लेखक परिचय

राजेश करमहे

राजेश करमहे

काशी हिंदू विश्वविद्यालय से स्नातकोत्तर एवं हैदराबाद विश्वविद्यालय से पी जी डिप्लोमा इन लाईब्रेरी ऑटोमेशन के पश्चात् आकाशवाणी मे कार्यरत| १९९६ में आकाशवाणी वार्षिक पुरस्कार में मेरिट सर्टीफिकेट| पठन-पाठन एवं आध्यात्म में रूचि|

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राजेश करमहे

श्रीमद्भगवद्गीता के सोलहवें अध्याय के इक्कीसवें श्लोक में कहा गया है –

“त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मनः। कामः क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत्त्रयं त्यजेत्॥ “

“नरक के तीन द्वार हैं – काम, क्रोध तथा लोभ। प्रत्येक बुद्धिमान व्यक्ति को चहिए कि इन्हें त्याग दें, क्योंकि इनसे आत्मा का पतन होता है|”

आत्मा का पतन ही तो भ्रष्टाचार का उदगम स्थल है| अब विवेचन का विषय यह है कि काम, क्रोध एवं लोभ रुपी ये दुर्वृतियाँ जो आत्मा या अंतरात्मा के पतन के कारक हैं, तो हमारे हृदय में क्यों उत्पन्न होते हैं? ईश्वर ने कामना की – “एकोऽहं बहुस्यामः” तात्पर्य मैं एक हूँ, अनेक हो जाऊँ| फिर सृष्टि का सूत्रपात संभव हुआ, ऐसा आर्षमत है| मनुष्य की प्रकृति पर विजय की कामना से ही विज्ञान का उद्भव, वैभव और विकास संभव हुआ| फिर काम या कामना विकार या दुर्वृति क्यों? तात्पर्य यह कि सत्य काम तो पुरुषार्थ की श्रेणी में है; काम से ही सृष्टि एवं सकल भौतिक जगत उत्पन्न हुआ| किन्तु इस भौतिकतावादी युग में असत्य काम ही मनुष्य का इष्ट हो गया है| मनुष्य जीवन एवं यौवन की क्षणभंगुरता से भयग्रस्त हो जाता है, फिर आवश्यकता से अधिक काम अर्थात् संसारिक भोगों(स्त्री ही नहीं वरन् सभी ऐश–आराम भी) को भोगना चाहता है और काम पुरुषार्थ से वासना बन जाती है| अतएव असम्यक एवं असत्य काम या अकर्मण्यता के बावजूद समस्त भोगों की इच्छा ही भ्रष्टाचार का पहला स्रोत है| काम का ही दूसरा स्वरूप लोभ या लिप्सा है जो भ्रष्टाचार का दूसरा जनक है| हमारा या हमारे सगे संबंधियों का सुख समाप्त न हो जाये, यह भय हमें सतत् सताता है और राज्य या समाज के द्वारा हमारी योग्यता एवं श्रम के अनुरूप प्राप्तियों से हमें संतोष नहीं मिलता है और हमारा लोभ हमें भ्रष्टाचार के मार्ग पर प्रवृत कर देता है| भ्रष्टाचार का तीसरा कारण है – मद| सत्ता से पद एवं पराक्रम (power) प्राप्त होता है| मनुष्य अपने जीवन में संघर्ष से बचने के लिए सतत् पद एवं पराक्रम में अभिवृद्धि करते रहना चाहता है| अयोग्य को पद एवं ताकत प्रदान करने पर मद या अहंकार रूपी विकार का सृजन होता है जो उसे भ्रष्टाचारगामी बना देता है| किसी ने कहा भी है –“ ताकत भ्रष्टाचारी बनाता है और पूर्ण ताकत तो पूर्णरूपेण|”

इस उदारीकरण एवं बाज़ार आश्रित व्यवस्था के दौर में समाज के अमीर एवं गरीब तबकों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती जा रही है| अमीर वर्ग तो भोग, लोभ और मद के कारण भ्रष्टाचाररत हैं, परन्तु दलित, शोषित एवं आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग में ये लालसाएं दमित होकर और भी विकृत स्वरूप में क्रोध, मोह एवं मात्सर्य (ईर्ष्या) के रूप में उभरती है| फलतः वंचित वर्ग भी भ्रष्टाचार एवं अपराध की शरण में जाना पसंद करते हैं| अब जब शासक एवं शासित, घुस लेने वाले एवं घुस देने वाले दोनों ही राज़ी हो तो कोई क़ानून क्या कर लेगा? दहेज लेना एवं देना दोनों ही जुर्म है, परन्तु दहेज विरोधी कानून का क्या हश्र हुआ है सभी जानते हैं|

कहने का तात्पर्य यह है कि काम,क्रोध,लोभ,मोह,मद और मात्सर्य मानव के आंतरिक छह विकार हैं और भ्रष्टाचार आंतरिक दौर्बल्य तो फिर इसका उन्मूलन तो कदापि संभव नहीं है| ध्यातव्य है कि मानव सभ्यता के विकास के साथ साथ भ्रष्टाचार भी फलता फूलता रहा है| हां, हम इसे नियंत्रित करने की कवायद कर सकते हैं|

पूंजीवादी व्यवस्था में धीरे धीरे समाज द्विध्रुवीय हो जाता है –पहला संचित तो दूसरा वंचित| एक अपनी स्थिति बनाये रखने के लिए तो दूसरा उस स्थिति में जाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेता है| अतएव समाज में धन या अर्थ का संवितरण भ्रष्टाचार नियंत्रण की पहली शर्त है और यह राज्य का दायित्व है| परन्तु बाज़ारवादी व्यवस्था में जहाँ एक रूपये का ठंडा पेय उफभोक्ता तक पहुँचते पहुँचते दस रूपये का हो जाता है और बीच में सारा माल उद्योगपतियों, राजनेताओं, मीडिया-विज्ञापन कर्ताओं और सम्बंधित अफसरशाहो के द्वारा गड़प कर लिया जाता है, यह कैसे संभव है? सूचना का युग है इसलिए राज्य-राज्य, शहर-शहर, गाँव-गाँव, मोहल्ला-मोहल्ला का अपना अखबार, अपना टीवी, अपना रेडियो होगा? जितना माध्यम उतना राजस्व, उतना विज्ञापन, उतना निवेश, उतनी उन्नत अर्थव्यवस्था, उतने खुश बड़े लोग, उतनी बढती महँगाई, उतने पिसते आम लोग, रामलीला मैदान में डंडे खाते लोग, जगह-जगह अनशन करते लोग, जो चाहें आका वही पढते, सुनते, बोलते लोग? हद तो तब हो गयी जब एक दैनिक में पढ़ा कि हार्वर्ड युनिवर्सिटी के राजनीतिक विश्लेषक सैमुएल हंटिगटन ने एक शोध में कहा कि भ्रष्टाचार से लोकतंत्र बेहतर तरीके से काम करता है| इसी का परिणाम है कि सामाजिक विज्ञान और प्रसिद्ध साहित्य दोनों कभी कभी लोकतंत्र में भ्रष्टाचार को एक जरूरी बुराई मानते हैं| क्या भारत जैसे देश में जहाँ एक बड़ा तबका अभी भी गरीबी की रेखा से नीचे गुजर बसर करता है, यह माडल मान्य होगा?

भ्रष्टाचार नियंत्रण की दूसरी शर्त है – अत्यधिक लिप्सा पर अंकुश| हमारे देश में जहाँ आम जनता के विकास हेतु निर्धारित एक सौ रुपया उन तक पहुँचते-पहुँचते एक रुपया हो जाता है| तो फिर यही एक रुपया बांटनेवाले प्रशासन के लोग लोकपालों के हुक्म को तामील करेंगे? जहाँ वाहन चालकों के दुर्घटना से बचाव के बदले पुलिसवाले रूपये वसूल करने में मशगूल रहेंगे, ऐसे ही पुलिसवाले लोकपाल की रक्षा का बीड़ा उठाएंगे?

क्या ब्रिटिश काल का क़ानून जो गुलामों पर शासन के लिए था, आज प्रासंगिक है? क्या न्यायपालिका को साहब की कुर्सी से उठकर जनसेवक बनकर त्वरित न्याय करने की जरूरत नहीं है? जब भी भारत में भ्रष्टाचार रहित समाज की बात होती है तो रामराज्य का जिक्र अवश्य होता है| राम के राज्य में जब एक आमजन ने सीताजी के चरित्र की आलोचना भर की और राम ने उन्हें वन में त्याग दिया फिर हम राष्ट्रीय सुरक्षा या सार्वजनिक व्यवस्था के अलावे अन्य मामलों में प्रधानमंत्री एवं प्रमुख न्यायविदों को लोकपाल के हवाले करने की बात करें तो क्या गलत है?

यह सच है कि प्रजातंत्र में संविधान सर्वोच्च होता है, पर संविधान तो आम जनता के हित के लिए ही तो बना है| सवाल अन्ना हजारे के समान्तर लोकपाल या बाबा रामदेव के चरित्र या आन्दोलन करने के तरीके का नहीं है, सवाल है भ्रष्टाचारियों को मात देने का| जब व्यक्ति या समाज मानसिक विकृतियों से ग्रस्त होकर गलत कार्य करता है तो समाज के पुरोधा उसके कृत्य को नंगा कर उसे लज्जित करते हुए पश्चात्ताप करने पर मज़बूर करते हैं| हम सूचना युग में जी रहें है| सूचना पारदर्शिता लाती है अतएव एक दूसरे को बेशर्मी से नंगा होते देखें| लोकतंत्र है इसलिए नंगो का बहुमत है| वहाँ क्या हो सकता है जहाँ कूप में ही भांग घुली हो और सब नशे में मस्त हों|

3 Responses to “भ्रष्टाचार : कारण एवं निवारण”

  1. भ्रस्टाचार निवारण हेतु

    सेवा में श्री मान एव श्रीमती महोदय श्री हमारे ग्राम पंचायत 31 एस एस डव्ल्यु पंचायत समिति हनुमानगढ़ rajasthan 31 एस एस डव्ल्यु के पंचायत भबन में कार्यरत सुरक्षा गार्ड रामकुमार मिरासी जिसकी डयूटी स्याम 5 बजे से लेकर सुबह 10 बजे तक है जो कभी अपनी अपनी डयूटी पर नहीं जाता बल्कि पंचायत के काम में दखल देता है कोई भी ग्रामीण पंचायत भबन में जाता है तो उनसे मनमाने ढंग से पैस आता है अगर ग्रामीण सिकायत करने की बात कहते है तो उनको धमकाता है की अगर किसीने ने मेरी सिकायत की तो मै मनरेगा बंद कर्वादुन्गा b.p.l कार्ड कटवादूंगा इसने ग्राम पंचायत में कार्यरत सभी कर्मचारीयों को अपने वश में कर रखा है जो इसके कहे अनुशार काम करते है सवच्छ सोचाल्य अभियान के तहत अगर कोई अपने घर पर सोचलल्य बनबता है तो ये कहता है की सोचाल्य की फोटो खीचना नाम लिखवाना ये सव कार्य मेरे द्वारा किया जाना ही अनिवार्य है एसा कहकर भ्रस्ताचार करता है सोचाल्य काम पूरा होजाने के बाद ये कहता है की अगर सोचाल्य का चैक प्राप्त करना चाहते हो तो मुझे 200 सो रुपये देने होंगे और जब चैक अधिकारी द्वारा लाभार्थी को दिया जाता है तो ये चैक देते हुए की फोटो खेंच कर 200 सो से 500 सो रुपये तक लेता है इस तरह रामकुमार ने गाँव में लूट मचा रखी है इसने अपने ही नियम कायदे बना रखे है इसके कारन हम सभी ग्राम वासी बहुत परेशान है ये किसी भी योजना की सुचना को ग्रामवासियों तक नहीं पहुँचने देता मनरेगा का काम इसने बंद करवा रखा है इसके खिलाप जल्द से जल्द कार्यवाही की जनि चाहिए मनरेगा का काम ठप होने के करन हम सभी ग्रामवासी बेरोजगारी के सीकार होगये है

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  2. k.r.aqrun

    भारत की राजनीती के इतिहास में सर्वोच सत्ता के पद पर आसीन १९६३ में केंद्रीय ग्रहमंत्री गुलजारीलाल नंदा जी ने गांधीवाद के राजनेतिक सफर में २साल के अन्तराल में ब्र्हस्ताचार मुक्त सासन देने का ऐलान करने का होंसला दिखाया .चाहे वे कई परिस्थिति के शिकार होकर निराश हुए तो त्याग पत्र देते समय २ साल बाद प्रधानमन्त्री लालबहादुर शास्त्री जी ने नंदा जी की सामर्थ से साशन में आई पार्द्र्सिता के नतीजों से नन्दा जी का त्यागपत्र मंजूर नही किया ,
    आजीवन सदाचार के नेतिक बल से भारतीय राजनीती के दिशा सचेतक रहे नंदा जी वंशवाद और धन पद लोलुपता से मुक्त सच्चे गांधीवाद के साकार रूप साबित हुए.भारतीय इतिहास में गांधीवादी श्रमिक राजनीती के जनक गुलजारीलाल नंदा भारतीय राजनेतिक सदाचार के कुसुम हैं . नइ पीढ़ी जब भी राजनीती में सुद्दी करण के लिए इतिहास रचना चाहेगी उस वक्त भारत रत्ना गुलजारीलाल नंदा इस एतिहासिक पथ पर शोध का सबसे बड़ा विषय नजर आयेंगे .?
    के.आर.अरुण प्रमुख संयोजक ,भारतीय लोक मंच

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  3. Anil Gupta,Meerut,India

    भ्रष्टाचार का मुद्दा कोई नया नहीं है. आज़ादी के पहले से ही भ्रष्टाचार ने पांव फ़ैलाने शुरू कर दिए थे. कृष्णा मेनन के जीप घोटाले से लेकर २-जी स्पेक्ट्रम तक भारतीय लोकतंत्र ने एक लम्बा सफ़र तय किया है. एक से एक कीर्तिमान कायम किये हैं. मिडिया की भूमिका सभी दलों को एक ही पलड़े में रखने की है. हालाँकि न तो मोरारजी की सर्कार के खिलाफ और न ही अटलजी की सात साला सरकार के विरुद्ध कोई ठोस आरोप नहीं लगाया जा सका. लेकिन फिर भी लोकतंत्र को बदनाम करने और कुछ अति भ्रष्टों के काले कारनामों पर पर्दा डालने के लिए ये जुमला उछल दिया जाता है कि हमाम में सब नंगे हैं. अरे भाई जो नंगे हैं उनका इलाज करो. लेकिन बिना वजह सब को एक पलड़े में रखकर आम आदमी कि लोकतंत्र में आस्था को कमजोर मत करो.
    भ्रष्टाचार वास्तव में अंग्रेजी शिक्षा का बाय प्रोडूक्त है. क्योंकि सेकुलरिज्म के नाम पर इसे नेतिकता विहीन बना दिया गया है. १९६८ में कुरुक्षेत्र में सूर्य ग्रहण के मेले के अवसर पर तत्कालीन गृह मंत्री स्वर्गीय गुलजारी लाल नंदा जी व ज्योतिर्पीठ के शंकराचार्य ब्रह्मलीन स्वामी कृष्ण बोधाश्रम जी एक ही मंच पर विराजमान थे. नंदा जी कि उपस्थिति में शंकराचार्यजी ने सेकुलरिज्म के विषय में कहा कि भारत कभी भी धर्मनिरपेक्ष नहीं हो सकता क्योंकि भारत तो सदैव धर्म सापेक्ष ही रह सकता है. उन्होंने कहा कि सेकुलरिज्म का अर्थ है ‘धर्म व नेतिक्ताविहीन भौतिकवाद पर आधारित राज्य’.
    अब जब सेकुलरिज्म के नाम पर नेतिकता विहीन शिक्षा दी जाएगी तो बाजारवाद व भौतिकतावाद में सारी सुख्सुविधायें जल्दी से जल्दी पाने के लिए भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिलेगा. स्कूलों में नेतिक शिक्षा अनिवार्य होनी चाहिए. जिसमे सभी धर्मों के अच्छी बातों का समावेश हो. लेकिन आज जिस स्टार पर भ्रष्टाचार हो रहा है वह केवल सुखसुविधाओं के लिए नहीं है. वह अधिक से अधिक आर्थिक सत्ता अपने हाथों में समेट लेने के लिए है. आन्ध्र प्रदेश के एक गाँव में एक प्राचीन शिलालेख मिला है जिस पर जनप्रतिनिधियों के व्यवहार में लेन के लिए कुछ नियम अंकित किये गए हैं. इमानदारी भी उनमे प्रमुख है. तथा उसमे कहा गया है कि जो जनप्रतिनिधि बेईमानी करता हो उसकी सात पीढियां जनप्रतिनिधित्व के लिए अयोग्य मानी जाएंगी. इसे वर्तमान में भी कानून बनाकर लागू किया जाये.और उनका सामाजिक बहिष्कार किया जाये. जिन नेताओं का काला धन विदेशों में जमा है उसे तत्काल राष्ट्रीकृत किया जाये और सभी टैक्स हेवेन्स को स्पष्ट कर दिया जाये कि अब ऐसा सभी धन जो भारतीय रिजर्व बैंक कि अनुमति एवं जानकारी के बिना बाहर जमा कराया गया है वह भारत सर्कार कि संपत्ति होगा. तथा ऐसे सभी धन का पूरा ब्यौरा यू एन ओ के प्रस्तावों व संधियों के तहत भारत को दिया जाये.
    लेकिन समस्या यहीं पर आ जाती है. क्योंकि ऐसी सूरत में सोनिया गाँधी परिवार का धन भी मांगना पड़ेगा. हालाँकि इससे बचने का पूरा इंतजाम मेडम हाल की अपनी स्वित्ज़रलैंड की निजी जहाज से की गयी गुप्त यात्रा के दौरान कर आयी हैं क्योंकि इस काम में उनको सलाह देने के लिए बारह वित्तीय सलाहकारों का दल भी गया था. जबकि इतनी बड़ी संख्या में वित्तीय सलाहकार प्रधान मंत्री के साथ भी नहीं जाते हैं. तथा उस गुप्त यात्रा के दौरान ही स्वित्ज़रलैंड में दुनिया के सभी पैसेवालों की एक गुप्त बैठक चल रही थी और यात्रा के बाद अख़बारों में ये समाचार आया की स्वित्ज़रलैंड के बैंकों से विदेशियों का कालाधन खिसकना शुरू हो गया है और उसमे पचास हज़ार करोड़ की कमी आ गयी है.

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  4. गंगानन्द झा

    गंगानन्द झा

    यह आलेख भ्रष्टाचार विरोध के नाम पर समय समय पर किए जा रहे शोर से हट कर एक वस्तुनिष्ठ विश्लेषण प्रस्तुत करता है.।
    ये पंक्तियाँ ध्यान खींचती हैं
    “पूंजीवादी व्यवस्था में धीरे धीरे समाज द्विध्रुवीय हो जाता है –पहला संचित तो दूसरा वंचित| एक अपनी स्थिति बनाये रखने के लिए तो दूसरा उस स्थिति में जाने के लिए भ्रष्टाचार का सहारा लेता है|”

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