काश्मीर में रोशनी एक्ट की कालिमा के दंश

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-ललित गर्ग –
जम्मू-काश्मीर के आजादी के बाद के राजनीतिक जीवन एवं शासन-व्यवस्था में कितने ही भ्रष्टाचार, घोटाले, गैरकानूनी कृत्य एवं आर्थिक अपराध परिव्याप्त रहे हैं। अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद एवं वहां स्वस्थ लोकतांत्रिक व्यवस्था को लागू करने की प्रक्रिया को अग्रसर करते हुए अब इनकी परते उघड़ रही है। एक बड़ा घोटाला जम्मू-कश्मीर में रोशनी एक्ट की आड़ में 25 हजार करोड़ का सामने आया है। असल में नाम से यह एक विद्युत से जुड़ा घोटाला प्रतीत होता है, लेकिन यह जम्मू-कश्मीर की राजनीति एवं शासन-व्यवस्था की अंधेरगर्दी से जुड़ा सबसे बड़ा जमीन घोटाला है। आजादी के बाद से राजनैतिक एवं सामाजिक स्वार्थों ने काश्मीर के इतिहास एवं संस्कृति को एक विपरीत दिशा में मोड़ दिया है, भ्रष्ट, विघटनकारी एवं आतंकवादी संस्कृति को एक षडयंत्र के तहत पनपाया गया। लेकिन अपनी मूल संस्कृति को रौंदकर किसी भी अपसंस्कृति को बड़ा नहीं किया जा सकता। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में काश्मीर के जीवन के हर पक्ष पर हावी हो रही अराजकता, स्वार्थ की राजनीति, आतंक की कालिमा को हटाया जा रहा है ताकि इस प्रांत के चरित्र के लिए खतरा बने नासूरों को खत्म किया जा सके, आदर्श शासन व्यवस्था स्थापित हो सके।
जम्मू-कश्मीर के इस सबसे बड़े घोटालों में सीबीआई जांच के दौरान कई बड़े नेताओं, अफसरों और व्यापारियों के नाम सामने आए हैं। जिनमें पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू, पूर्व गृह मंत्री सज्जाद किचलू, पूर्व मंत्री अब्दुल मजीद वानी और असलम गोनी, नैशनल कांग्रेस के नेता सईद आखून और पूर्व बैंक चेयरमैन एमवाई खान के नाम प्रमुख हैं। जम्मू-कश्मीर की लगभग 21 लाख कनाल भूमि पर लोगों ने अवैध कब्जा कर रखा था। तत्कालीन सरकारों ने अवैध कब्जे हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए कानून बना दिया जिसे रोशनी एक्ट या रोशनी स्कीम का नाम दिया गया। मगर एक्ट का फायदा उठाकर राजनेताओं, नौकरशाहों और व्यावसायियों ने सरकारी और वन भूमि की बंदरबांट की। अब केन्द्र शासित जम्मू-कश्मीर में यह उम्मीद जगी है कि न्यायपालिका के दबाव में सरकारी जमीन पर हुए इन अवैध कब्जों को हटाया जाएगा और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई होगी। सीबीआई जांच में और परतें खुलेंगी और लाभार्थियों का कच्चा चिट्ठा सामने आएगा।
 जम्मू-काश्मीर की राजनीति का चरित्र कई प्रकार के अराष्ट्रीय दबावों से प्रभावित रहा है, जिसमें आर्थिक अपराधों की जमीन को मजबूती देने के साथ आतंकवाद को पोषण दिया जाता रहा है। विडम्बना तो यह है कि इस प्रांत एवं प्रांत की जनता को राजनेता अपने आर्थिक लाभों-स्वार्थों के लिये लगातार हिंसा, अराजकता एवं आतंकवाद की आग में झोंकते रहे हंै, जिसमें प्रांत की सरकार को केन्द्र की सरकार से संरक्षण एवं आर्थिक सहायता भी मिलती रही है। अब अगर जम्मू-काश्मीर में चरित्र निर्माण, विकास, शांति और अमन का कहीं कोई प्रयत्न हो रहा है, आवाज उठ रही है तो इन भ्रष्ट राजनेताओं को लगता है यह कोई विजातीय तत्व है जो हमारे जीवन में घुसाया जा रहा है। जिस मर्यादा, सद्चरित्र और सत्य आचरण पर हमारा राष्ट्रीय चरित्र एवं संस्कृति जीती रही है, सामाजिक व्यवस्था बनी रही है, जीवन व्यवहार चलता रहा है वे इस प्रांत में जानबूझकर लुप्त कियेे गये। उस वस्त्र को जो इस प्रांत के अस्तित्व एवं अस्मिता एवं शांतिपूर्ण जीवन को ढके हुए था, कुछ तथाकथित राजनेताओं एवं घृणित राजनीति ने उसको उतार कर खूंटी पर टांग दिया। मानो वह पुरखों की चीज थी, जो अब इस प्रांत के भ्रष्ट एवं अराष्ट्रीय नेताओं के लाभ एवं स्वार्थ की सबसे बड़ी बाधा बन गयी। इस बड़े घोटाले की परते खुलने से जम्मू-काश्मीर का भाग्यविधाता मानने वाले भ्रष्ट राजनेताओं की नींद उड़ गयी है। नींद तो उनकी अनुच्छेद 370 खत्म किए जाने के बाद से ही उड़ी हुई है। तभी तो नेशनल कांफ्रैंस के नेता फारूक अब्दुल्ला, पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती और अन्य नेताओं की तीखी प्रतिक्रियाएं लगातार सामने आ रही हैं और उन्होंने कश्मीरियों के अधिकारों के लिए लड़ने और अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए गुपकर संगठन भी बना लिया है। इन राजनेताओं की बौखलाहट इतनी अधिक उग्र है कि फारूक अब्दुल्ला अनुच्छेद 370 की बहाली के लिए चीन की मदद लेने की बात करते हैं तो महबूबा तिरंगे का अपमान करती हैं। इस तरह की अराष्ट्रीय घटनाओं एवं विसंगतिपूर्ण बयानों से न केवल प्रांत बल्कि समूचे राष्ट्र का चिन्तीत होना स्वाभाविक है।
जम्मू-काश्मीर के फारूक अब्दुल्ला, महबूबा मुफ्ती, गुलाम नबी जैसे नेताओं ने प्रांत के धन को जितना अधिक अपने लिए निचोड़ा जा सके, निचोड़ लिया। भ्रष्ट आचरण और व्यवहार इन्हें पीड़ा नहीं देता था। सबने अपने-अपने निजी सिद्धांत बना रखे थे, भ्रष्टाचार की परिभाषा नई बना रखी थी। इस तरह की औछी एवं स्वार्थ की राजनीति करने वाले प्रांत एवं समाज के उत्थान के लिए काम नहीं करते बल्कि उनके सामने बहुत संकीर्ण मंजिल थी सत्ता पाने एवं धन कमाने की। ऐसी रणनीति अपनाना ही उनके लिये सर्वोपरि था, जो उन्हें बार-बार सत्ता दिलवा सके। नोट एवं वोट की राजनीति और सही रूप में सामाजिक उत्थान की नीति, दोनों विपरीत ध्रुव हैं। एक राष्ट्र को संगठित करती है, दूसरी विघटित। लेकिन इन नेताओं ने दूसरी नीति पर चलते हुए न केवल काश्मीर को लूटा, घोटाले किये, प्रांत को कंकाल किया, बल्कि हिंसा-आतंकवाद के दंश दिये।
अनुच्छेद 370 के चलते आज तक केन्द्र की सरकारों ने जम्मू-कश्मीर में इतना धन बहाया है कि उसका कोई हिसाब-किताब नहीं। प्रांत के तथाकथित नेताओं एवं अलगाववादियों ने सरकारी धन एवं पाकिस्तान और खाड़ी देशों से मिलेे धन से देश-विदेश में अकूत सम्पत्तियां बना लीं, जबकि कश्मीरी बच्चों के हाथों में पत्थर और हथियार पकड़वा दिए, उनकी मुस्कान छीन ली, विकास के रास्ते अवरूद्ध कर दिये। गरीबों के घर रोशन करने के नाम पर बनाए गए कानून की आड़ लेकर करोड़ों की सरकारी जमीन हड़प ली। शांति की वादी एवं उपजाऊ भूमि को बंजर एवं अशांत कर दिया। जबसे जम्मू-कश्मीर को केन्द्र शासित प्रदेश बनाया गया, इनकी दुकानें बंद होने से ये अराजकता एवं अलोकतांत्रिक घटनाओं पर उतर आये हैं, अभी तो एक रोशनी घोटाला उजागर होने पर इनकी यह बौखलाहट है, आगे अभी बहुत से कारनामें खुलेंगे।
जम्मू-कश्मीर देश का शायद एक मात्र ऐसा राज्य होगा जहां सरकारी जमीन पर धड़ल्ले से राजनीतिक संरक्षण में बड़े पैमाने पर कब्जे हुए है। सरकारों ने अवैध कब्जे हटाने की बजाय लोगों को इन जमीनों का मालिकाना हक देने के लिए जम्मू और कश्मीर राज्य भूमि एक्ट 2001 बनाया। इसके तहत सरकारी जमीनों पर गैर कानूनी कब्जों को कानूनी तौर पर मालिकाना हक देने का षडयंत्र हुआ। यह स्कीम 2001 में तत्कालीन मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला की सरकार ने लाते समय कहा कि जमीनों के कब्जों को कानूनी किए जाने से जो फंड जुटेगा, उससे राज्य में पावर प्रोजैक्टों का काम किया जाएगा, इसलिए इस कानून का नाम रोशनी रखा गया जो मार्च 2002 से लागू हुआ। एक एकड़ में 8 कनाल होते हैं और इस लिहाज से ढाई लाख एकड़ से ज्यादा अवैध कब्जे वाली जमीन हस्तांतरित करने की योजना बनाई गई। भ्रष्टता की चरम पराकाष्ठा एवं अंधेरगर्दी यह थी कि इस सरकारी भूमि को बाजार मूल्य के सिर्फ 20 प्रतिशत मूल्य पर सरकार ने कब्जेदारों को सौंपी।
अब्दुल्ला सरकार ने ही इस बड़े भूमि घोटाले की मलाई नहीं खाई बल्कि 2005 में सत्ता में आई मुफ्ती सरकार और उसके बाद गुलाम नबी आजाद सरकार ने खूब जमकर अपनी जेबें भरी। इन लोगों ने रोशनी एक्ट का फायदा उठाते हुए अपने खुद के नाम या रिश्तेदारों के नाम जमीन कब्जा ली। इस घोटाले की गहराई का अंदाजा इस बात से लगता है कि श्रीनगर शहर के बीचोंबीच खिदमत ट्रस्ट के नाम से कांग्रेस के पास कीमती जमीन का मालिकाना हक पहुंचा तो नेशनल कांफ्रैंस का भव्य मुख्यालय तक ऐसी ही जमीन पर बना हुआ है, जो इस भूमि घोटाले से तकरीबन मुफ्त के दाम हथियाई गई। जब सत्यपाल मलिक जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल बनाए गए तो उनकी अगुवाई वाली राज्य प्रशासनिक परिषद ने रोशनी एक्ट को रद्द कर दिया। कहा तो यह भी जा रहा है कि इस एक्ट की आड़ में जम्मू-कश्मीर से पलायन कर गए कश्मीरी पंडितों के खाली पड़े मकानों और दुकानों को भी हड़पा गया। इस घोटाले में जम्मू-कश्मीर के सभी राजनीतिक दलों के लोग शामिल रहे है, अब इनसे मुक्ति ही काश्मीर की वास्तविक फिजाएं लौटा दिला पायेंगी।

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