लेखक परिचय

शंकर शरण

शंकर शरण

मूलत: जमालपुर, बिहार के रहनेवाले। डॉक्टरेट तक की शिक्षा। राष्‍ट्रीय समाचार पत्रों में समसामयिक मुद्दों पर अग्रलेख प्रकाशित होते रहते हैं। 'मार्क्सवाद और भारतीय इतिहास लेखन' जैसी गंभीर पुस्‍तक लिखकर बौद्धिक जगत में हलचल मचाने वाले शंकर जी की लगभग दर्जन भर पुस्‍तकें प्रकाशित हो चुकी हैं।

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शंकर शरण 

पिछले दस वर्ष से भारत के युवा मतदाताओं में भ्रष्टाचार ही सबसे चिंताजनक मुद्दा है। अन्ना हजारे को मिल रहे व्यापक समर्थन के पीछे यही बात है। लेकिन इस के प्रति शासकों या बुद्धिजीवियों में कोई गंभीरता नहीं देखी जाती। अभी कांग्रेस नेता ऐसे बयान दे रहे हैं, मानो भ्रष्टाचार एक अनिवार्य स्थिति है, जिसे खत्म करने या कम करने की बात भी सोचना बेकार है। इसलिए अन्ना की माँग गलत है। उसी अंदाज में, किसी भ्रष्ट सत्ताधारी को भी हटाने की माँग भी गलत कही जा रही है।

यह सब हो रहा है और सारे वामपंथी बुद्धिजीवी तथा अधिकांश नेतागण भी मौन हैं। क्योंकि उन्हें सेक्यूलरिज्म, सामाजिक न्याय, आरक्षण, जैसे वोट-बैंक केंद्रित या राजनीतिक मुद्दे अधिक पसंद हैं। इसीलिए वे भी कहते हैं कि भ्रष्टाचार का कोई निदान नहीं। यह तो ‘विश्व-व्यापी परिघटना’ है।

पर जिन देशों के संविधान और प्रशासन की नकल हमने की है, उन में कहीं भ्रष्टाचार ऐसा नहीं है। मामूली टैक्स-चोरी के लिए भी अमेरिका, यूरोप में बड़े-बड़े लोगों को जेल भुगतनी पड़ती है। वहाँ पुलिस के सबसे निचले कांस्टेबल को भी सामान्यतः भ्रष्ट नहीं माना जाता। इसीलिए जो भारतीय दिल्ली में ट्रैफिक आदि नियमों का बेफिक्री से उल्लंघन करते हैं, वही लोग शिकागो या लंदन में ऐसा कदापि नहीं करते। क्योंकि वहाँ ऐसा कर बचा नहीं जा सकता।

किंतु भारत सदैव ऐसा नहीं था। भारतवासियों का चरित्र और न्यायप्रियता दुनिया में प्रसिद्ध थी। उन्नीसवीं सदी तक माना जाता था कि दूसरों पर लूट-पाट छोड़कर हर बात में भारत यूरोप से श्रेष्ठ है। प्रसिद्ध फ्रांसीसी दार्शनिक वाल्टेयर या बंबंई के गवर्नर रहे विद्वान अंग्रेज एल्फिन्स्टन ने भी इसे नोट किया था। उसी भारत में आज एक घोर भ्रष्ट संस्कृति जम गई है। अब तो उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए भ्रष्टाचारी होना मानो एक योग्यता में बदल गया है। हमारा ऐसा पतन कैसे हुआ?

एक कारण तो यह शासनतंत्र है जो औपनिवेशिक सत्ता ने विशेष उद्देश्य से बनाया था। अंग्रेजों द्वारा बनाए तंत्र का उद्देश्य थाः भारत की लूट और शोषण। तदनुरूप उन्होंने यहाँ टैक्स-प्रणाली, उद्योग, कृषि, सामाजिक नीतियाँ ही नहीं बल्कि प्रशासन और शिक्षा तंत्र भी बनाए। जमींदारी का निर्माण, जातियों में ऊँच-नीच की स्थाई सूची बनाकर और गलत इतिहास पढ़ाकर आपसी वैमनस्य को बढ़ावा, संस्कृत विरोधी शिक्षा-नीति अथवा पंचायतों की पारंपरिक भूमिका को छिन्न-भिन्न करके केंद्रीय पेनल कोड का सर्वाधिकार – यह सब के सब आर्थिक दोहन, भारतीय उद्योग-कृषि कौशल और ग्राम व्यवस्था को पूरी तरह उजाड़ने, और हमें आत्मसम्मानहीन बनाने के लिए किए गए थे। इसी क्रम में सोच-समझ कर भारतवासियों के बीच एक ऐसा उच्च तबका बनाया गया जो उस लूट का एक हिस्सा लेकर, सामान्य लोगों से ऊपर रहकर, विशेष सुख-सुविधाओं का उपभोग कर अपने ही देशवासियों का दमन करे। लेव टॉल्सटाय ने लिखा भी कि भारतवासियों ने ही भारतवासियों को गुलाम बना रखा है, अंग्रेजों ने नहीं।

वही प्रशासनिक और शैक्षिक-वैचारिक तंत्र हमने 1947 के बाद भी यथावत रहने दिया। यह हजार वर्षों की पराधीनता से मुक्त होने वाले भारत के लिए बहुत बड़ी दुर्घटना थी। जो तंत्र निर्मम शोषण, लूट तथा लोगों को तोड़-बाँट और आतंकित कर आत्महीन बनाए रखने के लिए बना था, उसे ही नए भारतीय सत्ताधारियों ने नवनिर्माण का साधन मान लिया! यह एक भयंकर त्रासदी थी, जिस के निहितार्थ अभी तक नहीं समझे गए हैं।

लेकिन यही एक मात्र कारण नहीं। अंग्रेजों ने भारत की लूट का व्यवस्थित तंत्र जरूर बनाया। किंतु उन की प्रवृत्ति में किसी देश को गुलाम बना लेना, प्रताड़ित करना, आदि चाहे था। यह वे अधिकारपूर्क करते थे। पर उनमें अपने ही बनाए कानूनों का उल्लंघन करने की प्रवृत्ति न थी। न कदम-कदम पर रिश्वतखोरी। यह बात उन्हें असम्मानजनक बात लगती थी। इसे अंग्रेजों का चारित्रिक गुण कह सकते हैं। प्रशासन चलाने और कानूनों के अनुपालन में वह कठोर थे। यहाँ बड़ा से बड़ा अंग्रेज गलती कर दंड से बचने की कल्पना नहीं करता था। उन के जाने के बाद देसी राजनेताओं में वह प्रवृत्ति नहीं थी। बल्कि उलटी थी। सत्ताधारी होते ही वे स्वयं को कुछ ऊपर, विशिष्ट समझने लगते थे जिनके लिए कानून को भी झुकना चाहिए।

भारतवासियों में चरित्र की यह कमी हमारे अनेक मनीषी सौ वर्ष पहले ही एक बड़े संकट के रूप में देख रहे थे। स्वामी विवेकानंद, श्रीअरविन्द, रवीन्द्रनाथ टैगोर आदि में यह चिंता मिलती है। उसी कमी के चलते स्वतंत्र भारत के आम सत्ताधारियों में राजनीति व शासन की योग्यता नहीं दिखी। डॉ. लोहिया के लेखन से 1947 के बाद के नेताओं का चरित्र समझा जा सकता है। हमारे नेताओं में लोभ, अज्ञान, भय, आलस्य और ढिलाई जैसे कई दुर्गुण थे। इस से नीति-निर्माण और प्रशासन की उत्तरोत्तर दुर्गति हुई।

एक तीसरा कारण भी थाः वामपंथी विचारधारा! नए भारत में विभिन्न दलों और सरकारी समर्थन से मार्क्सवाद-समाजवाद को खूब प्रचार मिला। समाजवादी मानसिकता भ्रष्टाचार को प्रश्रय देती थी। समाजवाद को सबसे महान लक्ष्य मानते हुए यह अन्य सभी बातों को गौण समझती थी। ‘सामाजिक परिवर्तन’ या ‘आर्थिक न्याय’ जैसे बड़बोले नारों के समक्ष स्वच्छ प्रशासन जैसी चिंता को ही तुच्छ मानती थी। साथ ही, अपने ‘लक्ष्य’ को आगे बढ़ाने के लिए अनैतिक या विदेशी संस्था को मदद देने या लेने को अनुचित नहीं समझती थी। यह मानसिकता भ्रष्टाचार को स्वीकार करने, उसे बढ़ाने का सबसे बड़ा तर्क होती आई है।

विश्व-प्रसिद्ध पुस्तक ‘मित्रोखिन आर्काइव्स’, भाग 2 (2005) में इसका विस्तृत उल्लेख है कि भारत के असंख्य नेता और बुद्धिजीवी सोवियत के.जी.बी. के लिए कार्य करते और उस से धन, सुविधा आदि लेते रहे थे। ऐसे सभी लोग प्रायः कम्युनिस्ट, नेहरूवादी और समाजवादी थे। यह तथ्य अब अनेक स्त्रोतों से प्रमाणित है। यहाँ कम्युनिस्ट पार्टी न केवल चुनाव लड़ने, बल्कि अपने दैनं-दिन खर्च के लिए भी सोवियत संघ से नियमित रूप से धन और अन्य मदद लेती रहती थी। इसे उन्होंने सिद्धांततः सही समझा था।

कांग्रेस पार्टी ने भी 1957 में समाजवाद का लक्ष्य घोषित किया। यह नेहरूजी की निजी पसंद थी। जिस ने स्वयं नेहरू को भ्रष्टाचार के प्रति उदार बनाया। प्रसिद्ध ब्रिटिश कम्युनिस्ट, तथा भारत में कम्युनिस्ट पार्टी के एक संस्थापक फिलिप स्प्रैट ने भ्रष्टाचार पर नेहरूजी के रुख को उन की कम्युनिस्ट भावना से जोड़कर देखा था। 1963 में ही स्प्रैट ने लिखा था, “जिन बातों से नेहरू की मार्क्सवादी भावना प्रमाणित होती है, उन में भ्रष्टाचार के प्रति उन की सहनशीलता भी है।”

सन् 1955-56 तक ही यह बात सार्वजनिक हो चुकी थी कि भारतीय कम्युनिस्ट नियमित रूप से रूसी-चीनी धन लेकर काम कर रहे हैं। यह अवैध था। स्प्रैट आगे लिखते हैं, “नेहरू रूसी, और संभवतः चीनी सरकार को भी इजाजत दे रहे हैं कि वे लोग भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को पैसा देते रहें। यह संसद में स्वीकार किया जा चुका है कि गृह विभाग इन में से कुछ विदेशी धन से अवगत है। दुनिया में कोई शासक इसकी अनुमति नहीं देगा। तब नेहरू क्यों दे रहे हैं?” समाजवादी आदर्श से लगाव के कारण ही हमारे प्रथम प्रधानमंत्री एक प्रमुख राजनीतिक दल को अवैध रूप से विदेशी धन लेने दे रहे थे। उन्होंने तरह-तरह के अन्य घोटालों पर भी उदार रुख लिया। स्वयं उनके दामाद फिरोज गाँधी ने इस पर कड़े प्रश्न उठाए थे।

अतः हमें समझना पड़ेगा कि ऐसी गलत शुरुआतों से ही स्वतंत्र भारत में धीरे-धीरे भ्रष्टाचार ने विकराल रूप लिया। जो कदाचार इंदिरा गाँधी के समय व्यापक हुआ, उस का वैचारिक-व्यवहारिक पूर्वाधार पहले ही स्थापित हो चुका था। यह भी एक सांकेतिक तथ्य है कि जिस समय सर्वोच्च स्तर पर भ्रष्टाचार व्यापक रूप ले रहा था (1971-75), उसी समय आपातकालीन तानाशाही का लाभ उठाते हुए भारतीय संविधान की प्रस्तावना में कुख्यात 42वें संशोधन द्वारा ‘समाजवाद’ और ‘सेक्यूलरिज्म’ को जोड़ दिया गया।

समाजवाद और भ्रष्टाचार का यह आपसी प्रेम सांयोगिक नहीं था। राज थापर की आत्मकथा ‘ऑल दीज इयर्स ’ से अंदाजा मिलेगा कि भ्रष्टाचार क्या रूप ले रहा था। इंदिराजी जानती थीं कि उन के अनेक मंत्री आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं, किंतु वे पदों पर बने रहे। स्वयं प्रधानमंत्री निवास और उनके पुत्र उन गतिविधियों से जुड़े थे। इन सबका समर्थन कम्युनिस्ट पार्टी कर रही थी। ‘दक्षिणपंथ’ विरोध के नाम पर विदेशी पैसा लेने से लेकर देश के अंदर लूट तक, हर काम जायज था। यह मानसिकता आज भी यथावत है। ‘सांप्रदायिकता’ विरोध के नाम पर हर तरह के भ्रष्ट नेता एक होकर गठबंधन बनाते हैं। स्वच्छ प्रशासन किसी के एजेंडे में नहीं आता। क्योंकि वामपंथी लफ्फाजी उस का स्थाई विकल्प है। सेक्यूलर-वामपंथी एकता या कथित तीसरे मोर्चे की धुरी केवल भ्रष्टाचार की छूट है, इस अघोषित बात का महत्व समझना चाहिए।

अधिकांश अर्थशास्त्री सहमत हैं कि भारत में समाजवादी नियोजन, राजकीय क्षेत्र की वृद्धि तथा आर्थिक-उद्यम गतिविधियों पर राजकीय नियंत्रण से एक बदनाम ‘लाइसेंस-कोटा-परमिट राज’ बना। यह व्यवहार में नेताओं और अफसरों के लिए भ्रष्टाचार की गंगोत्री में बदल गया। राज्यतंत्र का बेतहाशा विस्तार उसी का अंग है। अतः पिछले छः दशकों में भ्रष्टाचार बढ़ाने में इस पृष्ठभूमि को भूलना नहीं चाहिए, जो समाजवादी दुराग्रहों से ही बनी थी।

इसलिए यह संयोग नहीं कि वामपंथी टिप्पणीकारों, प्रोफेसरों, अर्थशास्त्रियों द्वारा लिखे गए असंख्य निबंधों, पुस्तक-पुस्तिकाओं में भ्रष्टाचार संबंधी विषय पर बिरले ही कोई लेखन मिलता है। न यह संयोग है कि दुनिया में सर्वाधिक भ्रष्ट शासन कम्युनिस्ट देशों का ही रहा है। सोवियत संघ, पूर्व यूरोप, चीन – हर कहीं सत्ताधारियों ने भ्रष्टाचार के कीर्तिमान बनाए हैं। रोमानिया के कम्युनिस्ट शासक चौसेस्क्यू के कारनामे अभूतपूर्व रहे हैं। भ्रष्टाचार और समाजवाद के विश्वव्यापी संबंध से शिक्षा लेनी चाहिए।

इसीलिए, जहाँ प्रत्येक गड़बड़ी के लिए नेहरूजी को दोषी बताना उचित नहीं – आखिर दूसरे लोग क्या कर रहे थे? – वहीं जिन प्रवृत्तियों का आरंभ उनके प्रधानमंत्रित्व में हुआ, उस के लिए दोष देने से बचा भी नहीं जा सकता। महात्मा गाँधी को भी, जिन्होंने नेहरू की सभी कमजोरियाँ जानते हुए उन्हें अपना “उत्तराधिकारी” घोषित करके जबरन कांग्रेस और देश पर थोपा। भ्रष्टाचार को घातक रोग के रूप में न लेना, और इसे रोकने का प्रयास न करना – इसके लिए नेहरूजी भी जिम्मेदार हैं। यह तथ्य बी. के. नेहरू, शाम लाल जैसे उन के प्रशंसक जीवनीकारों, टिप्पणीकारों ने भी नोट किया है।

अब यदि भ्रष्टाचार से मुक्ति के उपाय नहीं ढूँढे गए तो भारत की स्थिति उस वृक्ष जैसी हो गई है जिसे लोहे की बाड़ से सुरक्षित किया गया हो, किन्तु जिसकी जड़ों में दीमक लग रही हो। अभी समय है कि हम समस्या को गंभीरता से लें, अन्यथा भ्रष्टाचार की सेक्युलर-वामपंथी विचारधारा हमें सोवियत संघ की तरह अनायास ध्वस्त कर सकती है। सैन्य-शक्ति, सूचना तकनीक और सेंसेक्स के पास चरित्र को खाने वाली दीमक का इलाज नहीं है। अभी अनेक कांग्रेसी नेताओं के बयान इसके जीवंत प्रमाण हैं।

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