लेखक परिचय

राकेश कुमार आर्य

राकेश कुमार आर्य

'उगता भारत' साप्ताहिक अखबार के संपादक; बी.ए.एल.एल.बी. तक की शिक्षा, पेशे से अधिवक्ता राकेश जी कई वर्षों से देश के विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। अब तक बीस से अधिक पुस्तकों का लेखन कर चुके हैं। वर्तमान में 'मानवाधिकार दर्पण' पत्रिका के कार्यकारी संपादक व 'अखिल हिन्दू सभा वार्ता' के सह संपादक हैं। सामाजिक रूप से सक्रिय राकेश जी अखिल भारत हिन्दू महासभा के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राष्ट्रीय उपाध्यक्ष और अखिल भारतीय मानवाधिकार निगरानी समिति के राष्ट्रीय सलाहकार भी हैं। दादरी, ऊ.प्र. के निवासी हैं।

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राकेश कुमार आर्य

shahidoपाकिस्तान को लेकर इस समय भारत ही नही विश्व भी चिंतित है। विश्व को यह समझने में बहुत समय लग गया कि पाक पूर्णत: एक नापाक और आतंकी देश है। एक ऐसा देश जिसे राष्ट्र तो किसी भी दृष्टिकोण से नही कहा जा सकता। एक ऐसा देश जो पहले ही दिन अपने ही लोगों का खून बहाकर अपने ही आतंक पर खुशियां मना रहा था। जिसकी छठी ही खून से पुजी हो उसे मानवीय देश कैसे कहा जा सकता है? इस देश को ”मजहब की नाजायज औलाद” के रूप में देखने वाले उस समय के लोगों की दृष्टि से यदि 1947 में ही देखने की यथार्थ दृष्टि हमारे नेतृत्व द्वारा अपनाई जाती तो यह आज मानवता के लिए नासूर न बनता। यह तो हमारे ‘मानवतावादी’ नेतृत्व की उदारता रही जिसने इस आतंकी देश को भारत का भाई बनाये रखा। बड़ा भाई छोटे भाई के दंश झेलता रहा और विश्व के सामने अपनी ही बात को उठाने में बड़ा भाई इसलिए झिझकता रहा कि घर का मामला है-सब निपटा लिया जाएगा। हमारी हिचकिचाहट ने अपनी ही बात को सही ढंग से विश्व मंचों पर प्रस्तुत करने से हमें रोका और उसका लाभ मिला पाक को जो निरंतर हमें विश्व मंचों पर बदनाम करता रहा।

पर अब पाप का घड़ा भरने को है। सयाने लोग देख रहे हैं कि पाक और पाप का गहरा संबंध है। पाक ने ‘पाप’ से अपने जीवन की भोर देखी जब एक मजहब के नाम पर इसने भारत के टुकड़े करा डाले। लाखों नहीं अपितु करोड़ों लोगों की बददुआएं इसे मिलीं, लाखों विधवाओंं की चीत्कार और उन बहनों के हृदय से निकला करूणक्रंदन इसको पहले दिन ही सौगात में मिला जो पाकिस्तान से भारत आते-आते अपना सुहाग और सम्मान सब कुछ गंवा चुकी थीं।

कश्मीर की कसम को पाक ने नहीं सुना, कश्मीर की केसर को इसने बारूद के ढेर में दबा कर रख दिया, कश्मीर के स्वर्ग को इसने नर्क बना दिया, कश्मीर की बर्फ में बारूद का धुंआ उठाने का निंदनीय पाप किया, हजारों लाखों वर्ष से कश्मीर के स्वर्ग को विश्व के अनुपम वैदिक ज्ञान से सवाया करते आ रहे कश्मीरी हिंदू पंडितों के जीवन का इसने कोई मोल नही समझा। इसने इंसानी जिंदगी और पाशविकता में कोई अंतर नही करने का घोर पाप किया। इसने विश्व मंचों पर ‘पापपूर्ण झूठ’ फैलाने का कार्य किया। मस्जिदों से निकलने वाली अजानों का दुरूपयोग किया और एक वर्ग के विरूद्घ घृणा फैलाकर उन्हें 20वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में 14वीं शताब्दी की अमानवीय हिंसा और उत्पीडऩ का शिकार बनाने का प्रयास किया। हमारे सैनिकों के सर कलम किये, भारत के सैनिक के सिर को काटकर उसे फुटबाल की तरह प्रयोग करने का निंदनीय और क्रूर कृत्य किया। हमारे देश के नागरिकों को जेलों में ठूंसा और उन पर अमानवीय अत्याचार करने का पाप किया। कहने का अभिप्राय है कि एक नही सौ पाप किये। इस देश की ‘कृष्ण परंपरा’ है कि यह देश एक पाप पर उत्तेजित भी नही होता और जिसे एकबार अपना मान लेता है या कह लेता है या जिसके साथ कुछ देर तक रह लेता है उसके प्रति आंखों में सम्मान और हृदय में प्यार रखता है, पर जब गालियां सौ हो जाती हैं, तो फिर यह अपना ‘सुदर्शन चक्र’ उठा ही लेता है। तब इसके पास शत्रु के शरसंधान के अतिरिक्त कोई उपाय रहता भी नही है। पाक हमारी मानवता को और हमारी उदारता को हमारी दुर्बलता मानता रहा है-हमने पाक के पापों के प्रति नरमी बरतने वाले अपने ‘बापू’ को कोसा है। पंडित नेहरू को कोसा है, उनकी उदारता से अपनी असहमति प्रकट की है, परंतु आज तो बापू भी कह रहे लगते हैं कि ‘करो या मरो’ और नेहरूजी अपनी ससुराल (सरदार पटेल कश्मीर को नेहरू की ससुराल ही कहा करते थे) की दयनीय स्थिति को देखकर वर्तमान नेतृत्व को स्पष्ट संकेत कर रहे हैं कि अब ‘मोदी जी! आराम हराम है’ सारे विश्व में हिन्दुत्व की महानता का डिण्डिम घोष करने वाले स्वामी विवेकानंद भी मोदी सरकार को निर्देश कर रहे हैं-‘उत्तिष्ठत: जागृत: प्राप्य वरान्निबोधयति। अर्थात उठो जागो और लक्ष्य की प्राप्ति तक रूको नही।’ भारत की क्रांति के अग्रदूत महर्षि दयानंद का भी आदेश है कि ‘मोदीजी! षठे षाठ्यम् समाचरेत्’ दुष्ट के साथ दुष्टता का ही व्यवहार करो। सचमुच शिशुपाल अति कर चुका है। अब इसका काम तमाम होना ही चाहिए।

मोदी का नारा है ‘सबका साथ-सबका विकास’। आज देश का नारा है-‘सब मोदी के साथ-पाक का विनाश,’ यह सगुन बड़े संयोग और सौभाग्य से बना करता है। लगता है पाकिस्तान के पापों का हिसाब पाक साफ होने का समय आ गया है। अब इस बात पर लडऩे का समय नही है कि कश्मीर समस्या किसने उलझायी? कौन इसका दोषी है? और कौन इसका अपराधी है? अब तो केवल यह देखना है कि कश्मीर हमारा था और हम इसे लेकर रहेंगे। अब ना कोई कांग्रेसी है ना ही कोई भाजपाई या समाजवादी या साम्यवादी है सब भारतवासी हैं और सबकी दृष्टि में कश्मीरी वादी है। अब तो एक ही घोष हो-‘चलन्तु वीर सैनिका: प्रयान्तु वीर सैनिका:’-चलो वीर सैनिको प्रस्थान करो-मां भारती अपने टूटे हुए भाग से मिलना चाहती है-उसकी तड़प पूरी करो। सभी देशवासी गंभीर भूमिका का निर्वाह करने को तैयार हैं, सरकार से भी अपेक्षा है कि वह भी गंभीर और ठोस नीति अपनाकर पाक के पाप प्रक्षालन करे। देश उसके साथ है-आशा है मोदी जी सचमुच ही अपने सैनिकों के बलिदान को व्यर्थ नही जाने देंगे। आज के 18 सैनिक, 18 अक्षौहिणी सेना का अंत और महाभारत के 18 दिन….क्या कह रहे हैं?

One Response to “चलन्तु वीर सैनिका: प्रयान्तु वीर सैनिका:”

  1. Himwant

    बात की चाट है, लेकिन स्वाद नही आया. उरी जैसी जगह इस प्रकार आतंकियों का घुसना निश्चित रूप से सुरक्षा में चूक है. और यह जरूरी नही की सेना 100% घुसपैठ रोकने में सफल हो, मानवीय भूल से चुक हो जाती है. आगे चुक रोकने के चाक चौबंद प्रबन्ध होना चाहिए. इस घटना को भुला नही जाना चाहिए, सही समय पर उचित स्थान पर जोरदार तरीके से जवाब देने की जरूरत है. और यह काम सेना को करना है. यही 18 वीरो को सही श्रद्धांजलि होगी.

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