सिक्का और पर्ची न्याय

प्रायः शर्मा जी मेरे घर नहीं आते। बुजुर्ग व्यक्ति हैं, इसलिए मैं ही दूसरे-चौथे दिन उनके घर चला जाता हूं; पर आज ठीक से सुबह हुई भी नहीं थी कि वे आ गये। उनकी आंखें न्यायमूर्ति चेलमेश्वर जैसी ही उदास थीं। मैंने मुंह धोने के लिए उन्हें गरम पानी दिया। गिलास भर अदरक वाली चाय पिलाई। तब जाकर वे कुछ सामान्य हुए।

– ये ठीक नहीं हुआ वर्मा।

– क्या ठीक नहीं हुआ शर्मा जी ?

– वाह रे, पिछले कुछ दिन से सभी अखबारों में यही चर्चा है और तुम्हें पता ही नहीं ?

– क्यों, इसरो ने जो 31 उपग्रह एक साथ छोड़े हैं, उससे तो देश का हर नागरिक गर्व से भर उठा है।

– मैं उसकी नहीं, न्यायाधीशों की प्रेस वार्ता की बात कर रहा हूं। टी.वी. देखो, सभी चैनलों पर यही बहस हो रही है।

– हां, सुना तो मैंने भी है कि सर्वोच्च न्यायालय के चार बड़े लोग नाराज हैं; पर उनकी नाराजगी का कारण क्या है ?

– कारण बहुत साफ है। बड़ों में भी जो सबसे बड़े हैं, उन्होंने कई बड़े विषय उनसे छोटे लोगों को दे दिये हैं।

– तो क्या हुआ ? छोटे हों या बड़े, हैं तो सब सर्वोच्च न्यायालय के जज ही। जब ये छोटे थे, तो क्या इन्हें काम नहीं दिया जाता था ? हमारे बाबा जी कहते थे कि छोटों को बड़ा काम दिया जाए, तो वे उसे अधिक जिम्मेदारी से करते हैं और इससे उनमें आत्मविश्वास भी आता है।

– तुम तो कतई फूहड़ हो वर्मा। बात सर्वोच्च न्यायालय की हो रही है और तुम अपने बाबा जी को बीच में ले आये। तुम्हें न्याय के बारे में कुछ समझ नहीं है।

– इस बारे में मैंने एक कहानी पढ़ी थी। जंगल में एक लोमड़ी और गीदड़ ने शेर को बताया कि एक मोटा हिरन पास में घूम रहा है। शेर ने देर न करते हुए तुरंत उसका शिकार कर लिया। फिर शेर ने उनसे पूछा कि इसका बंटवारा कैसे हो ? लोमड़ी ने कहा, ‘‘हमारी सूचना पर आपने इसे मारा है, इसलिए आगे का हिस्सा आपका और पीछे का हमारा।” ये सुनकर शेर लोमड़ी पर चढ़ बैठा और उसका पेट फाड़ दिया। अब उसने गीदड़ से पूछा। गीदड़ ने कहा कि आप हमारे राजा हैं, इसलिए आगे का हिस्सा आपका है; और चूंकि आपने इसे मारा है, इसलिए पीछे का हिस्सा भी आपका ही हुआ।

शेर ने खुश होकर पूछा, ‘‘शाबाश। तुमने इतना सुंदर न्याय कैसे किया ?’’ गीदड़ ने कहा, ‘‘लोमड़ी का हाल देखकर।”

शर्मा जी बौखला गये, ‘‘तुम्हें हमारा सर्वोच्च न्यायालय जंगल दिखायी दे रहा है ?’’

– तो मैं अपने गांव के प्रधान जी के न्याय की बात बताता हूं। जब कोई घरेलू विवाद उनके सामने आता था, तो वे सिक्का उछाल देते थे। विवाद कई लोगों में हो, तो वे सबके नाम की पर्चियां बनाकर किसी बच्ची से एक पर्ची उठवा लेते थे।

– ये तो कोई न्याय नहीं है।

– तो हमारे अंग्रेजी वाले शर्मा सर का किस्सा सुनें। उनके पास हाई स्कूल और इंटर की हजारों कापी जांचने को आती थीं। वे बहुधंधी आदमी थे। ट्यूशन, खेती, बीमा और प्रापर्टी जैसे कई कामों के कारण उन पर समय कम ही रहता था। अतः वे अपने आसपास कई घेरे बनाकर कापी को हवा में उछालते थे। जो कापी जितनी दूर गिरती थी, उसे उतने अधिक नंबर देकर दो दिन में ही हर छात्र का न्याय कर देते थे।

– लानत है ऐसे अध्यापक पर। वे नकली शर्मा होंगे। असली शर्मा ऐसा कभी नहीं कर सकता।

– असली-नकली की पहचान तो आपको ही होगी; पर जो बड़े न्यायाधीश अपना काम छोड़कर राजनेताओं जैसा व्यवहार कर रहे हैं, उनके बारे में देश को जरूर सोचना होगा।

– वे सौ प्रतिशत असली न्यायाधीश हैं; पर उनके साथ खुद अन्याय हो रहा है। इसलिए उन्हें मीडिया में आना पड़ा।

– शर्मा जी, ये माननीय जो कह रहे हैं, उस समस्या की असली जड़ कहीं और है।

– अच्छा…। तो आप इस पर भी अपनी टार्च से कुछ प्रकाश डाल दें।

– असल में मोदी की प्रसिद्धि से कुछ लोगों के पेट में दर्द हो रहा है। हो सकता है ये माननीय भी इसी श्रेणी में हों।

– ये बेकार की बात है।

– तो उन्हें कहिए कि न्यायालयों में करोड़ों मुकदमे लटके हैं। दादा का मुकदमा पोते लड़ रहे हैं। इसलिए आपस में लड़ने की बजाय वे कुछ ऐसा करें, जिससे वे मुकदमे जल्दी समाप्त हों और आम जनता को शीघ्र न्याय मिले।

– ये तो बड़ा कठिन है। उन्हें और भी काम रहते हैं।

– तो फिर जनता का विश्वास न्यायालय की बजाय इन न्यायाधीशों से ही उठ जाएगा। फिर वे सिक्का और पर्ची न्याय पर ही विश्वास करने लगेंगे।

शर्मा जी से कुछ बोलते नहीं बना। उन्होंने चाय का गिलास उल्टा किया और घर चल दिये।

– विजय कुमार,

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