लेखक परिचय

विजय कुमार

विजय कुमार

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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भारत की हमारी महान सरकार ने तय कर लिया है कि वो हर चीज को डिजीटल करके रहेगी। वैसे तो ये जमाना ही कम्प्यूटर का है। राशन हो या दूध, रुपये पैसे हों या कोई प्रमाण पत्र। हर चीज कम्प्यूटर के बटन दबाने से ही मिलती है। जब से मोबाइल फोन स्मार्ट हुआ है, तब से पूरी दुनिया सचमुच मुट्ठी में आ गयी है।

लेकिन हमारे शर्मा जी का मानना है कि हर चीज की कोई न कोई सीमा होती है। बात इससे आगे निकल जाए, तो मामला खतरनाक हो जाता है। सरकार ने राशन पर तो सीमा बांध दी, पर भाषण पर नहीं। इसलिए कई नेता बिना सोचे समझे बोलते चले जाते हैं। एक नेता जी भाषण के दौरान कई बार संकेत देने पर भी जब नहीं माने, तो संचालक महोदय ने माइक ही बंद करा दिया। झक मार कर उन्हें बैठना ही पड़ा। एक नेता जी को आंख बंद करके बोलने की आदत थी। चुनाव के दौरान एक बार तीन घंटे के धाराप्रवाह भाषण के बाद जब उन्होंने आंख खोली, तो वहां दरी पर कुछ कुत्ते लमलेट हो रहे थे। नेता जी ने उन्हीं से वोट की अपील कर अपना भाषण समाप्त किया।

बस ऐसी ही कुछ बात इन दिनों हो रही है। सरकार ने तय किया है कि वह ‘डिजीटल शौचालय और स्नानघर’ बनाएगी। जब से शर्मा जी ने ये खबर पढ़ी है, तबसे वे बहुत परेशान हैं। असल में पेट खराबी के कारण उन्हें दिन में कई बार वहां जाना पड़ता है। दफ्तर में भी सीट पर न होने की स्थिति में वे प्रायः वहीं पाये जाते थे। यद्यपि रिटायर होने के कारण अब घर पर इसके लिए उन्हें पूरी फुरसत रहती है। फिर भी उनकी समझ में नहीं आ रहा कि ‘डिजशौचालय’ क्या और कैसा होगा ?

क्या वहां समय की सीमा होगी; यदि निर्धारित समय में काम पूरा न हुआ तो; वहां पानी कितना मिलेगा; पैसे नकद देेने पड़ेंगे या वहां कोई ए.टी.एम. या पे.टी.एम. जैसी पेमेंट मशीन होगी; क्या वहां 24 घंटे जागने वाले सी.सी.टी.वी. कैमरे भी होंगे ? बाजार में तो दुकानदार से मोलभाव हो जाता है। शर्मा जी को इसके बिना खरीदारी करने में मजा ही नहीं आता। वहां इसकी गुंजाइश होगी या नहीं ?

इस बारे में उन्होंने मुझसे पूछा। मैंने साफ बता दिया कि मेरा डिजीटल ज्ञान बहुत कम है। इस पर वे गुप्ता जी के पास चले गये। गुप्ता जी का बेटा कम्प्यूटर इंजीनियर है। उसने शर्मा जी को इस बारे में विस्तार से बताया। तबसे वे इस बारे में ही सोचते रहते हैं। परिणाम ये हुआ कि वे पहले से भी ज्यादा परेशान हो गये हैं।

कल इसी बारे में सोचते हुए उनकी आंख लग गयी। नींद में उन्हें लगा कि वे बाजार में घूम रहे हैं। अचानक उन्हें पेट पर कुछ दबाव महसूस हुआ। उन्होंने आसपास देखा, तो सामने एक ‘डिजशौचालय’ दिखायी दिया। शर्मा जी के पास उनके बेटे द्वारा दिया हुआ एक ‘ग्रीन कार्ड’ था। वह हर बैंक या ए.टी.एम. जैसी डिजीटल जगहों पर चल जाता था; पर आज उसमें पैसे बहुत कम थे। शर्मा जी ने उसेे ‘डिजशौचालय’ के दरवाजे पर लगाया। इससे दरवाजा खुल तो गया, पर स्क्रीन पर ये संदेश भी आ गया कि पैसे कम होने के कारण आप छोटा काम कर सकते हैं, बड़ा नहीं। शर्मा जी की जरूरत बड़े काम की थी। उन्हें बहुत गुस्सा आया; पर गुस्सा करें किस पर ? ‘डिजशौचालय’ होने के कारण वहां कोई आदमी था ही नहीं। एक तो पेट पर दबाव, फिर दिमाग में तनाव। भगवान की दया रही कि इस दोहरी परेशानी का दुष्परिणाम होने से पहले ही उनकी आंख खुल गयी।

अगले दिन फिर उन्हें ऐसा ही सपना आया। तब वे एक पर्यटन स्थल पर ‘डिजस्नानघर’ में नहा रहे थे। उन्होंने अच्छे से साबुन लगाया, पर तभी पानी बंद हो गया। हाथ, मुंह और आंखों तक में साबुन लगा था। जैसे-तैसे उन्होंने एक आंख खोलकर सामने स्क्रीन पर देखा। वहां लिखा था, “असुविधा के लिए खेद है। सर्वर डाउन होने से पानी बंद हो गया है। कुछ देर प्रतीक्षा करें।” कुछ देर बार जब उनकी आंख खुली, तो सचमुच मुंह पर कुछ साबुन लगा था। उनकी समझ में नहीं आया कि साबुन सच है सपना ?

ऐसा कई बार हो चुका है। तबसे शर्मा जी अपने घर में भी शौच-स्नान से डरने लगे हैं। हर काम को डिजीटल करने को तत्पर सरकार से मेरा आग्रह है कि शर्मा जी जैसे बुजुर्गों का भी ध्यान रखे। चीते की गति से दौड़ते हुए भी जमीन पर पैर टिकाए रखना जरूरी है। क्योंकि विज्ञान कितना भी उन्नति कर ले; पर कम्प्यूटर आदमी के लिए है, आदमी कम्प्यूटर के लिए नहीं।

– विजय कुमार

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