संकिसा में विश्व धरोहर सप्ताह मनाने की शुरूवात

unnamed-1डा. राधेश्याम द्विवेदी
विश्व धरोहर सप्ताह:- विश्व धरोहर सप्ताह हर साल 19 नवंबर से 25 नवंबर तक पूरे विश्व में मनाया जाता है। ये मुख्यतः स्कूल और कॉलेज के छात्रों द्वारा लोगों को सांस्कृतिक विरासत के महत्व और इसके संरक्षण के बारे में जागरुक करने के लिये मनाया जाता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की ओर से ऐतिहासिक भारत के ढांचे, भ्रमण स्थलों से और भारत की सांस्कृतिक और पारंपरिक विरासत से संबंधित विभिन्न कार्यक्रमों का पूरे भारत में विश्व धरोहर सप्ताह मनाने के लिये आयोजित किये जाते हैं।
भारत में विश्व धरोहर सप्ताह मनाने के प्रतीक:- ऐसे कई भारतीय ऐतिहासिक धरोहर और भ्रमण स्थल हैं जो प्राचीन भारतीय लोगों की संस्कृति और परंपरा के प्रतीक है। भारतीय विरासत के महत्वपूर्ण स्मारकों और कलाकृतियों में से कुछ दिल्ली दरवाजा, अस्तोदीया गेट, दिल्ली का लाल किला, मानेक बुर्ज, सरदार पटेल की विरासत भवन, तीन दरवाजा, भादरा-गेट, सिद्दी सैय्यद, सारनाथ, काशी, वाराणसी के मन्दिर आदि हैं। भारत की ये विरासत और स्मारक प्राचीन सम्पति हैं इस संस्कृति और परंपरा की विरासत को आने वाली पीढ़ीयों को देने के लिये हमें सुरक्षित और संरक्षित करना चाहिये। भारत में लोग विश्व धरोहर सप्ताह के उत्सव के हिस्से के रूप में इन धरोहरों और स्मारकों के प्रतीकों द्वारा मनाते हैं विश्व धरोहर सप्ताह को मनाने के लिये स्कूलों और कॉलेजों के छात्र बड़े उत्साह के साथ भाग लेते हैं। स्कूल से छात्र संस्कार केन्द्र और शहर के संग्रहालय के निर्देशित पर्यटन में भाग लेते हैं। हर सप्ताह पर्यटन में भाग लेते हैं। वो ऐतिहासिक धरोहरों और देश के स्मारकों के संरक्षण के प्रोत्साहन से संबंधित विभिन्न नारे लगाते हैं। भारत की ऐतिहासिक विरासत पर पूरे हफ्ते स्कूली बच्चों के लिए एक प्रश्नोत्तरी प्रतियोगिता और सांस्कृतिक विरासत कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। संस्कृति और पुरातत्व विभाग के साथ-साथ भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा कुछ कार्यक्रम जैसे सेमिनार, फोटो प्रदर्शनी और अन्य प्रतियोगी कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।
विश्व धरोहर सप्ताह मनाने का प्रयोजन:-विश्व धरोहर सप्ताह मनाने का मुख्य उद्देश्य देश की सांस्कृतिक धरोहरों और स्मारकों के संरक्षण और सुरक्षा के बारे में लोगों को प्रोत्साहित करना और जागरूकता बढ़ाना है। प्राचीन भारतीय संस्कृति और परंपरा को जानने के लिए ये बहुत आवश्यक है कि अमूल्य विविध सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक स्मारकों की रक्षा की जाये और उन्हें संरक्षित किया जाये।
संकिसा का इतिहास:-संकिसा उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद के निकट स्थित आधुनिक संकिस ग्राम से समीकृत किया जाता है। संकिसा की दूरी पखना स्टेशन से मात्र 5-6 किलोमीटर की है पर उबड़ खाबड़ सडको की कहानी कहता यह क्षेत्र आज भी विकाश की बाट जोह रहा है मेन रास्तो से देखा जाए इटावा फर्रुखाबाद मार्ग के बीच धीरपुर चोराहे से 15 किमी एटा फर्रुखाबाद मार्ग पर अलीगंज से 22 किमी जीटी रोड भोगाव से 25 किमी की दूरी पर है पर हर मार्ग विकशित नहीं है ना सवारिओ के आवागमन की स्मूथ व्यवस्था है हिन्दू तीरथ और मुस्लिम तीरथ के विकाश की सरकार हरसंभव कोशिश करती है तो इस बौद्ध धर्म के विकास के लिए कोई पैकेज की व्यवस्था क्यों नहीं करती है जो प्रदेश की आमदनी का रास्ता भी खोलती है एक छोटा सा कस्बा को यदि सरकार चाहे तो पर्यटन के रूप में खोल सकती है और जिसका फायदा क्षेत्र के विकास में मिल सकता है साथ ही रोज़गार के अवसर भी पैदा हो सकते है .
उस समय यह नगर पांचाल की राजधानी कांपिल्य से अधिक दूर नहीं था। महाजनपद युग में संकिसा पांचाल जनपद का प्रसिद्ध नगर था। बौद्ध अनुश्रुति के अनुसार यह वही स्थान है, जहाँ बुद्ध इन्द्र एवं ब्रह्मा सहित स्वर्ण अथवा रत्न की सीढ़ियों से त्रयस्तृन्सा स्वर्ग से पृथ्वी पर आये थे। इस प्रकार गौतम बुद्ध के समय में भी यह एक ख्याति प्राप्त नगर था।
कनिंघम ने अपनी कृति ‘द एनशॅंट जिऑग्राफी ऑफ़ इण्डिया’ में संकिसा का विस्तार से वर्णन किया है। सांकाश्य का सर्वप्रथम उल्लेख संभवत: वाल्मीकि रामायण व महाभारत में है। रामायण में सांकाश्य-नरेश सुधन्वा का जनक की राजधानी मिथिला पर आक्रमण करने का उल्लेख है। सुधन्वा सीता से विवाह करने का इच्छुक था। जनक के साथ युद्ध में सुधन्वा मारा गया तथा सांकाश्य के राज्य का शासक जनक ने अपने भाई कुशध्वज को बना दिया। उर्मिला इन्हीं कुशध्वज की पुत्री थी-
‘कस्यचित्त्वथ कालस्य सांकाश्यादागत: पुरात्, सुधन्व्रा वीर्यवान् राजा मिथिलामवरोधक:।
निहत्य तं मुनिश्रेष्ठ सुधन्वानं नराधिपम् सांकाश्ये भ्रातरं शूरमभ्यषिञ्चं कुशध्वजम्’।
महाभारत काल में सांकाश्य की स्थिति पूर्व पंचाल देश में थी और यह नगर पंचाल की राजधानी कांपिल्य से अधिक दूर नहीं था। यहीं पर तथाकथित बौद्ध स्तूप या बिसारी देवी मंदिर के खंडहर हो चुके अवशेष पर कब्जे के लिये बौद्ध धर्मावलंबियों व सनातन धर्मियों के बीच विवाद दोनों ओर के नेता अपनी-अपनी दुकानें सजाते हैं। पूरे वर्ष इस खंडहर हो चुके विवादित टीले की ओर चंद विदेशी सैलानियों के अतिरिक्त कोई झांकने तक नहीं जाता है, परंतु शरद पूर्णिमा पर दोनों ओर से आस्था के फौजदार परंपरा के तौर पर सामने आ जाते हैं।
महात्मा बुद्ध का आगमन:- गौतम बुद्ध के जीवन काल में सांकाश्य ख्याति प्राप्त नगर था। पाली कथाओं के अनुसार यहीं बुद्ध त्रयस्त्रिंश स्वर्ग से अवतरित होकर आए थे। इस स्वर्ग में वे अपनी माता तथा तैंतीस देवताओं को अभिधम्म की शिक्षा देने गए थे। पाली दंतकथाओं के अनुसार बुद्ध तीन सीढ़ियों द्वारा स्वर्ग से उतरे थे और उनके साथ ब्रह्मा और शक भी थे। इस घटना से संबन्ध होने के कारण बौद्ध, सांकाश्य को पवित्र तीर्थ मानते थे और इसी कारण यहाँ अनेक स्तूप एवं विहार आदि का निर्माण हुआ था। यह उनके जीवन की चार आश्चर्यजनक घटनाओं में से एक मानी जाती है। सांकाश्य ही में बुद्ध ने अपने प्रमुख शिष्य आन्नद के कहने से स्त्रियों की प्रव्रज्या पर लगाई हुई रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर स्त्रियों के लिए भी बौद्ध संघ का द्वार खोल दिया था। पालिग्रंथ अभिधानप्पदीपिका में संकस्स (सांकाश्य) की उत्तरी भारत के बीस प्रमुख नगरों में गणना की गई है। पाणिनी ने में सांकाश्य की स्थिति इक्षुमती नदी पर कहीं है जो संकिसा के पास बहने वाली ईखन है। इसी नगर में महात्मा बुद्ध ने अपने प्रिय शिष्य आनन्द के कहने पर यहाँ आये व संघ में स्त्रियों की प्रवृज्या पर लगायी गयी रोक को तोड़ा था और भिक्षुणी उत्पलवर्णा को दीक्षा देकर बौद्ध संघ का द्वार स्त्रियों के लिए खोल दिया गया था। बौद्ध ग्रंथों में इस नगर की गणना उस समय के बीस प्रमुख नगरों में की गयी है। प्राचीनकाल में यह नगर निश्चय ही काफ़ी बड़ा रहा होगा, क्योंकि इसकी नगर भित्ति के अवशेष, जो आज भी हैं, लगभग चार मील की परिधि में हैं। चीनी यात्री फ़ाह्यान पाँचवीं शताब्दी के पहले दशक में यहाँ मथुरा से चलकर आया था और यहाँ से कान्यकुब्ज, श्रावस्ती आदि स्थानों पर गया था। उसने संकिसा का उल्लेख सेंग-क्यि-शी नाम से किया है। उसने यहाँ हीनयान और महायान सम्प्रदायों के एक हज़ार भिक्षुओं को देखा था। कनिंघम को यहाँ से स्कन्दगुप्त का एक चाँदी का सिक्का मिला था।
विशाल सिंह / हाथी की प्रतिमा:-विषहरी देवी के मन्दिर के पास जो स्तम्भ-शीर्ष रखा है वह सम्भवत: एक विशाल हाथी की प्रतिमा है न कि सिंह की ओर इस प्रकार इसका अशोक स्तम्भ का शीर्ष होना संदिग्ध है। युवांगच्वांग ने सांकाश्य का नाम कपित्थ भी लिखा है। संकिसा के उत्तर की ओर एक स्थान कारेवर तथा नागताल नाम से प्रसिद्ध है। प्राचीन किंवदंती के अनुसार कारेवर एक विशाल सर्प का नाम था। लोग उसकी पूजा करते थे और इस प्रकार उसकी कृपा से आसपास का क्षेत्र सुरक्षित रहता था। ताल के चिन्ह आज भी हैं। इसकी परिक्रमा बौद्ध यात्री करते हैं। सातवीं शताब्दी में युवानच्वांग ने यहाँ 70 फुट ऊँचाई स्तम्भ देखा था, जिसे सम्राट अशोक ने बनवाया था। उस समय भी इतना चमकदार था कि जल से भीगा-सा जान पड़ता था। स्तम्भ के शीर्ष पर विशाल सिंह प्रतिमा थी। उसने अपने विवरण में इस विचित्र तथ्य का उल्लेख किया है कि यहाँ के विशाल मठ के समीप निवास करने वाले ब्राह्मणों की संख्या कई हज़ार थी।
फ़ाह्यान द्वारा उल्लेख:- 5वीं शती में चीनी यात्री फ़ाह्यान ने संकिसा के जनपद के संख्यातीत बौद्ध विहारों का उल्लेख किया है। वह लिखता है कि यहाँ इतने अधिक विहार थे कि कोई मनुष्य एक-दो दिन ठहर कर तो उनकी गिनती भी नहीं कर सकता था। संकिसा के संघाराम में उस समय छ: या सात सौ भिक्षुओं का निवास था। युवानच्वांग ने 7वीं शती में सांकाश्य में स्थित एक 70 फुट ऊँचे स्तम्भ का उल्लेख किया है जिसे राजा अशोक ने बनवाया था। इसका रंग बैंजनी था। यह इतना चमकदार था कि जल से भीगा सा जान पड़ता था। स्तम्भ के शीर्ष पर सिंह की विशाल प्रतिमा जटित थी जिसका मुख राजाओं द्वारा बनाई हुई सीढ़ियों की ओर था। इस स्तम्भ पर चित्र-विचित्र रचनायें बनी थीं जो बौद्धों के विश्वास के अनुसार केवल साधु पुरुषों को ही दिखलाई देती थीं। चीनी-यात्री ने इस स्तम्भ का जो वर्णन किया है वह वास्तव में अद्भुत है। यह स्तम्भ सांकाश्य की खुदाई में अभी तक नहीं मिला है।
ज्ञान-प्राप्ति का स्थान:- जैन मतावलंबी सांकाश्य को तेरहवें तीर्थंकर विमलनाथ की ज्ञान-प्राप्ति का स्थान मानते हैं। संकिसा ग्राम आजकल एक ऊँचे टीले पर स्थित है। इसके आसपास अनेक टीले हैं, जिन्हें कोटपाकर, कोटमुझा, कोटद्वारा, ताराटीला, गौंसरताल आदि नामों से अभिहित किया जाता है। इसका उत्खनन होने पर इस स्थान से अनेक बहुमूल्य प्राचीन अवशेषों के प्राप्त होने की आशा है। प्राचीन सांकाश्य पर्याप्त बड़ा नगर रहा होगा क्योंकि इसकी नगर-भित्ति के अवशेष जो आज भी वर्तमान हैं, प्राय: 4 मील के घेरे में हैं।
विश्व धरोहर सप्ताह मनाने की शुरूवात:- भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण आगरा मंडल, आगरा के तत्वावधान में हर वर्षों की भांति इस वर्ष भी विश्व धरोहर सप्ताह 19से 25नवम्बर 2016 के मध्य आयोजित किया जा रहा है। इसकी शुरूवात 19 नवम्बर को प्राचीन स्थल, संकिसा जिला फर्रूखाबाद से की जा रही है। यहां पूर्वान्ह 11 बजे छायाचित्र प्रदर्शनी का उद्घाटन तथा चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। यहां आम जनता जागरूक करते हुए विद्यालयों के छात्रों के मध्य चित्रकला प्रतियोगिता आयोजित की जा रही है। इस सप्ताह के अगली कड़ी के रूप में 23 नवम्बर 2016 को प्रातः 9 से 11 बजे के मध्य अकबर का मकबरा, सिकन्दरा, आगरा पर स्वैच्छिक रक्तदान शिविर का आयोजन भी किया जा रहा है। जिसमें विभाग के अधिकारी, कर्मचारी के साथ -साथ आम पर्यटक भी स्वेच्छा से रक्तदान कर सकते हैं। दिनांक 25 नवम्बर 2016 को प्राचीन स्थल, कंकाली के टीला मथुरा पर भी छायाचित्र प्रदर्शनी एवं गायन प्रतियोगिता तथा सप्ताह का समापन किया जाना निश्चित किया गया है। सप्ताह को सफल बनाने के लिए विभाग के अधिकारी तथा कर्मचारी पूरी निष्ठा और तनमयता से लगे हैं।

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