महिला आरक्षण पर कांग्रेस का सियासी दांव

प्रमोद भार्गव
संसद का मानसून सत्र शुरू होने से ठीक पहले कांग्रेस और भाजपा में जंग तेज होती दिख रही है। तीन तलाक को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा कांग्रेस पर तंज कसने के बाद अब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने महिला आरक्षण विधेयक पारित करने के सिलसिले में मोदी को पत्र लिखकर सियासी चाल चलते हुए पलटवार किया है। राहुल ने शायद मुस्लिम महिलाओं को तीन तलाक से मुक्ति दिलाने का श्रेय लूटने की कोशिश कर रहे मोदी पर यह दांव चला है। इस मुद्दे पर बिना शर्त समर्थन देने का ऐलान इसलिए किया है, जिससे महिला सशक्तीकरण के मुद्दे पर सरकार को कठघरे में खड़ा किया जा सके। क्योंकि जरूरी नहीं कि सरकार राज्य सभा में 9 मार्च 2010 को पारित हो चुके इस विधेयक को लोकसभा में लाए ? दरअसल भाजपा का लोकसभा में स्पष्ट बहुमत है, इसलिए विधेयक पारित न होने पाए इसमें कोई संशय ही नहीं है। राहुल ने यह दांव इसलिए खेला है, जिससे उज्जवाला योजना और तीन तलाक के मुद्दे पर महिलाओं का भाजपा के पक्ष में जो ध्रुवीकरण हुआ है, उसे चुनौती दी जा सके। क्योंकि इसी साल इस मुद्दे को जब पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन द्वारा बुलाए गए महिला विधायकों के राष्ट्रीय सम्मेलन में उठाया था, तब नरेंद्र मोदी ने बड़ी चतुराई से कह दिया था कि ‘महिलाओं को सषक्त बनाने वाले पुरुष कौन होते हैं ? देश के निर्माण में आधी आबादी की सषक्त भूमिका रही है और वह पुरुषों से बेहतर घर चलाती हैं।‘ यानी महिलाओं को घर चलाने की बात कहकर अपनी सीमा जता दी थी। राहुल से भी पूछा जा सकता है कि उनकी पार्टी के कार्यकाल में यह विधेयक जब लोकसभा में आया तब उनका और सोनिया गांधी का संकल्प क्यों जवाब दे गया था ?
राज्यसभा से पारित इस विधेयक को कानूनी रूप लेने के लिए अभी लोकसभा और पन्द्रह राज्यों की विधानसभाओं का सफर तय करना होगा। इसके कानून बनते ही ऐसे कई दोहरे चरित्र के चेहरे हाशिये पर चले जाएंगे, जो पिछड़ी और मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण देने के प्रावधान के बहाने, गाहे-बगाहे बीते 22 सालों से गतिरोध पैदा किए हुए हैं। महिला आरक्षण विधेयक का मूल प्रारूप संयुक्त मोर्चा सरकार के कार्यकाल के दौरान गीता मुखर्जी ने तैयार किया था। लेकिन अक्सर इस विधेयक को लोकसभा सत्र के दौरान अंतिम दिनों में पटल पर रखा गया। इससे यह संदेह हमेशा बना रहा कि एचडी देवगौड़ा, इन्द्रकुमार गुजराल और अटलबिहारी वाजपेयी सरकारें गठबंधन के दबाव और राजनीतिक असहमतियों के चलते इस मंशा-बल का परिचय नहीं दें पाईं थीं, जो कांग्रेस की मनमोहन सिंह सरकार ने जताई थी। जबकि इस सरकार को अपने ही सहयोगी दलों के जबरदस्त विरोध का सामना करना पड़ा था। यहां तक की समर्थक दलों ने कांग्रेस को समर्थन वापसी की धमकी भी दी थी। हालांकि प्रजातंत्र में तार्किक असहमतियां, संवैधानिक अधिकारों व मूल्यों को मजबूत करने का काम करती हैं, लेकिन असहमतियां जब मुट्ठीभर सांसदों की अतार्किक हठधर्मिता का पर्याय बन जाएं तो ये संसद की गरिमा और सदन की शक्ति को ठेंगा दिखाने वाली साबित होती हैं।
उस समय विधेयक से असहमत दलों की प्रमुख मांग थी, ‘33 फीसदी आरक्षण के कोटे में पिछड़े और मुस्लिम समुदायों की महिलाओं को विधान मंडलों में आरक्षण का प्रावधान रखा जाए।‘ जबकि संविधान के वर्तमान स्वरूप में केवल अनुसूचित जाति और जनजाति के समुदायों को आरक्षण की सुविधा हासिल है। ऐसे में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को लाभ कैसे संभव है ? हमारे लोकतांत्रिक संविधान में धार्मिक आधार पर किसी भी क्षेत्र में आरक्षण की व्यवस्था नहीं है। लिहाजा इस बिना पर मुस्लिम महिलाओं को आरक्षण की सुविधा कैसे हासिल हो सकती है ? आंध्रप्रदेश,महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की सरकारों ने सच्चर व रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों को आधार मानते हुए मुसलमान व ईसाईयों को नौकरियों में धर्म आधारित आरक्षण की व्यवस्था की थी, लेकिन न्यायालयों ने इन्हें संविधान-विरोधी फैसला जताकर खारिज कर दिया था।
दरअसल इस कानून के वजूद में आ जाने के बाद अस्तित्व का संकट उन काडरविहीन दलों को है, जो व्यक्ति आधारित दल हैं। इसी कारण लालू, मुलायम और शरद यादव इस बिल के विरोध में दृढ़ता से खडे़ हो जाते हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार में जातियता के बूते क्रियाशील इन यादवों की तिकड़ी का दावा रहता है कि इस अलोकतांत्रिक विधेयक के पास होने के बाद पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के लिए जम्हूरियत के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। जबकि इनकी वास्तविक चिंता यह नहीं है ? दरअसल 33 फीसदी आरक्षण के बाद बाहुबलि बने पिछड़े वर्ग के आलाकमानों का लोकसभा व विधानसभा क्षेत्रों में राजनीतिक आधार तो सिमटेगा ही, सदनों में संख्याबल की दृष्टि से भी इन दलों की ताकत घट जाएगी। अन्यथा ये सियासी दल वाकई उदार और पिछड़ी व मुस्लिम महिलाओं के ईमानदारी से हिमायती हैं, तो सभी आरक्षित सीटों पर इन्हीं वर्गों से जुड़ी महिलाओं को उम्मीदवार बना सकते हैं ? बल्कि अनारक्षित सीटों का भी इन्हें प्रतिनिधित्व सौंप सकते हैं ? दरअसल इन कुटिल राजनीतिज्ञों के दिखाने और खाने दांत अलग-अलग हैं। गोया तय है कि अल्पसंख्यकों की बेहतर नुमाइंदगी की वकालात के इनके दावे थोथे हैं।
इन दलों का दोहरा चरित्र इस बात से भी जाहिर होता है कि जब देश की पंचायती राज्य व्यवस्था में महिलाओं का 33 फीसदी से 50 फीसदी आरक्षण बढ़ाने का विधेयक लाया गया था तब ये सभी दल एक राय थे। यही नहीं जब नगरीय निकायों में महिलाओं के लिए 50 फीसदी आरक्षण का विधेयक लाया गया था, तब भी इन दलों की सहमति बनी रही। लेकिन जब लोकसभा व विधानसभा की बारी आती है तो यही दल गतिरोध पैदा करने लग जाते हैं। क्योंकि यह विधेयक कानूनी स्वरूप ले लेता है तो इनके निजी राजनैतिक हित प्रभावित होंगे। इनका लोकसभा और विधानसभा में पुरुषवादी  वर्चस्व का दायरा 33 फीसदी घट जाएगा। राजनेताओं के लिए यह विधेयक इसलिए भी वजूद का संकट है, क्योंकि जिन लोक व विधानसभा क्षेत्रों से ये लोग लगातार विजयश्री हासिल करते चले आ रहे हैं, वह क्षेत्र यदि महिला आरक्षण के दायरे में आ गया तो इन्हें चुनाव लड़ना भी मुश्किल हो जाएगा ? तृणमूल कांग्रेस की ममता बनर्जी ने भी मुस्लिम समुदाय को बरगलाए रखने के नजरिये से इस विधेयक का विरोध किया था। भ्रष्टाचार में लिप्त ऐसे नेता भी इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं, जिनके लिए सांसद अथवा विधायक के रूप में लोकसेवक बने रहना, सुरक्षा कवच का काम करता है। इन दुर्भावनाओं को मोदी भलीभांति समझ रहे हैं, इसीलिए वे बर्र के छत्ते में हाथ डालना नहीं चाहते।
हमारे देश में विकास को आंकड़ों और व्यक्तिगत उपलब्धि को संख्या बल की दृष्टि से देखने-परखने की आदत बन गई है। इस नाते हम मानकर चल रहे हैं कि 543 सदस्यीय लोकसभा में 181 महिलाओं की आमद दर्ज होने और 28 राज्यों की कुल 4109 विधानसभा सीटों में से महिलाओं के खाते में 1370 सीटें चली जाने से देश की समूची आधी आबादी की शक्ल बदल जाएगी। अथवा स्त्रीजन्य विषमताएं व भेदभाव समाप्त हो जाएंगे। फिलहाल लोकसभा में 12.15 प्रतिषत महिलाओं की ही भागीदारी हैं। दुनिया के 190 देषों में भारत का स्थान 109 वां हैं। 1952 में गठित पहली लोकसभा में सिर्फ 4.4 प्रतिशत यानी 489 में से महज 22 महिलाएं सांसद थीं। जबकि मौजूदा लोकसभा में 62 महिलाएं लोकसभा सदस्य के रूप में प्रतिनिधित्वि कर रही हैं। यह अब तक की सबसे अधिक संख्या है। विधानसभाओं में महिला विधायकों की उपस्थिति केवल 9 फीसदी है। हालांकि असमानता के ये हालत पंचायती राज लागू होने और उसमें महिलाओं की 33 और फिर 50 फीसदी आरक्षण सुविधा मिलने के बावजूद कायम हैं। लेकिन लोकसभा व विधानसभाओं में एक तिहाई महिलाओं की उपस्थिति इसलिए जरूरी है, जिससे वे कारगर हस्तक्षेप कर महिला की गरिमा तो कायम करें ही देश में जो पुरूष की तुलना में स्त्री का अनुपात गड़बड़ा रहा है, उसको भी समान बनाने के उपाय तलाशें ? साथ ही महिला संबंधी नीतियों को अधिक उदार व समावेशी बनाने की दृश्टि से उनकी रचनात्मक प्रतिबद्धता भी दिखाई दे। बहरहाल राहुल गांधी ने दांव जरूर बड़ा चला है, लेकिन इसके हासिल शून्य रहने वाले हैं, इसलिए यह दांव जुमला ही साबित होगा।

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