स्वतंत्रता आंदोलन में हमारे साहित्यकारों का योगदान

        राकेश कुमार आर्य 
लेखनी  प्रत्येक काल में  समाज का  मार्गदर्शन करती आई है ।  जब – जब  समाज दिग्भ्रमित होता है , राजनीति पथ भ्रष्ट होती है , और जनसाधारण किंकर्तव्यविमूढ़ की अवस्था में आता है , तब- तब लेखनी के सिपाही उठकर  लेखनी के माध्यम से  इन सब का मार्गदर्शन करते हैं । भारत का स्वतंत्रता आंदोलन  भी इसका अपवाद नहीं है । पराधीनता के उस  काल में  जब सर्वत्र पराभव ही पराभव दिखाई देता था , तब हमारे देश में अनेकों ऐसे क्रांतिकारी और साहित्यकार उत्पन्न हुए , जिन्होंने अपनी पवित्र लेखनी के माध्यम से  हमारे समाज का मनोबल और आत्मबल बनाए रखने का प्रशंसनीय कार्य किया । स्वतंत्रता आन्‍दोलन के इस महायज्ञ में साहित्यकारों ने तत्कालीन समाज में चेतना के ऐसे बीज बोये, जिनके अंकुरों की सुवास से सुवासित वृक्षों ने उस झंझावात को जन्म दिया, जिसने समाज के हर वर्ग को इस आंदोलन में ला खड़ा किया।गोपालदास व्यास के शब्दों में-”आज़ादी के चरणों में जो जयमाला चढ़ाई जाएगी।वह सुनो, तुम्हारे शीशों के फूलों से गूंथी जाएगी।“व्यास जी ने अपने उन महान क्रांतिकारियों को जिन्होंने देश के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर किया ,ऐसे भावपूर्ण शब्दों में अपनी श्रद्धांजलि अर्पित कर मानो समस्त राष्ट्र की ओर से ही उनकी स्मृतियों पर अपने पुष्प अर्पित कर दिए हैं । यह सच है कि आज जब – जब भी हमारे देश में स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस की धूम मचती है तो हमें अपने अनेकों महान क्रांतिकारियों और बलिदानियों की स्मृतियां आ घेरती हैं । हमारे चारों ओर उनकी स्मृतियां बड़े प्रश्न चिन्ह बनकर आ खड़ी होती हैं ,और हमसे पूछती है कि आपने हमारे सपनों का भारत बनाने की दिशा में क्या किया ?  कितना किया ? और कैसे किया ? जब स्वतंत्रता आंदोलन की हमारे देश में धूम मची थी , तब लगभग हर प्रांत के, लगभग हर भाषा-  भाषी क्षेत्र के महान साहित्यकारों , कवियों , लेखकों ने अपने – अपने ढंग से अपने- अपने क्षेत्र के लोगों का आजादी के आंदोलन में कूदने का आवाहन किया ।  माइकेल मधुसूदन ने बंगाली में, भारतेन्दु हरिशचन्द्र ने हिन्दी में, नर्मद ने गुजराती में, चिपूलूंपणकर ने मराठी में, भारती ने तमिल में तथा अन्य अनेक साहित्यकारों ने विभिन्न भाषाओं में राष्‍ट्रीयता की भावना से परिपूर्ण उत्कृष्‍ट साहित्य का सृजन किया। यह ऐसा साहित्य लेखन था जिसे पढ़कर या सुनकर हमारे देश की तत्कालीन युवा पीढ़ी के रक्त में क्रांति का उबाल आ जाता था । उनकी बाजुए फड़कने लगती थीं , और मन राष्ट्र वेदी पर बलि होकर देश के लिए सर्वस्व न्योछावर करने की भावना से ओत प्रोत हो उठता था ।इन साहित्यिक कृतियों ने भारतवासियों के हृदयों में सुधार व जागृति की उमंग उत्पन्न कर दी।स्वतंत्रता के इस आंदोलन में भारतेन्दु हरिश्‍चन्‍द्र का नाम अग्रणी है। भारतेंदु हरिश्चंद्र  ने तत्कालीन युवा पीढी के भीतर  ऐसा उबाल  पैदा किया था  कि उनके साहित्य को पढ़कर  हमारे देश के अधिकांश युवा  अंग्रेजी सरकार के अन्याय , प्रतिशोध  और अत्याचार के विरुद्ध  उठ खड़े हुए थे । उन्हें इस बात का बड़ा क्षोभ था कि अंग्रेज़ भारत की सारी सम्पत्ति लूटकर विदेश ले जा रहे हैं। उनकी लेखनी ‘भारत दुर्दशा’ से अवगत कराते हुए लिखती है-“रोबहु सब मिलि, अबहु भारत भाई,हा! हा! भारत दुर्दशा न देखी जाई।“‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ व्यंग्य के माध्यम से भारतेन्दु जी ने  तत्कालीन राजाओं की कार्यशैली पर करारा व्यंग किया था । इसके माध्यम से उन्होंने जनता को बताया था कि हमारे वर्तमान शासक  घोर स्वार्थी हैं , और जनता के दुख-दर्द से उन्हें कोई लेना देना नहीं है, इसलिए ऐसे स्वार्थी  और  कर्तव्यविमुख  शासकों के विरुद्ध  आंदोलन करना देशवासियों का परम धर्म है। ।प्रताप नारायण मिश्र, बद्रीनारायण चौधरी, राधाकृष्ण दास, ठाकुर जगमोहन सिंह, पं. अम्बिका दत्त व्यास, बाबू रामकृष्ण वर्मा आदि समस्त साहित्यकारों ने स्वतंत्रता आंदोलन की धधकती हुई ज्वाला को प्रचंड रूप दिया । उन्होंने अपने स्तर से और अपने  ढंग से  क्रांति की  ज्वाला को तो प्रचंड किया ही  साथ ही यह बताने में भी संकोच नहीं किया  कि अंग्रेजी  सरकार का  इस देश के प्रति कोई  कर्तव्य नहीं है। वह अपने देश के प्रति  कर्तव्यबद्ध है , और इस देश के लोगों  को वह केवल और केवल अपना दास मानती है । उसके विचारों में और उसकी कार्यशैली में  कहीं पर भी ऐसा भाव नहीं झलकता कि वह लोकतंत्र  में विश्वास रखते हुए भारत वासियों के प्रति थोड़ी-सी भी सहानुभूति रखती हैं ।इन सबकी रचनाओं ने राष्‍ट्रीयता के विकास में बहुत योगदान दिया। बंकिमचन्द्र ने ‘आनंद मठ’ व ‘वंदेमातरम्’ की रचना की । वंदे मातरम गीत ने हमारे सभी देशवासियों को एक सूत्र में पिरो कर उस समय ऐसा रोमांस खड़ा किया था कि अंग्रेज सरकार इस शब्द मात्र से ही कांपने लगी थी जहां पर भी वंदे मातरम का गुण सुनाई दे जाता था वही अंग्रेज सरकार अनुमान लगा लेती थी यहां पर निश्चय ही क्रांति की आग दहक रही है। बंकिम बाबू की आनंदमठ ने बंगाल में क्रांतिकारी राष्‍ट्रवाद की पाठ्य पुस्तक का कार्य किया।माखन लाल चतुर्वेदी, रामनरेश त्रिपाठी, बालकृष्ण शर्मा ‘नवीन’ और सुभद्रा कुमारी चौहान ने राष्‍ट्र प्रेम को ही मुखरित नहीं किया अपितु स्वतंत्रता आंदोलन  में भी भाग लिया। माखन लाल चतुर्वेदी ने फूल के माध्यम से अपनी देशभक्‍ति की भावना को व्यक्‍त किया:-“चाह नहीं मैं सुरबाला केगहनों में गूंथा जाऊंचाह नहीं मैं प्रेमी माला में बिंधप्यारी को ललचाऊंमुझे तोड़ लेना ए वन मालीउस पथ पर देना फेंकमातृभूमि पर शीश चढ़ानेजिस पथ जाएं वीर अनेक।“राष्‍ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्‍त ने भारत-भारती के द्वारा राष्‍ट्रीयता का प्रचार-प्रसार कर भारत के रणबांकुरों को स्वतंत्रता आंदोलन में कूदने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने बहुत सरल शब्दों में देश के लोगों की चेतना को झकझोर कर रख दिया था । उनकी बनाई देश भक्ति की कविताओं  को लोग आज भी पढ़ कर रोमांचित हो उठते हैं। उन्होंने सोई हुई भारतीयता को जगाते हुए कहा-“जिसको न निज गौरव तथा निज देश का अभिमान है वह नर नहीं, पशु निरा है और मृतक समान है।“तत्कालीन साहित्यकारों में शिरोमणि लेखक, क़लम के सिपाही मुंशी प्रेमचंद्र को यदि आज इस अवसर पर स्मरण नहीं किया गया तो भी यह लेख अपूर्ण ही माना जाएगा  । मुंशी प्रेमचंद जी हमारे स्वतंत्रता आंदोलन में साहित्यकारों की ओर से वह हस्ताक्षर हैं जिन पर हम सबको गर्व और गौरव की अनुभूति होती है । इस महान साहित्यकार की रचनाओं ने मृतप्राय: लोगों में भी प्राण फूंक दिए। उन्होंने अपने अधिकारों के प्रति उदासीन  लोगों को जगाने और क्रूर तानाशाही के विरुद्ध उठ खड़े होने का सफल आवाहन किया जो अभी तक क्रूर तानाशाही के सामने बोलना तक उचित नहीं मानते थे और क्रूर तानाशाही के अत्याचारों को सहना जिनकी नियति  बन चुका था । मुंशी प्रेमचन्द की न जाने कितनी रचनाओं पर रोक लगी, न जाने कितना साहित्य जलाने की कोशिश की गई , परन्तु उनकी लेखनी सदा एक सच्चे क्रांतिकारी की भांति स्वतंत्रता आंदोलन में विस्फोटक का कार्य करती रही।मुंशी जी के पीछे अंग्रेज़ सरकार का गुप्तचर विभाग लगा रहा तथा उनकी रचना ‘सोज़े वतन’ के विषय में उन्‍हें तलब किया गया। नवाब राय की स्वीकृति पर उन्हें डराया-धमकाया गया तथा ‘सोज़े वतन’ की प्रतियां जला दी गई , परन्तु एक सच्चे क्रांतिकारी की भांति अंग्रेज़ों की इस दमनकारी नीति से प्रभावित हुए बिना मुंशी प्रेमचंद की लेखनी इस आंदोलन में वैचारिक क्रांति उगलती रही।“मैं विद्रोही हूंजग में विद्रोह कराने आया हूंक्रांति का सरल सुनहरा राग सुनाने आया हूं”का शंख बजाने वाले कवि नीरज की उक्‍त पंक्‍तियों से ही उनका स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान स्पष्‍ट झलकता है। लोगों को अत्याचार के आगे न झुकने की प्रेरणा देते हुए नीरज ने कहा था-“देखना है ज़ुल्म की रफ्‍़तार बढ़ती है कहां तक।देखना है बम की बौछार है कहां तक।।”इसी प्रकार ‘दिनकर’ की तूलिका ने ऐसे ही वीरों के स्वागत में लिखा-“क़लम आज उनकी जय बोलजला अस्थियां बारी-बारीछिटकायी जिसने चिंगारीजो चढ़ गए पुण्य वेदी परलिए बिना गर्दन का मोलक़लम आज उनकी जय बोल।”कविवर प्रसाद ने लेखनी के द्वारा जनमानस को यह कहकर उद्वेलित किया-“हिमाद्रि तुंग श्रृंग सेप्रबुद्ध शुद्ध भारतीस्वयंप्रभा समुज्जवलास्वतंत्रता पुकारती।”श्याम लाल गुप्‍त परिषद की लेखनी के साथ तो हर तरफ़ यही आवाज़ गूंज उठी-“विजयी विश्‍व तिरंगा प्याराझंडा ऊंचा रहे हमारा।”मित्रों ! आज  देश की जो परिस्थितियां बनी हुई है , उनमें भी सर्वत्र एक आवाहन है , एक चुनौती है ,चैलेंज है । हमारे लिए  सर्वत्र एक पुकार है , ललकार है  , एक आवाहन है –  क्रांति का ।और उठ खड़े होकर देशद्रोहियों , देश विरोधियों  और राष्ट्रघातियों  को  कड़ा पाठ पढ़ाने का । मां भारती आज भी बंधनों में जकड़ी खड़ी है । कहीं ईसाइयत  इसको जकड़ रही हैं , तो कहीं इस्लाम  अपना विकराल रूप दिखा रहा है । देशद्रोहियों को राजनीति के  गद्दार लोग अपना समर्थन देकर  यह स्पष्ट कर रहे हैं कि देश में आज भी जयचंद की परंपरा बनी हुई है । ऐसे में फिर हमें किसी दिनकर की,  किसी मैथिलीशरण गुप्त की, किसी प्रेमचंद की आवश्यकता है । फिर हमें  उनकी लेखनी से निकलने वाले गरम लहू से  बनने वाले सुभाष चंद्र बोस की आवश्यकता है , भगत सिंह की आवश्यकता है ,चंद्रशेखर और बिस्मिल की आवश्यकता है । यज्ञ वेदी  फिर सजी हुई है , क्रांति की धूम के लिए ।  समझ लो कि स्वतंत्रता आंदोलन  को तैयार करने की  सारी भूमिका बन चुकी है।अग्नि प्रचंड करने  भर की देर है । शत्रु फिर  फन फैला रहे हैं । यदि हम शांत रह गए  या इस  विकराल स्थिति के विरुद्ध उठ खड़े होने का साहस खो बैठे तो बड़े संघर्ष के पश्चात जिस आजादी को प्राप्त किया था , वह हमसे  फिर गुम हो सकती है । आज के हमारे कवियों का और साहित्यकारों का यह महती दायित्व बनता है कि वह इस देश के बारे में सोचें और उसी परंपरा को जीवित रखें जो मैथिलीशरण गुप्त की परंपरा है , प्रेमचंद की परंपरा है , नीरज की परंपरा है, और यह स्मरण रखें कि यहां पर राम का चरित्र लिखने के लिए वाल्मीकि तब मिलता है जब राम इस योग्य होता है कि कोई उसकी बारे में लेखनी चला सके। कहने का अभिप्राय है कि यहां पर चाटुकारिता को अपना उद्देश्य नहीं माना जाता और दरबारी कवि होना यहां पर अभिशाप है ।यहाँ दरबार कवि ढूंढता है , कवि दरबारों को नहीं ढूंढते  । यहां पर कवि किसी मोह के वशीभूत होकर नहीं लिखते । यहां तो राष्ट्र जागरण के लिए लिखा जाता है , राष्ट्रोत्थान के लिए लिखा जाता है , राष्ट्र – उद्धार के लिए लिखा जाता है । क्योंकि सब कवि अपना यह दायित्व समझते हैं कि राष्ट्र जागरण , राष्ट्रोद्धार और राष्ट्रोत्थान ही उनकी लेखनी का एकमात्र व्रत है ,एकमात्र संकल्प है ।

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