लेखक परिचय

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर

हिमांशु शेखर आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई कर रहे हैं. लेकिन वे सिर्फ पढ़ाई ही नहीं कर रहे बल्कि एक सक्रिय पत्रकार की तरह कई अखबारों और पत्रिकाओं में लेखन भी कर रहे हैं. इतना ही नहीं पढ़ाई और लिखाई के साथ-साथ मीडिया में सार्थक हस्तक्षेप के लिए मीडिया स्कैन नामक मासिक का संपादन भी कर रहे हैं.

Posted On by &filed under टॉप स्टोरी.


medical_devices_img01देश में जन स्वास्थ्य की हालत सुधारने के लिए कई योजनाएं चल रही हैं। हर साल इन योजनाओं पर करोड़ों रुपए पानी की तरह बहाए जा रहे हैं। पर जन स्वास्थ्य के मौजूदा हाल को देखते हुए यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल है कि आखिर यह पैसा जा कहां रहा है। जमीनी स्तर पर तो स्वास्थ्य सुविधाओं का टोटा तो जस का तस बना हुआ है। लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पा रही हैं।

ग्रामीण इलाकों की हालत तो और बदतर है। अभी भी गांवों में हर साल कई लोग स्वास्थ्य सुविधाएं समय से नहीं मिल पाने की वजह से काल कवलित हो जा रहे हैं। दरअसल, देश का पूरा स्वास्थ्य क्षेत्र ही गड़बड़ हालत में है। एक तरफ तो इस क्षेत्र में निजीकरण को बढ़ावा दिया जा रहा है। वहीं दूसरी तरफ सरकारी अस्पतालों को बेहतर बनाने की घोषणाएं केवल कागजी ही साबित हो रही हैं। जमीनी स्तर पर देखा जाए तो सरकारी अस्पतालों की हालत दिनोंदिन खराब ही होती जा रही है।

इसके अलावा देश में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी भी एक बड़ी समस्या है। पिछले सरकार में स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री अंबुमणी रामदास थे। उन्होंने इसी साल संसद में एक सवाल का जवाब देते हुए यह स्वीकार किया था कि देश में चिकित्सकों और स्वास्थ्यकर्मियों की भारी कमी है। उन्होंने कहा कि अभी देश में सात लाख चिकित्सक हैं और अभी आठ लाख डॉक्टरों की और जरूरत है। इसके साथ ही रामदास ने यह भी माना कि देश मे नर्सों की कुल संख्या दस लाख है जबकि स्वास्थ्य सुविधाओं को सही ढंग से बरकरार रखने के लिए अभी पंद्रह लाख नर्सों की और आवश्यकता है। बाद में इसी तरह की बातें राष्टपति प्रतिभा पाटिल ने भी कही।

 ऐसे में सवाल यह उठता है कि आखिर देश में स्वास्थ्य संबंधी सेवाओं के क्षेत्र में इस तरह की बदहाली क्यों है? दरअसल, नई आर्थिक नीतियों ने देश में कई बड़े बदलाव किए। इसी का परिणाम है कि निजीकरण की आंधी चली और पूंजीपतियों का हर क्षेत्र में दबदबा बढ़ा। ऐसा होने के बाद आम लोगों की बुनियादी जरूरतों के प्रति सरकारी तौर पर भी उपेक्षा का भाव गहराता गया है। आज हालत यह है कि सरकार तमाम क्षेत्रों मे निजीकरण को बढ़ावा दे रही है। जिसका नकारात्मक असर आमजन के जीवन पर पड़ रहा है।

 स्वास्थ्य सेवाओं के क्षेत्र में भी निजी क्षेत्र का वर्चस्व कायम हो गया है। एक तरफ सरकार यह दावा करते नहीं थकती की देश ने आर्थिक मोर्चे पर काफी तरक्की की है और सूचना प्रौद्योगिकी जैसे कुछ क्षेत्रों में भारत दुनिया में अहम स्थान बना चुका है। यह सही भी है लेकिन एक बड़ा सच यह भी है कि आजादी के बासठ साल बाद भी एक बड़े तबके को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं मयस्सर नहीं हो पा रही हैं। चिकनगुनिया, डेंगु बुखार, मलेरिया और कालाजार जैसी बीमारियों की वजह से हर साल हजारों लोग काल के गाल में समा जा रहे हैं।

ऐसे लोगों के पास इतना पैसा होता नहीं है की निजी अस्पतालों में ईलाज करा सकें और सरकारी अस्पतालों में सुविधाओं के साथ-साथ चिकित्सक भी नहीं उपलब्ध हो पाते। ऐसी हालत में इनके पास भगवान भरोसे रहने के अलावा कोई चारा नहीं बचता है और इनमें से ज्यादातर मौत की नींद सो जाते हैं। इनकी मौत खबर भी नहीं बन पाती है और सत्ता और व्यवस्था सब कुछ जानते हुए भी अनजान बनी रहती है।

 दरअसल, लोगों को आवश्यक चिकित्सा उपलब्ध नहीं हो पाने के पीछे डॉक्टरों का टोटा एक बड़ी वजह है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक भारत चिकित्सकों की संख्या के मामले में गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। भारत में हर दस हजार की आबादी पर महज सात चिकित्सक उपलब्ध हैं। अगर सरकारी क्षेत्र की बात की जाए तो दस हजार लोगों पर सिर्फ और सिर्फ दो सरकारी डॉक्टर उपलब्ध हैं। इसी से अंदाजा लगाया जा सकता है कि लोगों को कैसी स्वास्थ्य सुविधाएं मिल पाएंगी।

जब डॉक्टरों ही नहीं होंगे तो इलाज कौन करेगा। स्वास्थ्य सेवाओं की बदहाली का आलम यह है कि दस हजार की आबादी पर अपने देश में आठ नर्स हैं। जबकि वैश्विक स्तर पर यह औसत 33 का है। जाहिर है, ऐसी हालत में तो लोगों को चिकित्सा कराने के लिए समस्याओं से तो जूझना ही पडे़गा। समस्याओं को होना एक अलग बात है और सब कुछ जानते हुए उससे पार पाने की कोशिश नहीं करना बिल्कुल अलग बात है। स्वास्थ्यकर्मियों की कमी की समस्या नई नहीं है।

हर बार सरकार की तरफ से यह दावा किया जाता है कि इस समस्या का हल जल्द ही कर लिया जाएगा लेकिन हर बार नतीजा ढाक के तीन पात वाला ही होता है। सरकार लाख दावा करे की स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से निपटने के लिए वह बहुत चिंतित है। पर स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से निजात पाने के लिए सरकारी स्तर पर सुगबुगाहट नहीं दिख रही है। अभी देश में तकरीबन 250 ऐसे मेडिकल कॉलेज हैं जहां आधुनिक चिकित्सा की शिक्षा दी जाती है।

जबकि देशी चिकित्सक तैयार करने वाले संस्थानों की संख्या तकरीबन चार सौ है। इसमें होम्योपैथी सिखाने वाली संस्थाएं भी शामिल हैं। भारत में हर साल 25000 एलोपैथ के चिकित्सक तैयार होते हैं। ऐसा अनुमान लगाया गया है कि होम्योपैथी के भी इतने ही चिकित्सक हर साल भारत में तैयार होते हैं। इसके बावजूद एक अरब से ज्यादा लोगों की आबादी वाले इस देश में इलाज करने वालों का टोटा है। बजाहिर, स्वास्थ्यकर्मियों की कमी से पार पाने के लिए बड़े पैमाने पर नए मेडिकल काॅलेज खोलने की जरूरत है। समय-समय पर नए मेडिकल काॅलेज खोलने की घोषणा तो होती है लेकिन जिस गति से नए मेडिकल कॉलेज खोले जा रहे हैं वह इस देश में स्वास्थ्यकर्मियों की कमी दूर करने के लिए पर्याप्त नहीं है।

 स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में कमी की समस्या ने खास तौर पर ग्रामीण क्षेत्रों में भयानक रूप ले लिया है। जो नौजवान भारी-भरकम रकम खर्च करके डाॅक्टर बन रहे हैं वे शहरों में ही अपनी सेवाएं दे रहे हैं। गांवों की ओर जाने की जहमत कोई नहीं उठाना चाह रहा है। डाॅक्टरों के अलावा अन्य स्वास्थ्यकर्मियों के मामले में भी यही हालत है। इस समस्या से पार पाने के लिए यह चर्चा बीच-बीच में चलती रही है कि नए डॉक्टरों के लिए शुरूआती दिनों में कुछ साल गांवों में सेवा देने को अनिवार्य किया जाए।

 गांवों में स्वास्थ्य संकट के गहराने के लिए सरकारी अस्पतालों में स्वास्थ्यकर्मियों के अनेकों पदों का खाली होना भी जिम्मेदार है। सरकारी बहाली की प्रक्रिया इतनी जटिल है कि नियुक्ति में सालों का वक्त लग जाता है। एक बड़ी समस्या यह भी है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो स्वास्थ्यकर्मी कार्यरत हैं, उन्हें उचित प्रशिक्षण नहीं मिल पाया है। इसका असर उनके काम पर पड़ रहा है और खामियाजा रोगियों को भुगतना पड़ रहा है। इस निपटने के लिए हर पांच साल में चिकित्साकर्मियों के लिए अपनी योग्यता को साबित करने वाले टेस्ट आयोजित कराए जाने का प्रस्ताव है। पर अभी तक इस मसले पर कोई ठोस निर्णय नहीं लिया जा सका है।

लोगों को आवश्यक चिकित्सा सुविधाएं नहीं मुहैया हो पाने के पीछे अस्पतालों की कमी भी एक बड़ी वजह है। जिस गति से आबादी बढ़ रही है उस गति से अस्पतालों की संख्या नहीं बढ़ पा रही है। इसके कारण जो अस्पताल हैं उन पर दबाव बढ़ता जा रहा है। उपचार कराने के लिए लोगों को लंबे समय तक इंतजार भी करना पड़ रहा है। नए खुलने वाले अस्पतालों में निजी क्षेत्र के ज्यादा हैं। जाहिर है, इनका मकसद अधिक से अधिक पैसा कमाना होता। इसलिए यहां गरीबों के लिए इलाज करवा पाना असंभव सरीखा है।

 सरकारी क्षेत्र के अस्पतालों को चिकित्सकों की कमी से इसलिए भी जूझना पड़ रहा है कि निजी क्षेत्र के अस्पताल डाॅक्टरों को ज्यादा पगार दे रहे हैं। जबकि सरकारी अस्पताल के चिकित्सकों की पगार अपेक्षाकृत कम है। अब तो अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान यानी एम्स जैसे अस्पताल के डाॅक्टर भी ज्यादा पैसा पाने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहे हैं और निजी अस्पतालों का रुख कर रहे हैं। इस वजह से सरकारी अस्पतालों को डॉक्टरों के साथ-साथ अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का भी सामना करना पड़ रहा है।

 जाहिर है कि जब सरकारी नीतियों के परिणामस्वरूप ही डॉक्टरों के लिए सेवा की बजाए पैसा अहम हो गया तो सरकारी अस्पताल के स्वास्थ्यकमिर्यों के लिए भी बेहतर पगार का प्रबंध सरकार को करना चाहिए। ऐसा नहीं करके तो परोक्ष तौर पर निजी अस्पतालों को ही फायदा पहंुचाया जा रहा है। सारे अच्छे डॉक्टर जब निजी अस्पतालों में चले जाएंगे तो मजबूरन ही सही लोगों को उन अस्पतालों में ही जाना पड़ेगा।

 हालांकि, सरकारी तौर पर स्वास्थ्य सुविधाओं को दुरुस्त करने की कवायद समय-समय पर चलती रहती है लेकिन हर बार नतीजा उत्साह को ठंढ़ा करने वाला ही होता है। कई राज्यों में सरकारी अस्पतालों में खाली पदों पर अस्थाई तौर पर अनुबंध के तहत डाॅक्टरों को नियुक्त करने का प्रयोग किया गया है। पर अपेक्षित नतीजे अभी तक सामने नहीं आ पा रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाओं की दशा को सुधारने के लिए इन जगहों पर काम कर रहे डाॅक्टरों को अतिरिक्त सुविधा दिए जाने की चर्चा भी गाहे-बगाहे चलती रहती है।

गांवों में सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था चरमराने की वजह से झोलाछाप डॉक्टर जमकर चांदी काट र हे हैं। जिन्हें ना ही उचित प्रशिक्षण मिला होता है और ना ही इनका मकसद जनसेवा होता है। झोलाछाप डॉक्टरों की वजह से हर साल हजारों लोगा काल कवलित हो जा रहे हैं। इसके बावजूद इनका धंधा मंदा पड़ने का नाम नहीं ले रहा है। क्योंकि गांव के लोगों के पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। इसलिए मजबूरन उन्हें झोला छाप डाॅक्टरों के पास ही जाना पड़ रहा है।

अहम सवाल यह है कि आखिर इस गंभीर समस्या से निजात पाने के लिए क्या किया जाए? देशवासियों को जरूरी चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध हों, यह कैसे सुनिश्चित किया जाए? जानकारों का मानना है कि इसके लिए सबसे जरूरी यह है कि तेजी से बढ़ती आबादी और उसकी स्वास्थ्य ज़रूरतों को देखते हुए चिकित्सकों की संख्या भी तेजी से बढ़ाया जाए। साथ ही अन्य स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या बढ़ाए जाने की भी आवश्यकता है। इसके लिए नए मेडिकल काॅलेज खोले जाने की दरकार है।

 साथ ही साथ सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ग्रामीण क्षेत्रों में जिन डाॅक्टरों की नियुक्ति की गई है, वे अपने अस्पताल में मौजूद रहें। सरकारी अस्पतालों में काम करने वाले कई चिकित्सक अपना निजी अस्पताल भी चला रहे हैं। इसका भी बहुत नकारात्मक असर सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है। इन सेवाओं को सुधरने के लिए इस प्रवृत्ति पर भी अंकुश लगाना होगा।

 इसके बगैर तमाम सरकारी दावे हवा-हवाई ही साबित होंगे। इसका खामियाजा सत्ता सुख भोगने वालों को चुनाव में भुगतना पड़े या न पड़े लेकिन आम लोगों को तो भुगतना ही पड़ेगा। आज भी देश में एक बड़ा तबका वैसा है जिसके लिए सरकारी दावों का बहुत ज्यादा मतलब नहीं होता। उसे तो बस इस बात से मतलब होता है कि जब वह या उसके घर का कोई बीमार पड़े तो पास के अस्पताल में इलाज हो जाए। पर दुर्भाग्य से इस कसौटी पर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था खरी उतरती हुई नहीं दिख रही है।

One Response to “बिगड़ी हालत सेहत की-हिमांशु शेखर”

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *