लेखक परिचय

डॉ. मधुसूदन

डॉ. मधुसूदन

मधुसूदनजी तकनीकी (Engineering) में एम.एस. तथा पी.एच.डी. की उपाधियाँ प्राप्त् की है, भारतीय अमेरिकी शोधकर्ता के रूप में मशहूर है, हिन्दी के प्रखर पुरस्कर्ता: संस्कृत, हिन्दी, मराठी, गुजराती के अभ्यासी, अनेक संस्थाओं से जुडे हुए। अंतर्राष्ट्रीय हिंदी समिति (अमरिका) आजीवन सदस्य हैं; वर्तमान में अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्‍था UNIVERSITY OF MASSACHUSETTS (युनिवर्सीटी ऑफ मॅसाच्युसेटस, निर्माण अभियांत्रिकी), में प्रोफेसर हैं।

Posted On by &filed under विविधा.


डॉ. मधुसूदन

(एक)
भाषाएँ क्यों बदलती हैं?
संसार की सभी भाषाओं का व्याकरण धीरे धीरे बदलता रहा है. उनके उच्चारण भी बदलते रहते हैं. वर्णाक्षरों की संख्या भी बदलते रहती है.
व्याकरण, वर्णाक्षर, और उच्चारण ऐसे तीन बदलाव आप संसार की सभी भाषाओं में देख पाएँगे. इस प्रक्रिया के निरीक्षण के कारण एक सूत्र ही बन गया और “भाषा बहता नीर” के विधान से यह सूत्र जाना जाने लगा. जैसे जल प्रवाह (बदलता) है, बहता है, भाषा भी बहती बदलती है.

(दो) बदलाव का अपवाद संस्कृत:

इस बदलाव का एक अपवाद है संस्कृत. और लगता है, संस्कृत का सही ज्ञान न होने के कारण भाषावैज्ञानिकों ने यह “भाषा बहता नीर” का प्रचलन कर दिया. संस्कृत भाषा वैज्ञानिकों के चिन्तन में १७८४ के बाद आना प्रारंभ हुआ. पर उसकी पूरी जानकारी होते होते सौ देढ सौ वर्ष लगे.
संस्कृत का व्याकरण परिपूर्ण होने के कारण बदलने की आवश्यकता ही नहीं पडी. आज तक बदला नहीं है. और यह स्थिति गत २५०० वर्षॊं के इतिहास से देखी और परखी जा सकती है. न व्याकरण बदला है, न वर्णाक्षर बदले हैं, न मानक उच्चारण बदला है. 

परिपूर्णता को बदलोगे तो विकृत ही करोगे. परिपूर्णता को और अधिक परिपूर्ण कैसे किया जा सकता है?
संस्कृत का व्याकरण परिपूर्ण है. उसमें नौ काल होते हैं. इतने काल किसी भी अन्य भाषा में नहीं होते. उसके उच्चारणों की संख्या ३६+१६=५२ होती है. और यदि क का कि की कु कू इत्यादि सभी उच्चारों की गिनती करें तो संख्या ३६ गुणा १२ =३६०+७२=४३२ तक हो जाती है.
इतने सारे उच्चारणों के कारण भी शब्द समृद्धि संपादित की जाती है. इस लिए संस्कृत शब्द समृद्ध भी है.
भाषा के उच्चारणों मे, संदिग्ध उच्चारण जैसे ज़, ख़, और कॅ, मॅ इत्यादि उच्चारण उनकी संदिग्धता पर चिन्तन के बाद वर्ज्य माने गए थे. इसी कारण हमारा मानक उच्चारण विशुद्ध और निःसंदिग्ध बना है. साथ साथ उच्चारणों की परम्परा को अमर कर देने में पारम्परिक वेद शालाएँ उपयुक्त सिद्ध हुई हैं.

ऐसे उच्चारण, देवनागरी लिपि की ध्वन्यात्मक रचना के कारण अमर हो गया है. और वैदिक पाठशालाओं की अनुशासित गुरु शिष्य परम्परा ने वेदों सहित देवनागरी के उच्चारण भी अबाधित रखे हैं. वेद में आज तक एक अक्षर या उच्चारण बदला नहीं है.

यह चमत्कार है चमत्कार, यदि आप की समझमें आता है तो? जब इसाई बाइबिल की ८० तक गोस्पेल्स मिलती है, वेदों का एक अक्षर इधर का उधर नहीं हुआ है. यह भी एक स्वतंत्र आलेख का विषय है.

तुलना के लिए लातिनी का संक्षिप्त इतिहास देखते हैं. जो लोग लातिनी से संस्कृत की तुलना करना चाह्ते हैं, उनके लिए.

(तीन)
लातिनी विकास का संक्षिप्त इतिहास:
(७०० ई. पू. -४०० ई. पू.) एट्रुस्कन लिपि के २१ वर्णाक्षर ग्रहण किए गए.
(१ +/- ई. पू. ) वाय और झेड स्वीकारे गए और कुल २३ अक्षर हुए.
(१०० ई. पू.-१४ ईसवी तक ) भाषा का विकास होता रहा, शब्द भण्डार, व्याकरण, और उच्चारण सभी बदलता गया.
(३०० ईसवी ) सामान्य बोलचाल की (वल्गर) लातिनी फैली, और सुधारित साहित्यिक लातिनी साथ साथ प्रचलित हुई.
(३०० ईसवी के आगे) साहित्यिक लातिनी के शब्द, वर्तनी, और स्वरों के उच्चारण बदलते गए. और बोलचाल की लातिनी भी सुधरती गई.
(१५०० ईसवी ) १५०० के आसपास पूर्ण विकसित हुयी.
(१६०० ईसवी से आगे ) उसका प्रयोग और लोकप्रियता घटने लगी.
और १९०० ईसवी तक प्रायः मृत (डेड लॅन्गवेज ) हो गई.
अंग्रेज़ी ने भी अपना आल्फाबेट लातिनी से ही स्वीकारा है.

(चार) लातिनी पर लेखक मधुसूदन की टिप्पणी:–और चिन्तकों को आवाहन:
१५०० ईसवी में जो पूर्ण विकसित हुयी थी, जिसकी लिपि के वर्णाक्षर कभी २१, फिर २३, रहे. जो भाषा १५०० ईसवी तक पूर्ण विकसित होती ही रही और १९०० ईसवी तक मृत भाषा भी घोषित हुयी. जिसका उच्चारण बार बार बदला, वर्तनी भी बार बार बदली. उससे संस्कृत निकली मानना असंभव और अतर्क्य था.

(१) उसे संस्कृत के ( ५००-७०० ईसा पूर्व ) से भी पुरानी घोषित करना तो बिलकुल असंभव था. करते तो कौन-सा भाषाविद स्वीकार करता?
(२) लातिनी भाषा भी २३ अक्षरों की लिपिवाली ही थी. सामने, संस्कृत के ३६+ १६=५२ वर्णाक्षर और प्रत्येक वर्ण के १२ उच्चार (क, का. कि. की. ..इत्यादि). जो स्थूल रूप से अगणित शब्द रच लेती थी. (जो ऊपर कहा जा चुका है)
साथ उच्चारण ब्राह्मी और देवनागरी ने त्रुटिरहित और अक्षुण्ण कर दिए थे.

(पाँच)
लातिनी भाषा बदलाव के कारण:
संस्कृत के सामने लातिनी भाषा में बदलाव के कारण और विवशता बिलकुल पारदर्शक प्रतीत होती है.

क्या थे वे कारण?
कारण (१) स्पष्ट सुदृढ व्याकरण का अभाव.
कारण (२) उच्चारण आधारित लिपि न होने के कारण मानक उच्चारण का अभाव. इसके कारण शब्दों का उच्चारण बार बार बदलता रहा है.
कारण (३) हमारे जैसी, वेदोच्चारण की परम्परा प्रस्थापित कर उच्चारण त्रुटिरहित और अमर करनेवाली, गुरुकुल जैसी परम्परा का ना होना
कारण (४) देवनागरी जैसी उच्चारों को विशुद्ध रखनेवाली लिपि भी लातिनी के पास नहीं थी.
इस लिए, नियम बिना की लातिनी – उच्चारण शुद्धि में योगदान करवा कर परम्परा को अबाधित नहीं रख सकती थी.
कारण (५) वर्णाक्षरों की मर्यादित संख्या के कारण नवीन संक्षिप्त और सुगठित शब्द नहीं बना सकती थी.

(छः) अंग्रेज़ी और संस्कृत के शब्दों की समानता:
विषय पर इसी प्रवक्ता में शब्द वृक्ष नामक अनेक आलेख डाले गए हैं. साथ ढेर सारे, शब्द संस्कृत धातुओं पर अंग्रेज़ी में फैले मिलते हैं.
एक धातु से कैसे भारतीय हिन्दी शब्द और अंग्रेज़ी शब्द व्युत्पत्ति के नियमानुसार (व्युत्पत्ति के तीन नियम–निरुक्त)
अंग्रेज़ी में काफी शब्द संस्कृत मूल के दिखाए गए हैं. इसका कारण स्पष्ट है.
मर्यादित समय के कारण कुछ शीघ्रता से यह आलेख लिखा गया है.
विद्वान पाठक टिप्पणी से उपकृत करें. शायद शीघ्रता के कारण कुछ त्रुटियाँ रह गई हैं. क्षमा कीजिएगा.
संदर्भ:(१) एन्सायक्लोपेडिया ऑफ हिन्दुइज़्म.(२) मॅक्स मूलर के आय. सी. एस. प्रशिक्षार्थी व्याख्यान

6 Responses to “लातिनी और संस्कृत -भाषा में बदलाव की तुलना”

  1. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. नवलता वर्मा द्वारा

    लातिनी और संस्कृत –तुलना
    आदरणीया दीदी जी, प्रणाम।
    आपके द्वारा प्रेषित आलेख पढ़ा। लातिनी भाषा तथा संस्कृत की भाषागत तुलना कर विद्वान् लेखक ने अनेक तथ्य उद्घाटित करने का प्रयास किया है। यह निर्विवाद सत्य है किसी भी भाषा के दीर्घ जीवन के पीछे उसके व्याकरणगत स्वरूप की शुद्धता, उसके रचनागत विस्तार की व्यापकता तथा प्रयोगगत अनुशासन हुआ करते हैं। संस्कृत इस दृष्टि से निःसन्देह सर्वाधिक सफल भाषा है। रूपनिर्माण का जितना स्वातन्त्र्य संस्कृत में है उतना किसी अन्य भाषा में नहीं। व्याकरण की वैज्ञानिकता के कारण शाब्दबोध में जो सहजता संस्कृत में है वह अन्य भाषा में नहीं। सहस्रों वर्षों के पश्चात् भी संस्कृत के मूल स्वरूप में अन्तर नहीं आया है। यद्यपि भाषाप्रवाह के फलस्वरूप देश-कालगत प्रयोगवैचित्र्य दृष्टिगत होता रहा है। इसी कारण लोकव्यवहार में प्रचलित भिन्नता के आधार पर विकल्पजनित अपवादों का बाहुल्य शास्त्रीय स्तर पर स्वीकार किया गया।
    विगत कुछ दशकों में संस्कृत के प्रति लोगों में जो नकारात्मक दृष्टिकोण पनपा तथा उसकी प्रतिक्रिया में संस्कृत में श्रद्धा रखने वाले एक प्रबुद्ध सक्रिय वर्ग ने उपचारात्मक उपाय के रूप में संस्कृत के सरलीकरण की दिशा में प्रयास आरम्भ किया। आन्दोलन का रूप ले कर इस वर्ग के शिक्षाविदों, शिक्षकों, उत्साही राष्ट्रवादियों तथा आध्यात्मिक चेतना से जुड़े लोगों ने सरकार का सहयोग लेकर विश्वव्यापी अभियान आरम्भ कर दिया है। इस अभियान के प्रथम चरण में सरल संस्कृत सम्भाषण का विश्वव्यापी प्रसार किया जा रहा है। किन्तु दुःख के साथ कहना पड़ता है कि आज संस्कृत की उद्भवभूमि भारत में ही सरलीकरण तथा संस्कृतसम्भाषण को प्रोत्साहन के नाम पर संस्कृत की भाषागत शुद्धता को कहीं न कहीं अनदेखा किया जा रहा है जो हानिकारक है। विशेषतः विभक्तियों के प्रयोग में शैथिल्य तथा हिंग्लिश की तर्ज पर संस्कृत +हिन्दी +अॅंग्रेजी के मिश्रित प्रयोग के फैशन को हतोतसाहित नहीं किया जा रहा है।
    संस्कृत के मूल व्याकरणगत शुद्ध अविकारी रूप की रक्षा अत्यावश्यक है। विद्वानों भाषाशास्त्रियों तथा ंस्कृतप्रेमियों को इस बिन्दु पर गम्भीरता से विचार करना चाहिए।
    विचारणी य विषय तो अन्य भी हैं। किन्तु यहाॅं इतना ही। दीदी, आप विचार करें, क्या मैं ग़लत कह रही हूॅं।
    सादर
    आपकी शिष्या
    नवलता

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      उपरोक्त संदेश, प्रोफ़ेसर शकुन्तला बहादुर जी की विदुषी शिष्या डॉ. नवलता वर्मा जी की ओर से भेजा गया है.
      सारे बिन्दु अवश्य विचारणीय और विशेष है.
      पाठकों की सुविधा के लिए प्रकाशित कर रहा हूँ.
      मैं डॉ. नवलता वर्मा जी आभार व्यक्त करता हूँ.
      आपको विशेष और मुक्त टिप्पणी से उपकृत करने के लिए हृदयतल से धन्यवाद.
      साथ साथ, इस टिप्पणी को उपलब्ध कराने के लिए बहन शकुन जी का भी धन्यवाद करता हूँ.
      शुभेच्छा सहित …….
      डॉ. मधुसूदन

      Reply
  2. डॉ. मधुसूदन

    शकुन्तला बहादुर द्वारा

    आदरणीय मधु भाई,
    लातिनी के संबंध में विशेष रूप से ज्ञानवर्धक आलेख।
    संस्कृत और लातिनी की विशद तुलनात्मक विवेचना दुरूह कार्य है ,जो समयसाध्य हैऔर परिश्रमसाध्य भी। तदर्थ ज्ञान-पिपासा और धैर्य भी आवश्यक है।
    आपके व्यापक एवं गहन ज्ञान का अनुमान लगाना भी
    कठिन है।
    सादर,
    शकुन बहन

    Reply
  3. आशुतोष माधव

    इंजीनियरिंग के लिए ‘अभियांत्रिकी’ शब्द का प्रचलन है।
    कभी इस विषय पर विस्तार से लिखकर उपकृत कीजिए, चर्चा का पुष्ट आधार तभी मिल सकेगा।

    Reply
    • डॉ. मधुसूदन

      डॉ. मधुसूदन

      आ. आशुतोष माधव जी. नमस्कार.
      (१) अभियांत्रिकी की पारिभाषिक शब्दावली पर कुछ काम(मेरे द्वारा) हो रहा है. और हुआ भी है.
      (२) पर, पारिबाषिक शब्दों के,एक अंग को अलग कर के नहीं, पर समग्रता में (अन्य सभी विषयों के साथ साथ) ही विकसित किया जाना श्रेयस्कर और सफल होगा.
      (३) फिर भी मेरे द्वारा कुछ निर्माण अभियांत्रिकी की शब्दावली पर प्रयास हुआ भी है, और हो भी रहा है.
      भाषा परम्परा(एक नदी के बहाव जैसी) ही होती है. उसे सर्वांगीण बदलना होता है.
      (४) अकेली अभियांत्रिकी शब्दावली का काम कठिन नहीं मानता.
      विषय समग्रता में दृष्टि रखकर फिर विशिष्ट विषयों पर लक्ष्य केंद्रित करने से अधिक सफल हो सकता है.
      (५) आज शासन और वातावरण सहायक है, पर ७० वर्षों की देरी के कारण मानसिकता की गठ्ठन कडी हो चुकी है.
      (६) समय मिलने पर कुछ कडियाँ भेज सकता हूँ.

      Reply
  4. ken

    Why repeat the same article with http://www.hindiEtools.com picture?
    Why not write these words (लातिनी ,डेड लॅन्‌ग्वेज) the way they are pronounced in English? Why spoil readers English?

    latin, dead language /ˈlætən , dɛd ˈlæŋgwəʤ /læŋgwɪʤ ……. American IPA
    lătan , ded lăngwaj / lăngwij / लॅटन , डेड लॅङ्ग्वज /डेड लॅङ्ग्विज
    https://tophonetics.com/

    Why can’t we translate these Wiki articles in Hindi and create more jobs for English to Hindi translators?https://en.wikipedia.org/wiki/Latin

    Despite Chinese having no scientific alphabet, See how they lead Hindi in Wiki translation!

    In Hindi: partial translation
    https://hi.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%BF%E0%A4%A8_%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B7%E0%A4%BE

    In Chinese: full translation
    https://zh.wikipedia.org/wiki/%E6%8B%89%E4%B8%81%E8%AF%AD

    These newly added (ऍ , ऑ ) sounds, needed badly to write scientific words in Hindi are not taught to children in primary schools.Why?

    Is ऍ = ऐ in Hindi?
    बॅन्‌क, बैन्‌क?

    Reply

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *