लेखक परिचय

बीनू भटनागर

बीनू भटनागर

मनोविज्ञान में एमए की डिग्री हासिल करनेवाली व हिन्दी में रुचि रखने वाली बीनू जी ने रचनात्मक लेखन जीवन में बहुत देर से आरंभ किया, 52 वर्ष की उम्र के बाद कुछ पत्रिकाओं मे जैसे सरिता, गृहलक्ष्मी, जान्हवी और माधुरी सहित कुछ ग़ैर व्यवसायी पत्रिकाओं मे कई कवितायें और लेख प्रकाशित हो चुके हैं। लेखों के विषय सामाजिक, सांसकृतिक, मनोवैज्ञानिक, सामयिक, साहित्यिक धार्मिक, अंधविश्वास और आध्यात्मिकता से जुडे हैं।

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बीनू भटनागरdipression

दुखी या परेशान कौन नहीं होता ! इसे डिप्रैसिव मूड कहा जा सकता है, अवसाद या डिप्रैशन नहीं। चिन्ताओं और तनाव से भरी ज़िन्दगी मे बहुत से कारण होते हैं, जब मन दुखी होता है, कुछ भी सही होता नज़र नहीं आता।इस प्रकार की मानसिक स्थिति अधिक दिन तक रहे तो यह मानसिक अस्वस्थता मानी जाती है, जिसे अवसाद या डिप्रैशन कहते हैं।ऐसी स्थिति मे व्यक्ति को इलाज की ज़रूरत होती है।अवसाद की स्थिति मे रोज़ के काम करना मुश्किल हो जाता है, इलाज न होने की स्थिति मे परिणाम ख़तरनाक हो सकते हैं। अतः अवसाद क लक्षणों को जानना सबसे ज्यादा आवश्यक है।

लक्षण-

1 किसी भी विषय मे ध्यान नहीं लगता, कुछ याद करना कठिन हो जाता है।

2बिना बात क्रोध बार बार आ सकता है।

3 रोज़ के कामो से अरुचि होने लगती है।

4. रतिक्रया से भी अरुचि हो सकती है।

5 सोचने की गति धीमी हो जाती है।

6 दुख और असंतोष की भावना छाई रहती है।

7 ऐसा लगता है कि छोटे छोटे काम करने के लिये जरूरत से ज्यादा शक्ति ख़र्च करनी पड़ती है।

8 पुरानी असफताओं मे मन उलझा रहता है।

9 आत्महत्या करने का विचार मन मे आता है।

10 नींद मुश्किल से आती है।

11 चिड़चिड़ापन

12 चिन्ता करने की आदत बन जाती है।

13 भूख मे बदलाव, अचानक बहुत खाना खाने लगना या बहुत कम खाना।

14 अकारण ही रोना आना या रोने का बार बार मन करना।

इनमे से कई लक्षण 2 सप्ताह तक रहें तो ये अवसाद का संकेत हो सकते हैं। ऐसे मे चिकित्सक की सलाह लेनी चाहिये।

कारण

अवसाद के बहुत से कारण हो सकते हैं ,निश्चित रूप से अवसाद के अलग अलग कारण हर व्यक्ति के लियें होते हैं। कुछ चीज़े ऐसी होती हैं जिनसे इसके होने ख़तरा बढ जाता है। अनुसंधानों से पता चला है कि मस्तिष्क के रासायनिक तत्वों मे कुछ संतुलन बिगड़ने से, या अनुवाँशिक कारणों से या इन दोनो से ही अवसाद हो सकता है। जीवन मे घटी दुखद घटनायें भी इसका कारण हो सकती हैं।इन सबके मिले जुले रूप मे भी अवसाद के कारण हो सकते हैं।कभी कभी पारिवारिक इतिहास मे अवसाद कई व्यक्तियों को हुआ हो, संभव है, पर आवश्यक नहीं।

कुछ अन्य कारणों से भी अवसाद होने या बढ़ने की संभावना हो सकती है।-

1शराब व नशीली दवाओं का सेवन।

2 कुछ शारीरिक बीमारियाँ, लम्बे समय तक दर्द ,कैंसर या कम सक्रिय थायरायड।

3 स्टेरायड का सेवन।

4 नींद कम आना, नींद मे विभिन्न तरह की बाधायें होते रहना।

5 जीवन मे कोई भंयकर दुर्घटना,किसी प्रिय जन की मृत्यु, तलाक, या प्रेमी प्रेमिका का संबध टूटना 6 कोई बड़ा आर्थिक नुकसान।

7 परीक्षा मे असफलता।

8 नौकरी छूटना या कार्यालय मे कोई समस्या।

9 अकेलापन

इन कारणों के अतिरिक्त हर आयु मे अवसाद के अलग अलग कारण हो सकते हैं।अवसाद बच्चों को भी होता है। शारीरिक कारणों के अलावा माता पिता के व्यवहार से बच्चों को अगर लगता है कि उनके माता पिता उनके किसी भाई बहन पर ज्यादा ध्यान देते हैं,या ज्यादा प्यार करते हैं तो वह अवसाद से ग्रस्त हो सकते हैं।इसके अतिरिक्त शिक्षकों द्वारा बार बार प्रताड़ित होने से या साथियों के मज़ाक उड़ाने से उनके स्वाभिमान को झटका लगता है तब भी अवसाद हो सकता है।

किशोरावस्था मे हारमोनल बदलाव होने से गतिविधियों मे सामन्जस्य नहीं बैठता, माता पिता से भी टकराव होता है इससे भी अवसाद होता है।कभी कभी माओं को बच्चे के जन्म के बाद अवसाद हो जाता है क्योंकि वह जीवन मे आये बदलाव को स्वीकार नहीं पातीं।मध्य आयु की बढती ज़िम्मेदारियों के कारण पुरुष भी तनाव ग्रस्त होते हैं,यह तनाव भी अवसाद का कारण बनता है।स्त्रियों को रजोनिवृत्ति के समय हारमोन की कमी से अवसाद हो सकता है। बुढ़ापे मे अकलापन और स्वयं की वकत ख़त्म होती दिखती है, ये भी अवसाद के कारण सकते हैं।

तनाव कठिन परिस्थितियों का सामना करते समय होता है; यह स्वाभाविक भी है, और ज़रूरी भी क्योंकि तनाव मे शरीर मे एडरनलाइन उत्पन्न होता है जिससे अधिक सतर्कता, ज्ल्दी निर्णय लेने की क्षमता और अधिक शक्ति का संचार शरीर मे होता है।यदि तनाव सीमा मे रहता है तो लाभदायक होता है, परन्तु अत्यधिक तनावपूर्ण जीवन होने पर बहुत अधिक एडरनलाइिन बनने से हृदय रोग का ख़तरा बढ़ जाता है। एडनालाइन ज्यादा बनने व अधिक कार्य भार से अवसाद के लक्षण भी प्रकट होते हैं। तनावपूर्ण परिस्थितियों मे एडरनलाइन से कार्यकुशलता न बढकर जब कहीं ये नहो जाय कहीं वो नहो जाय का भय, चिन्ता और घबराहट (anxiety) होने लगे तो यह भी एक मानसिक रोग का रूप ले लेती है, तनाव (stress),भय ,चिन्ता और घबराहट (anxiety) अवसाद के लक्षण ही होते हैं।

उपचार

अवसाद से पीडित व्यक्ति अक्सर पड़ा रहना चाहता है, जहाँ तक संभव हो उसे अकेला नहीं छोड़ना चाहिये, थोड़ा बहुत चलते फिरते रहने और टहलने के लियें प्रेरित करना चाहिये।कठिन अवश्य होगा पर पीड़ित व्यक्ति को किसी न किसी काम मे व्यस्त रखने का प्रयास करना चाहिये। मनोचिकित्सक से संपर्क करना अति आवश्यक है। अवसाद का उपचार करने के लियें कई तरीके हैं।-

1 दवाइयाँ-

अवसाद के उपचार के लियें बहुत सी दवाइयाँ उपलब्ध हैं जो मनोचिकित्सक की सलाह से लेनी चाहियें। ये ऐन्टीडिप्रैसन्ट्स होती हर पीड़ित रोगी की समस्या का पूरा आँकलन करके दवाइयाँ दी जाती हैं। चिकित्सक को लाभ न हो तो दवाइयाँ बदलनी पड़ती हैं, दवाई की मात्रा तय करने मे भी समय लगता है। अतः आरंभ मे कभी कभी कभी चिकित्सक से जल्दी जल्दी संपर्क करना पड़ सकता है।

2 बात चीत द्वारा उपचार-

ये कोई मामूली बात चीत नहीं होती है, काउंसैलिंग होती है जो कि एक प्रशिक्षित मनोवैज्ञानिक ही दे सकाता है। मनोवैज्ञानिक को सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति का भरोसा जीतकर संवाद के लियें सही माहौल तैयार करना पड़ता है। उसके बाद पीड़ित की भावनाओं और विचारों को समझकर परिस्थिति से कैसे निपटा जा सकता है उसके बारे मे सुझाव देने होते हैं। मनोवैज्ञानिक किसी की परिस्थिति तो नहीं बदल सकता, परन्तु परिस्थिति का सही तरीके से, सकारात्मक रूप से सामना करने मे मदद कर सकता है। काँउसैलिग से मामूली सा अवसाद ठीक भी हो सकता है। गंभीर अवसाद के लियें दवाई और काँउंसैलिग दोनो की आवश्यकता होती है। कगनिटिव बिहेवियर थैरेपी द्वारा नकारात्मक सोच को बदलना सिखाया जाता है। सायकोथैरेपी से विचारों और भावनाओं के पीछे छुपे मुद्दों को समझ कर सुझाव दिये जाते हैं।कभी कभी एक सी मिलती जुलती समस्याओं से जूझते लोगों को एक साथ संवाद का अवसर देने से भी मदद मिलती है।

 

विद्युत द्वारा उपचार-

1 इलैक्ट्रोकन्वलसिव थैरैपी (Electroconvulsive therapy ECT)

आमतौर पर जब दवाइयों से लाभ न हो तब इससे लाभ होता है। यह उपचार बहुत सुरक्षित माना जाता है जब अवसाद के लक्षण बहुत गंभीर हों, विशेषकर जब आत्महत्या के विचार आते हों और दवाइयाँ बेअसर हो रही हों तब इससे लाभ होता है।

2 ट्रान्सक्रेनियल मैग्नैटिक स्टिम्यूलेशन(Transcranial magnetic stimulation TMS)

ऊर्जा की तरंगे मस्तिष्क की उन कोषिकाओं को भेजी जाती हैं जहाँ से मूड नियंत्रित होता है।कुछ अनुसंधानो से पता चला है कि अवसाद को कम करने मे इिससे मदद मिलती है।

3 प्रकाश द्वारा उपचार (Light therapy)-

कभी कभी सूर्य की रौशनी न मिलने से भी मौसमी अवसाद हो जाता है, इसके लियें पीड़ित व्यक्ति को नियंत्रित प्रकाश मे नियंत्रित समय तक रक्खा जाता है, जिससे लाभ होता है।

संभावनाये-

मामूली अवसाद विशेषकर जो किसी घटना की प्रतिक्रिया के फलस्वरूप पैदा हुआ हो कुछ सप्ताह काँउसैलि और सायकोथैरेपी से ठीक हो जाता है। गंभीर अवसाद मे 8-10 हफ्ते दवाइयाँ लेने से लाभ की संभावना होती है।कुछ लोगों को 6-9 महीने तक दवाई लेनी पड़ती है।यदि किसी व्यक्ति को बार बार अवसाद के लक्षण लौट कर आते हैं तो संभव है कि आाजीवन दवाइयों का सेवन करना पड़े।

ख़तरा-

1.अवसाद से पीडित व्यक्ति शराब या नशीली दवाइयों को लेने की कोशिश कर सकता है।

2.आत्महत्या की कोशिश कर सकता है।

3.धार्मिक गतिविधियों मे डूबकर यथार्थ से पलायन कर सकता है ।

रोकथाम-

1 शारीरिक व्यायाम व संतुलित भोजन जैसे योग, पैदल चलना, कोई खेल या नृत्य आदि।

2 अच्छी नींद की आदत।

3 सकारात्मक सोच।

4 रुचि के कार्यो के लियें कुछ समय देना जैसे पेंटिग, बागबानी संगीत लेखन या पढना।

5 अच्छे लोगों से मित्रता उनके साथ कुछ समय बिताना

6 समुचित मनोरंजन।

परिवार मे यदि किसी को अवसाद के लक्षण दो सप्ताह तक दिखाई दें, तो अविलम्ब मनोचित्सक या मनोवैज्ञानिक या दोनो की सलाह लेनी चाहिये। समुचित उपचार से पीड़ित व्यक्ति बिलकुल ठीक हो सकता है, जीवन मे मधुरता लौट आयेगी।

3 Responses to “अवसाद”

  1. Binu Bhatnagar

    प्राण जी और विजय जी,
    आपकी सराहना से बहुत बल मिलता है,शुक्रिया।

    Reply
  2. PRAN SHARMA

    विदूषी लेखिका बीनू भटनागर. का यह लेख सबके लिए संग्रहनीय है .

    Reply
  3. vijay Nikore

    Binu ji:
    Your article is very complete and exhaustive, and also the content is easy to understand.
    Vijay Nikore

    Reply

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