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    जानलेवा प्रदूषण की चादर में लिपटी दिल्ली

    -ललित गर्ग-

    कहते हैं जान है तो जहान है, लेकिन दिल्ली में बढ़ते प्रदूषण के कारण जान और जहान दोनों ही खतरे में हैं। दिल्ली एवं एनसीआर की हवा में घुलते प्रदूषण का ‘जहर’ लगातार खतरनाक स्थिति में बना होना चिन्ता का बड़ा कारण हैं। प्रदूषण की अनेक बंदिशों एवं हिदायतों के बावजूद प्रदूषण नियंत्रण की बात खोखली साबित हुई। जबकि स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि दिवाली की रात दिल्ली सहित आसपास के शहरों में दमघोंटू प्रदूषण हो चुका था। पैमाने के हिसाब से देखें तो वायु गुणवत्ता सूचकांक बेहद खतरनाक स्तर को भी पार कर गया और नोएडा में तो एक हजार के आसपास तक दर्ज किया गया।
    यह कैसा समाज है जहां व्यक्ति के लिए पर्यावरण, अपना स्वास्थ्य या दूसरों की सुविधा-असुविधा का कोई अर्थ नहीं है। जीवन-शैली ऐसी बन गयी है कि आदमी जीने के लिये सब कुछ करने लगा पर खुद जीने का अर्थ ही भूल गया, यही कारण है दिल्ली एवं एनसीआर की जिन्दगी विषमताओं और विसंगतियों से घिरी होकर कहीं से रोशनी की उम्मीद दिखाई नहीं देती। क्यों आदमी मृत्यु से नहीं डर रहा है? क्यों भयभीत नहीं है? दिल्ली की जनता दुख, दर्द और संवेदनहीनता के जटिल दौर से रूबरू है, प्रदूषण जैसी समस्याएं नये-नये मुखौटे ओढ़कर डराती है, भयभीत करती है। विडम्बना तो यह है कि दिल्ली सहित विभिन्न राज्यों की सरकारें इस विकट होती समस्या का हल निकालने की बजाय राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप करती है, जानबूझकर प्रदूषण फैलाती है ताकि एक-दूसरे की छीछालेदर कर सके।
    दिल्ली सहित उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में प्रदूषण बेहद खतरनाक स्थिति में पहुंच गया है। हालत ये है कि अब सांस लेना मुश्किल हो गया है और लोगों को घरों में ही रहने को कहा जा रहा है। वैसे दिल्ली, नोएडा, गाजियाबाद, फरीदाबाद, गुरुग्राम में प्रदूषण की स्थिति पिछले कई सालों से खराब है और हर साल अक्तूबर से ही यह समस्या शुरू हो जाती है। इसका बड़ा कारण पड़ोसी राज्यों से आने वाला पराली का धुआं है। पराली को भूलकर पटाखों का धुआं सबको दिखाई दे रहा है, सच है कि पटाखों से प्रदूषण बढ़ा है, लेकिन ज्यादा प्रदूषण बढ़ने का कारण लगातार जल रही पराली है। यह कैसी शासन-व्यवस्था है? यह कैसा अदालतों की अवमानना का मामला है? यह सभ्यता की निचली सीढ़ी है, जहां तनाव-ठहराव की स्थितियों के बीच हर व्यक्ति, शासन-प्रशासन प्रदूषण नियंत्रण के अपने दायित्वों से दूर होता जा रहा है। कहने को राष्ट्रीय हरित पंचाट (एनजीटी) से लेकर दिल्ली सरकार तक ने पटाखों पर पांबदी लगा रखी थी, पर यह कवायद पूरी तरह से नाकाम साबित हुई। कानून को एक तरफ रखते हुए लोगों ने जमकर पटाखे फोड़े।
    दिल्ली में प्रदूषण जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गयी है। हर कुछ समय बाद अलग-अलग वजहों से हवा की गुणवत्ता का स्तर ‘बेहद खराब’ की श्रेणी में दर्ज किया जाता है और सरकार की ओर से इस स्थिति में सुधार के लिए कई तरह के उपाय करने की घोषणा की जाती है। हो सकता है कि ऐसा होता भी हो, लेकिन सच यह है कि फिर कुछ समय बाद प्रदूषण का स्तर गहराने के साथ यह सवाल खड़ा होता है कि आखिर इसकी असली जड़ क्या है और क्या सरकार की कोशिशें सही दिशा में हो पा रही है। इस विकट समस्या से मुक्ति के लिये ठोस कदम उठाने हांगे। सिर्फ दिल्ली ही नहीं, देश के कई शहर वायु प्रदूषण की गंभीर मार झेल रहे हैं। इसका पता तब ज्यादा चलता है जब वैश्विक पर्यावरण संस्थान अपने वायु प्रदूषण सूचकांक में शहरों की स्थिति को बताते हैं। पिछले कई सालों से दुनिया के पहले बीस प्रदूषित शहरों में भारत के कई शहर दर्ज होते रहे हैं। जाहिर है, हम वायु प्रदूषण के दिनोंदिन गहराते संकट से निपट पाने में तो कामयाब हो नहीं पा रहे, बल्कि जानते-बूझते ऐसे काम करने में जरा नहीं हिचकिचा रहे जो हवा को जहरीला बना रहे हैं।
    बात सरकार की अक्षमता की नहीं है। उन कारणों की शिनाख्त करने की है, जिनके चलते एक आम नागरिक पर्यावरण या उसके अपने स्वास्थ्य जैसे मुद्दों पर मंडरा रहे खतरों के बावजूद लगातार उदासीन एवं लापरवाह क्यों होता जा रहा है। इस हकीकत से तो कोई अनजान नहीं है कि लगातार बढ़ता वायु प्रदूषण लोगों को बीमार बना रहा है। बुजुर्ग ही नहीं, बच्चों तक को सांस लेने में दिक्कत होने लगी है। ज्यादातर गंभीर बीमारियों का बड़ा कारण जहरीली हवा है। प्रदूषित हवा से कैंसर के मामलों में बढ़ोतरी की बात हम पिछले कई सालों से सुन ही रहे हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि अभी कोरोना संकट से मुक्ति नहीं मिली है। कोरोना महामारी को पनपने का बड़ा कारण प्रदूषण ही है। डॉक्टर बार-बार चेतावनी दे रहे हैं कि वायु प्रदूषण ज्यादा होने से कोरोना संक्रमण फैलने का खतरा बढ़ जाता है क्योंकि प्रदूषित हवा में कोरोना विषाणु को बने रहने का मौका मिल जाता है और इससे संक्रमण कहीं ज्यादा तेजी फैल सकता है। हैरानी की बात तो यह है कि यह सब जानते-बूझते भी हम ऐसी पहल करने से कतराते हैं जो हवा को खराब होने से बचा सकती है। मसला केवल पटाखों तक सीमित नहीं है। चाहे पुराने वाहनों का हो, या पराली जलाने का हो, ये ऐसे मुद्दे हैं जिन पर कोई एक राय नहीं बन पाना या इनके समाधान की दिशा में नहीं बढ़ पाना चिंता पैदा करता है। प्रदूषण से बचाव के लिए सिर्फ सरकारी प्रयासों से काम नहीं चलने वाला, इसके लिए जन-जन की जागरूकता कहीं ज्यादा जरूरी है।
    दिल्ली के सामाजिक संरचना में बहुत कुछ बदला है, मूल्य, विचार, जीवन-शैली, वास्तुशिल्प, पर्यावरण सब में परिवर्तन है। आदमी ने जमीं को इतनी ऊंची दीवारों से घेर कर तंगदील बना दिया कि धूप और प्रकाश तो क्या, जीवन-हवा को भी भीतर आने के लिये रास्ते ढूंढ़ने पड़ते हैं। सुविधावाद हावी है तो कृत्रिम साधन नियति बन गये हैं। चारों तरफ भय एवं डर का माहौल है। यह भय केवल प्रदूषण से ही नहीं, भ्रष्टाचारियों से, अपराध को मंडित करने वालों से, सत्ता का दुरुपयोग करने वालों से एवं अपने दायित्व एवं जिम्मेदारी से मुंह फैरने वाले अधिकारियों से भी है। हमें यह स्वीकार करना होगा कि हम अब भी ऐसे मुकाम पर हैं, जहां सड़क पर बाएं चलने या सार्वजनिक जगहों पर न थूकने जैसे कर्तव्यों की याद दिलाने के लिए भी पुलिस की जरूरत पड़ती है। जो पुलिस अपने चरित्र पर अनेक दाग ओढ़े हैं, भला कैसे अपने दायित्वों का ईमानदारी एवं जिम्मेदारी से निर्वाह करेंगी?

    मुश्किल यह है कि वायुमंडल के घनीभूत होने की वजह से जमीन से उठने वाली धूल, पराली की धुंध और वाहनों से निकलने वाले धुएं के छंटने की गुंजाइश नहीं बन पाती है। नतीजन, वायु में सूक्ष्म जहरीले तत्व घुलने लगते हैं और प्रदूषण के गहराने की दृष्टि से इसे खतरनाक माना जाता है। हमारा राष्ट्र एवं दिल्ली-सरकार नैतिक, आर्थिक, राजनैतिक और सामाजिक एवं व्यक्तिगत सभी क्षेत्रों में मनोबल के दिवालिएपन के कगार पर खड़ी है। और हमारा नेतृत्व गौरवशाली परम्परा, विकास और हर प्रदूषण खतरों से मुकाबला करने के लिए तैयार है, का नारा देकर अपनी नेकनीयत का बखान करते रहते हैं। पर उनकी नेकनीयती की वास्तविकता किसी से भी छिपी नहीं है, देश की राजधानी और उसके आसपास जिस तरह प्रदूषण नियंत्रण की छीछालेदर होती रहती है, उससे यह सहज ही जाहिर हो गया है। कुछ समय से दिल्ली में सरकार की ओर से प्रदूषण की समस्या पर काबू करने के मकसद से चौराहों पर लगी लालबत्ती पर वाहनों को बंद करने का अभियान चलाया गया था। सवाल है कि ऐसे प्रतीकात्मक उपायों से प्रदूषण की समस्या का कोई दीर्घकालिक और ठोस हल निकाला जा सकेगा?

    ललित गर्ग
    ललित गर्ग
    स्वतंत्र वेब लेखक

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