ग्रुप डी

कुमार विमल

दामोदर बाबू एक किसान थे. घर में उनके अतरिक्त पत्नी और दो बच्चे थे. बड़ा लड़का ओर छोटी लड़की. किसान का परिवार था, सारा परिवार मिलकर खेती करता था, घर में अन्न की कमी न थी. खेती से पर्याप्त उत्पादन कर लेते थे,जिससे परिवार का गुजारा अच्छे से चल जाता था. एक दिन की बात है दामोदर बाबू सपरिवार खेत में काम कर रहें थे. बरसात का दिन था. हल्की बूंदा-बांदी हो रही थी. दामोदर बाबू और उनकी पत्नी रोपनी कर रहें थे. पत्नी रोपनी करते हुए सुरली आवाज में गा रही थी. 

   काली बदरा छम-छम बरसे..

   पानी अग्न लगायें रे..

एक तो सुहाना मौसम ऊपर से पत्नी की सुरीली आवाज, दामोदर बाबू उत्साहित हो तेजी से रोपनी किए जा रहें थे. थोड़ी दूर पर बच्चे पानी में खेल रहें थे, कूदते-फानते और बीच-बीच में एक दो धान की नन्हें पोधों की रोपनी भी करते.

          इसी बीच गाँव के शर्मा जी छतरी लगायें पगडंडियों पर तेजी से कदम बढ़ा रहें थे. दामोदर को देखते ही खुश मिजाज आवाज में बोलें, “क्यों भाई दामोदर, कैसे हो, खेती कैसी हो रही है?” दामोदर ने विनम्र भांव से कहाँ, “इस बार तो बारिश अच्छी हुई है, मौसम अगर ऐसे ही साथ दिया तो इस बार अच्छी फसल होगी.” इतना कह दामोदर फिर खेती में लग गया. शर्मा जी खेत के और करीब आकर रुक गयें फिर कुछ सोच कर बोलें,“क्यों बच्चो को भी खेती में ही लगा दिया, पढाओ-लिखाओ इंजीनियर-डाक्टर या कोई ऑफिसर बनाओ, खुद तो किसान ही रह गए, अब बच्चो को भी क्या किसान ही बनाओगे.” “अरें नहीं शर्मा जी, दोनों बच्चे स्कूल जाते है, पढाई करते है, बड़का लड़का श्रावक तो अब की दसवी की इंतिहान देगा, बेटी सुलेखा भी आठवी में है, “दामोदर हसकर बोलें.” शर्मा जी धीरे-धीरे और करीब आ गए, फिर विचारक की  तरह कहा, “भाई दामोदर तुम्हे आज के कम्पटीशन  के बारे में नहीं मालूम, कम्पटीशन दिन पे दिन बढ़ता ही जा रहा है, ऐसे गाँव की पढाई से कुछ ना होगा, मेरी बात मान दसवी के इंतिहान के बाद बेटे को शहर के किसी कोचिंग में डाल दें, मैंने भी अपने बच्चे को आई.आई.टी की तैयारी के लिए शहर के एक नामी कोचिंग READJEE में डाला है, ऐसे किताबों को सिर्फ अगरबत्ती दिखाने से कुछ ना होगा, सब कुछ छोड़, कम्पटीशन में लगना होगा.” दामोदर उनकी बातों पर सर हिलातें रहें, कुछ नहीं बोलें.

     शर्मा जी की बातें, दामोदर के मन में घर कर गई थी. रात को सोते समय पत्नी से कहाँ, “शर्मा जी आज सहीं ही कह रहें थे, हमें अपने बच्चो  के सुखद भविष्य के बारे में सोचना चाहिए, अन्यथा हमारी तरह वे भी किसान ही रह जाएंगे, अगर ढंग से पढ़-लिख जाएंगे तो कोई बड़ा आदमी बन, गाड़ी में घुमेंगे, नहीं तो हमारी तरह खेत में खटते रह जायेंगे.  पत्नी पति के बातों में सहमती देती हुई कही, “हाँ, जी तु ठीके कहित है,एकनी के हम बड़का आदमी बनायेम.”

      कुछ महीनो के बाद दसवीं का परिणाम आया. श्रावक ने प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण किया था. बेटे के परिणाम से घर में खुशी थी, माँ ने आरती उतरा, खीर बनाया. पिता भी खुश थे, मन ही मन कुछ सोच रहें थे, शर्मा जी की बातें अब भी उनके जेहन में कौंध रही थी. पत्नी से कहा, “अब हमें अपने बेटे की आगें की पढाई के बारे में सोचना चाहिए, मैं तो सोच रहा हूँ कि इसे शहर के किसी अच्छे कोचिंग में डाल दूँ, यहाँ रहेगा तो हमारी तरह किसान ही रह जाएगा, वहां पढ़-लिख कर कुछ बन जाएगा.” “पत्नी ने सहमति देती हुई उमंग मिश्रित आवाज में कहा, “हाँ जी एकरा कोनो बड़ियाँ जगह पढ़े ला भेज द,बबुआ पढ़-लिख के कुछ बन जाई.”

                  अगली सुबह पिता और पुत्र ट्रेन पर सवार हो शहर के लिए रवाना हुए. पिता के आँखों में स्वपन था, बेटा मन ही मन पिता के स्वप्नों को भांप गया था. READJEE कोचिंग स्टेशन से ज्यादा दूर ना था, स्टेशन पर उतर दोनों पैदल ही कोचिंग की और चल दिए. पहुंचा तो देखा भव्य बिल्डिंग है, सामने बड़ी-बड़ी गाड़ियाँ लगी है, विज्ञापन से पूरा सड़क भरा है. पिता और पुत्र कुछ देर बिल्डिंग को निहारते रहें, फिर अन्दर जाने के लिए कदम बढाया ही था कि एक गार्ड  ने टोका, “कहाँ जा रहें है क्या काम है?” दामोदर- जी अपने बेटे का एडमिशन कराने के लिए आया था. गार्ड- इस रजिस्टर में नाम, पता और समय लिख दें और रिसेप्शन पर जाएँ. पिता ने रजिस्टर  पर लिख अन्दर को प्रवेश किया. सामने एक सुन्दर लड़की रिसेप्शन पर बैठी थी, देखते ही बड़े प्यार से कहा, “ How can I help you?” दामोदर- जी मुझे अपने बेटे का एडमिशन करवाना है.  सुन्दर लड़की-  ओके, बैठ जाइए, कब 10th पास किया आपका बेटा. दामोदर- जी इसी साल किया है. सुन्दर लड़की- वैरी गुड, बिल्कुल सही समय पर आ गए आप, अभी तीन  दिनों के बाद, शुक्रवार से, आई.आई.टी का एक नया बैच स्टार्ट हो रहा है. दामोदर कुछ कह पाते इससे पहले ही सुन्दर लड़की ने एक फार्म उनकी तरफ बढाया और बहुत प्यार से कहा, “पहले आप इस फॉर्म को भर दे.” दामोदर फॉर्म को हाथ में ले, एक बार फॉर्म को पढ़ा फिर हलके आवाज में बोलें, “मैडम, फीस कितनी देनी होगा.” सुन्दर लड़की-  यह लगभग दो साल का कोर्स है, इसके लिए आपको one and half lakh with GSTदेने होंगें. दामोदर- मैडम, फीस तो बहुत ज्यादा है. सुन्दर लड़की-इसमें आपको स्टडी मटेरियल भी मिलेंगें, टेस्ट सीरीज में भी आपका बच्चा बैठेगा, अगर एक बार देने में दिक्कत हो तो आप फीस इन्सटॉलमेंट में भी दे सकते है. फिर एक कागज पर लिखते हुए सुन्दर लड़की ने कहा, “अगर आप दो इन्स्टालमेन्ट में करते हैं तो आपको per installment 80 thousand देने होंगें ओर अगर आप चार इन्सटॉलमेंट में करते हैं तो केवल 40 thousand per installment देने होंगें.” दामोदर- मैडम फिर भी बहुत ज्यादा है. सुन्दर लड़की- आप रिजल्ट भी तो देखिए, last time 80 out of 100 toppers, हमारे कोचिंग के ही थे, पिछले पाँच सालो से आई.आई.टी टापर्स हमारे ही इंस्टिट्यूट से हो रहें है,आप बच्चे के future के लिए खर्च कर रहें है, यह खर्च नहीं आपका investment है, आखिर सब बच्चो के लिये ही तो कमाते है. दामोदर- ठीक है मैडम, हम पैसो का इंतजाम कर फिर आयेंगे. सुंदर लड़की- ओके पर देर ना करियेगा, the batch is going to start on Friday. दामोदर सर हिलाते हुए कहें, “ठीक है मैडम.” सुन्दर लड़की थोड़ी देर चुप रही फिर जब दामोदर उठने ही वालें थे तो कहीं, “क्या आपने अपने बच्चे का एडमिशन 11th मै करवा दिया है?” दामोदर- नहीं मैडम अभी तो नहीं करवाया है. सुन्दर लड़की ने मुस्कुराकर कहा, “कोई बात नहीं, यहाँ उसका भी प्रबंध है और बच्चे को कहीं जाना भी नहीं होगा, बस एग्जाम के समय जाकर एग्जाम दे देना होगा, सब मैनेज होगा, इससे बच्चे के आई.आई.टी के preparation में disturbance  भी नहीं होगा, बस आपको इसके लिए केवल 35 thousand और pay करना होगा, बाकी आपकी मर्जी है.” दामोदर सर हिलाते हुए बाहर आयें, मन ही मन कुल खर्च को जोड़ रहें थे. बेटा श्रावक पीछे-पीछे चल रहा था. मन ही मन पिता की मन:स्थिति को भांप गया था. दामोदर अभी बाहर निकलें ही होंगें कि कुछ लोगों ने उन्हें घेर लिया. उनमें से एक आदमी ने  मुस्कुराते हुए कहा,“ अच्छा-अच्छा बेटे के एडमिशन के लिए आयें हैं.” दामोदर अभी कुछ उत्तर भी ना दिए होंगे, वह आदमी कुछ और नजदीक आकर बोला, “मेरा नाम मोहन है, अगर आपको बच्चे के लिए रूम या खाने की प्रबंध करवाना हो तो मुझ से मिल सकते है, यह मेरा विसिटिंग कार्ड है, कभी भी जरूरत पड़े तो बस एक कॉल कर दीजिएगा” फिर उसने अपना विसिटिंग कार्ड दामोदर को दिया, दामोदर विसिटिंग कार्ड पॉकेट में रख आगें बढ़ गए.

      शाम को घर लोटें, पत्नी सामने बैठी है. श्रावक घर के दुसरे कमरें में चुप-चाप बैठा है, पास ही बहन पढ़ रही है. पत्नी ने चुपी तोड़ते हुए पति से कहा, “क्यों जी क्या हुआ, बचवा के कोचिंग में नाम लिखेवाने का, बात बनी की ना,” दामोदर-नाम तो लिखवा दूँ, मगर पैसा ही ज्यादा मांगते है. पत्नी-कितने मांगते है. “दू लाख के लगभग तो फीस ही है, उपर से रहने का खर्च अलग से”, दामोदर ने चिंता के स्वर में कहा. पत्नी- तो क्या सोचें हैं जी. दामोदर- कोचिंग तो अच्छा है हर साल वहां से बच्चे फर्स्ट करते है, हो  जाए तो अपने बेटे का  बड़ा इंजीनियर बनना पक्का मानों, सोचता हूँ डाल ही दूँ लड़के को वहाँ, आखिर यहाँ रहेगा तो हमारी तरह किसान ही रह जाएगा. बोलते हुए दामोदर मानो कोई मधुर सपनों में खो गया. पत्नी ने कहा, “तो फिर इतने पैसो का इंतजाम कहाँ से करिएगा?” दामोदर- अभी बैंक में अपने पास एक लाख रुपए है, उसमे से पचास हजार तो अभी दे दूंगा बाकी का बाद  में इंतजाम करूँगा. पत्नी- बाद में कहाँ से इंतजाम करिएगा. दामोदर- अरे! हो जाएगा, तुम तो हमेशा बेकार की ही बातें करती हों.

      दामोदर बेटे के साथ आज शहर में है, कोचिंग में चालीस हजार देकर उन्होंने बच्चे का एडमिशन करवा दिया है. बाकी के पैसो के लिए मोहलत माँग ली है. रूम के प्रबंध के लिए उस आदमी से बात कर रहें है. दामोदर- बच्चे के लिए कम किराये में कोई अच्छा से कमरा दिखलाना, और हाँ वहां पढाई में कोई दिक्कत नहीं होनी चाहिए. वह आदमी- चलिए ना सर, आपको पास में ही एक अच्छा कमरा दिखलाता हूँ. आदमी ने पास में ही एक कमरा दिखलाया. कमरा दामोदर को जँच गया. मकान मालिक से बात भी बन गया.कमरा श्रावक के रहने के लिए तय हो गया. पास ही खाने का भी प्रबंध हो गया. दामोदर उस आदमी को धन्यवाद कह ही रहें थे कि उसने कहा, “सर रूम दिलवाने के पांच सौ होते है, कृपा कर मेरे पैसे दे दें. दामोदर –अरे भाई वहाँ से यहाँ  लाकर रूम दिखने के पाँच सौ! वह आदमी इस बार तेवर में बोला –जी हाँ, कहाँ है आप! दोनों में थोड़ी बहस हुई, अन्तत: दामोदर उसे चार सौ देकर छुटकारा लिए.

       फिर पिता और पुत्र बाजार सामान खरीदने को चले गए. बाजार से लौटकर कमरें में सारें सामान को व्यवस्थित किए. रात का खाना पुत्र के लिए तय किए गए मेस में किए. रात दामोदर ने पुत्र के साथ उसके कमरें में ही व्यतीत किया. सुबह पूरी तरह आश्वस्त हो चलने को तैयार हुए. जाते–जातें पुत्र को समझाया, “मन लगाकर पढना, खाने-पीने पर ध्यान देना और अगर कोई तकलीफ हो तो कॉल करना.” पुत्र ने पूरे विश्वास के साथ कहा, “बिल्कुल पिताजी, मै मन लगाकर पढूंगा.” बोलते-बोलते पुत्र की आंखें भर आयी. पिता ने प्यार से पुत्र को गले लगा लिया.

          हाँ, एक पुत्र आज गाँव छोड़ रहा था,

          वह विक्षोभ,वह व्याकुल मन सब कुछ संग चल रहा था,

          भविष्य और वर्तमान में एक अजीब द्वंद्व चल रहा था,

          हाँ एक पुत्र आज गाँव छोड़ रहा था.

शाम तक दामोदर घर लौट आए. पुत्र के शहर चलें जाने पर माँ उदास थी, बहन चुप-चाप पढ़ रही थी. पिता बैठे-बैठे पुत्र के सुन्दर भविष्य का स्वपन देख रहें थे.

         इधर श्रावक मन लगाकर पढ़ रहा था, प्रति दिन प्रात: जल्दी उठ जाता, मन लगा कर पढाई करता फिर दस बजें नास्ता कर कोचिंग चला जाता. कोचिंग से आकर खा-पीकर थोडा आराम करता,फिर पढ़ने बैठ जाता.शाम को थोडा टहलने जाता, फिर आकर देर रात तक पढ़ता.

        अभी चार महीने होने को ही थे कि कोचिंग से दामोदर को कॉल आने लगा. दामोदर बार-बार कहतें कि थोड़े दिनों के बाद अगला किस्त जमाकर दूंगा. फिर भी लगभग हर दो-तीन दिनोंके बाद उन्हें कोचिंग से कॉल आता, पैसो के लिए तकाजा पे तकाजा किया जाता.चार महीने में अभी एक हफ्ते बाकी ही होंगे कि दामोदर बैंकसे बाकी के पचास हजार भी निकाल लाएं.शहर जाकर अगला किस्त जमा कर आए. पुत्र से मिलें हाल-चाल लिए और जल्दी ही लौट आए.

       गर्मी का मौसम बीत गया था हल्की सरदी ने दस्तक दे दी थी. धान के फसल पक गए थे. खेत लहलहा रहें थे. किसानो की महेनत रंग लायी थी. अच्छी फसल हुई थी. दामोदर ने साल भर खाने के लिए चावल रख बाकी बेच दिए थे. बिक्री से जो आमदनी हुई उससे जाकर अगला किस्त भर आए. जब  उससे अगले किस्त का तकाजा हुआ तो उनके पास अब और कोई साधन ना था, नतीजतन कुछ जमीन बेचना पड़ा. जमीन बेचते समय उन्हें दुःख तो काफी हुआ पर पुत्र के उज्जवल भविष्य के स्वप्न से उन्हें दिलासा मिला.

     इधर श्रावक इन सब बातों से अनजान जी तोड़ मेहनत कर रहा था.जैसे-जैसे परीक्षा नजदीक आती वैसे-वैसे उसके मेहनत में और ज्यादा इजाफा होता जाता. अब तो उसे खाने की भी सुध ना रहता.हर समय किताबों में खोया रहता.

         आज फिर परीक्षा आई है,

         अपने को जांचने का मधुर सौगात लाई है,

         युद्ध का शंखनाद होगा,

         प्रश्नों के वज्रपात होंगे,

         तनाव होगा, कुंठा होगी,

         पर हिम्मत हमारे पास होगी,

         कलम रूपी तलवार होगी,

         अपनों का आशीर्वाद होगा,

           परीक्षा हुई, कुछ दिनों के बाद परिणाम आया. पुत्र की मेहनत रंग लाई, पिता का विश्वास सफल सिद्ध हुआ, माँ का आशीर्वाद फलीभूत हो गया. श्रावक काफी अच्छे रैंक से परीक्षा पास कर गया है. पिता खुश हैं, लड्डू बाँट रहें हैं, माँ रसोई में पूरी बना रहीं है, बहन का भी खुशी का ठिकाना ना है, वह रसोई में माँ की मदत कर रही है. आस-पड़ोस के लड़के जो अच्छे रैंक ना ला सके, उन्हें उनके पिता श्रावक का उदहारण देकर कोस रहें है.

           कुछ दिनों के बाद श्रावक का एडमिशन  एक टॉप के आई.आई.टी में हो गया.पिता की छाती गर्व से चौड़ी थी. समाज में उनका कद बढ़ गया था. मित्र मंडली में बैठ वे अक्सर अपने पुत्र

का गुणगान किया करते थे. लोग ध्यान से उनकी बातें सुनते, उनके बात को महत्व देनें थे. दामोदर  को बड़ा आदमी होने का आभास होता. ऐसे में खेती में उन्हें मन ना लगता. खेती पर अब वे उतना ध्यान ना देतें नतीजन अब ज्यादातर खेत वें दूसरों को खेती के लिए बटाई पर दे देतें थे. यहाँ तक बेटें के कॉलेज की फीस, कंप्यूटर, किताबें तथा अन्य सुविधाओं के लिए उन्होंने कुछ जमीन बेच भी दिया था. पर इस बार बेचने में उन्हें पहले की तरह दुःख न था, उन्हें लगता की अब वें बड़ा आदमी बन गए है, खेती क्या करेंगें, कुछ वर्षों  के बाद शहर में बस जाएंगे, ऐसे में इन खेतों को बेच देना ही उचित है.

             देखेतें-देखतें चार वर्ष बीत गए. इन चार वर्षौं में श्रावक इंजीनियरिंग की पढाई पूरा कर लिया. कॉलेज से ही  बैंगलोर के किसी  कंपनी में सॉफ्टवेर इंजिनियर के रूप में जॉब भी मिल गया. बैंगलोर जाने से पूर्व कुछ दिनों के लिए  घर आया. आने पर माँ ने आरती उतारी, पिता मिठाई बांटें, बहन गिफ्ट मांगी. कुछ दिनों तक घर पर रहने के बाद श्रावक बैंगलोर अपने कार्यस्थल पर चला गया. वहां सॉफ्टवेयर इंजीनियर के रूप में कार्य करने लगा. अब उसका जीवन काफी व्यस्त रहता. सुबह नौ बजे ऑफिस पहुँचता, शाम छह बजे तक वहां काम करता, थक कर सात बजे तक अपने आवास में लौट आता. रविवार को अपने आवास पर ही पुर हफ्ते की रिपोर्ट बनाता. भाग-दौड़ में दिन कब बीत जाता पाता ही ना चलता. अब वह गाँव भी कम ही जाता.

        इधर गाँव में दामोदर के यहाँ उनके लड़के से शादी के लिए लड़की वालो का ताँता लगा रहता दामोदर को एक दो रिश्ता पसंद आता तो बहन  श्रावक को कॉल कर बताती और आगे के बात के लिए आने को कहती पर प्रया: श्रावक को ऑफिस के काम के कारण छुट्टी ना मिलती, वह ना आ पाता. परिणाम स्वरुप लगभग दो साल के बाद लोगों का आना कम हो गया. गावं में बातें चलती, “दामोदर का लड़का कहीं शादी कर लिया होगा या कहीं रंग-रलियाँ मना रहा होगा इसीलिए तो शादी नहीं कर रहा है.”

    इसी तरह लगभग तीन साल बीत गए. इस दौरान तीन बार ही श्रावक गाँव आया, वह भी दो-तीन दिनों के लिए ही. अब दामोदर की उम्र हो गई थी, उम्र का असर दिखने लगा था. अक्सर बीमार रहतें. अस्वस्थता के कारण बाहर कम ही जाते. इधर छोटी बेटी भी शादी योग्य हो गई थी, पुत्र के कम आने से बेटी की शादी का सारा दायित्व भी उन्ही पर था.

       एक दिन आचनक ही दामोदर का तबियत बहुत ज्यादा ख़राब हो गयी. उन्हें साँस लेने में दिक्कत हो रही थी. तेजी से हांफ रहें थे. आनन-फानन में गाँव के लोग दामोदर को लेकर गाँव के ही एक सरकारी अस्पताल में ले गए.बहन ने श्रावक को कॉल किया, उस समय वह ऑफिस में बैठा कम कर रहा था.बहन ने उसे सारा हाल बतलाया.खबर मिलते श्रावक बेतहाशा मैनेजर के चैम्बर में भागा. चैम्बर में घुसते ही मैनेजर से घबराकर बोला, “सर मेरे पिताजी की तबीयत काफी खराब है, Urgently I have to go home, sir.” मैनेजर साहब लैपटॉप पर काम करते हुए शांत स्वर में बोलें,“Oh! Very sad, I pray for his early recovery.पर अभी हमें एक इम्पोर्टेन्ट प्रोजेक्ट पूरा करना है, करोड़ो का डील है, काफी दबाव है, अभी हम आपको छुट्टी नहीं दे सकतें है.” श्रावक लगभग गिडगिडाते हुए कहा,“No sir, I have to go, my father is very serious.” मैनेजर ने समझाने के अंदाज में कहा,“देखिए मै आपकी हालत को समझ सकता हूँ, पर मुझे भी तो बॉस को जवाब देना होता है, फिर भी मै इतना ही कर सकता हूँ कि आप आज से तीसरे दिन ऑफिस ज्वाइन कर लें.That’s all I can help you.”श्रावक ओके कह बाहर आया, चलते-चलते उसने मोबाइल से ऑनलाइन एयरप्लेन का टिकेट बुक किया और ऑफिस से सीधा एअरपोर्ट चल दिया.

      श्रावक गाँव आ चूका है, पिता के इलाज में भाग-दौड़ कर रहा है. मगर दामोदरकी हालत बिगडती ही जा रहीं है. यहाँ तक कि अस्पताल के डॉक्टरो ने कह दिया कि इनका इलाज यहाँ संभव नहीं अत:  इन्हें शीघ्र शहर लें जाए. गाड़ी ठीक कर दामोदर को शहर ले जाया गया. शहर के एक नामी अस्पताल में उनका इलाज शुरू हुआ. डॉक्टरों ने बतलाया कि हार्ट में माइनर ब्लॉकेज है ऑपरेशन करना होगा. ऑपरेशन हुआ. पूरा परिवार उनकी सेवा में लगा रहा. धीरे- धीरे उनके तबीयत में सुधर होने लगा, लगभग पन्द्रह दिनों के बाद उन्हें अस्पताल से डिस्चार्ज का दिया गया, पर डॉक्टरों ने उन्हें अभीपूरा आराम करने की सलाह दी.

         दामोदर अस्पताल से डिस्चार्ज हो घर आ गए है, पूरा परिवार उनकी सेवा में लगा है. लगभग एक महीने में वे पूरी तरह स्वस्थ हो गए, पिता के स्वस्थ हो जाने पर श्रावक बैंगलोर जाने को तैयार हो रहा था कि पिता ने कहा, “बेटा उम्र होने  के कारण में पहले ही ज्यादा भाग-दौड़ नहीं कर पाता था, अब इस बीमारी ने तो मुझे और कमजोर कर दिया है ऐसे में बहन की शादी की जिम्मेदारी तुम्हारी ही है, पिछले महीने तुम्हारे मामा ने शहर के एक लड़के के बारे में बतलाया था, लड़का बिजली विभाग में जूनियर इंजीनियर है, मैं चाहुँगा कि तुम अगले महीने आकर बात आगे बढाओ.” श्रावक सर हिलाते हुए हाँ पिताजी कहा,फिर माता –पिता का आशीर्वाद ले चल दिए.

     श्रावक आज ऑफिस आ गए है. मैनेजर क चैम्बर में खड़े है, मैनेजर और उनके बीच वार्तालाप चल रहा है. मैनेजर उनसे काफी नाखुश है. मैनेजर- आप इतने दिनों के बाद आ रहें है, आपकी वजह से प्रोजेक्ट डिले हो गया, बॉस ने मुझे काफी सुनाया, आपको ऑफिस की कोई परवाह ही नहीं. श्रावक- सर मैंने आपको मेल लिख कर इन्फॉर्म किया था कि आने में देर हो जाएगा क्योकि पिताजी का इलाज चल रहा है.” मैनेजर- मैने आपके मेल का ठेका नहीं ले रखा है, बॉस ने आपकी जगह एक नए लड़के को रख लिया है, आप अकाउंट सेक्शन में जाकर अपना हिसाब कर लें.” श्रावक असमंजस में वही खड़े रहें. मैनेजर ने  गुस्से में चिल्ला कर कहा,“Leave my office.”

    श्रावक की नौकरी छुट गया है. घर पर उसने इसके बारें में किसी को ना बतलाया, हाँ दोस्तों से राय-सलाह जरुर किया. दोस्तों ने तरह-तरह की सलाह दिया किसी ने कहा, “दिल्ली जाकर आई.ए.एस. की तैयारी कर लें,” तो किसी ने कहा, “ऍम.बी.ए कर लें.” श्रावक किंकर्तव्यविमूढ़ था, पिता की बातें उसके कानो में गूंज रही थी,“बेटा, मैं कमजोर हो गया हूँ, बहन की शादी की जिम्मेदारी अब तुम्हारी ही है.” बार-बार पिता का वृद्ध चेहरा उसे सामने आ जाता. इसी दुविधा में पड़ा,श्रावक लैपटॉप पर ऑनलाइन जॉब सर्च कर रहा था, कोई जॉब हैदराबाद में था, तो कोई दिल्ली में लेकिन पिता की बातें उसे अपने गाँव खींच रहा था.वह एक ऐसी नौकरी खोज रहें थे,जिसको करते हुए वह अपने घर की जवाबदेही भी निभा पाए. तभी उनकी नजर रेलवे के  एक विज्ञापन पर गई. तुरंत माउस क्लिक कर डिटेल पढ़ने लगा, पूरे देश में लगभग तीन हजार वेकेंसी था, जिसमे पचास उसके गृह राज्य में.सारी वेकेंसी ग्रुप डी पोस्ट के लिए थे, पोस्ट उसके शैक्षणिक योग्यता के अनुसार काफी छोटा था पर उसने इस पर ध्यान ना दिया सोचा इस नौकरी के सहारे वे अपने घर का दायित्व भी निभा सकता है. तुरत ऑनलाइन आवेदन  कर दिया.

        लगभग बीस दिनों के बाद परीक्षा हुई. जल्द परिणाम भी आ गया. श्रावक की कामना पूर्ण हो गयी योजना सफल हो गयी. उसका चयन रेलवे के ग्रुप डी पद के लिए हो गया. पिता को कॉलकिया और कहा,“पिताजी, अब मेरी नौकरी रेलवे में हो गया है,पोस्टिंग भी अपने ही राज्य में हो जाएगी, अब मै गाँव आकर आप लोगों के साथ रह पाऊंगा.” पिता अत्यंत खुश हुए, बोले, “यह तो बहुत अच्छा हुआ बेटा, यहाँ रह कर तुम नौकरी के साथ घर को भी देख पाओगे.” तुरंत यह सुखद समाचार दामोदर ने अपनी पत्नी को सुनाया, उसकी खुशी का ठिकाना ना रहा.

        श्रावक घर आ गया है, उसकी पोस्टिंग भी गाँव और शहर के बीच बिहटा स्टेशन पर हो गया है. अब वह घर से ड्यूटी करने जाता, शाम में आकर घर के काम भी देखता, रात में पूरा परिवार बातें करतें, विभिन्न विषयों पर चर्चा भी करतें, फिर खा कर सो जातें. पिता को बुढ़ापें का सहारा मिल गया था. माँ को बेटा दुलारा मिल गया था, भाई-बहन की नोक-झोंक से घर फिर गूंज उठा था. घर की रौनक वापस आ गई थी. वीराना दूर हो गया था. यूँ तो श्रावक की तनख्वा बैंगलोर के नौकरी से काफी कम थी लेकिन यहाँ खर्च भी कम था, ऊपर से रेलवे के यात्रा-पास, मेडिकल इत्यादि की सुविधा अलग से. अत: उन्हें कोई विशेष आर्थिक नुकसान तो ना हुआ था, लेकिन यहाँ समाज के कुछ लोग उन्हें अब ताना देने लगें थे,उसे बार-बार बोलतें उसके ग्रुप डी की नौकरी पर व्यंग करतें, पर वह कोई विशेष परवाह न करता, उसके सामने अभी पिता का ईलाज, बहन की शादी और घर की देख-भाल था. कुछ दिनों के बाद वे शहर के उस जूनियर इंजीनियर, जिसके बारें में उसके मामा ने बतलाया था, मिलने गया. लड़का संस्कारी था, बात भी बन गई. धूम-धाम से बहन की शादी हो गया. बहन विदा हुई.  श्रावक की योजना सफल हो गयी, कार्य सिद्ध हो गया.

     श्रावक गाँव में अपने परिवार  के संग रह,अपने दायित्व की पूर्ति करतें हुए, खुश तो था लेकिन उसके अन्दर का इंजीनियर कुंठित था, उसका ज्ञान रह-रह कर हिलोरें मारता. उसें बेचैन करता.अपने ज्ञान का  उचित उपयोग करने हेतु, अपने इंजीनियरिंग कौशल को गाँव में सार्थक करने हेतु उसने गाँव में एक कंप्यूटर सेंटर की स्थापना किया, जहाँ उसने गाँव के बच्चों को नाम मात्र के शुल्क पर कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेर  की शिक्षा देना प्रारंभ किया. अपने लेक्चरों को यूट्यूब पर अपलोडे भी करने लगा, देखतें  ही देखतें कई छात्र ऑनलाइन या ऑफलाइन उससे जुड़ गए.

           दोपहर का समयथा, श्रावक तल्लीनता से रेलवे ट्रैक पर काम कर रहा था. तभी उपमंडल अभियंता दौरें पर आ गए. जूनियर इंजीनियर उन्हें काम समझा  रहें थे. वें जैसे-जैसे गुजरतें ट्रैक पर काम करने वालें कर्मचारी एवं मजदूर  काम रोक कर उन्हें सलाम करतें. उपमंडल अभियंता साहब गर्व से हूँ –हूँ कर बढ़ें जातें. कुछ देर के बाद वें श्रावक जहाँ काम कर रहा था वहां से गुजरें, कम् में तल्लीनता के कारण श्रावक उन्हें देख ना पाया, अभियंता साहब इसे अपने शान के खिलाफ समझा, तुरत ऐठ कर बोलें, “क्यों रे तुमकों पता नहीं साहब को कैसे सलाम करतें है.” श्रावक सर उठा कर उनकी तरफ देखां और बोला, “मैं काम में व्यस्त था आपको देख नहीं पाया, पर साहब को क्या यह भी नहीं पाता वर्कर से कैसेबात करतें.” इतना सुनतें ही अभियंता साहब भड़क उठें, जैसे किसी ने आग में घी डाल दिया हो. ताव में बोलें, “अब तू मुंझे बोलना सिखाएगा, तेरी यह मजाल.” अब श्रावक भी थोडा उतेजित हो गया, उतेजना में बोल उठा,“आप मुझे इस तरह तुम-ताम कर बात ना करें, मै कोई आपका गुलाम नहीं हूँ, वर्ना इस तरह से बातें करना मुझे भी आता है.” मामला बिगड़तें देख जूनियर इंजीनियर साहब ने बीच-बचाव किया, और उपमंडल अभियंता से बोलें,“जाने दीजिए सर अभी नया लड़का है, जवानी का जोश है, माफ़ कर दीजिए.” उपमंडल अभियंता लाल-पीला हो वहां से चल दिए.रास्तें में जूनियर इंजीनियर साहब ने उन्हें बतलाया,“सर वह लड़का कोई ऐसा-वैसा नहीं है,आई.आई.टी. से बी-टेक है.” उपमंडल अभियंता ने आश्चर्य से कहा –हाँ!

     दोपहर का समय था.स्टेशन पर लोगों की भीड़ थी.लोग बेबसी से ट्रेन का इंतजार कर रहें थे. लोग रेलवे को कोस रहें थे. बच्चे रो रहें थे, माँ गोद में ले उन्हें दिलासा दे रही थी, “वो देखो ट्रेन आया, मुन्ना ट्रेन में बैठ कर नानी के घर जाएगा, जाएगा ना मुन्ना.” पर बच्चे रुक-रुक कर रोयें जा रहें थे,अब उन्हें माँ की बातों पर विश्वास ना था. सारी ट्रेने लेट थी. स्टेशन पर टीटी इधर-उधर काला कोर्ट पहन टहल रहें थे.एक तो गर्मी का दिन उपर से ट्रेन लेट, यात्रियों का बुरा हाल था. कोई यात्रियों का  सुध लेने वाला ना था. इधर श्रावक काम पुरा कर स्टेशन पर ही बैठा था. यात्रियों की हालत देख वह मन ही मन चिंतित था. उसे ट्रैक पर काम करते हुए लगभग दो वर्ष हो गया था, इस दौरान उसने रेलवे परिचालन का काफी अवलोकन कर रखा था. इन अवलोकन से उसे यह अनुभव हुआ कि रेलवे सिग्नल्लिंग में कमियाँ के कारण अक्सर ट्रेन लेट होती है. बठे-बैठे सोचने लगा, अगर रेलवे सिग्नल्लिंग को और बेहतर कर दिया जाए तो एक ही ट्रक पर कई ट्रेनों को कम समय अंतराल पर चलाया जा सकता है. यह सोच उसके मन-मष्तिस्क में घर कर गई. शाम को घर लौटते समय इस युक्ति पर विचार करता रहा.रात को सोते समय भी यह विचार उसे सोने ना दिया, मन ही मन विचार मग्न था. सोचते-सोचते ख्याल आया क्यों ना एक सिग्नल्लिंग सॉफ्टवेर विकसित किया जाए, जो दुरी, ट्रेन की चाल, एक ही ट्रैक पर चलने वाले ट्रेनों की संख्या इत्यादि के आधार पर आटोमेटिक एवं डायनामिक सिग्नल्लिंग करें. रात को ही उठ कर लग गया. कॉपी पर अल्गोरिथम विकसित करने लगा. सुबह भी ड्यूटी जाते समय इसी ख्यालों में मग्न रहा. स्टेशन पर काम खत्म कर लैपटॉप पर कोड लिखने लग गाया. लगभग एक महीने तक वह अथक मेहनत करता रहा. एक दिन महीनो की साधना सफल हो गया, उसकी मेहनत रंग ले आई. अथक मेहनत के उपरांत उसने आटोमेटिक एवं डायनामिक सिग्नल्लिंग के लिए सॉफ्टवेयर  विकसित कर लिया था. मानो कोई संचित धन मिल गया हो.श्रावक के खुशी का ठिकाना ना था.

    अगले दिन सुबह ड्यूटी जल्दी ही ड्यूटी चला गया.काम ख़त्म कर सीधे उपमंडल अभियंता साहब के ऑफिस चला गया.उनसे मिलने का समय ले बाहर इंतजार करने लगा.बाहर बैठा हुआ बार-बार लैपटॉप को खोलता, अपने सॉफ्टवेर को रन करता, अपेक्षित परिणाम देख कर उसे वही खुशी होती जो एक किसान को लहलहाते हुए फसल को देख कर होता है. मन में ख्याल आता कि आज ज्ञान और कौशल का समुचित सम्मान होगा. अन्दर का उल्लास हिलोरे मार रहा था. कुछ देर के बाद उसे उपमंडल अभियंता के कक्ष में बुलाया गया. उत्साह के साथ वह कक्ष के अन्दर प्रवेश किया.श्रावक को देख उपमंडल अभियंता साहब रखे फाइल को पलटने लगें. श्रावक उसे आदरपूर्वक सम्मान किया और उत्साह से कहा,“सर अपने ट्रेन सिग्नल्लिंग को और बेहतर बनाने के लिए मैंने एक सॉफ्टवेर विकसित किया है जो ट्रेन की गति, ट्रेनों के बीच की दुरी और स्टेशन पर स्टापेज समय के आधार पर आटोमेटिक एवं डायनामिक सिग्नल्लिंग कर सकता है.” इतना कह श्रावक लैपटॉप खोल कर उनके सामने सॉफ्टवेर को प्रदशित करना चाहा. उपमंडल अभियंता साहब ने अनमने ढंग से उसे देखें और बेरुखी से कहें,“अरे भाई,एक तो ग्रुप डी की नौकरी करते हो और अपने आप को आइन्स्टीन समझते हो, बड़े आए सॉफ्टवेयर विकसित करने वाले, जाओ जाकर अपना काम करो.” श्रावक कुछ बोलता इससे पहले ही उपमंडल अभियंता साहब तेज आवाज में दुतकारते हुए फिर बोलें,“खड़े-खड़े मुहं क्या देख रहें हो ,जाओ, मुझे काम करने दो.” उपमंडल अभियंता साहब के इस व्यवहार पर श्रावक को काफी दुःख हुआ, हाथ में लैपटॉप लेकुछ सोचता हुआ धीरे- धीरे कमरे से बाहर निकल आया. वह दुखी तो जरुर था लेकिन उसके हौसले में कोई कमी नहीं आया था.अन्दर का इंजीनियर उतना ही उत्साही, उतना ही विश्वासपूर्ण था.

                               श्रावक शाम तक घर आ गया. घर के एक कमरे में एकांत बैठा हुआ विचार करता हुआ बार-बार विकसित सॉफ्टवेयर को रन करता परिणाम को थोड़ी देर देखता, फिर विचार मग्न हो जाता. उपमंडल अभियंता के बर्ताव से वह दुखी तो  था मगर सॉफ्टवेयर को रन कर आपेक्षित परिणाम देख उसके दुःख दूर हो जाता, मन में असीम उत्साह का संचार हो जाता. कैसे अपने इस विकसित सॉफ्टवेयर को उचित मुकाम तक पंहुचाया जाए इसी पर विचार करने लग जाता. इसी क्रम में मन ही मन सोचने लगा मै व्यर्थ ही उपमंडल अभियंता के पास चला गया, उसे सॉफ्टवेयर के बारे में मालूम ही क्या होगा, मुझे किसी योग्य व्यक्ति से मिलना चाहिए. कुछ सोचकर उसने मोबाइल से अपने प्रभारी जूनियर इंजीनियर को कॉल किया कॉल कर कहा कि कल मैं नहीं आ पाऊंगा,कोई आवश्यक काम है. जूनियर इंजीनियर साहब ने छुट्टी की स्वकृति दे दिया.

         अगले दिन सुबह तैयार हो लगभग छह बजे वह ट्रेन से शहर की ओर प्रस्थान किया. वहां स्टेशन पर उतर कर रेलवे जोन के डी.आर.एम. ऑफिस की ओर चल दिया. वहां पहुँच डी.आर.एम. साहब से मिलने का समय लिया और इंतज़ार करने लगा.थोड़ी देर के बाद वहां कार्यरत एक सज्जन आकर उसे बोलें,“इस पुर्जे पर अपना नाम, पद और मिलने का कारण लिख दें.” श्रावक कागज पर लिख सज्जन को दिया, सज्जन पुर्जा ले कर अन्दर चलें गए. लगभग एक घंटा हो गया पर श्रावक की बारी ना आई. उसने ध्यान दिया कि उसके बाद आने वाले लोग अन्दर जा रहें है अधीर हो सज्जन के पास गया और बोला,“सर मैंने लगभग एक घंटे पहले पुर्जे पर नाम वगैरह लिख कर आपको दिया था, मेरे बाद वालें लोगों का नंबर तो आ गया पर मेरा नहीं आया कहीं मिस तो नहीं हो गया.” सज्जन ने नाम पूछा.फिर बोला अच्छा वो ग्रुप डी वाला, उसमे तो साहब ने कहाँ है कि एक ग्रुप डी स्टाफ से वे नहीं मिल सकते है. “सर मैंने एक सॉफ्टवेयर विकसित किया है जिससे ट्रेन लेट की समस्या से निजात पाया जा सकता है उसी का प्रदर्शन करना है, प्लीज मुझे मिलने दीजिए सर” श्रावक ने गिडगिडाते हुए कहा. सज्जन-देखिए, इसमें मैं कुछ भी नहीं कर सकता,साहब का आर्डर है. श्रावक- प्लीज सर, कुछ करें सर, बस पाँच मिनट के लिए सर.” श्रावक के इस तरह गिडगिडाते देख सज्जन को दया आ गई, दया के स्वर बोलें,“चलिए अगर आप इतना कह रहें है तो आप का काम करा देते है, पाँच बजे शाम को साहब जातें है उस समय मैं आपको उनसे मिला दूंगा, लेकिन इसके लिए आपको पांच सौ रूपए चढ़ावा देना होगा.” श्रावक ठीक है सर कह खुशी-खुशी पाँच सौ रुपए दे दिया. वह वहां दोपहर से लेकर शाम तक डटा रहा, बीच-बीच में लैपटॉप खोल सॉफ्टवेयर को रन कर लेता जिससे उसमें  असीम उत्साह का संचार हो जाता.शाम के पाँच बजे, ऑफिस के लोगों में घर जाने की जल्दी है,कितने तो चार बजें ही सटक लिए. अन्दर डी.आर.एम. साहब किसी ठेकेदार से चर्चा कर रहें है. रेलवे ओवर-ब्रिज के ठेके में कमीशन बंटवारे पर चर्चा चल रही है.साथ ही पूर्व के ठेके का कमीशन की भुगतान के लिए ठेकेदार को कहा जा रहा है. इधर श्रावक बेसब्री से इंतजार किया जा रहा है. लगभग साढ़े पाँच में वो सज्जन आए कहा साहब जाने वाले है तैयार रहना, दरवाजे पर ही मुलाकात कर लेना. जैसे सीमा पर जवान किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार खड़ा होता है, वैसे ही लैपटॉप खोल तैयार खड़ा हो गया. उनके निकलते ही नमस्ते कर अपन परिचय दे कह उठा, “सर मैंने एक सॉफ्टवेयर विकसित किया है जो आटोमेटिक एंड डायनामिक सिग्नालिंग कर सकता है.” डी.आर.एम. साहब ने तेजी से चलते हुए कहा, “इसकी  कोई  जरूरत नहीं हमने पहले ही जापान की एक कम्पनी स्मार्ट सॉफ्टवेर से सिग्नल्लिंग कंट्रोल के लिए सॉफ्टवेयर का करार कर लिया है. श्रावक पीछे-पीछे सर-सर करता रहा और डी.आर.एम. साहब आगे-आगे तेजी से चलते चले गए. योग्यता कुर्सी के आगे गिड़गिड़ाती रही.

    मेधा कहाँ हारने वाली थी, अन्दर का इंजीनियर कहाँ मानने  वाला था. श्रावक घर वापस आ गया. कमरे में लैपटॉप खोल कर  पुन: बैठ गया. सोचा क्यों ना जापान की कंपनी स्मार्ट सॉफ्टवेयर जिसका जिक्र  डी.आर.एम साहब ने किया था, उस से संपर्क किया जाए. तुरन्त गूगल पर स्मार्ट सॉफ्टवेयर टाइप किया, वेबसाइट पर जाकर कंपनी के विषय में जानकारी लिया. वेबसाइट से कम्पनी का ईमेल आईडी भी प्राप्त कर लिया और अपने द्वारा  विकसित सॉफ्टवेयर का संक्षिप्त विवरण लिख कर कम्पनी को मेल कर दिया. कुछी दिनों के बाद उन्हें स्मार्ट सॉफ्टवेयरकम्पनी से एक मेल प्राप्त हुआ. लिखा था कम्पनी आपके सॉफ्टवेयर में इंट्रेस्टेड है, आप कृपा कर अपने सॉफ्टवेयर का डेमन्सट्रेसन इंडिया के हमारे दिल्ली सेंटर पर दे दें. आने-जाने और रहने का सारा प्रबंध कम्पनी करेगी. अगले ही दिन वह छुट्टी लेकर हवाई जहाज से दिल्ली को रवाना हो गया. कम्पनी के सेंटर पर पंहुचा तो उसका उचित स्वागत हुआ,सम्मानपूर्वक कमरे में बिठाया गया. नाश्ता और चाय भी दिया गया. फिर उसने कम्पनी के इंजीनियरो के समक्ष अपने सॉफ्टवेयर का प्रदर्शन किया. वहां के इंजीनियरो ने उसके काम की सराहना किया और कहा,“इस सॉफ्टवेयर के आगे के ट्रायल्स के लिए आपको हमारे मेन सेंटर जापान आना होगा.” श्रावक कुछ बोलता इससे पहले ही एक इंजीनियर ने आगे कहा,“आप चिन्ता ना करें आपके आने–जाने और रहने का सारा प्रबंध कंपनी वहन करेगी.” यह सुन खुशी से श्रावक की आँखे भर आया. लगा भटके नाव को किनारा मिल गया.

             कुछ दिनों के बाद कम्पनी ने मेल कर श्रावक को इनविटेसन लेटर और एयर टिकेट भेजा. लगभग पन्द्रह दिनों के बाद की टिकट थी. श्रावक के खुशी का ठिकाना ना था. अगले ही इनविटेसन लेटर और अनुमति के लिए आवेदन लिख वो अपने प्रभारी जूनियर इंजीनियर के पास पहुंचा, सारी बात बताकर उसने उन्हें आवेदन और इनविटेसन लेटर की प्रति आगे अग्रसारित करने को दिया. जूनियर इंजीनियर ने कुछ देर तक पत्र हाँथ में ले सोचते रहें फिर कुछ दुविधा में कहा,“देखिए श्रावक जी इस तरह के पत्र को मैं आगे अग्रसारित नहीं कर सकता आप सीधे डी.आर.एम ऑफिस जाए,यह वहीँ जमा करें.” श्रावक तुरंत वहां से शहर डी.आर.एम. ऑफिस चला गया. वहां पत्राचार सेक्शन में जमा कर रिसीविंग ले लौट आया. मन बेचैन था, दो दिनों के बाद फिर भागता हुआ डी.आर.एम. ऑफिस को गया. पाता चला पत्र ज्यों का त्यों पड़ा हुआ है. सारी बात बताकर विनती की तो वहां के सहायक ने कहा,“बहुत सारे पत्र हैं, कोई एक आपका थोड़े ही है ज्यो अभी के अभी भेज दें, समय लगेगा.” श्रावक- पर सर मेरी टिकट तेरह दिनों के बाद है, कृपा कर इससे पहले प्रोसेस करवा दें. सहायक ने झटकते हुए कहा,“जल्दी करवानी है तो कुछ नजराना लगेगा.” श्रावक- कितना सर. सहायक-अरे यार दे दो मिठाई खाने के लिए पाँच सौ. सौदा पक्का हो गया, बाथरूम में जा कर लेन-देन भी हो गया.

               श्रावक घर लौट आय, किसी तरह तीन दिन गुजारा, उससे रहा ना गया चौथे दिन फिर डी.आर.एम.ऑफिस पहुँच गया.पाता किया तो मालुम चल पत्र सेक्शन ऑफिसर के टेबल पर धुल खा रहा है. काफी विनती और हाँथ जोड़ने के बाद शुक्र है फाइल उनके टेबल से आगे बढ़ा.

     इसी तरह वे आते-जाते रहें विनती और नजराने के बल पर फाइल आगे बढ़वातें रहें. अब पाँच दिन का समय और बचा है, पत्र अंतिम मुकाम तक पहुँच चूका था, आज अंतिम साइन के लिए फाइल में बंद चीफ पर्सनल ऑफिसर के टेबल पर पड़ा था. बाहर श्रावक इंतजार कर रहा था उसके साथ उसके सपने, उसके हौसले भी इंतजार कर रहें थें. कुछ काम निपटा लेने के बाद चीफ पर्सनल ऑफिसर ने श्रावक के फाइल को पलटा, कुछ देर फाइल  पलटने के बाद, उन्होंने सहायक को भेज कर श्रावक को अन्दर बुलवाया. श्रावक अन्दर आकर विनम्रता की मूर्ति की तरह खड़ा हो गया. चीफ पर्सनल ऑफिसर ने उसे घुडतें हुए कहाँ, “अच्छा तो आप ही श्रावक हैं.” श्रावक-हाँ सर. चीफ पेरसोनल ऑफिसर-आपका  आवेदन पढ़ा, आपने किसी सॉफ्टवेर के सिलसिले में जापान जाने के लिए छुट्टी माँगा हैं. श्रावक-हाँ सर, मैंने आटोमेटिक एवं डायनामिक सिग्नल्लिंग के लिए एक सॉफ्टवेर विकसित किया है जिसके ट्रायल के लिए मुझे जापान जाना है. चीफ पर्सनल ऑफिसर ने फाइल को पलटते हुए कहाँ-वो  तो ठीक है, लेकिन क्या आपने पहले यह सुचना विभाग को दिया था. श्रावक- सर, सॉफ्टवेर विकसित करने के बाद मैं विभाग के अधिकारियों के पीछे चक्कर लगाता रहा पर किसी ने मेरी एक ना सुनी, अंततः थक-हार कर मै जापान के एक कम्पनी से संपर्क किया, इस क्रम में मैंने कोई विभाग को कोई लिखित सुचना तो नहीं दी है लेकिन विभाग के कुछ उच्च अधिकारी इससे अवगत हैं. चीफ पर्सनल ऑफिसर- विभाग में आ गए हैं लेकिन विभाग का नियम कानून नहीं जानतें, आपको ये सब करने से पहले विभाग से परमिसन लेना था, जो की आप ने लिया नहीं अब चलें आए छुट्टी मांगनें. श्रावक संकित हो गया, सोचा कहीं सारे  स्वपन टूट ना जायें, महीनों की मेहनत व्यर्थ ना चला जायें. घबडाये मुद्रा में विनम्रता से कहा,“ सर देखिए कोई उपाय कीजिए अब आप ही पर ही आशा है.” चीफ पर्सनल ऑफिसर श्रावक की बातों से थोडा द्रवित हुए कहा, देखिए एक ग्रूप डी कर्मचारी की छुट्टी के लिए रेलवे में इस तरह का प्रावधान नहीं है फिर भी अगर आप चाहे तो नो वर्क नो पे पर जा सकतें, लेकिन यह जान लीजिए इस दौरान आपको वेतन नहीं मिलेंगा और आपका सर्विस ब्रेक माना जाएगा जिससे भविष्य में पदोन्नति में आपको दिकतें आएगा. जैसे किसी कुशल धनुर्धर का ध्यान लक्ष्य पर होता है वैसे ही श्रावक का ध्यान अपने द्वारा विकसित सॉफ्टवेयर पर था तुरत बोल पड़ा हाँ सर मुझे मंजूर है.

            पाँच दिन बीत गया है आज श्रावक जापान में स्मार्ट सॉफ्टवेयर के हेड क्वार्टर में बैठा है, सामने कंपनी के कुछ उच्च इंजीनियरस की टीम बैठी है, वे आपस में सॉफ्टवेयर से सम्बंधित तकनिकी बातों पर चर्चा कर रहें हैं. चर्चा  के दौरान कल सॉफ्टवेयर के ट्रायल का दिन निर्धारित हुआ. अगले दिन सारी तैयारी कर लिया गया. दोपहर में सॉफ्टवेयर का ट्रायल शुरू हुआ जो लगभग एक घंटे तक चला. ट्रायल सफल रहा लेकिन कंपनी के कुछ  उच्च इंजीनियरस इसमें कुछ और सुधार  चाहतें थे. अत: उनलोगों ने श्रावक को एक महीने तक जापान ही रह इसे और बेहतर करने में सहयोग देने का अनुरोध किया, श्रावक पर तो पहले ही धून सवार था, खुशी-खुशी मान लिया. शाम को मेल लिख अपने विभाग को सारी बातों से अवगत भी कर दिया. पिता को भी फोन द्वारा सुचना दे दिया. 

      लगभग एक महीने तक श्रावक जापान में कंपनी के इंजीनियरो के साथ लगा रहा. सॉफ्टवेयर में बदलाव होतें फिर ट्रायल होता फिर अगर कोई त्रुटि होती तो फिर से सॉफ्टवेयर में सुधार होता. यही चक्र तब तक चलता रहा जब तक की आपेक्षित परिणाम ना आ गया. जिस दिन आपेक्षित परिणाम आया उस दिन उन लोगों के खुशी का ठिकाना ना था मानो वर्षो की साधना सफल हो गया. इस कार्य के लिए जापान सरकार ने श्रावक को विशेष सम्मान दिया. यहाँ तक की कम्पनी ने उसे वही रह कर आगें काम करने की पेशकश भी किया. पर श्रावक ने विनम्रता से मन कर दिया. गाँव की गलियाँ और परिवार का प्यार उसे आवाज दे रही थी.

     श्रावक भारत  आ गया है. चारो तरफ उसके काम के चर्चे है. टीवी पर दिखाया जा रहा है, एक ग्रूप डी ने कमाल कर दिया. फेशबुक पर उसके चित्र शेयर किए जा रहें हैं. इधर रेलवे ने वही सॉफ्टवेयर स्मार्ट सॉफ्टवेर कम्पनी से अरबो  रूपए का भुगतान कर ले लिया है.

     आज कुछ मीडिया के लोग इंटरव्यू के लिए गाँव श्रावक के पास  आयें हुए है. रिपोर्टर सवाल पूछ रहें हैं, श्रावक जवाब दे रहा हैं. एक रिपोर्टर- आप ग्रूप डी कर्मचारी होतें हुए इतनी बड़ी सफलता हासिल किए है, इस पर आप क्या कहना चाहेंगे. श्रावक- देखिए, कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, हमें हर काम का सम्मान करना चाहिए साथ ही हमें पद से ज्यादा व्यक्ति के ज्ञान और हुनर की कद्र करना चाहिए.

4 thoughts on “ग्रुप डी

  1. Nice work, this story depicits rat race of society, supreesion of talent by posts, brain drain, corruption etc. Truely great work by a researcher, teacher and an engineer.

  2. This story deficit the rate race of the society, suppression of merit by posts, brain drain, corruption etc. Nice work by a researcher, teacher and an engineer.

  3. बहुत ही सुंदर एवं मार्मिक कहानी।
    आज कल की अंधी और गलाकाट प्रतियोगिता एवं एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लोगो को क्या क्या करने पर मजबूर कर सकती है ये इस कहानी मैं बहुत अच्छे से दर्शाया गया है।।।
    मैं चाहूँगा की विमल सर् आगे भी ऐसे ही प्रेरणादायक कहानी लिखते रहे।।।

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