लेखक परिचय

मृदुल श्रीवास्तव

मृदुल श्रीवास्तव

स्वतंत्र लेखक

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मृदुल श्रीवास्तव

सोशल मीडिया एक बेहतर मंच है जहां पर हम विचारों का आदान प्रदान करते हैं फिर चाहे वह एक जनसाधारण हो या किसी राजनीतिक दल का कार्यकर्ता नेता अथवा कोई अभिनेता.

किसी भी राजनैतिक सामाजिक घटनाक्रम पर देश में क्या माहौल है पूरे देश की राय क्या है इसे जानने का सबसे बेहतर माध्यम सोशल मीडिया है आज बड़ी संख्या में देश में इंटरनेट का उपयोग किया जा रहा है और अधिकांश युवा सोशल मीडिया से जुड़े हुए है, और यह खुलकर बिना किसी रोक-टोक के अपनी राय रखते हैं और उस पर खुलकर परिचर्चा की जाती है यह भारतीय लोकतंत्र का सौंदर्य है जो किसी भी राष्ट्र के लिए बेहद अहम है
इसके बेहद नकारात्मक पक्ष भी हैं जिन्हें नजर अंदाज नहीं किया जा सकता जब सोशल मीडिया को तुष्टीकरण का साधन बना लिया जाए और नग्न भाषा का प्रदर्शन करते हुए,देश के प्रधान से लेकर 1 बड़े राज्य के मुख्यमंत्री तक को चुनौती दी जाए तो विषय बेहद गंभीर हो जाता है, इस बात को समझना होगा कि सवा सौ करोड़ लोगों की आकांक्षाओं पर खरा उतरना एक बहुत बड़ी जिम्मेदारी है एक बड़ी चुनौती है एक बेहद जटिल कार्य है और इतना ही जटिल कार्य एक बड़ी आबादी वाले राज्य के लोगों को विकास की ओर ले जाने की चुनौती उस जर्जर हो चुके राज्य को की कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने की चुनौती, यह कोई सरल कार्य नहीं है या बेहद ही जिम्मेदारी पूर्ण लोकतांत्रिक दायित्व है जिसे देश की जनता ने अपने जनादेश से अपने मुखिया को सौंपा है और दूसरी तरफ नाच गाने द्वारा लोगों के दिल को बहलाने की खूबी दोनों के बीच में जमीन आसमान का अंतर है बेहतर यह है kick kick नाच गाने द्वारा मनोरंजन करने का कार्य करने वाले लोग ऐसे संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्ति के विषय में ऐसी ऊंची बातें ना करें और अपनी मर्यादा में रहकर ही दूसरों रामे रहने की सीख दे यही नीति संगत और तार्किक है खेल

हमारा देश स्वस्थ लोकतंत्र का पक्षधर है जहां व्यक्ति के कुछ मौलिक अधिकार हैं तो कुछ मौलिक कर्तव्य भी हैं उन मौलिक कर्तव्यों में देश के संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का सम्मान करना देश के गौरवपूर्ण इतिहास पर मान करने के साथ-साथ राष्ट्रीयता की भावना को भी हृदय में संजोए रखने की अनिवार्यता है आपको यदि मौलिक अधिकार प्राप्त हैं तो मौलिक कर्तव्यों खरा उतरने का दायित्व भी आपका ही है इस बात का सदैव स्मरण रखें.

संविधान निर्माताओं ने भारत को एक #धर्मनिरपेक्ष अथवा #पंथनिरपेक्ष सेकुलर राष्ट्र का स्वरुप प्रदान किया है जिसका अर्थ सभी धर्मों के प्रति समान भाव रखना है ना की के वजूद को खोकर अन्य के वजूद को सिद्ध करना है वर्तमान में सेकुलरिज्म की परिभाषा को कुछ विकृत मानसिकता के लोगों द्वारा विकृति कर दिया गया है, अब #सेकुलरिस्म शब्द दिखते ही जेएनयू से पूछने वाली भारत विरोधी नारे,एक आतंकी के जनाजे में शरीक 18000 लोग, भगवान श्री कृष्ण के प्रति कुंठा व्यक्त करते हुए विकृत लोग, एक आतंकवादी का पक्ष लिए सुप्रीम कोर्ट में फरियाद के लिए पहुंचे लोगों की ही छवि उभरकर सामने आती है यह वही लोग हैं जो होली और दीपावली को पर्यावरण के लिए दोषी मानते हैं और जीव हत्या इन्हें इको फ्रेंडली लगती है पत्थरबाजी करते हुए आतंकवादियों के साबिर दे जिन्हें अपने भाई बंधु लगते हैं और देश के लिए शहीद होने वाले सिपाही के प्रति इनकी खामोशी ही दिखती है !
मैं मानता हूं कि कुछ भटके हुए गौरक्षकों के निंदनीय कृत्य से यह मुद्दा अधिक गंभीर है ।

आज कश्मीर भारत के लिए एक बहुत बड़ी चुनौती बन कर खड़ा है यहां से कुछ सैनिकों द्वारा उनके विरुद्ध हो रहे दुर्व्यवहार की शिकायतें आती हैं तो दूसरी ओर सेना के जवानों को पत्थरबाजों द्वारा लातों और घूसों से मारा जाता है और वह भारत का बेटा खामोश रहता है और उस सैनिक से अधिक खामोश और बेबस हमारी सरकार नजर आती है, फिर वह जम्मू कश्मीर की सरकार हो या फिर भारत की केंद्र सरकार हो यह मुद्दा गंभीर है कि पत्थरबाजों द्वारा पोलिंग बूथ के समस्त अधिकारियों और जवानों को एक बना लिया जाता है भारत विरोधी नारों के स्वर और तीव्र होते नजर आते हैं isis के झंडे फहराए जाते हैं पाकिस्तान के पक्ष में नारे लगाए जाते हैं हमारी सरकार खामोश रहती है ऐसे ही मैं सैनिक बेबस ही नजर आएगा यह विषय भारत की अस्मिता से जुड़ा हुआ है विषय भारत भूमि के उन सिपाहियों से जुड़ा हुआ है जो देश की रक्षा के लिए अपने प्राणों को न्योछावर करते आ रहे हैं इस विषय पर अनिर्णय की यह स्थिति सरकार का सबसे नकारात्मक पक्ष बन कर सामने आ रहा है इसके गंभीर परिणाम की संभावना भी नजर आ रही है बेहतर हो कि सरकार अपनी आंखें खोले अनिर्णय की स्थिति के सैदव घातक परिणाम होते हैं अतः विषय की गंभीरता को समझते हुए एक निर्णायक समाधान ढूंढने की आवश्यकता है ।

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