सत्ता बदलो, संविधान बचाओ के मायने-

वीरेन्द्र परिहार

अभी 15 जून को प्रदेश में कांग्रेस पार्टी की ’’सत्ता बदलो, संविधान बचाओ’’ यात्रा का समापन हुआ। सच्चाई यह है जब से वर्ष 2014 से देश में मोदी सरकार आई है तभी से इस देश में बहुत लोगों का यह मानना रहा है कि देश में असहिष्णुता बढ़ गई है, संविधान को खतरा उत्पन्न हो गया है और देश में एक व्यक्ति की तानाशाही का खतरा उत्पन्न हो गया है। इसी के तहत तथाकथित वामपंथी एवं प्रगतिशील लेखकों एवं कुछ कलाकारों द्वारा सरकारी पुरस्कारों को वापस लौटाने का दौर जारी रहा। यद्यपि तानाशाही के सन्दर्भ में कभी एक व्यक्ति यानी नरेन्द्र मोदी की तानाशाही की बात की गई तो कभी नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के तानाशाही की बातें की गई। तो कभी-कभी मोदी के साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के तानाशाही की भी बातें की गई। स्वतः राहुल गांधी ने इस दिशा में बढ़-चढ़कर आरोप लगाए। इसी से यह साबित हो जाता है कि ये सब बातें हवा-हवाई है और एक सुनियोजित प्रचारतंत्र का हिस्सा मात्र है क्योंकि तानाशाही किसी व्यक्ति विशेष की ही हो सकती है भारत में इसका उदाहरण एक दौर में श्रीमती इंदिरा गांधी थीं, तो पड़ोसी पाकिस्तान एक लम्बे समय तक सैनिक तानाशाही से ग्रस्त रहा। कभी ईराक में सद्दाम हुसैन और लीबिया में कर्नल गद्दाफी इसके जीते-जागते उदाहरण थे। वर्तमान दौर में भी उत्तर कोरिया में किम जोंग उन जैसे शासक इसके जीवंत और ताजा उदाहरण हैं।
जहां तक बात सत्ता बदलने की है, उस अभियान की बात अपनी जगह पर है क्योंकि राजनीतिक दल सत्ता के लिए ही राजनीति करते हैं। इसी के तहत विपक्षी दलों में एका की खबरे चल रही हैं। यह बात अलग है कि ऐसी स्थिति में कर्नाटक की तरह कांग्रेस पार्टी को पता नहीं कितने राज्यों में पिछलग्गू की भूमिका में रहना पड़े। यह भी बड़ी सच्चाई है कि आज भी राजग के गठबंधन में 47 दल शामिल है। सीएसडीएस के ताजा सर्वे में नरेन्द्र मोदी की लोकप्रियता पूर्ववत कायम है। पर विपक्षी एका का फायदा कुछ राज्यों में एक हद तक जरूर मिल सकता है।
विचारणीय प्रश्न यह कि नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इस चार सालों में ऐसा क्या किया जिससे लोकतात्रिक मूल्यों और संविधान के अस्तित्व के लिए संकट पैदा हो गया? इस कसौटी पर यह देखना होगा कि क्या सरकार ने कहीं नागरिकों के अधिकारों में कटौती की ? इसका कोई उदाहरण नहीं। इसके उलट नागरिक अधिकारों की रक्षा के लिए अनेक कदम उठाए गए। मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व काल में दस जनपथ ’’सुपर सरकार’’ का केन्द्र बन गया था। सरकार की फाइलें तक वहां भेजी जाती थी। प्रधानमंत्री कार्यालय के महत्व को पुनः स्थापित कर प्रधानमंत्री मोदी ने संसदीय लोकतंत्र की उन तमाम कमियों को पूरा किया जो कांग्रेस पार्टी के राज में आ चुकी थी। अलवत्ता कांग्रेस पार्टी ने बौखलाकर इस पूरे दौर में हंगामा खड़ा कर संसद को बाधित करने का प्रयास जरूर किया। यहां तक कि जब श्रीमती सोनिया गांधी एवं राहुल गांधी को न्यायालय द्वारा नेशनल हेराल्ड प्रकरण में धोखाधड़ी का अभियुक्त बनाया गया तब भी संसद को बाधित किया गया। कहने का तात्पर्य यह कि इस तरह से किसी न किसी बहाने संसद को चलने से रोका जाता रहा ताकि संसद में कोई सार्थक बहस न हो सके और जरूरी विधेयक पारित न हो सकें । इसका आशय यही ताकि मोदी सरकार सुचारू रूप से अपना काम न कर सके। अब इस तरह से जनता द्वारा निर्वाचित सरकार को काम-काज करने से रोकना किन लोकतांत्रिक मूल्यों के तहत आता है, और संविधान की कसोटी पर खरा उतरता है यह तो कांग्रेस पार्टी ही बता सकती है?
कांग्रेस पार्टी मोदी सरकार पर जारे-शोर से यह आरोप लगाती रही है कि मोदी सरकार न्यायपालिका को अपने जा सकता है। इसके बाद भी जब केन्द्र सरकार ने कुछ जजों की नियुक्तियों को लेकर सवाल उठाए तो कांग्रेस पार्टी इसे न्यायपालिका पर हमला बताती रही, जबकि केन्द्रीय विधि एवं न्याय मंत्री श्री रविशंकर प्रसाद यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उनका मंत्रालय कोई पोस्ट आंफिस नहीं है। कहने का आशय  यह कि किसी जज की नियुक्ति में उसकी ईमानदारी और कार्यप्रणाली यदि संदिग्ध है तो उस पर जनता की चुनी सरकार को आपत्ति उठाने का पूरा अधिकार है। बहुत से लोगों को आज तक समझ में नहीं आया कि न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन से न्यायपालिका की स्वतंत्रता कैसे प्रभावित हो जाती? जब कि इसमें जो छः सदस्य होते उसमें सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस के साथ दो वरिष्ठतम जज ही सदस्य होते। फिर जो दो सदस्य और चुने जाते वह प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और चीफ जस्टिस द्वारा ही चुने जाते, तो क्या मात्र भारत के विधि और न्याय मंत्री के उस आयोग में रहने से न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अपहरण हो जाता। भारत को छोड़कर दुनिया के और किसी भी देश में ऐसा अंधेर नहीं है कि जज ही जजों की नियुक्ति करें।
इंदिरा गांधी के दौर में न्यायपालिका को कैसे बधिया बनाया गया यह किसी से छिपा नहीं है। उस समय यह देखा जाता था कि किसी जज की क्या पृष्ठभूमि है। 1975 में तीन वरिष्ठतम जजों को दरकिनार कर कैसे ए.एन.राय को चीफ जस्टिस बनाया गया यह छिपा नहीं है जिसके चलते उन तीनों वरिष्ठतम जजों को इस्तीफा देना पड़ा था। इसी तरह से जस्टिस एच.आर.खन्ना को भी इस्तीफा देने को बाध्य होना पड़ा था। वस्तुतः उस दौर में नियंत्रित न्यायपालिका की खुले आम वकालत की जाती थी। प्रख्यात विधिवक्ता ए.बी. नूरानी ने फ्रन्टलाइन पत्रिका में एक लेख लिख कर यह बताया कि इन्दिरा गांधी के प्रधान सचिव पी.एन. हक्सर को अक्सर जजों के पास उन्हें डराने और अपने मनमाफिक फैसले कराने के लिए भेजा जाता था। (उल्लेखनीय है कि नूरानी कोई मोदी समर्थक नहीं है) उस दौर में संविधान में व्यापक फेर बदल की बातें की र्गइं। कुछ कांग्रेस नेता तो एक नई संविधान सभी बनाने की बाते करने लगे थे। इसी उद्देश्य के लिए बनाई गई स्वर्ण सिंह समिति ने यहां तक कि राष्ट्रपति पद्धति लागू करने की सिफारिश की। पर यह ऐसा नही कि जैसा अमेरिका में है, जहाॅ शक्ति पृथककरण का सिद्धान्त लागू हो। बल्कि यहां संसद और न्यायपालिका राष्ट्रपति के अधीन होती। यदि इंदिरा गांधी 1977 में चुनाव जीत जाती तो संविधान उनके हांथ में खिलौना मात्र होता। बड़ी बात यह कि कांग्रेस पार्टी की यही प्रवृत्ति विपक्ष में रहते हुए भी बनी हुई है, तभी तो जब जस्टिस लोया प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय कांग्रेस पार्टी के षड़यत्रों का पर्दाफाश करता है तो वह जजों पर हमला करने में कहीं नहीं झिझकती। सर्वोच्च न्यायालय के चीफ जस्टिस अरूण मिश्रा पर कांग्रेस पार्टी इसलिए महाभियोग लाने का प्रयास करती है ताकि राम जन्मभूमि पर सुनवाई न हो सके, क्योंकि संभावना यह है कि राम जन्मभूमि पर सुनवाई में फैसला राम मंदिर के पक्ष में होता जिसका फायदा 2019 के चुनाव में भाजपा को मिलता। कांग्रेस पार्टी के नेता- वकील कपिल सिब्बल पहले ही सर्वोच्च न्यायालय में राम जन्मभूमि पर 2019 के लोकसभा चुनावों केे बाद सुनवाई के लिए कह चुके हैं। कुल मिलाकर ’’उल्टा चोर कोतवाल को डांटे’’ की कहावत ही लागू होती है। असलियत यही कि जिन्होंने निर्बाध सत्ता के लिए हमेशा लोकतांत्रिक मूल्यों का हनन किया और संविधान में इतने संशोधन किए के वह उनकी सत्ता को मजबूत करने का पाया बन सके- वही लोग सत्ता की बेताबी के लिए लोकतांत्रिक मूल्यों और संविधान बचाने की दुहाई दे रहे हैं। कांग्रेस पार्टी के दोहरेपन को समझाने के लिए एक ही उदाहरण काफी होगा। पण्डित जवाहरलाल नेहरू अपने प्रधानमंत्रित्वकाल में नारा तो ‘‘आराम हराम है’’ का देते थे परंतु लेडी माउटबेटन को रोजाना एक प्रेम पत्र लिखतें थे (यह बात जो लेडी माउंटबेटन की जीवनी छपकर आई है, उसमें लिखी है) कहने की जरूरत नहीं की भारत जैसा समस्याग्रस्त देश का प्रधानमंत्री कितने आराम में था। (क्योंकि ऐसे पत्र आराम के क्षणों में ही लिखे जा सकते हैं।)

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