वर्गीय एकता के पक्ष में

-अरुण माहेश्वरी

‘तद्भव’ पत्रिका के ताजा अंक में पी.सी.जोशी का लेख है ‘विस्थापन की पीड़ा’। ज्योति बसु के साथ उनके संस्मरणों पर आधारित लेख। ज्योति बसु से श्री जोशी की मुलाकात कोलकाता में 55 साल पहले 1955 में हुई थी जब वे उनके चुनाव क्षेत्र बारानगर में स्थित प्रोफेसर चिन्मोहन महालनोबीस के प्रतिष्ठित संस्थान इंडियन स्टेटिस्टिकल इंस्टीट्यूट (आईएसआई) में काम करने के लिये आये थे। जोशीजी भारी दुविधा में थे। उनके अग्रज कामरेड, कम्युनिस्ट पार्टी के वरिष्ठ नेता पी.सी.जोशी चाहते थे कि वे अकादमिक जीवन को अपनाने के बजाय राजनीतिक पूरावक्ती कार्यकर्ता का जीवन चुनें और उत्तर प्रदेश की धरती को न छोडें। दूसरी ओर, बौद्धिक क्षेत्र के गुरु प्रो.राधाकमल मुकर्जी और प्रो. धुर्जुटि प्रसाद मुकर्जी ने स्वतंत्र बौद्धिक कर्म की अहमियत के बारे में जो संस्कार दिये थे, वे जोशी जी को अकादमिक दुनिया की ओर आकर्षित कर रहे थे। जोशीजी जब कोलकाता के लिये रवाना हो रहे थे तब उनके अग्रज कामरेड जोशी ने उन्हें कहा कि ऐसी स्थिति में वे ‘इस कटु सत्य को मान लें कि वे कानपुर के मजदूरों के या अल्मोड़ा के किसानों के बीच होलटाइमर के रूप में काम करने का उनका प्रस्ताव ठुकरा कर जो रास्ता अपना रहे हैं वह जनसेवा की हार्ड लाइफ (कठिन जिन्दगी) के स्थान पर मघ्यवर्गीय ‘साफ्ट लाइफ’ (आराम की जिन्दगी) चुनने का रास्ता है जिस रास्ते पर चल कर हमारे सामने ही अनके युवा अपने सच्चे कत्र्तव्य पथ से भटकने लगे हैं और आप भी उन्हीं का अनुगामी बन रहे हैं।’ दूसरी ओर, कोलकाता आने पर प्रो.महालनोबिस ने कामरेड जोशी की आशंकाओं के जवाब में उनसे कहा कि उनके अग्रज का यह सोचना गलत है कि अकादमिक जीवन ‘साफ्ट लाइफ’ है, बल्कि हर मामले में पार्टी नेताओं का मूंह जोहने वाले, अपने स्वतंत्र सोच की तकलीफ से बचने वाले पार्टी एक्टिविस्टों का जीवन कहीं ज्यादा साफ्ट कहलायेगा। प्रो.महालनोबिस ने उनसे यह भी कहा कि पार्टी के सर्वोच्च नेता रहे व्यक्ति की असहमति के बावजूद बौद्धिक कर्म में प्रवेश करने का निर्णय लेकर उन्होंने जो नैतिक साहस, मनोबल और वैचारिक स्वतंत्रता का परिचय दिया है, वह उनके भविष्य का शुभ संकेत है।

बहरहाल, इन दो ध्रुवांतों में कौन सही और कौन गलत का निर्णय न कर पाने के असमंजस से उत्पन्न दुविधा जोशी जी को ग्रसे हुए थी। उनके शब्दों में, मैं स्वयं को दो परस्पर विरोधी वैचारिक दबावों और खिंचावों के द्वंद्व में फंसा हुआ महसूस कर रहा था – एक ओर मेरे अग्रज और अन्य वरिष्ठ साथियों का ‘पॉलिटिकल एक्टीविज्म’ से संबंध तोड़ने के चलते दबाव और दूसरी ओर मेरे गुरु प्रोफेसर राधाकमल मुकर्जी और धूर्जटि प्रसाद मुकर्जी – दो मुकर्जियों – का बौद्धिक कर्म से जुड़ने का संयुक्त दवाब और प्रभाव। इन परस्पर विरोधी दबावों से मेरा सम्पूर्ण व्यक्तित्व, मेरा समग्र मानसिक जगत ही जैसे दो हिस्सों में विभाजित हो गया था। कभी एक दबाव, एक प्रभाव मेरे ऊपर हावी हो जाता और कभी दूसरा प्रभाव और दबाव हावी हो जाता। कोलकाता में भी का. मुजफ्फर अहमद (काका बाबू) से पहली मुलाकात और काका बाबू की प्रारंभिक प्रतिक्रिया ने उनकी इस दुविधाभरी मनोदशा को बढ़ाया था। ऐसे समय में जोशीजी की मुलाकात कामरेड ज्योति बसु से आईएसआई के कैम्पस में हुई थी।

ज्योति बसु उस क्षेत्र के विधायक के नाते संस्थान में आये थे। संस्थान के अन्य लोगों से मुलाकात और दूसरी सामान्य समस्याओं पर राय-मशविरे के बाद ज्योति बसु जोशीजी से अलग से उनके एक और साथी हरकुमार चतुर्वेदी के कमरे में मिले थे। ज्योति बसु ने संस्थान की अन्य समस्याओं पर विचार करते वक्त वहां के प्लानिंग डिविजन के साथियों से यह सवाल किया था कि क्या राष्ट्रीय स्तर की योजना सौ फीसदी उसी तरह प्रदेश के स्तर पर भी प्रासंगिक होगी, या प्रदेश-प्रदेश की विशिष्टताओं के आधार पर प्रदेश स्तर की योजना का अलग से निर्धारण करना होगा? इसके साथ ही ज्योति बसु ने ‘रीजनल प्लानिंग’ की बात भी की। इसपर जोशी जी की टिप्पणी है कि सहज बुद्धि और अनुभव के संयोग से ज्योति बसु का यह सुझाव और प्रस्ताव दीर्घकालीन दृष्टि से कितना महत्वपूर्ण था यह तब उतना स्पष्ट नहीं था जितना बाद में हुआ और आज तो यह लगता है कि दूरदृष्टि का धनी व्यक्ति ही इतना पहले इतनी महत्वपूर्ण बात कह सकता था।

जो भी हो, हम यहां मुख्य रूप से जिन बातों की ओर अपने पाठकों का ध्यान खींचना चाहते हैं, वे हैं ज्योति बसु के साथ जोशी जी और चतुर्वेदी जी की अलग से हुई बातें। ज्योति बसु ने जोशीजी से मिलते ही उन्हें बताया कि काका बाबू से वे उनके बारे में जान चुके हैं और उनसे मिलने के मौके की तलाश ही कर रहे थे। उसी समय जोशीजी के साथी चतुर्वेदी जी ने ज्योति बसु को जोशीजी की दुविधा और व्यथा के बारे में बताया। उसे सुनते ही ज्योति बसु ने हंसते हुए कहा कि काका बाबू भी पहले यही सोच रहे थे कि ‘यंगर जोशी’ को यूपी में जमे रहने का कोई तरीका निकालना चाहिए था जैसा ‘सीनियर जोशी’ भी चाहते थे। लेकिन ज्योति बसु ने परिस्थितियों के दबाव को मानते हुए उनसे इस विवशता को ही एक सुनहरे अवसर में बदल देने के लिये जो बातें कही, वे इतनी मार्के की बातें है कि उनकी रोशनी में मौजूदा परिस्थितियों में भारत की समग्र राजनीति के बारे में सोचने का एक नया आधार और नजरिया भी मिल सकता है। ज्योति बसु ने उन्हें बताया कि परिस्थितियों के दबाव से लाखों लोग, जिनमें उनकी तरह पढ़े-लिखे लोगों से कहीं ज्यादा संख्या में आम लोग यू.पी., बिहार के गांवों और शहरों से बंगाल में, विशेष रूप से कलकत्ता में रोजी-रोटी के अवसर खोजने पर मजबूर हुए हैं। इसका नतीजा है कि एक छोटा मोटा उत्तर प्रदेश, एक छोटा मोटा बिहार बंगाल में, कलकत्ते में, बस गया है। नतीजा यह है कि बड़े पैमाने पर पड़ोसी राज्यों से आर्थिक और सामाजिक विस्थापन के फलस्वरूप पारंपरिक बंगाल का चरित्र ही बदल गया है। अब बंगाल केवल बंगाल में पैदा हुए, बंगाली भाषी लोगों का ही प्रदेश नहीं उन सब अन्य भाषा भाषियों का भी प्रदेश है जो अपना प्रदेश छोड़ कर बंगाल में, कलकत्ता में बस गये है। आज जरूरी हो गया है कि पार्टी इस महत् परिवर्तन को समझे और इसके अनुकूल अपनी समझ, अपनी राजनीति, अर्थनीति, आंदोलन और संगठन की रणनीति को बदले और इस वृहत विस्थापित मेहनतकश समुदाय की मुसीबतों, समस्याओं तथा आकांक्षाओं से अपने को जोड़ कर उनकी भी सच्ची प्रतिनिधि बने। यह एक बड़ी चुनौती है, बड़ा अभियान है, जिसके लिये एकभाषी के स्थान पर बहुभाषी बनना होगा और उनकी भाषा में यानी हिन्दी में तथा उनकी बोलियों में उनसे संवाद और सम्पर्क करना होगा। …ज्योति बसु बोले कि यू.पी., बिहार से कलकत्ता आये लोगों से सम्पर्क करने और उनको संगठित करने के कई महत्वपूर्ण पहलू हैं। एक तो है यू.पी. और बिहार से विस्थापित और बंगाल में प्रवेश किये लोगों का सर्वेक्षण, जिससे यह पता चले कि उनकी संख्या और उनका आर्थिक और सामाजिक वर्गीकरण और संघटन क्या है, विस्थापन के बाद उनकी आर्थिक और सामाजिक स्थिति क्या है, उनके क्या वर्तमान पेशे हैं जिनसे वे रोटी रोजी कमाते हैं? उनकी आवास आदि की स्थिति क्या है? वे किन परिस्थितियों में रहते हैं, उनकी अपने घर भेजी हुई रकम कितनी है, वे परिवार से बिछड़े हैं या बीवी, बच्चों के साथ रहते हैं? उनकी सांस्कृतिक जिन्दगी क्या है? उनके बंगाली जनसाधारण के साथ कैसे रिश्ते बने हैं? उनकी राजनैतिक भूमिका क्या है? क्या वे जनसंगठनों, जनआंदोलनों का हिस्सा है? राजनीति से उदासीन और निष्क्रिय है? उनके नागरिक अधिकार क्या है? क्या नगरपालिका उनके प्रति अपने दायित्व के लिए सचेत है? उन्हें बंगाली नागरिक समाज का हिस्सा मानते हैं या वे उनकी चेतना और जिम्मेदारी के दायरे से बाहर है? इस तरह के कई अन्य सवाल हैं जिनका उत्तर खोजने और जानकारी हासिल करने में यू.पी. तथा बिहार के प्रबुद्ध बुद्धिजीवी अहम भूमिका निभा सकते हैं।

जोशीजी का कहना है कि ज्योति बसु की इन बातों ने हरकुमार जी और मेरे सामने एक नयी दुनिया के दरवाजे खोल दिये, जैसे हमारे बंद दिमागों की खिड़कियां खोल दीं। उन्होंने बंगाली समाज की जो नयी परिभाषा हमारे सामने प्रस्तुत की वह एक नयी अवधारणा ही नहीं, नवअवधारणा के आधार पर एक नये समाजिक और राजनैतिक एजेंडा, एक नये आर्थिक कार्यर्क्रम, एक नये जनचेतना अभियान, जनसंगठन और जनआंदोलन की सम्भावनाएं और अवसर भी प्रस्तुत करती थी।

जोशी जी आगे कहते हैं कि इस दौरान बंगाल की ओर, कलकत्ता की ओर आजीविका की तलाश में अन्य प्रदेश से आ आ कर वहां बस जाने वाले सभी स्तर के खासकर मेहनत मजूरी करने वाले लोगों का निरंतर प्रवाह बढ़ा ही है। …मूल निवासी और आप्रवासी जनों के बीच दरार का प्रश्न भारत के कई अन्य प्रदेशों में तीव्र अंतर्विरोध, असंतोष और अशांति का कारण बना है और आज भी मौके बमौके उभर कर सामाजिक विस्फोट पैदा करता है, उस तरह के सामाजिक तनाव, टकराव और विस्फोट से पश्चिम बंगाल, विशेष कर कलकत्ता, जहां आप्रवासी जनसाधारण खिंचे चले जाते हैं और उसकी आबादी का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं, मुक्त रहा है।

जोशी जी ने इसी आधार पर यह सवाल किया है कि भारत के दूसरे अनेक हिस्सों की तुलना में बंगाल और कोलकाता की इस अपवादस्वरूप स्थिति का कारण क्या है? उन्हें दुख इस बात का है कि इस सवाल पर समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र तथा इतिहास के विद्वानों द्वारा गहन शोध, अन्वेषण, चिंतन और विवेचन तो दूर, इस प्रश्न को पिछले दशकों से चले आरहे एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न के रूप में भी वैधता नहीं मिली है।

जोशीजी ने अपने इस लेख का अंत प्रसिद्ध अंग्रेजी पत्रिका ‘सेमिनार’ के मार्च 2006 के ‘सोल सिटी कलकत्ता’ पर केंद्रित अंक की चर्चा से की है। इस अंक के लेखों को पढ़ कर उन्हें लगा कि जो उदारता और खुली दृष्टि आम लोगों में पायी जाती है वह भद्रलोक बुद्धिजीवी में नहीं है चाहे वह दक्खिनपंथी स्वप्न दासगुप्ता हों या वामपंथी अशोक मित्रा। दोनों कलकत्ते की चारित्रिक गहराई और विस्तार से शायद पूरी तरह परिचित नहीं। जोशीजी के लेख की अंतिम बात है : प्रश्न उठता है कि उदार और व्यापक दृष्टि वाले ज्योति बसु और उनके साथी क्या एक लोप हो रही पीढ़ी और परम्परा के प्रतिनिधि हैं या एक ऐसी स्थिायी विरासत के प्रेरक और प्रसारक जो उनके बाद भी जीवंत रहेगी। भविष्य ही इसका सही सही उत्तर देगा।

कहना न होगा कि पी.सी.जोशी का यह लेख ज्योति बसु के बहाने पश्चिम बंगाल के समूचे सामाजिक जीवन में वामपंथी राजनीति के ऐतिहासिक अवदान को ही रेखांकित नहीं करता, बल्कि भारत के सभी राज्यों में सामाजिक-आर्थिक कारणों से आबादी के स्वरूप में जो परिवर्तन हो रहे हैं, उस पर नजर रखते हुए आने वाले दिनों के लिये राजनीतिक कार्यक्रम अपनाने का भी आह्वान करता है। सभी प्रकार की विभाजनकारी विचारधाराओं के विपरीत मेहनतकशों की वर्गीय एकता पर टिकी राजनीति का ही भविष्य है।

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