संकट के दौर में संकटमोचक का जाना!

किसी भी राजनीतिक दल की सबसे बड़ी ताकत उसके संकटमोचक होते हैं। अहमद पटेल कांग्रेस की ताकत थे। लेकिन कांग्रेस को लिए सबसे बड़ा संकट यही है कि संकट के इस सबसे कठिन दौर में ही उसका संकटमोचक संसार से चला गया।

-निरंजन परिहार

अहमद पटेल चले गए। जाना एक दिन सबको है। आपको, हमको, सबको। लेकिन अहमद भाई को अभी नहीं जाना चाहिए था। इसे नियती की निर्दयता कहें या देश की सबसे पुरानी पार्टी का दुर्भाग्य, कि कांग्रेस जब अपने सबसे बड़े संकटकाल से जूझ रही है, तभी उसका संकटमोचक संसार सागर को सलाम करते हुए स्वर्ग सिधार गया। बात एक बड़े नेता के दुनिया को अलविदा कहने की नहीं है, और इस बात यह भी नहीं है कि कांग्रेस में अब उनकी जगह कौन भरेगा। असल बात यह है कि जब कांग्रेस को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी, तभी वे क्यूं चले गए। कोई नहीं जाता इस तरह। अहमद भाई फिर भी चले गए। गुजरात के भरूच जिले अंकलेश्वर कस्बे में 21 अगस्त 1949 को वे दुनिया में आए थे और गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में 24 नवंबर 2020 का रात, यानी 25 नवंबर को तड़के साढ़े 3 बजे वे हमारे बीच से उठकर चल दिए। अहमद पटेल 8 बार सांसद रहे, 3 बार लोकसभा में और पांच बार राज्यसभा के। सन 1980 के इंदिरा गांधी ने अहमद भाई को अपनी सरकार में मंत्री बनाना चाहा, फिर 1984 में राजीव गांधी ने भी अपनी कैबिनेट में आने को कहा, पर दोनों ही बार अहमद भाई ने संगठन में काम करने को प्राथमिकता दी। यहीं से गांधी परिवार के प्रति उनके समर्पण का रास्ता बना। फिर तो वे संसदीय सचिव रहे और पार्टी में महामंत्री से लेकर कोषाध्यक्ष भी बने और सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार तो वे शुरू से ही रहे। लेकिन असल में वे संकटमोचक ही रहे। दरअसल, सत्ता में न रहकर भी सत्ता में बने रहना अहमद भाई को आता था, इसीलिए वे अंतक तक कांग्रेस में गांधियों के बाद सबसे बड़े नेता बने रहे।

दिखने में अहमद भाई छोटी कद काठी के थे, लेकिन असल में वे आदमकद आदमी थे। कांग्रेस के ही नहीं देश के बड़े बड़े नेताओं से भी बड़े आदमी, बहुत बड़े। इसीलिए असाधारण प्रतिभा के धनी अहमद भाई के बारे में उनके जाने पर देश ने माना कि साधारण दिखनेवाला असाधारण आदमी चला गया। वे साधारण से कार्यकर्ता को भी अदब से मिलते और सुनते। सन 1986 में अपन कोई अठारह साल के थे, लेकिन तब के केंद्रीय मंत्री अशोक गहलोत की सिफारिश पर अपन कई यात्राओं में अहमद भाई के साथ रहे, और तब से लेकर वे हमेशा हर मौके पर अपने को याद करते थे। बहुत कम लोग जानते हैं कि वे टीवी लगभग नहीं जितना ही देखते थे, लेकिन अखबार जरूर पढ़ते थे। वे मानते थे कि अखबारों में विश्लेषण अच्छे होते हैं। नई दिल्ली में लंबे समय तक कांग्रेस को बहुत नजदीक से देखते रहे राजनीतिक विश्लेषक संदीप सोनवलकर बताते है कि मीडिया के अजीब और जाल फैंककर फांसनेवाले सवाल सुनकर अहमद भाई जवाब देने के बजाय केवल मुस्कान बिखेर देते थे। उनकी इसी मुस्कान पर फिदा लोगों की कमी नहीं है।

नेता के रूप में वे बहुत ताकतवर थे, लेकिन दिखावा उनकी जिंदगी में बिल्कुल नहीं था। कांग्रेस में जहां भी रहे, तो उन्होंने अपने होने को साबित किया। वैसे, अपने लिखे इस तथ्य पर कांग्रेस के कई नेताओं को रंज हो सकता है, लेकिन सच्चाई यही है कि सोनिया गांधी के आज ताकतवर होने के पीछे अकेले अहमद भाई का सबसे बड़ा हाथ रहा है। वरना, उस दौर में सोनिया गांधी की हिम्मत तोड़नेवालों की भी कोई कमी नहीं थी। यह कहना मुश्किल है कि अहमद भाई नहीं होते, तो सोनिया भारतीय राजनीति में आज कहां होती और यह कहना तो और भी मुश्किल है कि कांग्रेस किस हाल में होती। वैसे, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं है कि अपने प्रधानमंत्री पति राजीव गांधी की हत्या के बाद सोनिया गांधी अगर भारत की सबसे पुरानी राजनीतिक पार्टी को कायदे से संभाल पाईं, तो उसके पीछे अहमद भाई ही थे। अहमद भाई की आखरी सांस तक सोनिया गांधी पूरी कांग्रेस में राहुल गांधी या दूसरे किसी भी नेता से कई गुना ज्यादा पटेल पर ही पर निर्भर रहीं। लंबे समय से वे सोनिया गांधी के राजनीतिक सलाहकार तो थे ही और सबसे बड़े सहयोगी भी, संकटमोचक और सारी भवबाधाओं को पार कराकर कांग्रेस की नाव को संकट से निकालनेवाले केवट भी वही थे। कांग्रेस में अपनी यह जगह उन्हीं ने बनाई, क्योंकि उनसे पहले वह जगह थी ही नहीं। सो, अब कोई और उस जगह पर आएगा भी, तो उसके लिए विश्वास के विकट संकट से पार पाना मुश्किल होगा और संकट क्षमता का भी रहेगा। क्योंकि हमारे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी 18 घंटे ही काम करते हैं, मगर अहमद भाई तो सुबह सात बजे से अगली सुबह चार बजे तक लगातार जूझते रहते थे। कांग्रेस में इतने समर्पण, इतनी निष्ठा और इतने मेहनती नेता दरअसल अहमद पटेल ही हो हो सकते थे।

अहमद भाई अब हमारे दिलों में और हमारी यादों में रहेंगे। क्या करें, विधि के विधान भी कुछ अलग ही होते हैं। विधि जब हमारी जिंदगी की किताब लिखती है, तो मौत का पन्ना भी साथ लिखती है। नियती ने कांग्रेस और अहमद भाई की जिंदगी की किताबों में दोनों के लिए कुछ पन्ने एक जैसे लिखे थे। लेकिन कांग्रेस की जिंदगी की किताब ज्यादा पन्नों वाली है तो अहमद भाई की किताब विधि ने थोड़े कम पन्नों की लिखी थी। मगर अहमद भाई ने इस सच्चाई को जान लिया था। मगर, जिंदगी के पन्नों की संख्या बढ़ाना तो संभव नहीं था, सो अहमद भाई ने उन पन्नों का आकार बड़ा कर लिया, इतना बड़ा कि हमारे देश चलानेवाले लोगों जिंदगी के पन्नों से कई गुना ज्यादा बड़ा। इसीलिए वे अंतिम सांस तक बड़े नेता बने रहे, बहुत बड़े। इतने बड़े कि उनके रहते तो कांग्रेस में कोई और उनसे बड़ा नहीं बन पाया। अब तक समूची कांग्रेस और गांधी परिवार के लोग अहमद पटेल नामक जिस विश्वास साथ जी रहे थे, अब वह दुनिया में नहीं है। इसलिए कांग्रेस, कांग्रेसियों और गांधी परिवार को अहमद भाई के बिना संकट सुलझाने की आदत डालनी होगी। क्योंकि संकट के दौर में ही संकटमोचक का चले जाना कांग्रेस के लिए सचमुच बहुत बड़ा संकट है।

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