अखिलेश सरकार की कथनी व करनी में खुला विरोधाभास !

मोहम्मद आसिफ इकबाल

भारत की राजनीति बड़ी दिलचस्प है साथ ही यहां के लोग भी राजनीति में खूब रुचि रखते हैं। छोटा हो या बड़ा, पढ़ा लिखा हो या अनपढ़, कार्यालय में काम करने वाला हो या खेत खलिहान में, चाय की दुकान पर बैठे लोग हों या बसों और ट्रेनों में यात्रा करते यात्री, कोई भी स्थान हो और किसी भी उम्र के लोग, चुनाव के दौरान प्रत्येक व्यक्ति राजनीति पर चर्चा करता नज़र आता है। वहीं दूसरा पहलू यह है कि राजनीति पर चर्चा करने वालों का बहुमत, राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणा पत्र, उसमें किए गए वादों और उनके कार्यान्वयन से सामान्य अनभिज्ञ होते हैं। साथ ही ऐसे लोग भी बड़ी संख्या में हैं जिन्हें ये तक पता नहीं है कि राज्य ने उन्हें क्या अधिकार दिए हैं और कौन सी योजनाएं उनके नाम पर चलाई जा रही हैं। साथ ही वे अधिकार, जो राज्य के प्रत्येक नागरिक को प्रदान किए गए हैं, वे वास्तव में उन्हें प्राप्त है या नहीं? और योजनाएं जो कल उन्हीं के नाम पर शुरू की गई थीं, वह जारी भी हुईं या नहीं? दूसरी ओर राजनीति में अत्यंत रुचि रखने वाली जनता के साथ साथ एक दुर्लभ संख्या ऐसे लोगों की भी मौजूद है जो अपना समय राजनीतिक बहसों में नहीं गुज़ारते, उन्हें वोट देने की भी जरूरत नहीं और न ही वह अपने अधिकारों के लिए धरने प्रदर्शन करते हैं।

उन्हें इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सरकार किस पार्टी की आएगी और किस की नहीं। इसके के बावजूद वह सत्ताधारी सरकार, देश की आर्थिक नीतियों, सामाजिक बदलाव और सभ्यता को दिशा देने वाले लोग होते हैं तथा सरकार पे भी किसी न किसी हद तक उनका नियंत्रण होता है। यह लोग आम तौर पर बड़े पूंजीपति और कॉर्पोरेट कहलाते हैं और पूंजी प्रवाह भी उन्हीं के हाथ में होता है। इस पृष्ठभूमि में राज्य के अल्पसंख्यक और कमजोर वर्गों की सूरते हाल क्या हो सकती है? इसको अच्छी तरह समझ जा सकता है। आइए इन्हीं परिस्थितियों में पिछले 2012 के विधानसभा चुनाव में किए गए वादों की समीक्षा करें साथ ही 2012 से 2016 के दरमियान उत्तर प्रदेश की जनता किन हालात से दो चार हुई? इस पर भी एक सरसरी निगाह डालते चलें।

2017 विधानसभा चुनाव के लिए एक बार फिर समाजवादी पार्टी ने अपना घोषणा पत्र जारी कर दिया है। पार्टी के अध्‍यक्ष अखिलेश यादव, सांसद डिंपल यादव के अलावा पार्टी के अन्‍य नेताओं ने घोषणा पत्र रिलीज किया। यहां यह बात भी अहम है कि चुनावी घोषणा पत्र जारी किए जाने के दौरान मुलायम सिंह यादव और शिवपाल यादव उपस्थित नहीं थे। 32 पन्नों के घोषणापत्र के कवर पेज पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा उनके पिता, सपा संस्थापक, मुलायम सिंह यादव की तस्वीर है, जबकि पिछले पृष्ठ पर अखिलेश के साथ-साथ प्रमुख समाजवादी नेताओं – राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, चौधरी चरण सिंह, जनेश्वर मिश्र तथा चंद्रशेखर के चित्र बने हैं। घोषणापत्र में पूर्व सपा प्रदेश अध्यक्ष शिवपाल यादव की तस्वीर नहीं है। इस दौरान अखिलेश ने कहा कि समाजवादी पार्टी ने पिछले चुनाव में अपने वादों से बढ़ कर काम किया। साथ ही उन्होंने विरोधी पार्टियों बीएसपी, बीजेपी पर निशाना साधा। मायावती पर निशाना साधते हुए कहा कि उनकी सरकार पत्थरों वाली सरकार थी… जो पूछने पर कुछ बोलते ही नहीं। वहीं बीजेपी पर वार करते हुए कहा कि बीजेपी कभी योग करवा देती है तो कभी झाड़ू पकड़ा देती है, लेकिन विकास के वादे तो केंद्र की बीजेपी सरकार भूल ही गई है। उसके बाद एक लंबी लिस्ट उन्होंने अपने कामों की बताई, जिसमें ख़ास तौर से कई शहरों में मेट्रो रेल परियोजना, लखनऊ-आगरा एक्सप्रेस वे का निर्माण, बिजली के आधारभूत ढॉंचे में सुधार कर शहरी क्षेत्रों में 24 घंटे व ग्रामीण क्षेत्रों में 18 घंटे बिजली आपूर्ति, समाजवादी पेंशन योजना, किसानों को मुफ्त सिंचाई, किसान दुर्घटना बीमा योजना, लैपटॉप वितरण, कन्या विद्या धन वितरण और 102/108 एम्बुलेंस जैसे अनेक कल्याणकारी कार्य। कानून व्यवस्था को चुस्त-दुरुस्त बनाने के लिए यू.पी.-100 नंबर वाली ऐतिहासिक योजना। अखिलेश ने दावा किया कि समाजवादी सरकार ने पांच वर्षों के कार्यकाल में उत्तर प्रदेश को उत्तम प्रदेश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। विकास के साथ सामाजिक सद्भाव की धारा को भी मजबूत किया है।

कार्यों की लंबी सूची सुनने और देखने के बावजूद जरूरत है कि उनके वादों और दावों की समीक्षा की जाए कि क्या वास्तव में अखिलेश शासन ने अपने वादे पूरे कर दिए हैं? ख़ास तौर से वह वादे जो मुसलमानों से किए गए थे। इसकी बड़ी वजह यह है कि 2012 में मुसलमानों के एक तरफा वोटों ही का परिणाम था कि समाजवादी पार्टी को बहुमत मिला और सरकार बनाने का मौका भी। इसलिए जरूरी है कि जिन लोगों के आधार पर सपा को शासन मिला, सत्ता हासिल करने के बाद क्या उन लोगों से किए गए वादे भी पूरे हुए या नहीं? इसकी ज़रूर समीक्षा की जानी चाहिए।

हक़ीक़त यह है कि 2012 में समाजवादी पार्टी के घोषणापत्र में जो वादे मुसलमानों से किए गए थे, वे पूरे नहीं हुए। बल्कि अगर कहा जाए कि मुसलमानों की बड़े पैमाने पर अनदेखी की गई तो कुछ गलत नहीं होगा। और यही वह स्थिति है जिसके आधार पर आज 2017 के चुनाव से कुछ दिन पहले, समाजवादी पार्टी की छवि आम मुसलमानों में अच्छी नहीं है। इसके बावजूद महसूस ऐसा हो रहा है कि उन्हें इसकी कोई चिंता भी नहीं है। उन्हें उम्मीद है कि कांग्रेस से गठबंधन के बाद 2012 के मुक़ाबले 2017 में ज्यादा सीटों पर कामयाबी मिलेगी, वहीं इस बात की भी संभावना है कि उनकी खुशफहमी या अति आत्मविश्वास ग़लत साबित हो जाए। इसके बावजूद, परिणाम क्या निकलेंगे यह तो समय ही बताएगा।

 

आइए एक सरसरी निगाह उन वादों और दावों पर डालते चलें जो 2012 में मुसलमानों से किए गए थे। वादा किया गया था कि मुसलमानों को आरक्षण प्रदान किया जाएगा, आतंकवाद के खिलाफ करवाई की आड़ में उत्तर प्रदेश में जिन निर्दोष मुस्लिम नौजवानों को जेलों में डाला गया है उन्हें न केवल तुरंत रिहा कराया जाएगा बल्कि मुआवजे के साथ न्याय भी दिलाया जाएगा। लेकिन रिहाई मंच जैसी संस्था कहती हैं कि सरकार ने इस वादे को न केवल भुला दिया बल्कि निमेश आयोग की रिपोर्ट, जिसमें खालिद मुजाहिद को बेगुनाह पकड़े जाने की बात कही गई थी, उसका भी पालन नहीं किया। रिहाई मंच का यह भी कहना है कि जब वह किसी को रिहा नहीं करेंगे तो उन्हें मुआवजा कैसे दिया जाएगा? वादों की लिस्ट में यह भी था कि मुस्लिम बहुल क्षेत्रों में कॉलेज खोलेंगे, रनगानाथ मिश्रा आयोग और सच्चर कमेटी रिपोर्ट की सिफारिशों के कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार पर दबाव बनाएंगे और जो सिफारिशें राज्य सरकार से संबंधित हैं यानी उनके द्वारा लागू हो सकती हैं उन्हें पूरे उत्तर प्रदेश में लागू क्या जाएगा।

 

आरटीआई कार्यकर्ता आरुषि शर्मा के अनुसार उत्तर प्रदेश सरकार ने सच्चर कमीटी सिफारिशों को लागू करने के लिए कोई पहल नहीं की। 11 फरवरी 2015 को मिले जवाब में उत्तर प्रदेश सरकार ने इस बाबत औपचारिक कोई ऑर्डर जारी नहीं किया। उत्तर प्रदेश के जनसंपर्क अधिकारी आरएन दरवीदी ने मुसलमानों को मुख्यधारा में लाने के लिए सरकार ने क्या किया? जवाब में सूचना का ‘शून्य’ होना लिखा है। चुनाव से पहले राम गोपाल यादव ने सच्चर समिति का तज़किरा करते हुए कहा था कि रिपोर्ट में मुसलमानों को दलितों से भी अधिक पिछड़ा करार दिया है, तब क्यों सरकार मुसलमानों के लिये संविधान में संशोधन करके आरक्षण संभव नहीं बना सकती? लेकिन वही राम गोपाल और उनकी पार्टी ने जब राज्य में सत्ता संभाली तो अपने ही द्वारा किए गए वादे वह भूल गए। कहा गया था कि कि उर्दू के विकास के लिए मुस्लिम बहुल जिलों में प्राथमिक, मध्य और उच्च विद्यालय स्तर पर सरकारी उर्दू मीडियम स्कूल स्थापित किए जाएंगे। वादे की रौशनी में हमें और आपको देखना चाहिए कि किस क्षेत्र में और कहाँ, यह स्कूल खुले हैं और उनकी क्या गुणवत्ता है? इसके विपरीत उत्तर प्रदेश में उर्दू के विकास के लिए स्थापित ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती उर्दू, अरबी, फारसी विश्वविद्यालय से उर्दू ही को निकाल दिया गया। वहीं यह वादा भी किया गया था कि सभी सरकारी आयोगों, बोर्डों और समितियों में कम से कम एक अल्पसंख्यक प्रतिनिधि बतौर सदस्य नामित किया जाएगा, इस पर भी कोई व्यवस्थित काम नहीं हुआ। एक वादा यह भी था कि वक्फ बोर्ड की संपत्ति पर अवैध कब्जे हटाकर उन्हें वक्फ बोर्ड को सौंप दिया जाएगा। वक्फ संपत्तियों को भूमि अधिग्रहण कानून के दायरे से बाहर रखा जाएगा, के संदर्भ में समर्पित जायदादों के संरक्षण के लिए अलग कानून बनाना, 2012 के घोषणा-पत्र में शामिल है। लेकिन आज तक यह सवाल बाकी है कि यह कानून कब बनेगा? और अब जबकि पार्टी का चुनाव घोषणापत्र 2017 जारी हो गया है, उसमें पिछले वे वादे जो 2012 में किए गए थे, मौजूद नहीं हैं। ऐसा क्यों है? यह खुद अपने आप में एक बड़ा सवाल है। लेकिन एक पल के लिए ठहरिये! और अखिलेश सरकार की कथनी व करनी की समीक्षा कीजिए, साथ ही अपने वोट की अहमियत, जानते पहचानते हुए फैसला कीजिए कि इस बार किसे और क्यों वोट देंगे !

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