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    परिवर्तन


    अचानक कैसे बदल जाता है सब कुछ
    राह चलते चलते आदमी तक बदल जाता है।
    गांव से शहर जाने वाले का पता बदल जाता है
    और तो और चेहरे का नकाब बदलता है हर पल।
    मुझे लगता है सिर्फ नहीं बदलता तो जनवाद
    मूर का ‘यूटोपिया’ और समाजवाद का वह स्वप्न
    ‘प्रत्येक से उसकी योग्यता अनुसार, प्रत्येक को उसकी आवशयकतानुसार’।
    पिछले 73 वर्षों में देश में गर कुछ हुआ है तो वह है
    ‘विचारधारा का अंत’ या फिर ‘इतिहास का अंत’
    बुद्धिजीवियों का रूपांतरण तथा ‘तटस्थतावाद’ का समर्थन
    सवाल दर सवाल उठा पर जवाब नहीं मिला
    किसी को कोई फर्क नहीं कि देश का क्या हुआ
    जब कभी पीछे लौटने की इच्छा हुई
    तब देश केंद्र में नहीं ‘हाशिए’ पर नजर आया।

    डॉ. ज्योति सिडाना
    डॉ. ज्योति सिडाना
    सहायक आचार्य , समाजशास्त्र विभाग राजकीय कला कन्या महाविद्यालय, कोटा (राजस्थान)

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