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    Homeधर्म-अध्यात्म“माता-पिता की नित्य सेवा करना सन्तान का धर्म वा पितृ-यज्ञ है”

    “माता-पिता की नित्य सेवा करना सन्तान का धर्म वा पितृ-यज्ञ है”

     

    मनमोहन कुमार आर्य

    मनुष्य के जीवन में ईश्वर के बाद माता-पिता का सबसे अधिक महत्व है। इसके बाद जिन लोगों का महत्व है उनमें हमारे आचार्य, गुरु व उपाध्याय आते हैं जिनसे हम ज्ञान, विज्ञान व अनेक विद्याओं का अध्ययन करते व सीखते हैं। यदि दुर्भाग्य से कोई मनुष्य अपने माता-पिता आदि देवताओं के सान्निध्य को प्राप्त कर उनकी सेवा आदि नहीं करता तो उसका जीवन पशुओं से भी निकृष्ट श्रेणी का होता है। मातापिता हों तो हमें मनुष्य जीवन मिलना ही असम्भव है। मातापिता हमारे जन्मदाता होने के साथ हमारे पालनकर्ता भी होते हैं। वह हमारी शिक्षा ज्ञान सम्बन्धी आवश्यकताओं को अपने पुरुषार्थ से अर्जित धन का व्यय कर पूर्ति करते हैं। यह कार्य माता पिता के अतिरिक्त समाज में कोई और नहीं करता है। इस प्रकार से मातापिता से हमें जो लाभ सुख प्राप्त होता है, उसका ऋण उतारना हमारा कर्तव्य है। यदि हम अपने माता-पिता के प्रति अपना ऋण नहीं उतारेंगे तो कर्म फल सिद्धान्त के अनुसार ईश्वर हमसे उसकी पूर्ति इस जन्म वा परवर्ती जन्मों में करेगा जिसका परिणाम सुख तो होना सम्भव नहीं है, अवश्य दुःख ही होगा। संसार का कोई मनुष्य ऐसा नहीं है जो दुःख चाहता हो। सभी दुःख से बचने के उपाय करते हैं। मनुष्य उच्च शिक्षा प्राप्त करता है, यह आवश्यक है। इसी के साथ उसे यह भी चाहिये कि वह योग्य विद्वानों से सम्पर्क कर जीवन में होने वाले सभी दुःखों के कारणों को जाने और उन कारणों से बचने उन्हें दूर करने के उपायों को भी जानना चाहिये। जीवन में मिलने वाले दुःखों के अनेक कारण होते हैं। उनमें से एक कारण यह भी होता है कि हमने पूर्वजन्म या इस जन्म में अपने माता-पिता के प्रति वह सद्व्यवहार न किया हो जो हमें करना चाहिये था अर्थात् जो हमारा कर्तव्य था। हो सकता है कि हमारे व्यवहार से उनकी आत्मा व शरीर को दुःख पहुंचा हो जिसमें यह भी सम्मिलित है कि हमारे होते हुए उन्हें उचित आवास, भोजन, वस्त्र व सुरक्षित जीवन उपलब्ध न हो पाया हो। हमें अपने माता-पिता की तो आवश्यकताओं का ध्यान तो रखना ही है, इसके साथ हमें अपने आचार्य, गुरुओं व उपाध्यायों की भोजन, वस्त्र व धन आदि से सेवा करने का अवसर गंवाना नहीं है। ऐसा यदि हम करेंगे तो इन कर्मों को करके हम अनेक दुःखों से बच सकते हैं। जहां तक पूर्व जन्म के हमारे कर्मों का फल है, वह तो हमें अवश्य ही भोगने होंगे। उससे बचने का कोई उपाय नहीं है। हां, हमें यह जानकर कि हमें पूर्वजन्मों के कर्मों को अवश्य भोगना है, हंस कर भोगें या रो कर भोगें, इनमें अच्छा है कि हम हंस कर उन दुःखों को भोगें। हमें ईश्वर का ध्यान व उपासना सहित सत्यार्थप्रकाश आदि सद्ग्रन्थों का स्वाध्याय करते हुए अविचलित होते हुए वाचिक, मानसिक व कायिक दुःखों को धैर्य पूर्वक सहन करना चाहिये। ऐसा करने से हमारे प्रारब्ध से अशुभ कर्म न्यून होते रहते हैं।

     

    हम अपने माता-पिता के प्रति अपने कर्तव्यों व उनके निर्वाह की चर्चा कर रहे हैं। मातापिता के प्रति अपने कर्तव्यों की भली प्रकार से पूर्ति का नाम ही पितृ यज्ञ है। मनुष्य को चाहिये कि जहां वह नाना प्रकार के मानसिक व्यवहार करता है, वहीं अधिक नहीं दो से पांच मिनट अपने माता-पिता के उपकारों व उनके कष्टों को भी प्रतिदिन स्मरण कर लिया करे। ऐसा करने से उसे यह लाभ होगा कि वह उनके प्रति अपने कर्तव्यों से शायद विमुख न हो। वह यदि माता-पिता की अच्छी तरह से सेवा करेगा तो उसे माता-पिता का आर्शीवाद मिलेगा और साथ ही माता-पिता की सेवा द्वारा वह जो सद्कर्म कर्म रहा है उसका लाभ भी उसे तत्काल व कालान्तर में अवश्य ही प्राप्त होगा। हम जब अपने जीवन के विषय में सोचते हैं तो हमारे माता-पिता के हमारे लिये गये अनेक उपकार सम्मुख आते हैं जिन्हें करने में उन्होंने अनेक कठिनाईयां व दुःख सहे थे। आज हम चाह कर भी उनकी आत्मा को अपनी सेवा के द्वारा प्रसन्न व सुखी नहीं कर सकते। इसका कारण की बहुतों के माता-पिता संसार में ही न हो। बहुत लोगों को माता-पिता, समाज व विद्यालयों से माता-पिता के प्रति सन्तानों के कर्तव्यों की शिक्षा ही नहीं मिलती। अतः बचपन से ही हमारे विद्वान, पुरोहित, आचार्य व गुरु आदि सन्तानों को घर व विद्यालय आदि में उपदेश करते रहें। राम व श्रवण कुमार आदि की कथाओं के द्वारा भी सन्तानों को माता-पिता की सेवा के महत्व को बताया जाये तो उन सन्तानों को बड़ा होने पर इस विषय में पश्चाताप नहीं करना पड़ेगा।

     

    हम जीवन में जो कुछ भी बनते हैं वह माता-पिता सहित अपने आचार्य व गुरुओं की कृपा से बनते हैं। जीवन में शिक्षा व ज्ञान का बहुत महत्व है। हमारे सभी ऋषि वेदों के परम ज्ञानी मनुष्य हुआ करते थे। यह ज्ञान उनको गुरुकुलों में अपने आचार्य व ऋषियों से ही प्राप्त होता था। स्वाध्याय का भी जीवन में बहुत महत्व है। प्राचीन काल से ही हमारे ऋषियों ने स्वाध्याय को नित्य कर्मों में सम्मिलित किया है। वेद, दर्शन, उपनिषद, मनुस्मृति, वेदांग आदि का स्वाध्याय मनुष्य को जीवन भर करना चाहिये। स्वाध्याय सन्ध्या का भी आवश्यक अंग है। यदि हम स्वाध्याय नहीं करेंगे तो हम सन्ध्या को उचित तरह से नहीं कर सकेंगे। स्वाध्याय करने से मनुष्य को ईश्वर, जीव व संसार के ज्ञान सहित अपने कर्तव्यों, लक्ष्यों तथा उसके साधनों का भी ज्ञान होता है। जीवन के आरम्भ काल में हमें विद्यालयों में अपने आचार्यों से व्याकरण, भाषा, ज्ञान, विज्ञान तथा सामान्य विषयों का ज्ञान भी प्राप्त करना होता है। आजकल अनेक भाषायें प्रचलित हैं। हिन्दी व अंग्रेजी भाषाओं का अपना महत्व है। यह भाषायें हम सभी को सीखनी चाहियें। हम जहां रहते हैं वहां की क्षेत्रीय भाषा का ज्ञान भी हमें होना चाहिये। इसके साथ संस्कृत का ज्ञान होना भी आवश्यक है। इसके लिये सभी को विशेष प्रयत्न करने चाहिये। यदि सभी आर्यहिन्दू यह निश्चय कर लें कि हमें संस्कृत का अध्ययन करना है तो इससे हमें बहुत लाभ हो सकता है। संस्कृत का अध्ययन कर हम अपने शास्त्रों को अच्छी प्रकार से समझ सकते हैं। शास्त्रीय ज्ञान से हमारा धर्म संस्कृति बलशाली होंगे। महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ लिखकर एक बहुत बड़ी आवश्यकता की पूर्ति की। उनके बनाये सत्यार्थप्रकाश ग्रन्थ को, जो कि आर्यभाषा हिन्दी भाषा में है, पढ़कर हम धर्म व संस्कृति विषयक अनेक बातों को आसानी से जान व समझ सकते हैं। यह सत्यार्थप्रकाश ऋषि का समस्त मानव जाति पर एक महान उपकार है और हिन्दुओं व आर्यों पर तो यह उपकार ऐसा है कि जिसका शब्दों में वर्णन नहीं किया जा सकता। इस ज्ञान की प्राप्ति के लिए ही ऋषि दयानन्द को अपने माता-पिता व उनका घर छोड़ना पड़ा था और देश के अनेक भागों में जाकर विद्वानों व योगियों को ढूंढ कर उनसे ईश्वर व आत्मा संबंधी अपने प्रश्नों के उत्तर प्राप्त करने के लिए अपूर्व पुरुषार्थ करना पड़ा था। हमें सत्यार्थप्रकाश का नित्य पाठ करना चाहिये। जीवन में जितनी बार भी सत्यार्थप्रकाश का पाठ करेंगे उतना अधिक लाभ हमें मिलेगा।

     

    पितृ यज्ञ के अन्तर्गत हमें अपने माता-पिता की भोजन, वस्त्र, आवास आदि की अपने समान व्यवस्था कर उनकी प्रातः व सायं आवश्यकतानुसार सेवा भी करनी है। हमें उनके प्रति ऐसा सभ्य व्यवहार करना है कि जिससे उनका मन व आत्मा सदैव सन्तुष्ट रहें। जहां तक सम्भव हो उन्हें किसी प्रकार का कष्ट नहीं होना चाहिये। इस कार्य से हमें इस जन्म व परजन्म में भी सुख का लाभ होगा। यदि हम ऐसा नहीं करेंगे तो ईश्वर की व्यवस्था से हमें माता-पिता की उपेक्षा का दण्ड मिलेगा जिससे बचने का अन्य कोई उपाय नहीं है। अतः माता-पिता, आचार्य और गुरुओं के प्रति हमें अपने कर्तव्य को जानकर वा पितृ यज्ञ करके पितृ ऋण से उऋण होने का प्रयत्न करना चाहिये।

     

    मनमोहन आर्य
    मनमोहन आर्यhttps://www.pravakta.com/author/manmohanarya
    स्वतंत्र लेखक व् वेब टिप्पणीकार

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