लेखक परिचय

प्रमोद भार्गव

प्रमोद भार्गव

लेखक प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक मीडिया से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार है ।

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प्रमोद भर्गव

कश्मीर के अलगाववादी नईम अहमाद खान पर किए गए टीवी समाचार चैनल ‘आज तक‘ के स्टिंग से हुर्रियत काॅन्फ्रेंस में कलह तेज हो गई है। इस स्टिंग से खुलासा हुआ है कि जम्मू-कश्मीर में विंध्वसक गतिविधियों में लश्करे तैयबा प्रमुख हाफिज मोहम्मद सईद प्रमुख भूमिका निभा रहा है। इस बाबत पिछले 6 माह के भीतर नईम खान के स्टिंग में कबूलनामे के मुताबिक 70 करोड़ रुपए मिल चुके है। नईम खान ने धनकुबेर बने पत्रकार से कहा कि ‘हमें 300 से 400 करोड़ रुपए मिल जाएं तो कश्मीर को 3 से 4 माह तक अशांत रखा जा सकता है। इस अराजकता को कायम रखने के लिए रेलवे स्टेशन, अस्पताल और स्कूल जला दिए जाएंगे। अब तक 35 स्कूल जला भी चुके हैं।‘ स्टिंग के प्रसारण के बाद जब राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने अलगाववादियों पर शिकंजा कसने की शुरूआत की तो कट्टरपंथी संगठन हुर्रियत के प्रमुख सैयद अली शाह गिलानी ने नईम खान को हुर्रियत से बाहर का रास्ता दिखाते हुए उसे प्राथमिक सदस्यता से निलंबित कर दिया है। नईम पिछले 5 साल से हुर्रियत का प्रांतीय प्रमुख था। यह धन पाकिस्तान से आता था।

हुर्रियत पाकिस्तान से आर्थिक मदद लेकर देश को किस तरह से बर्बाद करने पर तुली है, इस खुलासे के बाद कश्मीरी अलगाववादियों पर रहम की अब तनिक भी गुंजाइश नहीं रह गई है। हालांकि पहले भी अलगाववादियों के खिलाफ पाकिस्तान से धन लेकर अराजकता फैलाने के आरोप लगते रहे हैं। किंतु पहली बार किसी अलगाववादी नेता ने पाकिस्तान से धन लेने की बात स्वीकारी है। इसके बात एनआईए ने कश्मीर के अलगाववादियों के खिलाफ कार्यवाही शुरू कर दी है। इस सिलसिले में गिलानी, नईम, फारूक अहमद डार, बिट्टा कराटे और गाजी जावेद बाबा से पूछताछ शुरू कर  दी है। ये लोग कश्मीर में आतंकवाद के सरंक्षण का चेहरा बने हुए हैं। हालांकि इन्होंने टीवी चैनल पर हुए खुलासे के संबंध में स्पश्टीकरण देने में अनाकानी की थी, लेकिन एनआईए ने शक्ति दिखाई तो भीगी बिल्ली बनकर षरणार्गत हो गए। प्राथमिक जांच में इन अलगाववादियों के नाम दर्ज किए जाने के बाद एनआईए ने हवाला के जरिए आतंकी हरकतों के लिए मिलने वाले धन के सिलसिले में सबसे अलग-अलग बातचीत शुरू की है।

पाकिस्तान और लश्कर-ऐ-तैयबा के सरगना हाफिज सईद से पैसे लेकर कश्मीरी नौजवानों को बंदूक थमाने की असलियत सामने आने से हतास अलीशाह गिलानी ने सफाई के लिए अपने निवास पर बैठक बुलाई थी। लेकिन स्थानीय पुलिस ने अलगाववादी नेताओं को गिलानी के घर में यह कहकर प्रवेश नहीं दिया कि गिलानी नजरबंद हैं और वे अपने परिवार के सदस्यों के अलावा किसी से नहीं मिल सकते हैै। बावजूद गिलानी ने अपने बयान में कहा है कि हम अपनी तहरीख चलाने के लिए धन स्थानीय स्तर पर ही जुटाते हैं। 2016 में जो लोग सड़कों पर आए, वह अचानक ही बुरहान वानी की मौत से प्रभावित होकर आए थे। इसमें पाकिस्तान का कोई हाथ नहीं था। हालांकि खुलासे के बाद नईम ने बेहिचक मंजूर किया है कि ‘कश्मीर में जारी तहरीक मे पाक की भूमिका एक प्रमुख पक्षकार की है। वह हिंदुस्तान के खिलाफ कश्मीरियों का राजनीतिक दृष्टि से नैतिक समर्थन कर रहा है।‘

इस खुलासे के बाद देश के राजनैतिक विपक्ष और मावाधिकार संगठनों की आंखें खुल जानी चाहिए ? सेना के साथ जो कश्मीरी युवक बदतमीजी कर रहे हैं, उन्हें उकसाने के लिए पाकिस्तान कश्मीर के अलगाववादियों के लिए धन मुहैया करा रहा है। इसी ऐवज में स्थानीय नौजवान पाकिस्तान अथवा आईएस के झंडे उठाकर आतंकियों के मददगार बन रहे हैं। इससे साफ होता है कि कश्मीर में स्वायत्त्ता के बहाने जो भी  आंदोलन हो रहे हैं, दरअसल वास्तव मेें वे पाकिस्तान से निर्यात आतंकवादी गतिविधियों का राष्ट्रविरोधी हिस्सा हैं। इसीलिए सेनाध्यक्ष विपिन रावत ने इन युवकों के खिलाफ कड़ी कानूनी कार्यवाही के संकेत दिए थे। अब समझ आ रहा है कि सेनाध्यक्ष की यह आक्रमता उचित थी। दरअसल वादी में सुरक्षाकर्मी इसलिए ज्यादा हताहत हो रहे हैं, क्योंकि स्थानीय लोग धन लेकर सुरक्षा अभियानों में बाधा डालने में लगे हैं। पत्थर बाज युवक पत्थरों के साथ बोतलबंद पेट्रोल बमों का इस्तेमाल करने लगे हैं। जबकि सेना को पैलेट गन की बजाय गुलेल से मुकाबला करने को विवश किया जा रहा है। इस विरोधाभासी स्थिति में सेना के आत्मरक्षा का सवाल भी खड़ा होता है ? वैसे भी जब सैनिक को शपथ और प्रशिक्षण दिलाए जाते हैं, तब देशद्रोही के विरुद्ध ‘ षूट टू किल‘ मसलन गोली मार देने का पाठ पढ़ाया जाता है। वैसे भी दुनिया के किसी भी देश में फौज हिंसा का जवाब, हिंसा से देने के लिए रखी जाती है, न कि बम का जवाब गुलेल से देने के लिए ? कुछ  ऐसे ही कारण हैं कि घाटी में पाकिस्तान द्वारा भेजे गए आतंकियों के हाथों शहीद होने वाले सैनिकों की संख्या पिछले 5 साल में सबसे ज्यादा 2016 में तो रही ही, 2017 के इन 5 माहों में भी सबसे अधिक सैनिक हताहत हुए हैं। दो सैनिकों के तो सिर तक काट लिए गए हैं।

सरकार की नीतियों अथवा अपनी जायज मांगों को लेकर प्रदर्शन का अधिकार संविधान ने देश के हर एक नागरिक को दिया है। देशभर में आए दिन प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए कभी-कभी लाठीचार्ज किया जाता है या आसूं गैस अथवा तेज पानी की बौछारें छोड़कर उग्र होती भीड़ को काबू में लिया जाता है। लेकिन घाटी में प्रदर्शनकारियों पर नियंत्रण के लिए पैलेट गन के इस्तेमाल का अधिकार सेना और सुरक्षा बलों को मिला हुआ है। प्रदर्शनकारी जब सुरक्षाबलों पर पथराव करने से बाज नहीं आते तो बलों को मजबूर होकर पैलेट गन चलानी पड़ती हैं। ऐसा इसलिए भी होता है, क्योंकि वादी में होने वाले ज्यादातर प्रदर्शनों में अलगाववाद की बू आती है। इस दौरान ये देश विरोधी नारे लगाते हुए पाकिस्तानी झण्डे फहराते हैं। पाकिस्तान जिंदाबाद के नारे भी लगाते है।  इन हरकतों को देशद्रोह न मानकर क्या माना जाए ? ऐसे में राष्ट्रभक्त सैनिक पैलेट गन न चलाएं तो क्या करें ? अब नईम खान र्के िस्टंग के बाद भारत को कश्मीर के संबंध में अपनी नीति पर पुनर्विचार की जरूरत है ?

हमारी अदालतें भी मानवाधिकार संगठनों की तरह अलगाववादियों के पक्ष में उदारता जताने लग जाती हैं। शीर्श न्यायालय ने अफस्पा के संदर्भ में नई व्यवस्था कायम कर दी है। इसके अनुसार जिन अशांत क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की उग्रवादी तत्वों से मुठभेड़ होती है और उसमें यदि कोई उग्रवादी मारा जाता है तो इस मुठभेड़ की प्राथमिकी दर्ज कराना लाजिमी है। हालांकि नरेंद्र मोदी सरकार ने अफस्पा के परिप्रेक्ष्य में अपना रुख साफ कर दिया है। सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में सुधार याचिका दाखिल करके उपरोक्त आदेश को वापस लेने का निवेदन किया है। महाधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा है कि भारतीय सेना को परिस्थितियों के अनुरूप त्वरित निर्णय लेने की शक्तियां देना जरूरी है। क्योंकि सेना असामान्य परिस्थितियों में काम करती है। उसे पाकिस्तान से निर्यात आतंकियों द्वारा अचानक किए हमलों से भी दो-चार होना पड़ता है, इसलिए इन परिस्थितियों में हुई मुठभेड़ों की वैसी जांच-पड़ताल संभव नहीं है, जैसी सामान्य मौतों के बाद होती है। लिहाजा प्राथमिकी का प्रावधान अस्तित्व में बना रहता है तो आतंकवाद विरोधी कार्यवाहियां प्रभावित होंगी और सैनिकों के अतंर्मन में यह असमंजस और भय रहेगा कि उनकी गौलियों से कोई आतंकी मारा जाता है तो उनके विरुद्ध भी एफआईआर दर्ज की जा सकती है। हवन करते हाथ जलने की इस कहावत के चलते भला कोई सैनिक सख्ती बरतने की हिम्मत कैसे जुटा पाएगा ? साफ है सरकार का मकसद है कि सैन्य कार्यवाहियों के दौरान लोगों के हताहत होने की घटनाओं को न्यायिक प्रक्रिया के दायरे में नहीं लाया जा सकता है ? वैसे भी अफस्पा कानून संसद के दोनों सदनों से पारित अधिनियम है, जिसकी संवैधानिकता की पुश्टि स्वयं सर्वोच्च न्यायालय कर चुका है। लिहाजा मानवाधिकारों के बहाने ऐसे कानूनों में फेरबदल कतई उचित नहीं है। वैसे भी जब सेना हथियारों से लैस आतंकियों और उपद्रवियों से मुकाबला कर रही हो, तब उस पर किसी प्रकार के अंकुष लगाने की बजाय, उसे बेहिचक और बैखोफ अपनी शक्ति के इस्तेमाल की छूट देने की जरूरत है। कश्मीर में पाक से धन लेकर कश्मीर को बर्बाद करने पर तुले अलगाववादी और धंधेबाज पत्थरबाजों को नियंत्रित करने के लिए सेना और सुरक्षाबलों को छूट नहीं दी गई तो कालातंर में उनका आत्मबल टूट सकता है ? और आत्मबल टूटा तो वे घाटी में सक्रिय आतंकियों और पाकिस्तान परस्त अलगाववादियों से सामना करने की स्थिति में ही नहीं रह जाएंगे। स्टिंग में नईम के खुलासे के बाद सरकार को कश्मीर में कठोर से कठोरतम कदम उठाने की जरूरत है।

 

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