रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?

इस बात में तनिक भी सन्देह नहीं कि यदि केन्द्र एवं राज्य सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है! मैं फिर से दौहरा दूँ कि “हाँ यदि सरकारें चाहें तो देश में व्याप्त 90 फीसदी भ्रष्टाचार स्वत: रुक सकता है!” शेष 10 फीसदी भ्रष्टाचार के लिये दोषी लोगों को कठोर सजा के जरिये ठीक किया जा सकता है। इस प्रकार देश की सबसे बडी समस्याओं में से एक भ्रष्टाचार से निजात पायी जा सकती है।
मेरी उपरोक्त बात पढकर अनेक पाठकों को लगेगा कि यदि ऐसा होता तो भ्रष्टाचार कभी का रुक गया होता। इसलिये मैं फिर से जोर देकर कहना चाहता हूँ कि “हाँ यदि सरकारें चाहती तो अवश्य ही रुक गया होता, लेकिन असल समस्या यही है कि सरकारें चाहती ही नहीं!” सरकारें ऐसा चाहेंगी भी क्यों? विशेषकर तब, जबकि लोकतन्त्र के विकृत हो चुके भारतीय लोकतन्त्र के संसदीय स्वरूप में सरकारों के निर्माण की आधारशिला ही काले धन एवं भ्रष्टाचार से रखी जाती रही हैं। अर्थात् हम सभी जानते हैं कि सभी दलों द्वारा काले धन एवं भ्रष्टाचार के जरिये अर्जित धन से ही तो लोकतान्त्रिक चुनाव ल‹डे और जीते जाते हैं।
स्वयं मतदाता भी तो भ्रष्ट लोगों को वोट देने आगे रहता है, जिसका प्रमाण है-अनेक भ्रष्ट राजनेताओं के साथ-साथ अनेक पूर्व भ्रष्ट अफसरों को भी चुनावों में भारी बहुमत से जिताना, जबकि सभी जानते हैं की अधिकतर अफसर जीवनभर भ्रष्टाचार की गंगा में डुबकी लगाते रहते हैं। सेवानिवृत्ति के बाद ये ही अफसर हमारे जनप्रतिनिधि बनते जा रहे हैं। मैं ऐसे अनेक अफसरों के बारे में जानता हूँ जो 10 साल की नौकरी होते-होते एमपी-एमएलए बनने का ख्वाब देखना शुरू कर चुके हैं। साफ़ और सीधी सी बात है-कि ये चुनाव को जीतने लिये, शुरू से ही काला धन इकत्रित करना शुरू कर चुके हैं, जो भ्रष्टाचार के जरिये ही कमाया जा रहा है। फिर भी मतदाता इन्हें ही जितायेगा।
ऐसे हालत में सरकारें बिना किसी कारण के ये कैसे चाहेंगी कि भ्रष्टाचार रुके, विशेषकर तब; जबकि हम सभी जानते हैं कि भ्रष्टाचार, जो सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है। यदि सरकारों द्वारा भ्रष्टाचार को ही समाप्त कर दिया गया तो इन राजनैतिक दलों का तो अस्तित्व ही समाप्त हो जायेगा! परिणाम सामने है : भ्रष्टाचार देशभर में हर क्षेत्र में बेलगाम दौ‹ड रहा है और केवल इतना ही नहीं, बल्कि हम में से अधिकतर लोग इस अंधी दौ‹ड में शामिल होने को बेताब हैं।
 
‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनाया जावे।
  
अधिकतर लोगों के भ्रष्टाचार की दौ‹ड में शामिल होने की कोशिशों के बावजूद भी उन लोगों को निराश होने की जरूरत नहीं है, जो की भ्रष्टाचार के खिलाफ काम कर रहे हैं या जो भ्रष्टाचार को ठीक नहीं समझते हैं। क्योंकि आम जनता के दबाव में यदि सरकार ‘‘सूचना का अधिकार कानून” बना सकती है, जिसमें सरकार की 90 प्रतिशत से अधिक फाइलों को जनता देख सकती है, तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनाना क्यों असम्भव है? यद्यपि यह सही है कि ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बन जाने मात्र से ही अपने आप किसी प्रकार का जादू तो नहीं हो जाने वाला है, लेकिन ये बात तय है कि यदि ये कानून बन गया तो भ्रष्टाचार को रुकना ही होगा।

‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनवाने के लिए उन लोगों को आगे आना होगा जो-

भ्रष्टाचार से परेशान हैं, भ्रष्टाचार से पीड़ित हैं,

भ्रष्टाचार से दुखी हैं,

भ्रष्टाचार ने जिनका जीवन छीन लिया,

भ्रष्टाचार ने जिनके सपने छीन लिये और

जो इसके खिलाफ संघर्षरत हैं।

अनेक कथित बुद्धिजीवी, निराश एवं पलायनवादी लोगों का कहना है कि अब तो भ्रष्टाचार की गंगा में तो हर कोई हाथ धोना चाहता है। फिर कोई भ्रष्टाचार की क्यों खिलाफत करेगा? क्योंकि भ्रष्टाचार से तो सभी के वारे-न्यारे होते हैं। जबकि सच्चाई ये नहीं है, ये सिर्फ भ्रष्टाचार का एक छोटा सा पहलु है।
यदि सच्चाई जाननी है तो निम्न तथ्यों को ध्यान से पढकर सोचें, विचारें और फिर निर्णय लें, कि कितने लोग भ्रष्टाचार के पक्ष में हो सकते हैं?

अब मेरे सीधे सवाल उन लोगों से हैं जो भ्रष्ट हैं या भ्रष्टाचार के हिमायती हैं या जो भ्रष्टाचार की गंगा में डूबकी लगाने की बात करते हैं। क्या वे उस दिन के लिए सुरक्षा कवच बना सकते हैं, जिस दिन-

1. उनका कोई अपना बीमार हो और उसे केवल इसलिए नहीं बचाया जा सके, क्योंकि उसे दी जाने वाली दवाएँ कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरी नहीं उतरने के बाद भी अप्रूव्ड करदी गयी थी?


2. उनका कोई अपना बस में यात्रा करे और मारा जाये और उस बस की इस कारण दुर्घटना हुई हो, क्योंकि बस में लगाये गए पुर्जे कमीशन खाने वाले भ्रष्टाचारियों द्वारा निर्धारित मानदंडों पर खरे नहीं उतरने के बावजूद अप्रूव्ड कर दिए थे?


3. उनका कोई अपना खाना खाने जाये और उनके ही जैसे भ्रष्टाचारियों द्वारा खाद्य वस्तुओं में की गयी मिलावट के चलते, तडप-तडप कर अपनी जान दे दे?


4. उनका कोई अपना किसी दुर्घटना या किसी गम्भीर बीमारी के चलते अस्पताल में भर्ती हो और डॉक्टर बिना रिश्वत लिये उपचार करने या ऑपरेशन करने से साफ इनकार कर दे या विलम्ब कर दे और पीड़ित व्यक्ति बचाया नहीं जा सके?

ऐसे और भी अनेक उदाहरण गिनाये जा सकते हैं।
  
यहाँ मेरा आशय केवल यह बतलाना है की भ्रष्टाचार से केवल सीधे तौर पर आहत लोग ही परेशान हों ऐसा नहीं है, बल्कि भ्रष्टाचार वो सांप है जो उसे पालने वालों को भी नहीं पहचानता। भ्र्रष्टाचार रूपी काला नाग कब किसको डस ले, इसका कोई भी अनुमान नहीं लगा सकता! भ्रष्टाचार हर एक व्यक्ति के जीवन के लिये खतरा है। अत: हर व्यक्ति को इसे आज नहीं तो कल रोकने के लिये आगे आना ही होगा, तो फिर इसकी शुरुआत आज ही क्यों न की जाये?
उपरोक्त विवरण पढकर यदि किसी को लगता है की भ्रष्टाचार पर रोक लगनी चाहिये तो ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनाने के लिये अपने-अपने क्षेत्र में, अपने-अपने तरीके से भारत सरकार पर दबाव बनायें। केन्द्र में सरकार किसी भी दल की हो, लोकतन्त्रान्तिक शासन व्यवस्था में एकजुट जनता की बाजिब मांग को नकारना किसी भी सरकार के लिये आसान नहीं है।
  
क्या है? ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून”
  
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 19.1.ग में प्रदत्त मूल अधिकार के तहत 1993 में शहीद-ए-आजम भगत सिंह की जयन्ती के दिन (26 एवं २7 सितम्बर की रात्री को) स्थापित एवं भारत सरकार की विधि अधीन दिल्ली से 6 अप्रेल, 1994 से पंजीबद्ध एवं अनुमोदित ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान” (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लगातार अनेक राज्यों के अनेक क्षेत्रों व व्यवसायों से जुडे लोगों के साथ कार्य करते हुए और 20 वर्ष 9 माह 5 दिन तक भारत सरकार की सेवा करते हुए मैंने जो कुछ जाना और अनुभव किया है, उसके अनुसार देश से भ्रष्टाचार का सफाया करने के लिये ‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून” बनाना जरूरी है, जिसके लिये केन्द्र सरकार को संसद के माध्यम से वर्तमान कानूनों में कुछ बदलाव करने होंगे एवं कुछ नए कानून बनवाने होंगे, जिनका विवरण निम्न प्रकार है :-
1-भ्रष्टाचार अजमानतीय अपराध हो और हर हाल में फैसला 6 माह में हो :सबसे पहले तो यह बात समझने की जरूरत है कि भ्रष्टाचार केवल मात्र सरकारी लोगों द्वारा किया जाने वाला कुकृत्य नहीं है, बल्कि इसमें अनेक गैर-सरकारी लोग भी लिप्त रहते हैं। अत: भ्रष्टाचार या भ्रष्ट आचरण की परिभाषा को बदलकर अधिक विस्तृत किये जाने की जरूरत है। इसके अलावा इसमें केवल रिश्वत या कमीशन के लेन-देन को भ्रष्टाचार नहीं माना जावे, बल्कि किसी के भी द्वारा किसी के भी साथ किया जाने वाला ऐसा व्यवहार जो शोषण, गैर-बराबरी, अन्याय, भेदभाव, जमाखोरी, मिलावट, कालाबाजारी, मापतोल में गडबडी करना, डराना, धर्मान्धता, सम्प्रदायिकता, धमकाना, रिश्वतखोरी, उत्पीडन, अत्याचार, सन्त्रास, जनहित को नुकसान पहुँचाना, अधिनस्थ, असहाय एवं कमजोर लोगों की परिस्थितियों का दुरुपयोग आदि कुकृत्य को एवं जो मानव-मानव में विभेद करते हों, मानव के विकास एवं सम्मान को नुकसान पहुंचाते हों और जो देश की लोकतान्त्रिक, संवैधानिक, कानूनी एवं शान्तिपूर्ण व्यवस्था को भ्रष्ट, नष्ट या प्रदूषित करते हों को ‘‘भ्रष्टाचार” या “भ्रष्ट आचरण” घोषित किया जावे।
इस प्रकार के भ्रष्ट आचरण को भारतीय दण्ड संहिता में अजमानतीय एवं संज्ञेय अपराध घोषित किया जावे। ऐसे अपराधों में लिप्त लोगों को पुलिस जाँच के तत्काल बाद जेल में डाला जावे एवं उनके मुकदमों का निर्णय होने तक, उन्हें किसी भी परिस्थिति में जमानत या अन्तरिम जमानत या पेरोल पर छोडने का प्रावधान नहीं होना चाहिये। इसके साथ-साथ यह कानून भी बनाया जावे कि हर हाल में ऐसे मुकदमें की जाँच 3 माह में और मुकदमें का फैसला 6 माह के अन्दर किया जावे। अन्यथा जाँच या विचारण में विलम्ब करने पर जाँच एजेंसी या जज के खिलाफ भी जिम्मेदारी का निर्धारण करके सख्त दण्डात्मक कार्यवाही होनी चाहिये।
  
‘‘भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून के शेष सुधार अगली किश्त में शीघ्र पढने को मिलेंगे….
पाठकों से निवेदन है कि खुलकर प्रतिक्रिया दें और बहस को आगे बढाने में सहयोग करें!

14 thoughts on “रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार!

  1. आज भ्रष्टाचार देश की बहुत बड़ी समस्या है ऐसा सभी मानते हैं लेकिन इसके लिए जिम्मेदार कौन है जनता ,जनप्रतिनिधि ,या अफसर इसपर बहस कोई नहीं करना चाहता क्यों करें जब सभी जिम्मेदार हैं सरकार या संसद कितने ही कठोर कानून बना ले इनपर अमल या मानने के लिए कोई तैयार नहीं हर कोई इनसे बचने के अपने तरीके निकल ही लेता है। जनता को अपना काम करवाने ले लिए रिश्वत देने में गुरेज़ नहीं,अफसर को लेने में गुरेज़ कैसा ?भ्रष्टाचार को बढ़ावा सिर्फ और सिर्फ योजनाओं या सरकारी कार्यों की जटिल प्रक्रिया है ऐसा मैंने पाया अगर कोई बच्चे का एडमिशन करवाने भी जाये तो कम से कम ३ पेज का फॉर्म भरना पड़ता है जिसमे ५० प्रतिशत कालम गैर ज़रूरी होते हैं जिन्हे भर पाना किसी भी ऐसे व्यक्ति के लिए बेहद मुश्किल है जो उस फिल्ड से नहीं है थक हार कर वो उन्ही अफसरों का सहारा लेता है जो हेल्प के बदले सुविधा शुल्क वसूलने के लिए ही बैठे हैं। इस समस्या का केवल एक ही समाधान दीखता है और वो है इन जटिलताओं को खत्म करना जिससे मै समझता हूँ ९० प्रतिशत भ्रष्टाचार ख़त्म हो सकता है। अब रिश्वत कम सुविधा शुल्क का चलन ज्यादा है तो क्यों न सुविधा लेने की आवश्यकता ही खत्म कर दी जाये शुल्क देने की समस्या खुद ब खुद खत्म हो जाएगी।

  2. लिखने , पढने अथवा कमेन्ट करने तक सिमित रहेंगे तो कुछ नहीं होने वाला . जब तक जनआन्दोलन नहीं खड़ा होता . लिखने वाला, पढने वाला , कमेन्ट करने वाला pratyek viyakti लुंगी बाँध , हाथ में लठ ले के घर से यह soch ker nikle ke bhrishtachaar ke virudh arambh kiye gaye iss hawan mein purnahuti daal ker hi ghar lautunga. 90 din smapat ho jayega bhrishtachaar

  3. यहाँ लेख में मुख्य विषय भ्रष्टाचार का उन्मूलन को लेकर कुछ अच्छे विचार प्रस्तुत हैं| यह सार्वजनिक तथ्य है कि भ्रष्टाचार के प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष प्रभाव से कोई नहीं बच सकता लेकिन अदूरदर्शी अब के अवैध लाभ को पा लेने के लालच में कल का नहीं सोचता| कल्याण में १९५० दशक के अंत में छपी जहर नामक कहानी याद है| दूसरे शहरों में अपनी अवैध दवा बेचने आये व्यक्ति ने जब कई सप्ताह पश्चात अपने परिवार की सुध बुध ली तो उसे मालुम हुआ कि उसका इकलोता बेटा बुखार से पीड़ित है और उसी की कम्पनी की बनी दवाई से इलाज हो रहा है| उसने दवाई तुरंत बंद कर बच्चे को किसी अच्छे डाक्टर को दिखाने का आग्रह किया| अवैध दवाई असर कर चुकी थी और उस व्यक्ति के घर लोटने से पहले बच्चे ने दम तोड़ दिया था| आज जीवन के हर एक पहलू में अनैतिकता और भ्रष्टाचार का सीधा ताल मेल है| और हां, कांग्रेस-राज के समर्थक इसमें अपनी भलाई भी देखते है–भ्रष्टाचार द्वारा सभी राज्य व केंद्र शासित प्रदेश समूचे भारत में बंधे है| क्योंकर कोई भ्रष्टाचार उन्मूलन कानून बनाए?

  4. अवधेश जी से पूर्णत: सहमती|
    आज तक पता नहीं किन किन को भ्रष्टाचारी बता दिया मीना जी ने किन्तु सोनिया, राहुल मनमोहन की बात पर मौन हैं ये|
    हमसे तमीज की आशा रखते है मीना जी| मीना जी आपके द्वारा एक वेबसाईट पर गांधी जी के सेक्स जीवन पर लिखा लेख आप स्वयं पढ़ लीजिये, आपको पता चल जाएगा की आप कितने बदतमीज़ हैं जो आज़ादी की लड़ाई के पुरोधा को इस प्रकार अपमानित कर रहे हैं|

  5. डॉ मीना जी… आपके ही लेख पर आपकी दूसरी टिप्पणी पढ़ी| वाह क्या क्रोध भरा है आपके शब्दों में| कोई आपके विचारों se सहमत है तो वह महान और नहीं है तो फासीवाद, आतंकवादी जैसी गालियाँ दे दे कर उसका अपमान कर डाला| abhi कुछ समय पहले तक आप ही प्रवक्ता भर में गला फाड़ते नज़र आ रहे थे कि अपने टिप्पणियों में किसी का अपमान न करें, व्यक्तिगत टिप्पणियाँ न करें, तमीज के साथ टिप्पणियां करें आदि आदि| किन्तु आज आपको क्या हो गया है?

    आपके अनुसार तो हम सम्पादक जी के साथ भी मनमानी कर रहे हैं| मुझे पता है आप किस सन्दर्भ में बात कर रहे हैं| जो सन्दर्भ आप बता रहे हैं वह आप जैसों के कारण ही उत्पन हुआ था| और वहां हम सम्पादक जी के विरोध में नहीं अपितु एक राष्ट्रवादी के सहयोग में खड़े थे| सम्पादक जी तो निष्पक्ष पत्रकारिता के लिए वचनबद्ध हैं, किन्तु हम तो स्वतंत्र विचारक हैं| उन्होंने जो किया वह उनकी महानता है कि अपने विरोधियों की बात को भी वे स्थान देते हैं| यदि मनमानी जैसी बात होती तो आप जैसों को यहाँ कोई पूछता नहीं| आप हमसे उम्मीद लगाएं तो देश के लिए अच्छा है और न लगाए तो आपके लिए अच्छा रहेगा| क्यों कि देश से आपको कोई मतलब नहीं, आपका विरोध तो इस देश के प्राचीन महान पुरुषों से ही है, फिर आपको इस देश की क्या पड़ी है?

    यदि भारत में रामराज aata है तो यह न केवल भारत के लिए अपितु पूरे विश्व के लिए एक सुखद संकेत hoga, क्यों कि तब यह गन्दी राजनीति और आतंकवाद जैसा ज़हर तो नहीं होगा| न्याय की पूजा होगी| किन्तु आपको क्या पड़ी है इन सब बातों कि| आपतो मनुवादियों को ही क्रूर और अत्याचारी बता रहे हैं| अब आप बताएं हम आप जैसे व्यक्ति से क्या उम्मीद लगाएं जो अपने पुरखों को ही गाली देने से बाज़ नहीं आते| और वे पूर्वज जिनकी महानता दुन्य मानती है, किन्तु घर का भेदी लंका ढहाए| आपका क्या भरोसा आज अपने पूर्वजों को गाली दे रहे हैं कल हम जैसों का पता नहीं क्या करेंगे? आपको तो रामराज में आपत्ति है, क्यों कि आपको लगता है कि ऐसा होने पर कहीं अन्य सम्प्रदायों पर कोई संकट ना जाए| जैसे आपको बड़ी चिंता है इनकी| मर्यादा पुरुषोत्तम के राज में कभी किसी के साथ अन्याय हो सकता है भला? फिर चाहे वह किसी भी सम्प्रदाय अथवा जाती का हो|

    हमारे विचारों की बड़ी चिंता है आपको, हमें कौन क्या नज़र आता है उसका उत्तर तो मै आपको दूंगा ही, किन्तु एक पीढ़ा है मन में| सेक्युलर रुदालियों द्वारा आतंकवादी(?) घोषित इन्द्रेश कुमार तो आपको आतंकवादी नज़र आते हैं किन्तु कसाब और अफजल जैसे शायद शान्ति दूत| (मै यहाँ केवल अफजल और कसाब का नाम ले रहा हूँ, इस्लाम का नहीं| किन्तु आप जैसे तो मौका पाते ही हिन्दू आतंकवाद, क्रूर मनुवाद जैसा नारा लगा देते हैं|) कोष्ठक में लेखे शब्द इस प्रश्न का उत्तर है कि हमें कौन क्या नज़र आता है| मै इस्लामी आतंकवाद का नारा नहीं लगा रहा किन्तु आप तो भगवा आतंकवाद जैसा नारा पता नहीं कितनी बार लगा चुके| कोई मजहब आतंकवादी है या नहीं इसका पता जब चलेगा हम नारा लगा देंगे| किन्तु जो व्यक्ति आतंकवादी है उसे तो कम से कम आतंकवादी मान लिया कीजिए|

    आपका बस चले तो आप हम जैसों के बोलने पर प्रतिबन्ध लगा दें, क्यों कि यदि हम जैसे बोलते है तो देश की सरकार पंगु हो जाती है| मीणा जी देश की सरकार तो पंगु है ही क्यों कि अरुंधती जैसे लोग क्या क्या बोलने के बाद भी सुरक्षित हैं| अरुंधती राय कुछ बोलती है तो है विचारों की स्वतंत्रता और हम बोले तो क्रूर मनुवादी, सरकार पंगु| फासीवादी का तो छोडिये किन्तु यदि हम जैसों के हाथ में सत्ता हो तो देश का विकास दुनिया देखेगी जैसे गुजरात का देख रही है| आप कुछ भी बोले इससे आप जैसों का ही नकाब उतरता है| आप हमारा क्या नकाब उतारेंगे| अपने मूंह मिट्ठू बनने वाले आप जैसे लोग सोचते हैं कि वे ही देश को चला रहे हैं|

    कौनसे दल भ्रष्टाचार से चल रहे हैं ये मुझे आपको बताने की जरूरत नहीं, क्यों कि आपके लिये तो यह व्यर्थ है| देश जान चूका है कि कौन कहाँ कितना खा रहा है|

    हमारी आदत तो हमारा कर्तव्य है, किन्तु आपकी आदत का क्या? जब तक दीं में दो चार बार हिन्दुओं को गाली न दे दें आपका रोटी पानी हज़म नहीं होता| सुबह संडास में भी दिक्कत आती है| आप किसी को कुछ भी भला बुरा कह डालें किन्तु जब कोई आप पर सवाल उठाये तो तमीज की नानी याद आती है| जब कश्मीर से पंडित भगाए जाते है तो कुछ नहीं किन्तु जब कसाब या अजल की बात आये तो धर्मनिरपेक्षता की नानी याद आती है|

    पांच हज़ार साल की कथा आप हमें क्या सुनाएंगे, जब आप खुद ही एक विदेशी द्वारा निर्मित शिक्षा पद्धति को स्वीकार चुके हैं और उसी को सत्य मान रहे हैं| वो कहे तो आप अपने पुरखों को भी गालियाँ दे डालें| अब आप हमें न समझाएं कि किसने किसको वंचित किया| भारत में ऐसी कोई परंपरा नहीं रहे जिसमे किसी के साथ अन्याय हो, किन्तु आप जैसों को भारत की कहाँ पड़ी है| आप तैयार हो जाएं क्यों कि अब देश में राष्ट्र्विरोधियों का समय समाप्त होने वाल है|

  6. आदरणीय श्रीमान मीना जी,
    मेरे प्रश्नों से आप तिलमिला गए हैं, क्योकि हकीकत यह है की आपने देश के सबसे बड़े घोटालों पर अपना मुख नहीं खोला. जब देश भ्रष्टाचार की आग में जल रहा था तो आपके लेख किन्ही और विषयों पर होते थे.
    आपने बहुत सारे उदाहरण दिए लेकिन सोनिया, राहुल, मनमोहन का नाम नहीं लिया. जैसे ये कितने बड़े संत हैं. श्रीमान भ्रष्टाचार की असली जड़ कांग्रेस पार्टी है, जिसने जन जन को भ्रष्ट बना दिया है, यहाँ तक कि उसने सीबीआई और सेना को भी नहीं छोड़ा.
    यह टिप्पणियाँ आप पर व्यक्तिगत नहीं कारण कि आप सिर्फ एक लेखक नहीं, आपका सही परिचय राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान है. अगर प्रवक्ता का एक पाठक होने के नाते मैं ऐसे बास के राष्ट्रीय अध्यक्ष से भ्रष्टाचार के इन मुद्दों पर कार्य की आशा करता हूँ तो क्या गलत है.

  7. मीना जी ।
    आपने लंबा टिप्पणी की ।
    लेकिन जवाब फिर भी नहीं दिया ।

  8. आदरणीय पाठक बन्धुओ यहाँ पर जानबूझकर जिस प्रकार की टिप्पणियाँ की जा रही हैं, उनका मकसद क्या है, यह मुझे आपको बतलाने की जरूरत नहीं हैं, लेकिन यहाँ पर निष्पक्ष पाठकों के लिये यह अवश्य ही स्पष्ट करना जरूरी समझता हूँ कि मेरा काँग्रेस या भाजपा या किसी भी दल से दूर का भी रिश्ता नहीं है।

    हाँ आतंकवादी चाहे किसी भी देश और धर्म का हो, भ्रष्टाचारी चाहे किसी जाति और धर्म के हों, वे देशद्रोही और देश के प्रति गद्दार हैं, जिनके खिलाफ आवाज उठाना हम सबका फर्ज है। जिसके लिये किसी लेखक को किसी आतंकवादी गिरोह या साम्प्रदायिक कुनबे या भ्रष्टाचारियों के उत्पादकों से पूर्वानुमति लेने की जरूरत हो, हिन्दुस्तान में अभी तक तो एक भी ऐसा कानून नहीं बना है।

    जो लोग सही को सही कहने वाले प्रवक्ता के सम्पादक के साथ एकजुट होकर मनमानी करवाना चाहते हैं, उनसे किसी प्रकार के इंसाफ की आशा करना मूर्खता है। मुझे ऐसे लोगों से इस देश और मानवता के लिये कोई उम्मीद भी नहीं है।

    जिन लोगों का एक मात्र लक्ष्य येन-कैन प्रकारेण फिर से भारत को हिन्दू राष्ट्र एवं रामराज के नाम पर भारत में फिर से मनुवादी क्रूर व्यवस्था को लागू करना असली मकसद हो, जिनको भ्रष्टाचार में भी दलगत विभेद नजर आता हो, उनको कोई क्या समझा सकता है?

    जिन लोगों को बंगारू लक्षमण, जार्ज फर्नाण्डीज, ए. राजा, अशोक चह्वाण, पण्डित सुखराम, येदुरप्पा, कलमाडी जैसे भ्रष्टाचार के आरोपियों में भी सबसे पहले दलगत बू आती हो, जिन लोगों को कसाव तो आतंकवादी नजर आता है, लेकिन अजमेर की दरगाह पर आतंकी कार्यवाही में लिप्त आतंकी देशभक्त नजर आते हैं, वे मेरी समझ में इस देश के सभ्य नागरिक कहलाने के हकदार नहीं हैं!

    चूँकि देश में अभी तक ऐसा कोई कानूनी नहीं बना है जो बोलने पर पाबन्दी लगाता हो और देश की सरकारें पंगु हो चुकी हैं, इसलिये ब्राह्मणशाही और आतंकवादियों का समर्थन करने वाले इस देश में पूरे सम्मान के साथ मनचाही बकवास करते रहते हैं। अन्यथा इन्हीं की जैसी फासीवादी और रुग्ण मानसिकता के लोग भारत की सत्ता पर आसीन होते तो देश का न जाने क्या हाल हो गया होता!

    इसलिये बहुत जरूरी है कि फासीवाद, सम्प्रदायिकता, आतंकवाद, भ्रष्टाचार, शोषण, अत्याचार, जातिविभेद, अश्पृश्यता जैसे अपराधों का समर्थन करने वाले अपराधियों के असली चेहरे किसी भी रास्ते से देश के समाने आने ही चाहिये। मेरे लेख के बहाने कुछ लोगों का नकाब उतर रहा है, यह बडी सफलता है। हो सकता है, इनमें से कोई कल को इन्हीं की भाषा में दशभक्त बनने की तैयारी कर रहा हो?

    आशा है कि और भी अनेक ऐसे ही लोगों के विचार आपको इस आलेख पर एवं अन्यत्र भी पढने को मिलेंगे, क्योंकि जिनकी दाल रोटी भ्रष्टाचार से ही चलती है, जिनके संगठन और दल केवल भ्रष्टाचार पर ही पलते हैं। उनके लिये बहुत जरूरी है।

    प्रवक्ता के मंच से अनेक बार, अनेक विद्वानों की ओर से कहा गया है जो कुछ लिखा जाये उसी पर टिप्पणी की जाये और लेखक पर व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं की जावे, लेकिन फासीवादी तथा मनुवादी ताकतें जानबूझकर नकारात्मक और व्यंगात्मक टिप्पणियों के साथ-साथ लांछन और दुराचरण से परिपूर्ण आपराधिक टिप्पणियाँ करने की आदी हैं।

    मनुवादी तो इसी बात से दु:खी हैं, कि जिन लोगों को उन्होंने पाँच हजार से अधिक समय तक पढने-लिखने से वंचित रखा, आज उनकी हिम्मत इतनी कैसे हो सकती है, कि वे मनुवादियों के खिलाफ आवाज उठा सकें। ऐसे में किसी भी लेखक से प्रतिउत्तर में केवल सदाशयता या नम्रता की अपेक्षा करना दिन में स्वप्न देखना ही है। जिसके लिये कम से कम मैं तो तैयार नहीं हूँ।

    धन्यवाद।

  9. मीना जी
    सहगल जी पर आप की टिपण्णी पढ़ी.
    इसमें भी ब्राह्मणवाद आ गया .
    वेइसे कमाल है, काफी बढ़िया चीज है ब्राह्मणवाद. कुछ भी करो घूम फिर कर आ ही जाता है.
    कमाल की चीज है ब्राह्मणवाद .
    डटे रहिए । कुछ भी लिखो, कोई प्रतिक्रिया आये तो ब्राह्मणवाद को गाली दे दो । साबाश

  10. आदरणीय श्री मीना जी,
    समय समय पर आपके लेख प्रकाशित होते रहते हैं. लेकिन मैं सीडब्ल्यूजी, २जी और आदर्श घोटाले मुद्दे पर आपके लेख नहीं ढूंढ़ पाया. मुझे क्षमा करें. भ्रष्टाचार के इन बेहद प्रमुख मुद्दों पर अपने पूर्व लेखों से अवगत कराएं. मुझे विश्वास है की आपने और आपकी संस्था ने इन मुद्दों पर राष्ट्रहित में जरूर कार्य किया होगा, और अगर नहीं किया तो झूठी संस्था बंद कर दीजिये और इस संस्था को कांग्रेसहित में बीजेपी के शासन काल में फिर से शुरू कर दीजिएगा.
    सादर.

  11. आदरणीय श्री मीना जी,
    भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई के लिए शुभकामनाएं.
    जिस हिंदुत्व के विरोध में आप खड़े हैं, उस हिंदुत्व के सुनहरे दिनों में लोग घरों में ताले नहीं लगाते थे, भ्रष्टाचार तो दूर की बात थी. निःसंदेह कुछ बुराइयां भी थी, जिन्हें दूर करने की जरूरत है. आजकल हिंदुत्व का विरोध बेहद सस्ती लोकप्रियता का साधन बन गया है, आप भी उस हथियार को इस्तेमाल कर लोकप्रिय हो जाइए. फिर भ्रष्टाचार के विरुद्ध लड़ाई में कांग्रेस का साथ दीजिये, जैसे कई सारी संस्थाए करती हैं. शुभकामना.

  12. श्री सेहगल जी आपने टिप्पणी दी, धन्यवाद।

    मुझे लगता है कि आपको नकारात्मक और विध्वंसात्मक टिप्पणी करने और जिन्हें आप सम्मान नहीं देना चाहते, उनका मजाक उ‹डाने में मजा आता है। खैर अपनी-अपनी सोच। आपको यही मुबारक।

    लगता है आप किसी के बारे में बिना हिस्ट्री जाने कुछ भी लिख देने के लिये आजाद हैं। लिखते रहिये जब बाबा राम देव को कोई नहीं जानता था, तब एक कलेक्टर के वेतन से रिकर्वी करवाने का श्रेय भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान को जाता है।

    अनेकों काम हमारे कार्य करते रहते हैं, जिनमें ब्राह्मणवादी व्यवस्था अर्थात् हिन्दुत्व के अत्याचारों का विरोध भी शामिल है, जो आपको एवं आपके साथियों को प्रिय नहीं है। इस कारण हमारा कोई भी प्रयास आपके गले उतरना सम्भव नहीं है। हम चाहते भी नहीं कि अनचाहे किसी बात को गले में उतारा जाये।

    यदि आपने टिप्पणी लिखने से पूर्व मेरे आलेख के नीचे प्रवक्ता पर ही दिये गये आलेखों की सूची (सम्बन्धित पोस्ट) पर ही ध्यान दिया होता तो आप यह नहीं लिखते कि आपका अभियान भी इसी समय प्रारम्भ हो रहा है।

    धन्यवाद और शुभकामनाएँ।

  13. रुक सकता है 90 फीसदी भ्रष्टाचार! – by – डॉ. पुरुषोत्तम मीणा

    ………. भ्रष्टाचार सभी राजनैतिक दलों की ऑक्सीजन है ……….

    आप 1994 से ‘‘भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान” (बास) के राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में लगातार अनेक लोगों के साथ कार्य कर रहें हैं.

    आप होम्योपैथ चिकित्सक भी हैं.

    उतार दीजिए भ्रष्टाचार की ऑक्सीजन और फेंक दीजीये ऑक्सीजन की नलियाँ. मरने दीजीये सभी
    राजनैतिक दलों को.

    …………… मेरा सुझाव ……………

    Strike when iron is hot माननीय सर्वोत्तम न्यायालय, भाजपा, साम्यवादी, समाजवादी, बाबा रामदेव, स्वामी अग्निवेश, प्रथम IPS किरण बेदी, और वरिष्ट माननीय अन्नाहजारे सभी भ्रष्टाचार के विरोध में आजकल संलग्न हैं.

    श्री सुब्रास्वामी ने तो 2G Spectrum लायसेंस के घोटाले के मामले में महत्वपूर्ण कार्य को आगे बढ़ा रहे हैं.

    aapka abhiyaan भी isii samay prarambh ho raha hai.
    main apne vichaar prastut karta huun.

    (Transliteration service has stopped functioning, let me stop).

    – Anil Sehgal –

  14. पुरुषोत्तम भाई आप पर तो मुकदमा चलना चाहिये…..आप तो व्यवस्था के खिलाफ लिख रहे हैं….भाई व्यवस्था रुक जायेगी…कितने लोगों के पेट पर लात मार रहें हैं आप…..

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