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    Homeसाहित्‍यलेखअहिंसा के सिवाय कोई सौन्दर्य नहीं

    अहिंसा के सिवाय कोई सौन्दर्य नहीं

    – आचार्य डाॅ.लोकेशमुनि-
    आज समूची दुनिया संकटग्रस्त है, अब तक के मानव जीवन में ऐसे विकराल एवं विनाशक संकट नहीं आये। एक तरफ कोरोना महामारी का संकट है तो दूसरी ओर विश्व-युद्ध का माहौल बना है। हमें उन आदतों, वृत्तियों, महत्वाकांक्षाओं, वासनाओं, इच्छाओं को अलविदा कहना होगा जिनका हाथ पकड़कर हम उस ढलान पर उतर गये जहां रफ्तार तेज है और विवेक का नियंत्रण खोते चले जा रहे है, जिसका परिणाम है, मानव का विनाश, जीवनमूल्यों का हृास एवं असंवेदना का साम्राज्य। आज की मुख्य समस्या यह है कि आदमी किसी दूसरे को आदमी की दृष्टि से नहीं देख रहा है। वह उसे देख रहा है धन के पैमाने से, पद और प्रतिष्ठा के पैमाने से, शक्ति एवं साधनों से।
    हिंसा का उदय कहां से होता है? हिंसा कहीं आकाश से तो टपकती नहीं है, न जमीन से पैदा होती है। हिंसा पैदा होती है आदमी के मनोभावों से। हिंसा का मनोभाव न रहे तो हथियार बनाने वाले उद्योग अपने आप ठप्प हो जाएंगे। विकृत मानसिकता, हिंसा एवं महत्वाकांक्षाओं की ही निष्पत्ति है कोरोना महामारी। इंसान का भीतरी परिवेश विकृत हो गया है, उसी की निष्पत्तियां हैं युद्ध, महामारी, प्रदूषण, प्रकृति का दोहन, हिंसा एवं भ्रष्टाचार। जबकि भीतर का सौंदर्य है अहिंसा, करुणा, मैत्री, प्रेम, सद्भाव और आपसी सौहार्द। सबको समान रूप से देखने का मनोभाव। जब यह भीतर का सौंदर्य नहीं होता तो आदमी बहुत समृद्ध होकर भी बहुत दरिद्र-सा लगता है। सुंदर शरीर में कुष्ठरोग की तरह शरीर के सौंदर्य को खराब कर रही यह महामारी इस बात का खुला ऐलान कर रही हैं कि सृष्टि का चेहरा वैसा नहीं है, जैसा कोरोना महामारी एवं युद्ध के मंडराते बादलों के दर्पण में दिखता है। चेहरा अभी बहुत विदू्रप है। मानवता के जिस्म पर गहरे घाव हैं, जिन्हें पलस्तर और पैबंद लगाकर भरा नहीं जा सकता। दुनिया के निवासियों में गहरी असमानता है। कुछ लोगों के पास बेसूमार सुख-सुविधाओं के साधन, रिहाइसी बंगले और कोठियां हैं तो बाकी आबादी को मुश्किल से रात को छत उपलब्ध हो पाती है। यह असमानता एवं गरीबी-अमीरी का असंतुलन समस्याओं की जड़ है।
    वर्तमान युग की समस्याओं का समाधान है अहिंसा, आपसी भाईचारा, अयुद्ध एवं करुणा। इस तरह बाहरी सौंदर्य को बढ़ाने के लिये पहले भीतर का सौंदर्य बढ़ाना होगा और उसके लिए अहिंसा सर्वोत्तम साधन है। उसमें दया है, प्रेम है, मैत्री, करुणा, समता है, संवेदनशीलता है। जितने भी गुण हैं, वे सब अहिंसा की ही परिक्रमा कर रहे हैं, उसके परिपाश्र्व में घूम रहे हैं। अहिंसा ही जीवन का सबसे बड़ा सौन्दर्य है। उसका विकास होना चाहिए। कैसे हो, यह हमारे सामने एक प्रश्न है। प्रेरक वक्ता टॉनी रॉबिन्स कहते हैं, ‘हमारे जीवन की गुणवत्ता इस बात का दर्पण है कि हम खुद से क्या सवाल पूछते हैं।’

    समाज में अनैतिकता इसलिए पैदा हो रही है और फल-फूल की है कि आदमी के मन में करुणा नहीं है, अहिंसा नहीं है, मैत्री और समानता का भाव नहीं है। आज मैं अपने दीक्षा के 38वें वर्ष में प्रवेश करते हुए सोच रहा था कि हमें जीने के तौर-तरीके ही नहीं बदलने है बल्कि उन कारणों की जड़े भी उखाड़नी होगी जिनकी पकड़ ने हमारे परिवेश, परिस्थिति और पहचान तक को नकार दिया। आधुनिकता के नाम पर बदलते संस्कारों ने जीवनशैली को ऐसा चेहरा और चरित्र दे दिया कि टूटती आस्थाएं, खुलेआम व्यवसाय एवं कर्म में अनैतिक साधनों की स्वीकृति, स्वार्थीपन, खानपान में विकृतियां, ड्रिंक-ड्रंग्स-डांस में डूबती हमारी नवपीढ़िया, आपसी संवादहीनता, दायित्व एवं कत्र्तव्य की सिमटती सीमाएं- अनेक ऐसे मुद्दें हैं जिन्होंने हमारे जीवन पर प्रश्नचिन्ह टांग दिये हैं। दिल्ली की सड़कों का दृश्य मेरे सामने आ गया। इस महानगर में जहां अनेक बड़े भवन रोज बनकर तैयार होते हैं, वहां की सड़कों की ऐसी हालत क्यों हो? लेकिन जैसा कि अभी कहा, स्वार्थ आड़े आता है। भवन मेरा अपना है, सड़क मेरी नहीं है। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। माचिस, सूई, धागा आदि का आविष्कार जरूरत के अनुसार हुआ और आज इससे सारी दुनिया लाभान्वित हो रही है। अहिंसा विश्व भारती और उसके अहिंसा प्रशिक्षण एवं अहिंसक जीवनशैली आदि उपक्रमों में अगर प्राणवत्ता है, लोगों के लिए लाभदायी है तो एक दिन इन्हें सारी दुनिया स्वीकार करेगी। हम क्यों इस चिंता में दुबले हो कि सभी लोग हमारी बात को नहीं सुन रहे हैं या स्वीकार नहीं कर रहे हैं।
    भगवान महावीर की अनुभूतियों से जन्मा सच है-‘धम्मो शुद्धस्य चिट्ठई’ धर्म शुद्धात्मा में ठहरता है और शुद्धात्मा का दूसरा नाम है अपने स्वभाव में रमण करना, स्वयं के द्वारा स्वयं को देखना, अहिंसा, पवित्रता एवं नैतिकता को जीना। धर्म दिखावा नहीं है, आडम्बर नहीं है, बल्कि यह नितांत वैयक्तिक विकास की क्रांति है। जीवन की सफलता-असफलता का जिम्मेदार व्यक्ति स्वयं और उसके कृत्य हैं। इन कृत्यों को एवं जीवन के आचरणों को आदर्श रूप में जीना और उनकी नैतिकता-अनैतिकता, उनकी अच्छाई-बुराई आदि को स्वयं के द्वारा विश्लेषित करना, यही हमें स्वास्थ्य, शक्ति, आंतरिक सौन्दर्य, सम्यक् साधन-सुविधाओं एवं सुयश के साथ-साथ जीवन की शांति और समाधि की ओर अग्रसर कर सकते हैं।
    प्रकाश के अभाव में सचाई का साक्षात्कार नहीं हो पाता। आदमी रस्सी को सांप समझ लेता है और सांप को रस्सी। प्रकाश भले ही कितना भी क्षीण हो, वह सचाई को प्रकट करने में बहुत सहायक होता है। इसी सचाई के आधार पर हम वास्तविकता की खोज करते रहे हैं, अच्छे आदमियों के निर्माण में लगे रहे हैं। आज से नहीं, 38 वर्षों से वह क्रम आगे से आगे चल रहा है। हमने जो उपाय खोजे, उन्हें अपने तक ही सीमित नहीं रखा, प्रसाद मानकर उसे जन-जन को बांटा। मेरी दृष्टि में आदमी की तलाश वही कर सकता है, जिसका तीसरा नेत्र खुल गया हो। दो आंखें तो सिर के बीचो बीच सामने की ओर होती हैं, किन्तु हमारी तीसरी आंख भृकुटी के बीच में होती है। आज की मेडिकल साइंस में इसे पीनियल ग्लैंड का स्थान माना गया है। तीसरी आंख का संबंध न तो प्रियता के साथ होता है, न अप्रियता के साथ होता है। इसका संबंध एकमात्र सचाई के साथ होता है और जो सचाई को देखने वाला है, वही आदमी को तलाश कर सकता है। जैसाकि लेखिका शेनॉन ब्राउन कहती हैं, ‘हम खुद को बदलें या हालात को, ये हिम्मत कहीं बाहर नहीं है। हमारे अपने भीतर है।’
    आदमी के मूल्यांकन का मेरा अपना पैमाना है। आज सभी लोगों की प्रायः यह धारणा है कि जिसके पास बहुत ज्यादा धन-दौलत हो, उसे बड़ा मान लिया जाता है। लेकिन मेरी धारणा तो कुछ दूसरी है। ऐसे बहुत से करोड़पति मिलेंगे, जिन्हें बड़ा तो क्या आदमी मानने में भी संकोच होगा। अर्हता पर विचार न करें तो उन्हें आदमी की श्रेणी में भी नहीं रखा जा सकता। संवेदनहीन, हृदयहीन और क्रूर आदमी को आदमी कैसे माना जा सकता है? आदमी वही है जिसमें आदमीयत हो।
    हमें क्षण भर के लिए भी यह विस्मृति क्यों हो कि हम आदमी नहीं हैं। देखा जाए तो आज की मूल समस्या यही है कि आदमी की स्वयं की और दूसरों की पहचान खो गयी है। सारा संकट पहचान का है। जो हम हैं, वह मानने को तैयार नहीं और जो नहीं हैं, उसका लेबल जबर्दस्ती लगाए घूम रहे हैं। स्वयं का व्यवहार आदमी जैसा नहीं है फिर भी कहीं प्रसंग आता है तो कह देते हैं कि आदमी हूं, कोई जानवर तो नहीं हूं और अपने नौकर के साथ आदमी जैसा व्यवहार करने को तैयार नहीं है। इन्हीं जीवनगत विसंगतियों को दूर करके ही हम वर्तमान की समस्याओं का समाधान पा सकते हैं।

    आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि
    आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि
    आचार्य लोकेश आश्रम, 63/1 ओल्ड राजेन्द्र नगर, करोल बाग मेट्रो स्टेशन के समीप, नई दिल्ली-60 सम्पर्क सूत्रः 011-25732317, 9313833222,

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