चलो ना माँ अपने घर, जो घर “अपना” है

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ललित कौशिक

माँ का आंचल पकड़ करकें बोला बेटा चलों ना माँ, चलों न माँ, चलों न अपने घर ! वह घर जहाँ बरसों से अँधेरा है, कब पहुचेंगे वहाँ जहाँ अपनापन है ! जहाँ मेरे पूर्वजों की आत्मा है और मेरे अपनों की गूंजती वाणी है!

‘कब चलेंगे माँ आखिर कब’ हर रोज मुझकों कहानी सुनाकर और कल का नाम लेकर सुला देती हो, शायद आज भी आप उसी कोशिश में हो कि कल का नाम लेकर सहलाकर सुलाने की ! लेकिन आज शायद इसका जवाब आपको देना ही पड़ेगा ! आखिरकार बेटें के मुख से बार-बार पूछने पर माँ का कलेजा भर आया ! आखिर माँ ने गले को रुंधकर कह दिया, कौन सा कश्मीर, बेटा “कश्यप ऋषि” वाला कश्मीर या “जिहादी वाला” कश्मीर “भगवान शिव” वाला कश्मीर या “लहराती हुई नंगी तलवारों वाला कश्मीर”

मानती हूँ कि “जननी जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी” जननी जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान है लेकिन उस स्वर्ग से हमें निकाल कर शरणार्थी बना दिया गया है. बेटा कोई भी व्यक्ति अपनी जमीन, मातृभूमि को छोड़ना नही चाहता. लेकिन जब जुर्म की हद अस्मिता पर जाए उस समय सभी को समझौता करना पड़ता है ! कोई भी अपनी मौत के भय से अपनी मातृभूमि का त्याग नही करता है ! लेकिन जब बात माँ, बहन और बेटी की इज्जत पर आ जाए तो उस समय अपने सामने कोई चारा नहीं रहता है ! बस और बस एक पलायन ही चारा बचता है !

याद है, वो दिन हर सप्ताह की भांति शुक्रवार जुम्मे की नमाज़ के बाद जिहादियों का एक जत्था हाथों में नंगी तलवारे लेकर घूम रहें थे ! सारे कश्मीरी पंडितो के घर के दरवाजो पर नोट लगा दिया जिसमें लिखा था, “या तो मुस्लिम बन जाओ” या “कश्मीर में अपनी बहु, बेटियों को छोड़ कर भाग जाओ या फिर मरने के लिए तैयार हो जाओ”। पाकिस्तान की तत्कालीन प्रधानमंत्री “बेनजीर भुट्टो” ने टीवी पर कश्मीरी मुस्लिमों को भारत से आजादी के लिए भड़काना शुरू कर दिया। सारे कश्मीर की मस्जिदों में एक टेप चलाया गया। जिसमें मुस्लिमों को कहा गया कि वो हिंदुओं को कश्मीर से निकाल बाहर करें। उसके बाद सारे कश्मीरी मुस्लिम सडको पर उतर आये। उन्होंने कश्मीरी हिन्दुओं के घरो को जला दिया, कश्मीर हिन्दु महिलाओं का बलात्कार करके,फिर उनकी हत्या करके उनके नग्न शरीर को पेड़ पर लटका दिया गया। कुछ महिलाओं को जिन्दा जला दिया गया और बाकियों को लोहे के गरम सलाखों से मार दिया गया। बच्चों को स्टील के तार से गला घोटकर मार दिया गया, इन जालिमों ने 2 महीनें के बच्चों को भी नहीं बख्शा । कश्मीरी महिलाएं ऊँचे मकानों की छतो से कूद कूद कर जान देने लगी। कश्मीरी मुस्लिम, कश्मीरी हिंदुओं की हत्या करते चले गए और नारा लगाते चले गए कि उन पर अत्याचार हुआ है, और उनको भारत से आजादी चाहिए। जनवरी 19, 1990 को हिंदुओं को सामूहिक तौर पर कश्मीर से पलायन करना पड़ा था। वहाँ एक नरसंहार हुआ था, माताओं और बहनों के सम्मान को खुले तौर पर बेआबरू किया गया था, तब जाकर केवल पलायन ही एक रास्ता बचा था ! लेकिन उस समय देश के किसी भी व्यक्ति ने नहीं कहा देश रहने लायक नहीं है और न ही किसी ने अपने अवार्ड वापिस किए ! कहने को तो 19 जनवरी 1990 को हमे कश्मीर से निकाल दिया गया लेकिन जुर्म की हद तो 1947 यानि बंटवारे के समय से ही शुरू हो गई थी, लेकिन जुल्म सहते – सहते 90 के दशक में मजबूरन हमें कश्मीर छोड़ने के लिए मजबूर होना पडा ! जिस कारण हमनें शिविरों की शरण ली. जिससे आज तक वही हमारी जिंदगी बनी हुई है !

अब माँ और बेटे दोनों की आँखों से झर- झर करके आँसुओं की धारा बह रही थी !

इस घटना को सुनकर बच्चा सहम सा गया और गला रूँध गया ! अब माँ ने सहमें अपने बेटे को गले से लगा लिया, और कहा बेटा, “एक दिन हम जरुर जाएँगे अपने घर” पर शायद आखिर कब आयेगा, वो दिन आखिर कब आयेगा ?

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