आदिवासियों को पट्टे न मिलने से खफा है केंद्र

0
148

छत्तीसगढ और मध्य प्रदेश काफी पिछडे

नई दिल्ली 05 जनवरी। आदिवासियों को वनभूमि के पट्टे देने की केंद्र सरकार की महात्वाकांक्षी योजना में पलीता लगाने वाले राज्यों पर जल्द ही केंद्र सरकार की नजरें तिरछी हो सकतीं हैं। देश के लगभग डेढ दर्जन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लगभग तीस लाख प्रकरण अभी भी अफरशाही और बाबूराज के चलते लंबित पडे हैं।

केद्रीय आदिवासी कल्याण मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि सबों ने अब तक महज तीस हजार पट्टों के प्रकरणों का ही निष्पादन किया है। सूत्रों ने यह भी बताया कि गैर कांग्रेसी सरकारें जानबूझकर केंद्र सरकार की इस अभिनव योजना में दिलचस्पी नहीं ले रहीं हैं, ताकि कांग्रेस के परंपरागत आदिवासी वोट बैंक में सेंध लगाई जा सके।

सूत्रों ने यह भी संकेत दिए हैं कि लगभग दो लाख प्रकरण अभी तैयार पडे हुए हैं किन्तु राज्य सरकारें अनावश्यक अडंगेबाजी कर विलंब करने पर आमदा हैं। राज्यों में अफसरशाही और बाबूराज के बेलगाम घोडे इस कदर दौड रहे हैं कि हर माह राज्य सरकारों को पट्टा बांटने के लिए भेजी जाने वाली सूचना का जवाब देना भी सूबों की सरकारें उचित नहीं समझतीं हैं।

प्राप्त जानकारी के मुताबिक छत्तीसगढ में चार लाख, मध्य प्रदेश में पौने चार लाख, महाराष्ट्र में ढाई लाख, आंध्र प्रदेश में सवा तीन लाख, उडीसा में तीन लाख तो पश्चिम बंगाल में लगभग डेढ लाख प्रकरण अभी भी सरकारी मुहर की बाट ही जोह रहे हैं। बताया जाता है कि तमिलनाडू, केरल, बिहार, उडीसा, कर्नाटका, अरूणाचल प्रदेश आदि में तो अभी पट्टे बांटने के काम का श्रीगणेश भी नहीं किया जा सका है।

उधर सूबों की सरकारों की ओर से जो खबरें छन छन कर देश की राजनैतिक राजधानी दिल्ली पहुंच रहीं हैं, उनके मुताबिक सरकारी रिकार्ड में की गई जबर्दस्त हेरफेर के कारण इसमें विलंब हो रहा है। सूबों में अधिकारियों द्वारा आदिवासियों से आय प्रमाण-पत्र के साथ ही साथ अन्य दस्तावेजों की मांग की जा रही है, जिसके चलते इस काम में विलंब हो रहा है।

गौरतलब होगा कि कांग्रेसनीत केंद्र सरकार के आदिवासी मामलों के मंत्री कांतिलाल भूरिया स्वयं भाजपा शासित मध्य प्रदेश के आदिवासी अंचल से संसद सदस्य चुने गए हैं। उनके अपने सूबे में ही पौने चार लाख प्रकरणों का लंबित होना दर्शा रहा है कि वे केंद्र सरकार में अपनी जवाबदारी के निर्वहन के साथ अपने सूबे के आदिवासी भाईयों को कितना न्याय दिला पा रहे हैं।

-लिमटी खरे

Previous articleखेलों को बढावा देने भारत सरकार को बनानी होगी व्यवहारिक नीति
Next articleन्याय का रास्ता साफ करती मीडिया
हमने मध्य प्रदेश के सिवनी जैसे छोटे जिले से निकलकर न जाने कितने शहरो की खाक छानने के बाद दिल्ली जैसे समंदर में गोते लगाने आरंभ किए हैं। हमने पत्रकारिता 1983 से आरंभ की, न जाने कितने पड़ाव देखने के उपरांत आज दिल्ली को अपना बसेरा बनाए हुए हैं। देश भर के न जाने कितने अखबारों, पत्रिकाओं, राजनेताओं की नौकरी करने के बाद अब फ्री लांसर पत्रकार के तौर पर जीवन यापन कर रहे हैं। हमारा अब तक का जीवन यायावर की भांति ही बीता है। पत्रकारिता को हमने पेशा बनाया है, किन्तु वर्तमान समय में पत्रकारिता के हालात पर रोना ही आता है। आज पत्रकारिता सेठ साहूकारों की लौंडी बनकर रह गई है। हमें इसे मुक्त कराना ही होगा, वरना आजाद हिन्दुस्तान में प्रजातंत्र का यह चौथा स्तंभ धराशायी होने में वक्त नहीं लगेगा. . . .

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

* Copy This Password *

* Type Or Paste Password Here *

12,769 Spam Comments Blocked so far by Spam Free Wordpress