चीन अब भारत से परेशान क्‍यों है ?

डॉ. बचन सिंह सिकरवार

चीन भारत के दक्षिण चीन सागर में वियतनाम के साथ संयुक्त तेल खोज परियोजना सहयोग के बहाने वियतनाम से प्रगाढ़ सम्बन्ध बनाने तथा इस सागर के अन्तर्राष्ट्रीय जल में अपने कानूनी दावों को सुदृढ़ करने से बेहद नाराज है। इसके लिए वह वियतनाम के साथ-साथ फिलीपींस को भी कोस रहा है। उसका आरोप है कि ये दोनो देश तेल से समृध्द विवादित दक्षिण चीन सागर पर चीन के दावे को खारिज करने के लिए भारत तथा अमरीका जैसी बाहरी शक्तियों की सहायता ले रहे हैं। ऐसा करके ये दोनों मुल्क इस मसले को चीन के साथ द्विपक्षीय ढंग से सुलझाने के अपने वादे से मुकर रहे हैं। उसका यह भी कहना कि ये देश सौदेबाजी के तहत बाहरी ताकतों को बुला रहे है, किन्तु उनका यह मंसूबा कभी पूरा नहीं होगा।

अब अच्छी बात यह है कि भारत उसके विरोध और धमकियों की कतई परवाह नहीं कर रहा है। सितम्बर में विदेशमंत्री एस.एम.कृष्णा की वियतनाम यात्रा को लेकर अपनी नाखुशी जतायी। इस यात्रा के दौरान भारत ने वियतनाम के साथ वैज्ञानिक, तकनीकी, शिक्षा ,व्यापार, तेल और गैस अन्वेषण, रक्षा, सेना,नौसेना और वायु सेना के संयुक्त अभ्यास, मीडिया दलों का आदान-प्रदान और ढाँचागत सुविधाओं के विकास आदि के क्षेत्र में सहयोग के समझौतों पर हस्ताक्षर किये थे। इससे पहले इसी जुलाई माह में वियतनाम की सद्भावना यात्रा गए भारतीय नौसेना पोत रावत को चीन की नौसेना ने दक्षिण चीन सागर की सीमा से बाहर जाने को कहा था। तब भारत ने इस घटना को अधिक महत्त्व नहीं दिया, लेकिन सागर की अन्तर्राष्ट्रीय सीमा में मुक्त आवागमन के अधिकार का हवाला देकर दक्षिण चीन सागर में अन्वेषण के चीनी विरोध को खारिज कर दिया।

दरअसल ,चीन अपनी विभिन्न प्रतिक्रियाओं से भारत समेत पूरी दुनिया को यह बताने-जताने की बराबर कोशिश कर रहा है कि सम्पूर्ण दक्षिण चीन सागर ही नहीं, वरन् स्प्रेतली, परसेल्स द्वीप भी उसके हैं। इन द्वीपों में काफी मात्रा में तेल और गैस मिलने की सम्भावनाएँ हैं। इस कारण दक्षिण चीन सागर में तेल और गैस की खोज करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उसका है। चीन का आरोप है कि भारत का वियतनाम के साथ तेल की खोज का अनुबन्ध करना गम्भीर राजनीतिक’ उकसावा है। वह इस क्षेत्र के देशों के दावों को तो एक बार को मान भी सकता ह , किन्तु उसे दूसरे देशों की अपने इलाके में हस्तक्षेप मंजूर नहीं है। चीन के इस दावे के विपरीत वियतनाम का कहना है कि संयुक्त राष्ट्रसंघ के समझौते के अनुसार ब्लाक संख्या-और पर उसके सम्प्रभु अधिकार हैं। इनमें तेल की खोज के लिए चीन से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। दक्षिण चीन सागर को लेकर चीन की वियतनाम समेत इस क्षेत्र के दूसरे देशों के साथ तनातनी नयी नहीं है। चीन अपने नौसैनिक शक्ति के बल पर दक्षिण चीन सागर और इसके तेल तथा गैस पर अपने एकमात्र स्वामित्व होने का दावा कर रहा है जबकि यह सागर ही इस इलाके के मुल्कों की आर्थिक गतिविधियों के संचालन का सबसे महत्त्वपूर्ण माध्यम है। उसके इस दावों को अमरीका भी नहीं मानता,लेकिन वह इस क्षेत्र चीन, ताइवान ,फिलीपीन्स, मलेशिया,इण्डोनेशिया, वियतनाम के विवादित दावों का मध्यस्थता कर अन्तर्राष्ट्रीय तंत्र गठित करने में सहयोग करने का तैयार है, यह संकेत गत वर्ष अमरीकी विदेश मंत्री हिलेरी किलण्टन जरूर दिया था। वैसे भी चीन को भारत से ऐसी शिकायत करने का कोई नैतिक और किसी भी तरह का अधिकार नहीं है। वस्तुतः अब भारत चीन के साथ वही कर रहा है जो वह उसके साथ दशकों से अब तक करता आया है। चीन पाक अधिकृत कश्मीर में अपनी सेना के साये में कई जल विद्युत, सड़क निर्माण आदि परियोजनाओं पर काम कर रहा है, वह भारत के विरोध की लगातार अनदेखी कर रहा है। उसने जम्मू-कश्मीर के लद्दाख इलाके बहुत बड़े भू-भाग पर अनधिकृत कब्जा जमाये बैठा है और बार-बार इस इलाके में घुसपैठ भी करता आ रहा है। इसी अगस्त माह में उसके सैनिक लेह इलाके में डेढ़ किलोमीटर अन्दर घुस आये और सेना के खाली पड़े बंकरों को तोड़ गए।इससे पहले सियाचिन क्षेत्र में कराकोरम राजमार्ग बना चुका है जिससे भारत की सुरक्षा को गम्भीर खतरा पैदा हो गया।

चीन पाकिस्तान के सिन्ध प्रान्त के कराची नगर में ग्वादर बन्दरगाह का निर्माण में लगा,जिससे भारत की सुरक्षा का खतरा बढ़ गया है। चीन भारत के अरुणाचल प्रदेश के तवांग इलाके समेत सिक्किम आदि पर जब तक दावे करता रहता है। भारत से लगी सीमा के निकट चीन बड़ी-बड़ी सड़कें ,हवाई पट्टियाँ, बंकर, मिसाइलें लगा रखी हैं। वह भारत को हर तरफ से घेरने में भी जुटा है। भारत के पड़ोसी नेपाल में माओवादियों की मदद के साथ-साथ नक्सलियों का सहयोगी बना हुआ। चीन ने हिन्द महासागर में अपनी गतिविधियाँ बढ़ाने के साथ-साथ आर्थिक और हथियारों की आपूर्ति कर श्रीलंका में भी अपनी पैठ बढ़ा ली है। भारत के रक्षामंत्रा ए.के.एंटनी का भी कहना कि हमें दक्षिण चीन सागर में बीजिंग की बाधा से उतनी समस्या नहीं है जितनी हिन्द महासागर और भारत के चारों ओर चीन की सक्रियता से है।

पाकिस्तान का वह शुरू से ही साथी रहा है और अस्त्रों-शस्त्रों के साथ हर तरह से उसकी मदद करता रहा है। चीन द्वारा जम्मू-कश्मीर और अरुणाचल के भारतीय नागरिकों को नत्थी वीजा देने पर भारत अपना विरोध व्यक्त करता आया है, किन्तु उसने ऐसा करना बन्द नहीं किया। अब भारत ने चीन की हिन्द महासागर और दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ाने की नीति का मुकाबला करने के लिए पूर्वी एशियाई देशों से हर तरह के सम्बन्ध बनाने की नीति अपना रहा है। इसके अन्तर्गत वियतनाम के साथ भारत ने सुरक्षा साझेदारी बढ़ायी है। इसी के तहत भारत को तरांग बन्दरगाह के उपयोग करने का अधिकार प्राप्त हुआ है। इस बन्दरगाह से भारत समुद्री रास्तों की पहरेदारी और समुद्री लुटेरों से जलपोतों की सुरक्षा कर पाएगा।

चीन ने भारतीय अर्थव्यवस्था में भी अपनी गहरी पैठ बना ली है। इस साल भारत और चीन का द्विपक्षीय व्यापार अरब डॉलर पर पहुँच गया है ,मगर इसमें से अरब डॉलर का भारत में सिर्फ आयात हुआ हैं। बढ़ते व्यापार घाटे को देखते हुए योजना आयोग उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया चीन के साथ पहली रणनीतिक आर्थिक वार्ता एस.ईडी में अपने बाजार खोलने की माँग रखी है, ताकि चीन के भारतीय अर्थव्यवस्था पर बढ़ते दबाव को नियंत्रित किया जा सके।

जहाँ तक चीन और वियतनाम के बीच शत्रुता का प्रश्न है तो यह कोई नयी नहीं है। पूर्व में वियतनाम चीन के कब्जे में था। सन् में चीन फ्रान्स से हार गया। इसके पश्चात हिन्द चीन (कम्बोडिया,लाओस,वियतनाम) पर चीन का नियंत्रण खत्म हो गया। तदोपरान्त वियतनाम की सोवियत संघ से मित्रता ने चीन को क्रुध्द कर दिया। अन्ततः चीन ने फरवरी, में वियतनाम पर आक्रमण कर दिया, जबकि भारत के विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी चीन की यात्रा पर थे। इस हमले से नाराज होकर वह अपनी यात्राा अधूरी छोड़ कर स्वदेश लौट आये। इस जंग में चीन को अपने हजार और वियतनाम एक लाख से ज्यादा सैनिक खोने पड़े थे।

चीनी सेना राजधानी हनोई के पास पहुँच गयी थी। उस समय कोई पन्द्रह दिनों बाद अन्तर्राष्ट्रीय दबाव में चीनी सेना को अपनी सीमा में लौटने को विवश होना पड़ा ,किन्तु सोवियत संघ के विघटन तक दोनों देशों में तनातनी बनी रही।

यद्यपि हिन्द चीन के इलाके को देश शताब्दियों से भारतीय संस्कृति एवं बौध्द धर्म के कारण हमें अपना मानते रहे, तथापि गुलामी की मानसिकता के चलते भारत केवल पश्चिमी मुल्कों की तरफ दोस्ती का हाथ पसारे खड़ा रहा। इस दौरान चीन ने इस इलाके में अपना प्रभाव विस्तार किया। दक्षिण पूर्वी एशिया के देशों में वियतनाम का बड़ा महत्त्व है।

पिछले सालों में भारत और वियतनाम के आर्थिक सम्बन्ध में दस गुना से ज्यादा बढ़ोत्तरी हुई है जो अब लगभग में तीन अरब डॉलर तक पहुँच गई है। इस समय भारत वियतनाम की वायु सैनिकों को प्रशिक्षित कर रहा है। इसके अलावा भविष्य में वह वियतनाम को गैर परमाणु प्रक्षेपास्त्रों देने की सोच कर रहा है।

चीन के पूर्वी एवं दक्षिण पूर्वी क्षेत्रा में तेजी से बढ़ रहे सामरिक एवं आर्थिक प्रभाव को थामने में वियतनाम भारत का सहायक हो सकता है। नवम्बर, में भारत ने वियतनाम के साथ गंगा-मेकोंग सहयोग करार पर हस्ताक्षर किये थे। भारत की वियतनाम से मैत्री दक्षिण-पूर्वी एवं पूर्वी एशियाई क्षेत्र के चीन की चुनौतियों का जवाब देने के लिए बेहद जरूरी है। इसके बगैर चीन ड्रैगन को भारत को घेरने से रोक पाना सम्भव नहीं है।

* लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं।

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