नागरिकता पर सवाल उठा क्या!

भारत के में  मुसलमानों का इतिहास खोजना मेरा मक़सद नहीं हैं, लेकिन जब से इस प्रायद्वीप में मुसलमान आये तब से ही उनके प्रेम सौहार्द्य और टकराव की कहानियाँ शुरू हो गईं।अग्रेज़ो ने जाते जाते धर्म के आधार पर पाकिस्तान बनवा  दिया,जिसका एक टुकड़ा अब बंग्लादेश है।ये दोनो देश इस्लामिक देश रहे पर हमारे उस समय के नेताओं ने भारत को धर्मनिर्पेक्ष राष्ट्र रखा फिर भी कुछ हिंदू और अन्य गैर मुस्लिम वहाँ छुट गये जो बद से बद्तर ज़िंदगी जीते रहे।भारत में मुसलमानों से कभी भेद भाव नहीं हुआ योग्यता थी इसलिये हमारे मुस्लिम राष्ट्रपति भी हुए, नेता भी हुए और भारतीय क्रिकेट व अन्य खेलों के कप्तान हुए।मुसलमान होने के कारण कभी उनकी योग्यता पर शक नहीं किया गया।कभी कभी कहा जाता है कि मुसलमानों को घर किराये पर लेने में दिक्क़त होती है इसका कारण उनका मुसलमान होना नहीं बल्कि माँसाहार भोजन से दूर रहना होता है।पिछले सत्तर सालों में अल्पसंख्यक के नाम पर मुसलमानों  का तुष्टीकरण करने के आरोप लगे, उनकी बढ़ती जनसंख्या और कुछ दबंग मुसलमान नेताओं से हिंदुओं को ख़तरा महसूस होने लगा।कुछ कट्टर हिंदुत्ववादी ताक़ते  भीउ भरने लगी।

नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में मुसलमानों को भरोसा नहीं था,जबकि उन्होने कभी मुस्लिम विरोधी कोई बात नहीं की।बीजेपी के कुछ नेताओं ने अनर्गल प्रलाप किये, तो मुसलमानों और कौंग्रेस ने भी ज़हर उगला।भारत में मयनमार पाकिस्तान बंग्लादेश और अफगानिस्तान से लगातार शरणार्थी और अवैध घुसपैठियों के साथ आतंकी भी आते रहे।सी.ए.ए कानून में मुसलमानों को छोड़कर बाकी धर्म के लोगों नागरिकता देने की बात मुसलमानों और कुछ हिंदुओं को असंवैधानिक लगी। बात न्यायालय में थी तो भी निर्णय का इंतज़ार किये बिना हिंसक/अहिंसक आँदोलन शुरू हो गये।सी. ए.ए. में मुसलानों कोन शामिल करने का मक़सद भारत के मुसलमानों से भेदभाव था ही नहीं। सोचने वाली बात है कि जिन तीन देशों की बात की गई है वो तीनों इस्लामिक देश हैं वहाँ से कोई प्रताड़ित मुसलमान तो आयेगा नहीं।ऐसा भी नहीं है कि इन देशों से आये मुसलमानों को नागरिकता न देने की कोई कसम उठाई गई थी। आख़िर अदनान सामी और तस्लीमा नसरीन को नागरिकता दी गई थी।मोदी जी चाहते तो CAA में मुसलमानों का ज़िक्र भी न करते । हाँ ये ग़लती तो हुई   है क्योंकि यह वाक्य देखने में धर्मनिर्पेक्षता के अनुकूल नहीं था जिसके विरोध मे विपक्ष पक्ष के नेताओं ने खूब बयानबाज़ी की। विपक्ष को तो मोदी जी और बीजेपी को कोसने का बहाना मिल गया। शाहीनबाग़ उग गया। वहाँ फंडिग कहाँ से हुई सब जानते हैं।पूर्वोत्तर दिल्ली में भयानक दंगे हुए। बात का बतंगड बना या राई का पहाड़ पर जाने दोनों तरफ़ की गईं करोड़ो़ रुपये की संपत्ति नष्ट हुई पर किसी की नागरिकता पर कोई सवाल नहीं  उठा……इसलिये इतना  दूर की सोचने की ज़रूरत ही क्या थी इंगलिश में एक कहावत है Cross the bridge when it cimes!

Leave a Reply

%d bloggers like this: