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    Homeसाहित्‍यकविताअंधेरे रास्तों पर

    अंधेरे रास्तों पर

     

    जीवन में क्यों कोई राह नजर नहीं आती है ?
    हर राह पर क्यों नई परेशानी चली आती है ?
    जब जब चाहा भूल जाऊं अपनी उलझनों को 
    तब तब एक और नई उलझन मिल जाती है। 
    खुलकर जीना और हंसना मैं भी चाहती हूं 
    पर ज़िन्दगी हर बार ही बेवजह रुला जाती है। 
    पूछना चाहती हूं ज़िन्दगी से खता क्या है मेरी 
    क्यों जीवन की राहें मेरी हो गयी हैं अंधेरी। 
    अंधेरी राहों पर आखिर कब तक ऐसे चलूंगी 
    एक दिन ढलती शाम के साथ मैं भी ढलूंगी। 
    अंधेरे इन रास्तों पर न मंज़िल का ठिकाना है 
    और न इस डगर पर जीने का कोई बहाना है। 
    कैसे जिऊं मैं इन कठिन रास्तों पर चलकर
    क्यों खुशियां नहीं आती अपना रास्ता बदलकर। 
    ऐसा नहीं कि मैंने कोशिश नहीं की इन्हे बुलाने की 
    पर जैसे खुशियां कसम खा चुकी हैं मुझे भुलाने की। 
    जब जब चाहा जी लूं ज़िन्दगी मैं भी खुलकर। 
    ज़िन्दगी ने दी गम की सौगात दोबारा हंसकर।
    लक्ष्मी जायसवाल
    लक्ष्मी जायसवालhttps://www.pravakta.com/author/lakshmijaiswal
    दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा तथा एम.ए. हिंदी करने के बाद महामेधा तथा आज समाज जैसे समाचार पत्रों में कुछ समय कार्य किया। वर्तमान में डायमंड मैगज़ीन्स की पत्रिका साधना पथ में सहायक संपादक के रूप में कार्यरत। सामाजिक मुद्दों विशेषकर स्त्री लेखन में विशेष रुचि।

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