शिवराज से मुकाबले के लिए कांग्रेसियों को शिवराज से ही बहुत कुछ सीखना होगा

विवेक कुमार पाठक
मध्यप्रदेश में विपक्षी दलों को शिवराज सिंह चौहान से जनसंचार कला सीखना चाहिए। चुनाव में तभी टक्कर ले पाएंगे। शिवराज अपना उठना, बैठना, बोलना, आना जाना सब भुनाना जानते हैं। निसंदेह वे बहुत मेहनती हैं और अगर मध्यप्रदेश में वे इतने लंबे समय से मुख्यमंत्री बने हुए हैं तो किसी बाबा वैरागी की कृपा से नहीं बने। शिवराज सिंह चौहान एक कुशल राजनेता हैं और जमीन से निकलकर राजनीति की मुख्य धारा में आए हैं। वे बहुत अच्छे डैमेज कंट्रोलर हैं। 15 सालों में तमाम मौके आए हैं जब सरकार बैकफुट पर आई है मगर मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी गाड़ी पटरी पटरी निकाल ले गए हैं। ये राजनैतिक कुशलता बुजुर्ग नेता एवं मध्यप्रदेश के दो दशकों तक मुख्यमंत्री रहे राधौगढ़ के जागीरदार एवं कांग्रेस के शीर्ष नेताओं में अत्यंत ताकतवर दिग्विजय सिंह जी को भी सीखना चाहिए। दिग्गी राजा ने निसंदेह 1993 से 2003 तक मध्यप्रदेश में निष्कटंक राज किया है मगर उनके कार्यकाल में एंटी इनकमबैंसी पहले पांच साल के बाद भी दिखना शुरु हो गई थी। वे बुद्धि में प्रवीण हैं और राजनैतिक उठापटक और विनोदप्रियता का अस्त्र बहुत कुशलता से प्रयोग करते हैं मगर उनकी विनोदप्रियता में शिवराज सिंह चौहान जैसी नजाकत और नफासत की कमी रही है। शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ व्यापम जैसे अंतर्राष्ट्रीय घोटाले की हवा बनने के बाबजूद आज भी मध्यप्रदेश के लोगों का उनके प्रति मोह खत्म नहीं हुआ है ये बात चाहे न चाहे मगर है एकदम सच। इस मोहपाश का राज शिवराज सिंह चौहान ही बता सकते हैं। कभी कभी वे फर्श और जाजम बिछाने को तैयार हो रहे लाखों कार्यकर्ताओं के बीच मन की बात आखिर कह ही जाते हैं। पैर में चक्कर और मुंह में शक्कर कार्यकर्ताओं ने कितनी आत्मसात की है मगर बीजेपी के सफलतम मुख्यमंत्रियों में शुमार शिवराज अपने इन मंत्रों को रामबाण मानकर पकड़े हुए हैं। वे धैर्य नहीं खोते इसलिए व्यापम घोटाले के समय जब विपक्ष से लेकर नेशनल मीडिया का बबंडर सत्ता परिवर्तन के लिए मध्यप्रदेश के आसमान में मंडरा रहा था तब भी वे उसका सामना कर गए और गरिमापूर्ण ढंग से अपनी बात सार्वजनिक रुप से रख पाए। न न करते हुए उन्होंने आकाशवाणी हो या अंतर्रआत्मा की आवाज मगर सीबीआई की घोषणा उन्होंने की थी।

आखिर विपक्षी कांग्रेस और देश प्रदेश का हमलावर होता मीडिया भी तो इसी पर उनके पीछे पड़ गया था। वे नेशनल मीडिया से सरकार विरोधी लहर चलते दिखते ही हरकत में आ गए थे और अविलंब खुद प्रेस कांन्फ्रेस करके उन्होंने व्प्यापम घोटाले मामले में सीबीआई जांच की घोषणा कर दी थी। शिवराज की इस घोषणा के बाद विजयी भाव से नाचा गाया पूरा विपक्ष और तमाम मप्र के बड़े नेता गदगद हो गए थे मगर उनका आनंद अधूरा ही रहा। शिवराज सिंह चौहान ने इसके बाद अत्याधिक श्रम और परिश्रम करके मध्यप्रदेश में अपने काम को और बेहतर बनाने का प्रयास किया था और इसके परिणाम भी आम जनता के सामने देखने में आए। मप्र सरकार ने अपनी कई खामियों को दूर करते हुए अपने प्रति दुबारा अच्छा वातावरण बनाने का मिशन भाव से प्रयास और प्रचार किया है। तो प्रचार की बात आने पर मैं भी आता हूं प्रचार की पहली बात पर। शिवराज सिंह चौहान भारतीय जनता पार्टी के लिए निश्चित रुप से जनसंचार के रोल मॉडल हैं। वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से भी बेहतर जनसंचारक हैं। अपनी बातों को बहुत सरलता, सहजता और विनम्रता के साथ लाखों लोगों के बीच रख जाते हैं। उनके कट्टर विरोधी भी उनकी निंदा करने के लिए मानवीय अवगुणों को खुलकर उनमें नहीं ढूंढ़ पाते हैं। वे आज भी कांग्रेस और श्यामला हिल्स के बीच सबसे बड़ी और विशालकाय बाधा और रुकावट हैं। मोदी और अमित शाह ने चाहकर अथवा न चाहकर मगर उन्हें ही 2018 के चुनाव के लिए भारतीय जनता पार्टी का मुख्यमंत्री प्रत्याशी घोषित किया है तो छोटी बात नहीं है। पल पल सांस ले रहे और पल पल भाजपा को देश में बढ़ाने में जुटे अमित शाह का गुणा भाग शिवराज सिंह को अब तक अपने लिए फिट बता रहा है। ये छोटी बात नहीं है। शिवराज सिंह चौहान 15 साल बाद भी भाजपा का झंडा मध्यप्रदेश में थामे हुए हैं तो इसमें उनके व्यक्तिगत गुण और व्यवहार का बड़ा योगदान है। वे भारतीय जनता पार्टी से प्रधानमंत्री पद के सर्वमान्य उम्मीदवार भी हो सकते हैं बशर्ते आडवाणीजी की भाजपा में चलना शुरु हो जाए और अमित शाह और पीएम नरेन्द्र मोदी का अश्वमेघ रथ भाजपा के ही लव कुश अथवा भाई बंधुओं द्वारा मौका पड़ते ही बांध लिया जाए। राजनीति में ऐसे उठापटक होना किक्रेट की तरह आम बात है। फिलहाल तो जनसंचार कला के भारत प्रसिद्ध राजनेता एवं मप्र के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान कांग्रेस के लिए भी आदरणीय गुरु हो सकते हैं। 2018 में कमलनाथ, दिग्विजय सिंह और ज्योतिरादित्य सिंधिया से लेकर तमाम आसमानी अरमान पाले हुए बाकी नेताओं को जनसंचार कला का अविलंब प्रशिक्षण लेना चाहिए। वे जनसंचार कला जानते हैं मगर मूसलाधार बारिस जैसी जनसंचार कला सिर्फ मध्यप्रदेश भाजपा में शिवराज सिंह चौहान ही जानते हैं। दिल्ली में हालांकि चमत्कारी जनसंचारक नेता भी उपलब्ध हैं। 2018 में अगर बिना लड़े वीरगति को प्राप्त नहीं होना है तो विपक्ष को पूरी तैयारी से आना चाहिए। उन्हें अपने सामने खड़े भारतीय जनता पार्टी के 15 साल अनुभव वाले मुख्यमंत्री से ही बहुत कुछ सीखना चाहिए। शिवराज के तीरों का जबाब उनके तरकश के जाने समझे बिना अच्छे अच्छे देने की स्थिति में नहीं होंगे। शिवराज सिंह मप्र की माटी से निकले किसान के बेटे हैं और मुख्यमंत्री पद तक सतत मेहनत और संघर्ष तक पहुंचे हैं। उनका मुकाबला करने के लिए कांग्रेस के दिग्गज और कार्यकर्ता भी उतनी ताकत और मेहनत का जज्जा लेकर ही 2018 की तैयारी में जुटें। कांग्रेस के पास एंटी इनकमबैंसी फैक्टर का वजन जरुर है मगर शिवराज पर जनसंचार कला का बहुत बड़ा वजन है। वे हर दिन हर रात मध्यप्रदेश के करोड़ों घरों तक चर्चा में बने हुए हैं ये उनकी बहुंत बड़ी ताकत है। कांग्रेस इस ताकत को शिवराज सिंह चौहान की शैली का सूक्ष्म अन्ववेषण किए बिना बराबरी से मुकाबला नहीं कर सकती। कम लिखा है मगर आप जरुरत के हिसाब से जितना चाहे समझ सकते हैं।

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