भारतीय वामपंथ के पुनर्गठन की एक प्रस्तावना / अरुण माहेश्‍वरी

Posted On by & filed under राजनीति

(”आत्मालोचना क्रियात्मक और निर्मम होनी चाहिए क्योंकि उसकी प्रभावकारिता परिशुद्ध रूप में उसके दयाहीन होने में ही निहित है। यथार्थ में ऐसा हुआ है कि आत्मालोचना और कुछ नहीं केवल सुंदर भाषणों और अर्थहीन घोषणाओं के लिए एक अवसर प्रदान करती है। इस तरह आत्मालोचना का ‘संसदीकरण हो गया है’।”(अन्तोनियो ग्राम्‍शी : राजसत्ता और नागरिक… Read more »

वामपंथ के पतन के बाद आइए अपनी जड़ों में करें विकल्पों की तलाश / प्रो.बृजकिशोर कुठियाला

Posted On by & filed under राजनीति

प्रो.बृजकिशोर कुठियाला ऐसा माना जाता है कि भारत टेक्नॉलाजी के क्षेत्र में विकसित अर्थव्यवस्थाओं से लगभग 20 वर्ष पीछे चलता है। हाल ही में हुए विधानसभा के परिणाम से यह सिद्ध हुआ कि राजनीतिक विचारधारा के विस्तार और विकास में भी हम लगभग इतने ही वर्ष पीछे चल रहे हैं। शेष विश्व में साम्यवाद का… Read more »

केरल विधानसभा का खरा-खरा “साम्प्रदायिक” चित्र पेश है

Posted On by & filed under राजनीति

सुरेश चिपलूनकर केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आ चुके हैं, और कांग्रेस मोर्चे की सरकार मामूली बहुमत से बन चुकी है। जीते हुए उम्मीदवारों एवं मतों के बँटवारे के आँकड़े भी मिलने शुरु हो चुके हैं… कुल मिलाकर एक भयावह स्थिति सामने आ रही है, जिस पर विचार करने के लिये ही कोई राजनैतिक पार्टी तैयार… Read more »

साम्‍यवाद एवं पूंजीवाद का विकल्‍प है एकात्‍म मानवतावाद

Posted On by & filed under विविधा

-राजीव मिश्र स्वतंत्रता के उपरांत के अपने आर्थिक इतिहास के खतरनाक दौर में हम पहूंच गए हैं जबकि सारी व्यवस्था ही टूटती हुई दिखायी पड़ रही है। आज भारत एवं संपूर्ण विश्व एक चौराहे पर किंकर्तव्यविमूढ़ सा खड़ा है उसे मार्ग नहीं दिख रहा है। उसके सामने यह यक्ष प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि वास्तविक… Read more »

मधुसूदनजी की कविता: मास्‍को में बारिश, मुंबई में छाता

Posted On by & filed under कविता

बिन बादल, बिन बरसात, बिना धूप, सर पर छाता! एक लाल मित्र मुम्बई में मिले। पूछा, भाई छाता क्यों, पकडे हो? बारिश तो है नहीं? तो बोले, वाह जी, मुम्बई में बारिश हो, या ना हो, क्या फर्क? मास्को में तो, बारिश हो रही है। १० साल बाद। जब मास्को से भी कम्युनिज़्म निष्कासित है।… Read more »

संयासवाद नहीं है साम्यवाद

Posted On by & filed under राजनीति

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी भारत में एक तबका है जिसका मानना है कि कम्युनिस्टों को दुनिया की किसी चीज की जरूरत नहीं है। उन्हें फटे कपड़े पहनने चाहिए। सादा चप्पल पहननी चाहिए। रिक्शा-साइकिल से चलना चाहिए।कार,हवाई जहाज का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए। मोटा खाना और मोटा पहनना चाहिए। इस वेशभूषा में थोड़ी तरक्की हुई तो पाया कि… Read more »

काश! हिन्दी की महत्ता कम्युनिस्ट पार्टियां समझतीं

Posted On by & filed under राजनीति

-जगदीश्‍वर चतुर्वेदी सबसे पहले मैं अपने एक पाठक की टिप्पणी पर ध्यान देना चाहूँगा । उन्होंने एक बड़ी समस्या की ओर ध्यान खींचा हैं। लिखा है- “भारत गांवों का देश है। यहां की ग्रामीण जनता मुख्‍य रूप से हिन्‍दी बोलती है और उसका मुख्‍य पेशा कृषि है। लेकिन मुझे लगता है कि भारत के कम्‍युनिस्‍टों… Read more »

वामपंथी व्याधि और उपचार

Posted On by & filed under राजनीति

-शंकर शरण जैसे पूरी पृथ्वी पर कोरियोलिस इफेक्ट एक समान है, और नदियों का बहाव इस तरह होता है कि सदैव दाहिना किनारा कटता और टूटता है, जबकि बाढ़ का पानी बाएं किनारे पर फैलता है, उसी तरह धारती पर लोकतांत्रिक उदारवाद के सभी रूप दक्षिणपंथ पर चोट करते हैं और वामपंथ को गले लगाते… Read more »

वर्गीय एकता के पक्ष में

Posted On by & filed under राजनीति

-अरुण माहेश्वरी ‘तद्भव’ पत्रिका के ताजा अंक में पी.सी.जोशी का लेख है ‘विस्थापन की पीड़ा’। ज्योति बसु के साथ उनके संस्मरणों पर आधारित लेख। ज्योति बसु से श्री जोशी की मुलाकात कोलकाता में 55 साल पहले 1955 में हुई थी जब वे उनके चुनाव क्षेत्र बारानगर में स्थित प्रोफेसर चिन्मोहन महालनोबीस के प्रतिष्ठित संस्थान इंडियन… Read more »

देंग ने साम्यवाद का चरित्र बदला

Posted On by & filed under विश्ववार्ता

चीनी जनता इस अर्थ में महान है कि उसने अपने देश के शासकों, खासकर देंग जियाओ पिंग की बातों पर विश्वास किया और सबसे भयानक जोखिम उठाया। स्वेच्छा से सुरक्षित जीवनशैली वाले समाजवादी मॉडल को त्यागकर असुरक्षा वाले भूमंडलीकृत पूंजीवाद के मॉडल को स्वीकार किया और ईमानदारी के साथ उसे लागू किया। बड़े पैमाने पर… Read more »