“प्रलोभनों को त्याग कर सत्य मार्ग पर चलें : आचार्य आशीष

 मनमोहन आर्या 

द्रोणस्थली कन्या गुरुकुल महाविद्यालय का वार्षिकोत्सव 4 जून से आरम्भ हुआ है जो 6 जून 2018 को समाप्त होगा। हमें आज इस गुरुकुल के उत्सव में सम्मिलित होने का अवसर मिला। हमारे पहुंचने से पूर्व गुरुकुल की 7 ब्रह्मचारिणियों का समावर्तन संस्कार सम्पन्न हो चुका था और उसके बाद विद्वानों द्वारा उनको भावी जीवन में कर्तव्यों आदि के विषय में प्रेरित किया जा रहा था। मंच पर आर्यजगत के अनेक विद्वान, नेता व संन्यासी उपस्थित थे। प्रमुख लोग स्वामी आशुतोष परिव्राजक जी, डा. प्रियंवदा वेद-शास्त्री, आचार्य आशीष दर्शनाचार्य, सार्वदेशिक सभा के नेता श्री सुरेश चन्द्र अग्रवाल जी, ठाकुर विक्रम सिंह जी, डा. अन्नपूर्णा जी सहित पं. सत्यपाल पथिक एवं उनके सुपुत्र भजन गायक श्री दिनेश पथिक जी उपस्थित थे। हम जब पहुचें तो वहां श्री दिनेश पथिक जी अपने पिता की एक बहुत ही भावपूर्ण रचना सुना रहे थे जिसके बोल थे ‘प्रभु तुम अणु से भी सूक्ष्म हो और गगन से विशाल हो। मैं मिसाल दूं तुम्हें कौन सी दुनियां में तुम बेमिसाल हो।।’ यह भजन उन्होंने गिट्टार बजा कर सुनाया जो बहुत आनन्ददायक लग रहा था। कार्यक्रम का संचालन गुरुकुल की आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी कर रही थीं।

भजन के बाद गुरुकुल की 6 छात्राओं ने संस्कृत भाषा का एक स्वागत गीत सुनाया। डा. अन्नपूर्णा जी ने सूचना दी की कुछ समय पूर्व 6 छात्राओं का समावर्तन संस्कार पूर्ण हुआ है। यह सभी छात्रायें मंच के सम्मुख प्रथम पंक्ति में बैठी हुईं थीं। हमने इनका एक चित्र लिया जिसे हम आपके लिए प्रस्तुत कर रहे हैं। स्नातक छात्रा दीप्ति ने गुरुकुल पर एक गीत रचा है जिसे सभी स्नातिकाओं ने गा कर सुनाया। गीत की पहली पंक्ति थी ऋणी हम तुम्हारे हैं गुरुकुल की भूमि। इसकी एक अन्य पंक्ति थी आंगन से तेरे हम जुदा हो रहे हैं।  आयोजन में आचार्य आशीष दर्शनाचार्य जी भी उपस्थित थे। उन्होंने अपने व्याख्यान में कहा कि स्नातिकाओं ने 15 वर्ष तक इस गुरुकुल में तप किया है। मंच पर उपस्थित आचार्या प्रियंवदा जी का भी उन्होंने उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इन बहिनों को देख कर मन में प्रसन्नता का भाव आता है। छात्राओं के निर्माण के लिए इन दोनों बहिनों ने अपना जीवन समर्पित किया है। आचार्य जी ने कहा कि आज स्नातिकाओं को विद्या दान देकर डा. अन्नपूर्णा जी को सन्तोष हो रहा होगा। स्नातिकाओं को उन्होंने कहा कि आप सब गुरुकुल परम्परा, आर्यसमाज और वैदिक धर्म की प्रतिनिधि हैं। आचार्य जी ने आचार्य का अपने शिष्यों को उपदेश सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्याय मा प्रमदः का उल्लेख किया। छात्राओं को उन्होंने कहा कि आपने आचार्या जी से यह उपदेश सुना होगा। आप सत्यं वद का अर्थ जानती हैं। हम ऋषि दयानन्द के अनुयायी समाज में सत्यं वद का समर्थन करने वाले हैं। हम जीवन में असत्य न बोले। उन्होंने कहा कि अब आपको समाज में जाकर काम करना है। सम्पत्ति, सुविधाओं व साधनों, कार एवं गोठी आदि के आकर्षण से आपको बचना है। अपने बारे में उन्होंने कहा कि मेरे पास बाहर के साधन सम्पन्न लोग आये और उन्होंने मुझे सभी प्रकार की सुविधायें देने का प्रलोभन दिया। आपको प्रलोभनों को त्याग कर सत्य मार्ग पर ही चलना है। बड़े लोगों के प्रभाव व सुविधाओं से आपको बचना है और उन्हें स्वीकार नहीं करना है। स्नातक बनी छात्रओ ंको उन्होंने कहा कि यदि आप सत्य पर स्थिर रहती हैं तो आपके गुरुकुल की छोटी बहिनों को प्रेरणा प्राप्त होगी। यदि आपने सत्य के विपरीत व्यवहार किया तो गुरुकुल की छोटी बहिनें भी वैसी ही हो जायेंगी।आचार्य आशीष जी ने स्नातक छात्राओं को कहा कि आपने सत्य सिद्धान्तों के साथ किसी प्रकार से समझौता नहीं करना है तथा उन पर अडिग रहना है। अपना स्वभाव आपने विनम्र रखना है। जीवन में आपसे बड़ी चूक न हो जाये, इसके लिए सावधान रहना है। परिश्रम करने वाला व्यक्ति यदि अपने लक्ष्य को भूल जाये तो यह उसके लिए विडम्बना बन जाती है। जीवन में पूर्णता को प्राप्त करें। हमें हमेशा यह स्मरण रहना चाहिये कि हमारा लक्ष्य क्या है। अपने जीवन के उद्देश्य को नहीं भूलना है। अध्ययन के क्षेत्र में आपकी जो प्रवीणता बनी है उसके साथ आपको ध्यान के क्षेत्र में भी कुशल बनाना है। जीवन के सत्य लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए आपको ध्यान से जुड़ना पड़ेगा। आपको ध्यान से जुड़े रहना है। आप अपने सभी कर्तव्यों को करते हुए ध्यानी बने रहें। जीवन में अच्छे काम करें। आचार्य जी ने पुनः सत्यं वद का उल्लेख कर कहा कि हमें सत्य से समझौता नहीं करना है। मनुष्य कई बार सांसारिक आकर्षणों में फंस कर समझौता कर बैठता है। दूसरी बात यह है कि आपको कभी जीवन के लक्ष्य से भटकना नहीं है। आचार्य जी ने स्नातक सभी छात्राओं को अपनी शुभकामनायें दी। डा. अन्नपूर्णा जी ने आचार्य जी का धन्यवाद करते हुए कहा कि हमें सत्य व आध्यात्मिक मार्ग को नहीं छोड़ना है।    स्नातिका दीप्ति ने कहा कि मेरे पास अनुभव नहीं है। अनुभव जीवन में सबसे बड़ी किताब होती है। मेरी सफलता में मेरी आचार्या और, गुरुकुल के संस्थापक तथा पिता जी के नाम से प्रसिद्ध, पिता जी का हाथ है। आचार्या जी का मेरे जीवन में योगदान है। वह मेरी मां भी हैं और आचार्या भी हैं। दीप्ति ने आचार्या जी के जीवन व चरित्र की प्रशंसा की। अपनी जूनियर छात्राओं को दीप्ति जी ने कहा कि आपको गुरुकुल की मर्यादाओं की रक्षा करनी है। अपने संस्कारों को आप हमेशा ऊंचा रखना। मैं कोशिश करुंगी की मैं अपनी आचार्या जी के दिये हुए संस्कारों को कभी न भूलूं।ठाकुर विक्रम सिंह जी ने कहा कि समय के अनुसार चलें। स्नातक कन्याओं को उन्होंने आचार्या बनने की सलाह दी। अपने बारे में उन्होंने कहा कि मैं तीन उपदेशक विद्यालयों में पढ़ा हूं। वैदिक साधन आश्रम तपोवन में मैं महात्मा आनन्द स्वामी जी से पढ़ा। हिसार दयानन्द ब्राह्म विद्यालय में पढ़ा और हापुड़ में स्वामी अमर स्वामी जी से पढ़ा। मैंने एम.ए. किया परन्तु मुझे इसका कोई महत्व प्रतीत नहीं होता। उन्होंने कहा कि सत्य बोलना, धर्म पर चलना एवं स्वाध्याय करने में प्रमाद न करना सुन्दर उपदेश है। जो इन्हें न मानता हो उसके लिए यह आदेश है। सबको इसे मानना ही होगा। ठाकुर विक्रम सिंह ने कहा कि उपदेश ब्राह्मण का होता है और आदेश क्षत्रिय करता है। ब्राह्म एवं क्षात्र शक्तियों के मिलने से देश उन्नति करता है। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने कहा कि पं. रामचन्द्र देहलवी एवं स्वामी अमर स्वामी जी आर्यसमाज के महाधन थे। यह दोनों कुरआन के विद्वान थे। उन्होंने बताया की पं. रामचन्द्र देहलवी जी ने चादंनी चौक के फव्वारे पर 15 वर्ष तक लगातार वेद और आर्यसमाज पर व्याख्यान दिये। विद्वान वक्ता ने पाखण्डों का खण्डन करने की सलाह दी। ठाकुर विक्रम सिंह जी ने अपने व्याख्यान को विराम देते हुए गुरुकुल को सहयोग का आश्वासन दिया।

 

पं. सत्यपाल पथिक जी ने कहा कि मुझे समावर्तन संस्कार को देखकर प्रसन्नता हो रही है। मैं स्नातक छात्राओं की योग्यताओं से आश्वस्त हूं। उन्होंने प्रियंवदा जी के गुरुकुल का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि मैं उनके गुरुकुल के समावर्तन संस्कार को कभी नहीं भूलूंगा। पथिक जी ने आचार्या और शिष्या के भावनात्मक संबंधों पर प्रकाश डाला। स्नातक छात्राओं को उन्होंने अपनी शुभकामनायें दी। उन्होंने स्नातक छात्राओं को वैदिक धर्म का पालन और प्रचार करने की सलाह दी और अपना आशीर्वाद भी दिया।वेद विदुषी आचार्या डा. प्रियंवदा वेदशास्त्री ने कहा कि वर्षों पहले डा. वेद प्रकाश गुप्ता जी से उनकी दिल्ली में भेंट हुई थी। तब उन्होंने गुरुकुल खोलने में सहयेग करने का प्रस्ताव किया था। उन्होंने कहा कि विद्या रूपी जल में स्नान की हुई छात्राओं को स्नातिका कहते हैं। गुरु का अर्थ आचार्य होता है। मनुस्मृति के अनुसार जो वेद और उपनिषद् का अध्ययन कराता है उसे आचार्या कहते हैं। स्वामी दयानन्द जी की कृपा से आपको उपनयन का अधिकार मिला है। हमें वेद का अध्ययन करना है और वेद की बातों को प्रमाण मानना है। स्वामी दयानन्द ने वेद के आधार पर नारियों को वेदाध्ययन एवं अन्य अधिकार प्रदान किये। समाज को उत्तम ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य चाहिये तो नारियों को वैदिक शिक्षा के द्वारा पढ़ाना चाहिये। उन्होंने मनुस्मृति का उल्लेख कर विस्तार से बताया कि उसमें कहा गया कि यदि राजा और वेद स्नातक कहीं जा रहे हों और एक को पहले रास्ता देना हो तो किसे दें? उन्होंने कहा कि इसके लिए स्नातक को पहले रास्ता देने का विधान है। उन्होंने कहा कि यह प्राचीन काल में गुरुकुल के ब्रह्मचारी के सम्मान का प्रतीक था। आचार्या जी ने कहा कि समावर्तन का अर्थ है कि अपने घर को पुनः लौटना। आचार्या जी ने कहा कि विद्या के आरम्भ से विद्या की समाप्ति तक ब्रह्मचारी व ब्रह्चारिणी को गुरुकुल में ही रहना होता था। ऐसा ब्रह्मचारी जब घर लौटता था तो उसके ग्राम व नगर के लोग मिलकर उसका अभिनन्दन करते थे। आचार्या जी ने कहा कि गुरु के द्वारा दी गई दृष्टि दीक्षा है। इसका ध्यान रखते हुए पालन करना है। उन्होंने सभी स्नातक छात्राओं को अपनी शुभकामनायें दी।   स्वामी आशुतोष परिव्राजक जी ने कहा कि हम आत्मा हैं। हमारे जीवन का आधार परमात्मा है। हम देह नहीं है। आत्मा का गुण विद्या, ज्ञान व चेतना है। हम सभी आत्मायें परमात्मा में डूबे हुए हैं। वही परमात्मा अनन्त काल तक हमारा आधार रहेगा। परमात्मा को मन व आत्मा से प्रणाम करें। हम सुनते व बोलते हैं। थोड़ा बोलो और बहुत सारा काम करो। ओ३म् क्रतो स्मर। परमात्मा को स्मरण करना ही हमारा पहला धर्म है। स्वामी जी ने वर्तमान समय में भोगवाद की प्रवृत्ति में वृद्धि की चर्चा की। उन्होंने कहा कि सबको सुख की खोज है। हमें अपनी आत्मा का ज्ञान व पहचान नहीं है तो हमें सुख कहां से मिलेगा। परमात्मा हमारे अन्दर है। अविद्या से हमें अपने भीतर विद्यमान परमात्मा की झलक नहीं मिलती। हम आत्म विद नहीं हैं। परमात्मा हम से दूर है। अनुभव में दूरी बनी हुई है। परमात्मा दूर से दूर व निकट से निकट है। परमात्मा पर विश्वास रखें। आत्मा रूप, रस, गन्ध, शब्द आदि विषय नहीं है। परमात्मा भी अरुप तथा विषयों से रहित है। हमें आत्मा व परमात्मा को समझना है। हम समाज में आदर्श व्यक्ति बने। ऐसा होने पर आप तृप्त होंगे। स्वाध्याय करना अच्छा काम है। हमें यम व नियमों को जानना व समझना है। यम व नियमों को धारण करने से परिवार व समाज बनेगा। वैदिक जीवन आदर्श जीवन है। मनुष्य स्वयं को पहचाने। आत्मा का भोजन आनन्द है। देव बनने पर आपको सुख मिलेगा।  सार्वदेशिक सभा के नेता श्री सुरेश चन्द्र अग्रवाल ने कहा कि स्नातिकाओं का चौथा समूह आज यहां से विदा ले रहा है। उनके पुरुषार्थ का यह परिणाम है। स्नातिकाओं को गुरुकुल में जो संस्कार मिले हैं वह उनके भावी जीवन में सहायक होंगे। आप अपनी पूर्व स्नातिकाओं के जीवन की जानकारी प्राप्त करें। इससे आपको अपने जीवन का मार्ग चुनने में सहायता व प्ररेणा मिलेगी। वर्ष में एक या दो बार आप यहां गुरुकुल में अवश्य आयें। आप ऐसा करेंगी तो छोटी छात्राओं को अच्छा लगेगा। श्री सुरेश अग्रवाल जी ने कहा कि आपका जीवन साथी आर्य विचारों का होना चाहिये। यह बहुत आवश्यक है। तभी आप आर्य विचारधारा को बढ़ा पायेंगी। आप भारत की वेद व वैदिक संस्कृति की संवाहक हैं। श्री सुरेश अग्रवाल जी ने कहा कि वर्तमान मे ंवैदिक धर्म एवं संस्कृति का संक्रमण काल चल रहा है। इस धर्म व संस्कृति को विलुप्त करने के षड़यन्त्र हो रहे हैं। वैदिक धर्म व संस्कृति हमारे गुरुकुलों में जीवित है। हमें गुरुकुलों को सहयोग करना चाहिये। श्री सुरेश अग्रवाल जी ने अपनी ओर एक लाख ग्यारह हजार रुपये गुरुकुल को दान करने की घोषणा की। डा. अन्नपूर्णा जी ने इस उदारता के लिए उनका धन्यवाद किया। गुरुकुल की आचार्या डा. अन्नपूर्णा जी ने कहा कि कोई मनुष्य कितना रूपवान हो यदि उसमें गुण नहीं है तो उसका रूप व्यर्थ है। किसी का खानदान कितना बड़ा हो पर यदि वह व्यक्ति चरित्रवान् नहीं है तो वह बेकार है। विद्वान का आचरण यदि पढ़ी विद्या के अनुकूल नहीं है तो उसकी विद्या व्यर्थ है। किसी के पास धन है परन्तु वह उसका सदुपयोग नहीं करता तो उसके पास धन का होना व्यर्थ है। आचार्या जी ने छात्राओं को कहा कि अपनी विद्या को सार्थक करो। सभा को आचार्य डा. सूर्य मोहन, श्री वीरेन्द्र शास्त्री, श्री अशोक आर्य गाजियाबाद/डबवाली, ब्र. नन्द किशोर, गोस्वामी जी और गुरुकुल के संस्थापक डा. वेद प्रकाश गुप्ता जी ने भी सम्बोधित किया। शान्ति पाठ के साथ लगभग 2.15 बजे अपरान्ह सत्संग समाप्त हुआ।

 

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