युवराज के नाटक

rahul_gandhiअब आप सोच रहे होंगे कि युवराज कौन? हम इस देश की सत्तारूढ़ पार्टी के युवराज की बात कर रहे हैं। पुराने समय में राजा-महाराजा हुआ करते थे और उनके पुत्रों को युवराज कहा जाता था। रजवाड़े खत्म हो गए लेकिन आज के आधुनिक दौर में भी युवराज होते हैं। अब युवराज हैं तो भइया सुरक्षा भी ज्यादा चाहिए। जहां जाते हैं पूरा काफिला साथ चलता है। उनकी सुरक्षा के कारण आम जनता को बड़ी दिक्कतों का सामना करना पड़ता है और राहुल बाबा हीरो बन जाते हैं। किसी गांव में गए और गांव में सुरक्षाबलों का तांता लग जाता है। लोगों को अपने ही घरों को जाने में दिक्कतों का सामना करना पड़ता है।

युवराज हैंडपम्प से नहा लें तो यह खबर है और हजारों लोग यमुना के जहरीले पानी से नहाते हैं वो खबर नहीं है। ट्रेन से जाएं तो यह खबर है और गांवों में लोग आज भी कोसों पैदल चलने को मजबूर हैं, यह खबर नहीं है। ऐसी ही न जाने कितनी बातें हैं जो युवराज के जाने से खबर बन जाती है। देश की मूलभूत समस्याओं को उजागर करने की जगह मीडिया राहुल गांधी के नाटकों को तरजीह दे रहा है।

कुछ दिन पहले राहुल गांधी जेएनयू पहुंचे। लाल टापू में उनके जाने से हवाएं गर्म हो गईं। जगह-जगह पोस्टर लगाए गए। कहीं पोस्टर में राहुल चाय पीते नजर आए तो कहीं युवराज के आगमन व स्वागत के पोस्टर थे। लाल टापू का यह दौरा एनएसयूआई के ही लोगों द्वारा कराया गया। युवराज के आने से पहले जेएनयू छावनी में तब्दील कर दिया गया। इतनी सुरक्षा तो तब भी नहीं दिखी थी जब प्रधानमंत्री यहां आए थे लेकिन जब राहुल गांधी वामपंथिओं के गढ़ पहुंचे तो उनके लिए 600 से ज्यादा सुरक्षाकर्मी थे। छात्रों से ज्यादा तो सुरक्षाबल नजर आ रहा था। अब सवाल यह उठता है कि जो सुरक्षा प्रधानमंत्रियों के लिए भी नहीं होती तो राहुल के लिए क्यों। न तो राहुल देश के प्रधानमंत्री हैं और ना ही सरकार में मंत्री। केवल गांधी होने के कारण क्या इतनी सुरक्षा सही है?

जेएनयू में कई छात्रों के तीखे तेवरों का सामना भी राहुल को करना पड़ा। शुरुआती औपचारिक भाषणों के बाद राहुल जैसे ही मंच पर पहुंचे, सामने बैठे स्टूडेंट्स के एक ग्रुप ने राहुल को काले दुपट्टे दिखाते हुए नारे लगाने शुरू किए- ’84 के दंगाइयों को एक धक्का और दो। फेक एनकाउंटर करने वालों को एक धक्का और दो।’ इन सबके बीच राहुल ने बोलना शुरु किया और छात्रों के सवालों के जवाब भी दिए। एक छात्र ने सवाल पूछा कि उसने फ्रेंच भाषा में बी.ए. किया है और उसे तमाम एमएनसी से भी ऑफर हैं लेकिन प्राइवेट नौकरी में सिक्युरिटी नहीं है इसलिए वो सरकार के साथ काम करना चाहता है। राहुल ने उस छात्र को मंच पर बुलाकर गले लगाया और एनएसयूआई के नेताओं से कहा कि इनका बायोडेटा ले लीजिये, देखते हैं। लेकिन राहुल जी इस देश में लगभग 4 करोड़ से ज्यादा शिक्षित युवा बेरोजगार हैं; किस-किस का बायोडेटा लेंगे राहुल जी? चलिए शायद इस प्रकरण से एक बेरोजगार को रोजगार मिल जाए…।

कभी दलित के यहां रात गुजारना तो कभी भीड़ में जाकर बात करना और इसके कारण उनके सुरक्षा बल आम लोगों को परेशान करते हैं। भीड़ को हटाने के लिए धक्का मारा जाता है। अरे युवराज जी आप आम आदमी की मुश्किलें सुलझाने जाते हैं या बढ़ाने? चलिये युवराज जी बातें बनाने में तो आप माहिर हैं लेकिन बातों की जगह जमीनी स्तर पर कुछ कार्य भी करें तो अच्छा होगा।।

-हिमांशु डबराल

3 thoughts on “युवराज के नाटक

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  2. दरअसल अब देश के अन्दर लोगो ने अपनी सोच को एकदम ताला लगा के रख दिया है. जो हो रहा है सब ठीक और जो जो अच्छा नहीं हो पाया, वो सब ऊपर वाले कि इच्छा से नहीं हुआ. ऐसे में अब इस तरह से राजनीती करने वालों को बहुत ज्यादा कुछ नहीं करना पड़ता, जब सब काम थोड़े से बनावटी ( सजावटी) कार्य करने से ही बन जाता है. बाकी मीडिया ( विशेष तौर पर electronic मीडिया) भी ऐसे किस्सों को बहुत चाव से जगह देती है और बिना प्रयास ऐसी राजनीती करने वालों को शिखर पर ला खडा करती है.

    वैसे भी जनता के सामने नौटंकी करके राजनीती के शिखर पर पहुँचने वालों कि कोई कमी नहीं रही है. इसलिए यह चिंता कि कोई बात नहीं होनी चाहिए क्योंकि जब जनता ही सोच पर ताला लगा कर बैठी हो तो ऐसे ही लोग राजनीती कि दिशा बन जाते है इसलिए किसी को दोष नहीं देना चाहिए जबकि दोषी तो हम खुद है जो ऐसे नाटक देख कर बह जाते है……. रविकवि

  3. यह देश नौटंकियों से ही चलता है, यह बात गाँधी परिवार अच्‍छी तरह से जानता है। मीडिया और नौकरशाहों को मूर्ख राजनेता चाहिए जिससे उनकी बुद्धि काम आती रहे और राजनेता उनकी हाँ में हाँ मिलाते रहें।

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