संविधान नही आस्थाओं के व्यापार पर संकट”

विनोद कुमार सर्वोदय
यह अत्यंत दुःखद है कि जब से देश में भाजपानीत सरकार अस्तित्व में आयी है और श्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में अनेक प्रकार की विकास परक नीतियों का योजनाबद्ध ढंग से किर्यान्वन किया जा रहा है फिर भी कुछ विदेशी शक्तियों द्वारा नियुक्त उनके भारतीय एजेंटों ने राष्ट्रवादी कहे जाने वाली वर्तमान सरकार को विभिन्न अवसरों पर केवल विरोध करके अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि को धूमिल करने का एक सूत्री कार्य अपना रखा है। धर्म के आधार पर एक दर्दनाक विभाजन झेल चुके हमारे देश में पुनः अल्पसंख्यकों को बिना कारण भयभीत करके व उनको भड़काने के राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्रों से कब तक हमको अवनति के मार्ग पर ढकेलने का कुप्रयास जारी रहेगा ? जबकि पूर्व की भांति अल्पसंख्यक मंत्रालय अल्पसंख्यकों के लिए अनेक अतिरिक्त विशेष योजनाओं द्वारा उनके सशक्तिकरण के  प्रति प्रतिबद्ध है।फिर भी ऐसे में  “भारत की बर्बादी तक जंग जारी रहेगी”  व  “भारत के टुकड़े टुकड़े होंगे” आदि नारे लगाने वालों के प्रति हमको और अधिक सावधान नही रहना होगा ? विशेषतः जब से केंद्र सरकार ने ऐसे देशद्रोही तत्वों को पालने व अनेक देशद्रोही गतिविधियों के लिए धन उपलब्ध कराने वाली विदेशी सहायता प्राप्त स्वयं सेवी संगठनों (NGO) की विधिवत जांच करके अनेक अनियमितताओं व असंवैधानिक कार्यों में लिप्त पाये जाने पर प्रतिबंधित किया है तब से भारत विरोधी विश्वयापी मंडली बौखला गई है। साथ ही इन पर अंकुश लगने से उनके पालतू बुद्धिजीवियों व पत्रकारों और उनसे जुड़े कुछ अन्य लाभान्वित होने वाले प्रभावशाली लोगों के लिए अपनी विलासिता पूर्ण जीवन शैली अपनाने में कठिनाइयां आ रही है। इनकी मुख्य चिंता भारत का संविधान नही बल्कि “आस्थाओं व आत्माओं के व्यापार पर संकट” की समस्या है। भोले-भाले भारतवासियों की फसल का व्यवसाय करके उसको अपने धार्मिक चोले में समेटने की स्वतंत्रता पर अंकुश लगने से ईसाई मिशनरियों में भारी हताशा व्याप्त हो गई है। इसीलिए रोमन कैथोलिक एंटोनिया माइनो के लाडले राहुल गांधी को सत्ता में लाने के लिए अनेक षडयंत्रो को रचने वाले ईसाई तंत्र के आर्क विशप, विशप व पादरी आदि वर्तमान सरकार पर बार बार आरोप लगाये जा रहे है। एक और ईसाई धर्माधिकारी गोवा व दमन के आर्क विशप फादर फिलिप नेरी फेराओ ने भी भारत में न्यायिक व्यवस्था व मानवाधिकारों के प्रति सरकार पर आधारहीन दोष लगा कर अपनी भारत विरोधी दूषित मानसिकता का ही परिचय कराया हैं। इन्होंने विशेषतः अल्पसंख्यक  ईसाई समुदाय को भड़काते हुए एक पत्र में लिखा है कि संविधान और लोकतंत्र संकट में है, इसलिये राजनैतिक सक्रियता बढ़ाएं। इससे पूर्व पिछले दिनों कर्नाटक विधान सभा के चुनाव के पहले भी दिल्ली के आर्क विशप अनिल कूटो ने कई धार्मिक संगठनों को लिखे पत्र में भड़काने के लिये लिखा था कि देश में विध्वंसकारी राजनीति का वातावरण बना हुआ है , लोकतांत्रिक मूल्यों पर संकट मंडरा रहा है और 2019 के चुनाव का भी उल्लेख किया था। इसी कड़ी में आपको स्मरण होगा कि पिछले वर्ष 2017 में गुजरात विधानसभा के चुनावों के समय भी वेटिकन के ध्वजवाहक व गांधीनगर के आर्कविशप मैथ्यू मैक्वान ने भी पत्र लिख कर राष्ट्रवादी शक्तियों को पराजित करने की अपील की थी।
ध्यान रहे इन आर्कविशपों की नियुक्ति वेटिकन के सर्वोच्च रोमन कैथोलिक ईसाई धर्माधिकारी पोप के द्वारा की जाती है और अधिकांशतः तथाकथित स्थानीय धर्माधिकारी उनके गुप्त एजेण्डे को ही आगे बढ़ाने के लिए हमारे देश में नकारात्मक वातावरण बनाते हैं। वर्तमान में हमारे राष्ट्र में लगभग बीस आर्क विशप व एक सौ विशप हैं जो सभी प्रायः वेटिकन के ईसाई धर्म के सर्वोच्च नेता पोप द्वारा व उनके भारतीय प्रतिनिधि/ राजदूत जिनको नुना क्लेचर कहते है के द्वारा नियुक्त किये जाते है। इन नियुक्तियों में भारत के ईसाइयों से सामान्यतः निर्णय के लिए कोई सुझाव नही लिया जाता और नही कोई चर्चा की जाती होगी ? निसंदेह ऐसी नियुक्तियों में किसी भी प्रकार से भारतीय ईसाइयों का हस्तक्षेप स्वीकार नही होता होगा ।भारत के मूल निवासी व शासन-प्रशासन के सर्वोच्च अधिकारीगण प्रायः सहनशील हैं ,उदार हैं , सहिष्णु हैं , विवादों व संघर्षो से बचते हैं , विस्फोट व विनाशकारी कार्यो से दूर रहते हैं और मुख्यतः समझौतावादी होते हैं। हमारे इन गुणों /अवगुणों के कुछ ऐसे ही कारणों से उत्साहित होकर भारत विरोधी मानसिकता वाले प्रभावशाली लोग हमको ही कटघरे में खड़े करने का दुःसाहस करते रहते हैं।जब यह सर्वविदित ही है कि विभिन्न विदेशी षडयंत्रकारी स्थानीय देशद्रोहियों के सहयोग से अनेक प्रकार से बाधक बन कर धार्मिक व सांस्कृतिक आधार पर निरंतर प्रहार करके भारत की एकता और अखण्डता के लिये एक बड़ी चुनौती बनें हुए है।तो फिर ऐसे प्रतिकूल वातावरण में यह सुनिश्चित होना चाहिये कि कोई भी विदेशी हमारी आंतरिक राष्ट्रीय , धार्मिक व सामाजिक व्यवस्थाओं पर हस्तक्षेप करने की अनाधिकृत चेष्टा न करें।
वर्षों पूर्व गुजरात व मध्यप्रदेश आदि में कई बार चर्चो व ननो आदि पर हुए झुठे हमलों की सत्यता उजागर हुई जिसमें उसी धर्म के लोगों के शामिल होने की पुष्टि हुई थी। तब भी ऐसे ही ढोगी चोलाधारी धर्माधिकारियों की किरकिरी हुई थी। इसी प्रकार लगभग दो वर्ष पूर्व दिल्ली आदि कुछ अन्य नगरों में चर्चो व मिशनरी स्कूलों में हुई छुट पुट चोरी व तोड़फोड़ आदि की घटनाओं की जांच करें बिना ही हिन्दुओं की उदारता को ही तथाकथित ईसाई धर्म के ठेकेदारों ने संदेहात्मक बना दिया था।जबकि पिछले कुछ वर्षों से अमरीका में निर्दोष हिन्दुओं को ईसाइयों द्वारा निशाना बना कर उनकी हत्या की जाने तक के समाचार आते हैं और हिन्दुओं का उत्पीड़न व संहार चाहे अफगानिस्तान में हो , पाकिस्तान व बंग्ला देश में हो या फिर कश्मीर सहित भारत व विश्व के किसी भी कोने में हो इन स्वयंभू “भारत भक्तों” की संवेदनायें नहीं जागती।  “गुजरात के मोदी” के विरोध में  व “कश्मीर के आतंक व अलगाववादियों” के पक्ष में हड़कंप मचाना इनका मुख्य कार्य बना हुआ है। देश-विदेश में भारत की छवि को धूमिल करने में तीस्ता जावेद , अरुंधति राय, मेघा पाटेकर व निर्मला देशपांडे आदि के स्वयं सेवी संगठन भी इन धर्मांधों का बढ़-चढ़ कर साथ निभाते हैं । अवैध विदेशी धन के बल पर भारतीय संस्कृति व हिन्दू धर्म के विरुद्ध नकारात्मक वातावरण बनाने वालों को आज अपने स्वार्थों के लिए जूझना पड़ रहा हैं। यह कैसी मानसिकता है जो इन धर्माधिकारियों और तथाकथित भारत भक्तों के झूठे व मनगठन्त प्रचारों द्वारा करोडों भारतवासियों को अपमानित होने को विवश करती है ?
प्रायः यह स्पष्ट है कि मुसलमानों के समान ही ईसाइयों के वैश्विक इतिहास को पलट कर पढ़ने व समझने से पता चलता है क़ि भारत के साथ साथ पुरी दुनिया मे ईसाइयों ने भी अपना साम्राज्य बढ़ाने के लिए अपने धर्मानुयायियों की सँख्या बल को बढाने के लिए किस किस प्रकार के षड्यंत्र रचे थे और अभी भी रचते है । इसके लिए इनके शिक्षा के केंद्र, चिकित्सा सुविधाएं संस्थान व लोभ-लालच आदि के द्वारा धर्मांतरण करवाना प्रमुख है। प्रायःपादरियों द्वारा हिन्दू देवी-देवताओं के प्रति अभ्रद प्रचार भी उनके षड्यंत्रों का एक प्रमुख भाग है।वास्तव में इनके विस्तार का मुख्य आधार ही धर्मान्तरण है इसीलिये यह प्रक्रिया भारत सहित विश्व के अनेक भागों में जारी है।
ब्रिटिश शासन में ईसाई मिशनरियों द्वारा बडे पैमाने पर हिंदुओं को आदिवासी व जनजाति बता कर  धर्मान्तरित करके ईसाई बनाया गया था वहीँ योजनायें कही गुप्त रूप से तो कहीं स्पष्ट रूप में  अभी भी चलायी जा रही है।इसके लिए मुस्लिम देशों के समान ईसाई देशों से भी प्रति वर्ष लगभग 10 से 15 हज़ार करोड़ रुपया विभिन्न संगठनों के माध्यम से आता रहा है। मोदी सरकार द्वारा ऐसी सैकड़ो-हज़ारों स्वयं सेवी संस्थाओं पर प्रतिबंध लगाये गये हैं। वैसे भी आस्थाओं व आत्माओं  का व्यापार नहीं किया जाना चाहिये। कुछ प्रदेशों छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश,गुजरात व हिमाचल प्रदेश में इसको रोकने का प्रावधान किया गया है परंतु कितना प्रभावशाली है अभी स्पष्ट कहा नही जा सकता। लेकिन राष्ट्रीय हित में धर्मांतरण पर पूर्ण प्रतिबंध लगे तो अनेक समस्याओं का निदान स्वतः ही हो जायेगा।
यह कहना अनुचित नहीं होगा कि इन समस्त नकारात्मक सोच वालों का केवल एक सूत्री एजेंडा होता है कि भारत को अस्थिर करने के लिये राष्ट्रवादी शक्तियों पर येन केन प्रकारेण आक्रामक बने रहो और अपने विदेशी आकाओं और प्रायोजकों को प्रसन्न रखो ताकि उनको आस्थाओं व आत्माओं के व्यापार की छूट मिली रहें। इसीलिए इन चर्च के धर्माधिकारियों के लिये संविधान नही “आस्थाओं के व्यापार पर संकट”  मुख्य चिंता का विषय बना हुआ है।

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