कुटिल राजनीति से आहत होता लोकतंत्र

सत्ताहीनता से पीड़ित कांग्रेस सहित अधिकांश विपक्ष बार-बार हथकंडे अपना कर कोई न कोई संवेदनशील मुद्दा उठा कर समाज को भ्रमित करने में सक्रिय है। श्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में राजग के सशक्त शासन को गिराने के लिए 2015 का  बिसाहडा,दादरी (ग्रेटर नोएडा) कांड हो, 2016 में हैदरबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या हो, जेएनयू (नई दिल्ली) में टुकड़े-टुकड़े गैंग की देशद्रोही गतिविधियां  हो, दिसम्बर 2019 से मार्च 2020 तक “नागरिकता संशोधन अधिनियम” के विरोध में भकड़ा कर जामिया, शाहीन बाग व एएमयू (अलीगढ़) के साथ-साथ देश के विभिन्न क्षेत्रों में अहिंसक व हिंसक प्रदर्शनों को कांग्रेस व कुछ अन्य विपक्षी राजनैतिक एवं सामाजिक संगठनों के सतत् समर्थन से उनका दुःसाहस बढ़ता जा रहा है। इसी का दुष्परिणाम हुआ कि 23-25 फरवरी 2020 में दिल्ली को साम्प्रदायिक दंगों की आग में झोंक कर भारत को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर लज्जित होना पड़ा था। लोकतंत्र में ऐसे कुटिल राजनेताओं को नियंत्रित करना राष्ट्रहित होगा।
 निःसंदेह कांग्रेस सहित कुछ विपक्षी दल अपनी सत्ताहीनता की पीड़ा से बहुत अधिक हताश हो चले है। हाथरस के बूलगढी गांव में अनुसूचित जाति की हिन्दू युवती के साथ 14 सितंबर को हुई घटना अत्यन्त भयावह व झकझोरने वाली अवश्य है। वर्षों से देश में ऐसे या इससे भी अधिक दर्दनाक अत्याचारों से नित्य पीड़ित होने वाली अबलाओं पर मौन रहने वाला समाज कब तक राजनेताओं की ओर टकटकी लगाकर उनको कुत्सित राजनीति करने का अवसर देता रहेगा? ऐसे अवसरवादी राजनीतिज्ञ केवल पीड़ित परिवार के प्रति सहानुभूति का नाटक करके सत्ता पक्ष को निशाना बना कर वातावरण को दूषित और विषैला बनाते है। जिससे समाज में परस्पर वैमनस्य व घृणा का ही बीजारोपण होता आ रहा है। लोकतंत्र में विपक्ष की इस प्रकार की कुत्सित व कुटिल राजनीति को कब तक स्वीकार किया जाता रहेगा?   
अतः यह मानना उचित ही होगा कि इस बूलगढी कांड को झूठ के पंख लगा कर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार को कटघरे में खड़े करने के सभी हथकंडे अपनाये जाना भी कुटिल राजनैतिक षड्यंत्र का ही भाग है। समाचार पत्रों व विभिन्न समाचार चैनलों द्वारा नित्य नए नए मिलने वाले समाचारों से यहीं उजागर हो रहा है कि इस दर्दनाक घटना की आड़ में प्रदेश सहित पूरे देश में जातीय आधार पर बड़े पैमाने में दंगे करवाने के लिए कौन-कौन षड्यन्त्रकारी किस-किस प्रकार से तैयारी कर रहे थे।  
यह दुःखद है कि जब देश आंतरिक रूप से कोरोना महामारी से जूझ रहा है और सीमाओं पर चीन एवं पाकिस्तान से देश की सुरक्षा के प्रति सतर्क है तब भी ऐसे तत्व सरकार के प्रति अपनी दुर्भावनाओं को भी नियंत्रित नहीं कर पाते। इसमें संदेह नहीं कि जब से विदेशी सहायता प्राप्त हज़ारों स्वयं सेवी संगठनों पर अनियमितताओं व देश विरोधी गतिविधियों के कारण प्रतिबंध लगाए गए है तब से वे शासन का विरोध करने का कोई भी अवसर खोना नहीं चाहते। ऐसे संगठन देश को तोड़ने व बर्बादी तक जंग जारी रखने वाले राष्ट्रद्रोहियों, जिहादियों, ईसाइयों, नक्सलवादियों व माओवादियों को आर्थिक व बौद्धिक रूप से सहयोग करके भारत की संप्रभुता व अखण्डता के लिए बहुत बड़ा संकट बने हुए है। ऐसे स्वयं सेवी संगठनों पर अंकुश लगने से तिलमिलाने वाले तत्व अभी पता नहीं और कितने रूप दिखाएंगे?
ऐसी विपरीत स्थिति में जब चारों ओर से देशविरोधी व सरकार विरोधी एकजुट होकर आक्रामक हो रहे हो तो संघ परिवार के अतिरिक्त भाजपा को अपने अन्य शुभचिंतकों व राष्ट्रवादियों की राष्ट्रीय पीड़ाओं को अवश्य महत्व देना चाहिये। यह कहना अनुचित होगा कि केवल संघ परिवार के कारण ही भाजपा सत्ता में बैठी है। हम जैसे हज़ारों देशभक्तों का वर्षों का परिश्रम है जिसके कारण 2014 व 2019 में मोदी जी के नेतृत्व में राजग ने केंद्र में सत्ता संभाली है। ध्यान रखना होगा कि जब नींव सशक्त नहीं होगी तो शिखर की चमक अवश्य धूमिल पड़ सकती है। निःसंदेह संघ परिवार को छोड़कर शेष राष्ट्रवादी हिन्दू समाज की राष्ट्रीय वेदनाओं की अवहेलना करना भाजपा के लिए अवश्य हानिकारक हो सकती है। 
सन्  2015 के बिहार विधान सभा चुनाव में बिसाहड़ा कांड भाजपा की पराजय का कारण बना था सम्भवतः उसी की पुनरावृत्ति में अब इस हाथरस कांड को भुनाया जा सकता है। अगामी माह में होने वाले बिहार विधानसभा के चुनाव भाजपा के लिए एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में भाजपा व संघ परिवार को अपने गुप्तचरों व कार्यकर्ताओं को सत्ता सुख के लिए चापलूस नहीं राष्ट्रवादी सोच के साथ सत्ता की सुरक्षा के लिए समर्पित व तपस्वी बनाना होगा। जीवन के इस सत्य है को भी समझना चाहिये कि विलासिता, निर्बलता और चाटुकारिता के वातावरण में संयम, धैर्य, बल व पराक्रम आदि शनै-शनै लुप्त हो जाते है।
अतः भविष्य में उपरोक्त देशविरोधी तत्वों के विभिन्न षडयंत्रों को भांपना और उस पर गिद्ध दृष्टि से आक्रामक होना पड़ेगा। भारत की अखंडता व संप्रभुता को बनाये रखने के लिए सुरक्षात्मक व समझौतावादी नीतियों और वार्ताओं के स्थान पर अब आक्रामक नीतियों को अधिक महत्व देना होगा। महान आचार्य चाणक्य के अमर वचन भी आज प्रसांगिक है। जिसमें उन्होंने कहा था कि  “संसार में कोई किसी को जीने नहीं देता, प्रत्येक व्यक्ति व राष्ट्र अपने ही बल व पराक्रम से जीता है।” किसी दूरदर्शी अज्ञात नायक ने यह भी उचित कहा था कि “शांतिप्रियता किसी व्यक्ति की आत्मा के लिए तो अच्छी हो सकती है किंतु किसी देश की सुरक्षा के लिए घातक है।”
अतः जब हमारी महान संस्कृति सबको एक परिवार मानती है तो इसका अर्थ यह नहीं हो सकता कि एक पक्ष निरंतर कांटें चुभाता रहे और दूसरा घायल होता रहे। इसलिये धन बल के सहारे झूठ को पंख लगा कर लोकतंत्र को आहत करने वाली कुटिल राजनीति करने वालों पर अंकुश लगाने के सभी सम्भव उपाय करने होंगे। 

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