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    Homeटॉप स्टोरी‘जमूरे और मदारी’ तो रोज बदलते हैं लेकिन हम जहाँ हैं वहीं...

    ‘जमूरे और मदारी’ तो रोज बदलते हैं लेकिन हम जहाँ हैं वहीं रहते हैं …”

    gandhi maidan caseनौ सालों के बाद सुशासनी – सरकार को सूबे के सबसे बड़े हस्पताल पीएमसीएच की चिंता सताने लगी है , वो भी तब जब हालिया पटना हादसे के बाद इस हस्पताल की बदहाली से खुद मुख्यमंत्री को रूबरू होना पड़ा …. बेबाकी से कहूँ तो पीएमसीएच प्रशासन ने तो सूबे के मुखिया को ही उसकी ‘औकात’ बता दी …..अब तक के सुशासनी शासन-काल में चंद अखबार और मेरे जैसे चंद लोग जब सरकार का ध्यान इस ओर खींचने की कोशिश लगातार कर रहे थे तो उसमें सत्ताधारी दल के लोगों व उनके समर्थकों को ‘विपक्ष का हाथ’ नजर आ रहा था …… जबकि सच तो ये है कि बिहार के विपक्ष ने भी कभी इस ओर देखने या इसे दुरुस्त करवाने की कभी कोई पहल ही नहीं की ….. बिहार का सबसे बड़ा दुर्भाग्य तो ये है कि पक्ष हो या विपक्ष किसी के पास जनसरोकर से जुड़े मुद्दों के लिए ना तो कोई गंभीर सोच है और ना ही समय … हो भी कैसे राजनीति की दुकान सजाए रखने की ‘तुंगाफेरी’ से फुर्सत मिले तब ना….!! बिहार का राजनीतिक तबका तो ‘बयानवीरों’ से पटा पड़ा है ……दूर – दूर तक नजर दौड़ाने और माथा-पच्ची के बावजूद बिहार में एक भी जनप्रतिनिधि और राजनेता दिखाई नहीं देता है जिसके दिल में जनता के लिए रत्ती भर भी दर्द हो ….!

    मैंने तो साल की शुरुआत में अपनी सचित्रात्मक रिपोर्ट में इस हस्पताल को ‘नर्क’ की संज्ञा दी थी जो उस समय भी किसी भी दृष्टिकोण से गलत नहीं था और ना आज है ….. हालिया पटना हादसे वाले दिन भी मैं ने अपनी रिपोर्ट में पीएमसीएच की कुव्यवस्था और बदइंतजामी का जिक्र किया था और पटना के चंद अखबारों ने भी फिर से ‘कुम्भ्कर्णी सरकार’ को जगाने की कोशिश जारी रखी….. सरकार को ‘कुछ’ दिखा भी और सरकार हरकत में आई … पीएमसीएच से जुड़े चंद चिकित्सकों एवं पदाधिकारियों पर कारवाई की अनुशंसा की गई , सख्त दिशा-निर्देश जारी किए गए …… लेकिन कुछ भी बदलता हुआ नजर नहीं आ रहा ….

    हद तो तब हो गई जब रविवार को मुख्यमंत्री की पीएमसीएच में मौजूदगी और अनेकों बुलावे के बावजूद हस्पताल के अधीक्षक ने आने तक की जहमत नहीं उठाई ….. जिस प्रदेश के मुखिया को उसका ही एक मामूली सा अधिकारी तरजीह व तबज्जो ना दे उस प्रदेश की जनता तो ‘भगवान भरोसे’ ही है ना …..!! पीएमसीएच में ही पदस्थापित एक वरीय चिकित्सक से मैंने कल जब इस बारे में पूछा तो उन्होंने ढिठाई से हँसते हुए कहा “ ऐसे – ऐसे ‘जमूरे’ देखते – देखते हमारे बाल सफ़ेद हो गए …. ‘जमूरे और मदारी’ तो रोज बदलते हैं लेकिन हम जहाँ हैं वहीं रहते हैं …” इसके बाद मैंने आगे कुछ भी पूछना लाजिमी नहीं समझा और थोड़ी देर के लिए ये सोचने को विवश हो गया कि क्या बिहार की जनता के भाग्य-विधाता बने बैठे लोग सच में ‘जमूरों’ से ज्यादा ‘कुछ’ भी नहीं हैं …..!!

    आलोक कुमार

    आलोक कुमार
    आलोक कुमारhttps://www.pravakta.com/author/alok-kumar-2
    बिहार की राजधानी पटना के मूल निवासी। पटना विश्वविद्यालय से स्नातक (राजनीति-शास्त्र), दिल्ली विश्वविद्यालय से स्नाकोत्तर (लोक-प्रशासन)l लेखन व पत्रकारिता में बीस वर्षों से अधिक का अनुभव। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक व सायबर मीडिया का वृहत अनुभव। वर्तमान में विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के परामर्शदात्री व संपादकीय मंडल से संलग्नl

    1 COMMENT

    1. आलोक कुमार जी,आपने तो पटना मेडिकल काल्वेज के बद इंतजाम का जिक्र किया और करना जायज भी है,पर क्या आपने कभी यह जानने कि चेष्टा की कि वास्तव में सरकार नियंत्रित सभी अस्पतालों और स्कूलों की कमो बेश यही समस्या है.अगर आज सम्पूर्ण भारत अशिक्षित या अस्वस्थ है ,तो उसका एक मात्र कारण सरकारी स्कूल और सरकारीअस्पताल हैं.

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