झुलसे हुए तंत्र की एक बानगी है दिल्ली का अग्निकाण्ड!

लिमटी खरे

देश में आपदा प्रबंधन का राग जब चाहे तब अलापा जाता रहा है। आपदा प्रबंधन के नाम पर राष्ट्रीय और प्रदेश स्तर पर साल में एक बार करतब दिखाए जाते हैं तो जिला स्तर पर इसके नाम पर किसी तालाब या नदी में नगर सैनिकों को लाईफ जैकिट पहनाकर तैरते हुए फोटो खिचावाकर रस्म अदायगी कर ली जाती है। याद नहीं पड़ता कभी आपदा प्रबंधन के नाम पर माक ड्रिल का आयोजन किया गया हो! जब भी कोई बड़ा हादसा होता है और यह राष्ट्रीय फलक पर उछलता है उसके बाद इस तरह के हादसे न हों इसके लिए संकल्पों को एक बार दोहराया जाता है। कुछ दोषियों को कटघरे में खड़ा किया जाता है। इसके बाद जैसे ही सब कुछ सामान्य होता है उसके बाद हुक्मरान सब कुछ बिसार देते हैं। दिल्ली की अनाज मण्डी में रविवार को लगी आग के बाद भी ऐसा ही कुछ होता दिख रहा है। इस बारे में चुने हुए प्रतिनिधियों के द्वारा भी उन्हे ंमिले जानादेश का सम्मान तक नही किया जाना आश्चर्य जनक ही माना जाएगा। किसी भी सांसद या विधायक ने इस तरह की घटनाएं दुबारा न घटें इसके लिए समय समय पर माक ड्रिल की मांग न किया जाना निराशाजनक ही माना जाएगा।

रविवार को अलह सुब्बह अनाज मण्डी क्षेत्र में एक कारखाने में लगी आग में 43 लोग काल कलवित हो गए। इस अग्निकाण्ड ने एक बार फिर सड़ांध मारती व्यवस्था की कलई खोल दी है। दिल्ली में उपहार सिनेमा में लगी आग के बाद लोगों को लगा था कि इससे सबक लेकर देश भर में व्यवस्थाएं माकूल स्तर की होने के मार्ग प्रशस्त होंगे किन्तु एक के बाद एक अग्निकाण्ड से यही साबित होता दिख रहा है कि हुक्मरानों के लिए देश की रियाया की जान बहुत ज्यादा कीमती नहीं है। देश भर में घटने वाली घटनाओं से सबक लेने के जरूरत है। जरूरत इस बात की है कि इस तरह की घटनाओं पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस आरंभ कराई जाए। संसद और विधान सभाओं में इस तरह के हादसों के कारणों और उन्हें रोकने की दिशा में कारगर कदम उठाए जाने की बात जनादेश प्राप्त नुमाईंदों को करना ही होगा।

देश भर में रिहाईशों क्षेत्रों में उद्योग संचालित करने की अनुमति आखिर किस आधार पर दी जाती है। औद्योगिक क्षेत्रों में बसाहट का लाईसेंस कौन देता है! उद्योगों की संस्थापना पर सुरक्षा इंतजामों की फेहरिस्त बहुत ही लंबी है। जब शादी लॉन्स के लिए सुरक्षा इंतजामात बहुत ही कड़े नियमों के गलियारे से गुजरते हैं तो उद्योग के लिए तो निश्चित तौर पर सुरक्षा इंतजामात इससे ज्यादा कड़े ही होंगे। विडम्बना ही कही जाएगी कि इसके लिए जिम्मेदार विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों के द्वारा निहित स्वार्थ के चलते सुरक्षा इंतजामात को बलाए ताक पर रख दिया जाता है। अब दोषी कारखाना संचालक पर गाज गिरना तय है पर सबसे पहले कटघरे में सुरक्षा इंतजामात को बरकरार रखने वाले विभाग के अफसरों को खड़ा किया जाना चाहिए। आखिर हर माह उन्हें किस बात के लिए भारी भरकम वेतन दिया जा रहा है!

दिल्ली की अनाज मण्डी में चल रहे कारखानों को खाली कराने के लिए नोटिस जारी किए जाने की बात भी सामने आ रही है। आखिर क्या वजह है कि हादसे के महज एक सप्ताह पहले ही अफसरों की तंद्रा टूटी और उन्होंने नोटिस जारी किए। यह बात भी सामने आ रही है कि इस कारखाने को चलाने वाले संचालक के पास न तो अग्निशमन विभाग के द्वारा दिया जाने वाला अनापत्ति प्रमाण पत्र था न ही संचालक के द्वारा कारखाने में फायर सेफ्टी के माकूल इंतजामात की किए गए थे। नियमों को किस तरह धता बताई जा रही थी, इसका उदहारण भी यहां देखने को मिलता है। नियम कहते हैं कि घरेलू (कुटीर आदि) उद्योगों में कर्मचारियों की तादाद नौ से ज्यादा नहीं होना चाहिए एवं यहां दिया जाने वाला बिजली का कनेक्शन भी 11 किलोवाट से अधिक का नहीं हो सकता है। इन दोनों मापदण्डों का यहां सालों से सरेआम उल्लंघन किया जा रहा था, पर संबंधित जिम्मेदार विभागों के हाकिम कुम्भकर्णीय निंद्रा में ही थे।

राजधानी दिल्ली सहित देश भर में घरेलू इलाकों में छोटी और बड़ी इमारतों में कथित गुपचुप तरीके से कारखाने संचालित हो रहे हैं। क्या नगर निगम या नगर पालिकाओं के द्वारा इस तरह की इमारतों से घरेलू के स्थान पर व्यवसायिक कर की वसूली की जाती है! अगर नहीं तो क्यों! जब भी इस तरह के हादसे सामने आते हैं तब ही पड़ताल आरंभ होती है और इस तरह की विसंगतियां प्रकाश में आती हैं। इसके उपरांत कड़ाई से कार्यवाही की बातें कहीं जाती हैं। कुछ दिनों में जब इस तरह की घटनाओं की खबरें दम तोड़ने लगती हैं तो एक बार फिर पुराने ढर्रे पर ही सब कुछ लौट जाता है। महानगरो की छोड़िए छोटे शहरों में हाल बहुत ही बुरे हैं।

जब भी कोई नई कॉलोनी बसती है तो नगर निगम या नगर पालिका के द्वारा उसका नक्शा पास किया जाता है। इन कॉलोनियों में सड़कें और नालियां बनाते समय स्थानीय निकाय यह देखने की जहमत क्यों नहीं उठाता है कि नक्शे में सड़क कितनी चौड़ी है और यर्थात में उसकी चौड़ाई कितनी रह गई है। अनेक स्थानों पर तो नई बसाहट में सड़कों की चौड़ाई इतनी कम है कि यहां दमकल या एंबूलेंस को प्रवेश करने में मशक्कत ही करनी पड़े। जाहिर है सब कुछ मनमाने तरीके से हो रहा है। अगर मनमानी को अघोषित छूट दी ही जाना है तो फिर नक्शा पास कराते वक्त नियम कायदों की रस्म अदायगी क्यों!

देश में एक देश एक कर की अवधारणा के नाम पर जीएसटी लागू किया गया है। केंद्र सरकार इस जीएसटी व्यवस्था को फूल प्रूफ करार दे रही है। इस तरह के गैर व्यवसायिक क्षेत्रों में व्यवसायिक गतिविधियों के संचालन के बाद क्या वाणिज्यिक कर विभाग इस बात का आंकलन करने की जहमत उठाएगा कि जिस कारखाने में आग लगी है उसमें कितने कर्मचारी काम करते थे और इन कर्मचारियों का मासिक वेतन कितना था! इस वेतन और अन्य खर्चों को कारखाने के संचालक के द्वारा कहां से निकाला जाता था! क्या कारखाना संचालक के द्वारा जितना खर्च हो रहा था उतना उत्पादन कर वास्तव में कमाया जा रहा था! अगर यह सब कुछ सही है तो क्या उसके द्वारा सही सही जीएसटी को भरा जा रहा था! अगर नहीं तो सड़ांध मारते सिस्टम को एक बार फिर नए सिरे से बनाए जाने की आवश्यकता है। देश की सरकारें अगर इस तरह के तमाम पहलुओं पर विचार कर नए सिरे से कानून बनाए जाने और कानून का पालन सुनिश्चित करवाने के लिए अफसरों की जवाबदेही तय कर दे तो बात बने, नहीं तो देश भर में दिल्ली की तरह के हादसे अगर दोहराए जाते रहें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिए!

1 thought on “झुलसे हुए तंत्र की एक बानगी है दिल्ली का अग्निकाण्ड!

  1. राजनीतिक आरोप प्रत्यारोप में इन कांडों की लपटें ठंडी हो जायेगी और कुछ समय बाद फिर नया कांड हो जाएगा अभी चुनाव का समय है अतः ये सब और भी होंगे , दिल्ली सरकार निगम को दोषी ठहराएगी व निगम राज्य सरकार को , अफसर तो वसूली कर , नजरें फेर लेंगे व अपने ऊपर तक के सब अधिकारीयों व नेताओं को खुश रख अनदेखी कर देंगे , नुक्सान आम जनता का होना है जो होता रहेगा
    ज्यादा ही कुछ हुआ तो निगम व सचिवालय के ऑफिस में ही आग लग जायेगी तथा सभी फाइलें जल कर राख को सदा के लिए ठंडा कर देगी
    हमारे प्रशसनिक तंत्र की यह पुरानी कहानी है

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