चलि दिए विराट विश्व !

चलि दिए विराट विश्व, लै कें फुरकैंया;
ध्यान रह्यौ निज सृष्टा, नैनन लखि पैयाँ !

पैंजनियाँ बजति रहीं, देखत है मात रही;
प्रकृति ललचात रही, झाँकन रुचि आत रही !
सँभलावत गात चलत, मोहन मन कछु सोचत;
अँखियन ते जग निरखत, पगडंडिन वे धावत !

पीले से वस्त्र पहन, गावत तुतलात रहत;
दौड़त कबहू ठहरत, स्मित वे बदन फिरत !
जसुमति औ नंद तकत, हर हरकत वे सिहरत;
‘मधु’ मानस द्रष्टा बनि, भूलि जातु दुनियाँ !

रचयिता: गोपाल बघेल ‘मधु’

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