परेशान करती है कश्मीर की जमीनी सच्चाई

 केवल कृष्ण पनगोत्रा

कश्मीर मुद्दा स्वार्थ की राजनीति का एक ऐसा अखाड़ा बन चुका है जहां अपनी-अपनी दृष्टि और गणित के हिसाब
से वोटों के लाभ और हानि का जोड़ना-घटाना चलता रहता है। बात ज़मीन पर खीचीं गई सीमा रूपी कच्ची-पक्की
लकीरों की करें तो भारत ही नहीं पाकिस्तान में भी कश्मीर सत्ता की सियासत का ख़ास मोहरा बन चुका है।
इससे पहले कि कश्मीर मुद्दे का स्थानीय विश्लेशण किया जाए, यह जान लेना भी जरूरी है कि कश्मीर की विश्व
में एक रणनीतिक महत्ता भी है। भारतीय उपमहाद्वीप का यह उत्तरी छोर दक्षिण एशिया का एक रणनीतिक मोर्चा
और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर पर्वतीय भू-भाग भी है जिस पर अमेरिका और चीन की वर्तमान में विशेष दृष्टि
है। मोहरा पाकिस्तान है, जिससे न अमेरिका रूठता है और न चीन छोड़ता है। ….और कश्मीर के नाम पर जो
बारूद जलाया जा रहा है उसकी प्रत्यक्ष या परोक्ष भुक्तभोगी आम जनता हैै। धरातल पर लाशें हैं और लाशों पर
राजनीति है। 1989-90 से कश्मीर जल रहा है। कश्मीरी पंडित अपने ही देश और अपने ही राज्य में विस्थापित हैं।
छोटे-बड़े कई विस्थापन हुए हैं।
1947 में पाकिस्तान का वजूद में आना धर्म आधारित द्विराष्ट्रवादी सिद्धांत का प्रतिफल था और यही कारण था
जब पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर को एक मुस्लिम बहुल राज्य और द्विराष्ट्रवाद की दृष्टि से देखा। 1947 से पूर्व
जम्मू-कश्मीर भारत का हिस्सा नहीं था। यहां पर डोगरा राजशाही राज करती थी। कश्मीर घाटी की जनता को
राजशाही से कुछ शिकायतें थीं। शेख अब्दुल्ला द्वारा स्थापित मुस्लिम कांफ्रैंस (वर्तमान में नेशनल कांफ्रैंस) के
नेतृत्व और झंडे के नीचे घाटी में 1932 के दौरान ‘कश्मीर छोड़ो‘ आदोलन भी चला था। मगर 1947 में भारत
विभाजन के बाद जब पाकिस्तान ने कबाइलियों की आड़ में जम्मू-कश्मीर पर आक्रमण किया तो हालात से मजबूर
डोगरा राजा हरिसिंह को राज्य बचाने के लिए भारत के साथ विलय का दस्तावेज साइन करना पड़ा, जिससे जम्मू-
कश्मीर भारत का ही भू-भाग प्रतिपादित कर लिया गया। शेख अब्दुल्ला जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री और जम्मू-
कश्मीर के शासक महाराजा हरिसिंह के बेटे डॉ. कर्णसिंह को सदर-ए-रियासत यानि राज्यपाल नियुक्त किया गया।
भारतीय संविधान की धारा-1 के तहत राज्य भारत का अंग माना गया और राज्य को धारा 370 के तहत विशेष
दर्जा दिया गया। लेकिन इसके बावजूद भी जम्मू कश्मीर कई प्रकार की राजनैतिक उथल-पुथल का साक्षी रहा।
13 नवम्बर, 1974 को इंदिरा-शेख समझौता हुआ और शेख अब्दुल्ला कांग्रेस के सहयोग से राज्य के मुख्यमंत्री
बने। यह समझौता लोगों के लिए आशा की एक किरण थी। लोगों को आशा हुई कि एक असहनशील एकजुट राज्य
यानि ओवरवियरिंग युनिटेरियन स्टेट से कश्मीरियों को स्वतंत्रता प्राप्त होगी। लेकिन घाटी में रोष बढ़ता रहा। शेख
अब्दुल्ला ने भी कहा था कि उनके साथ चपरासी की तरह व्यवहार किया जा रहा है।
वर्तमान में श्रीनगर और दिल्ली के बीच टकराव यह है कि भारत आतंकवाद को गैर राजनैतिक मानता है और राज्य
का कश्मीर केंद्रित नेतृत्व, जिसमें मुख्यतः पीडीपी (पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी) और नेकां (नेशनल कांफ्रैंस) शामिल हैं,
कश्मीर मुद्दे को राजनैतिक मानता है। भारत का मानना है कि पाकिस्तान के साथ मात्र आतंकवाद पर बात की
जा सकती है और वह भी तब जब पाकिस्तान आतंकवाद को शह देना बंद कर देगा। कश्मीरी नेत्त्व कहता है कि

कश्मीर राजनैतिक मुद्दा है और इसे राजनैतिक तरीके से पाकिस्तान को शामिल कर हल किया जाना चाहिए। केंद्र
और राज्य के स्थानीय नेतृत्व के बीच 1990 के बाद इसी खंेचातान के चलते राज्य की उस पहचान को नुक्सान
पहुंच रहा है जिसके चलते जम्मू-कश्मीर को भारत का ताज कहा जाता है। जिस प्रकार भारत विविधताओं से भरपूर
एक संपूर्ण देश है उसी प्रकार जम्मू-कष्मीर भी विविधताओं से परिपूर्ण है। मगर दुर्भाग्य है कि जम्मू-कश्मीर सत्ता
और वोटों की स्वार्थपरक राजनीति का अखाड़ा बनता जा रहा है। राजनैतिक स्वार्थ के इस अखाड़े में धर्म, क्षेत्र,
संस्कृति और भाषा स्वार्थपरक राजनीति से पैदा हुई घृणा के हथियार बने हुए। कहीं कश्मीरियत तो कहीं डोगरी और
डुग्गर को वोटों के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। जन सरोकार पीछे छूटते जा रहे हैं। 1990 के बाद, जब
आतंकवाद चरम पर था, कश्मीर मुद्दे पर अनगिनत सुझाव और अनगिनत तरीके आजमाये गए फिर भी कश्मीर
एक ऐसे नासूर की तरह बन गया है जिसकी तकलीफ कम होती नजर नहीं आ रही। यह तकलीफ न आर्थिक पैकेज
बांटने से कम हो रही और न ही बन्दूक और बारूद से। 1947 में कश्मीर मसले के आयाम सीमित थे। अब हवाला
का लालच और सत्ता की स्वार्थपरक राजनीति भी इसमें शामिल है। वोटों के जरिए सत्ता पाने की चाहत ने कश्मीर
में मुख्यधारा की राजनीति को अलगाववाद के करीब लाया। अब कष्मीर के स्थानीय राजनीतिक दल और
अलगाववादी एक दूसरे के पूरक लगने लगे हैं। स्वार्थ के इस अखाड़े में शांति की चाहत रखने वाली आम जनता
परेशान है। कश्मीर में जिस प्रकार से 1989-90 से इंसानी लाशों पर राजनीति हो रही है उससे तो यह भी स्पष्ट
होता है कि कहीं न कहीं कश्मीर के साथ राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय राजनैतिक हलकों के हित भी जुड़े हुए हैं। प्रश्न
उठता है कि अमेरिका अगर दुनिया से आतंकवाद का खात्मा चाहता है तो पाकिस्तान जैसे आतंकवाद के कारखाने
को आर्थिक और सैन्य सहायता देना बंद क्यों नहीं करता? स्वार्थपरक राजनीति को अब कष्मीर के समाधान की
जरूरत कम है। जरूरत है तो नफरत और लाशों पर राजनैतिक रोटियां गरम करने की ताकि सत्ता का सुख मिल-
बांट कर भोगते रहें।
देखा जाए तो सत्ता के लिए भारत के किसी भी राजनैतिक दल को कश्मीर केंद्रित अलगाव समर्थक पार्टियों के साथ
मिलकर सरकार बनाने में कभी कोई हिचक नहीं हुई। राज्य में पीडीपी और भाजपा का हालिया मिलन, जब दोनों
धुर विरोधी पार्टियों ने 2015 में मिलकर सरकार बनाई, सत्ता लोलुपता का एक ताजा उदाहरण है। भाजपा ने जब
देखा कि पीडीपी के साथ ज्यादा देर सत्ता सुख भोगना राज्य के जम्मू संभाग में जनाधार को कमजोर कर रहा है तो
पीडीपी के साथ नाता तोड़ना भाजपा को लाभकारी लगा। 2008 के विधानसभा चुनावों के समय तो भाजपा नेकां के
साथ मिलकर सरकार बनाने के सपने देख रही थी। तब राज्य में भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में धारा 370
का जरा भी उल्लेख नहीं किया था।
जम्मू-कश्मीर में जरूरत इस बात की है कि स्वार्थपरक राजनीति के हेर-फेर से निकल कर धरातल पर भी उतरा
जाए।
कैसा है जम्मू-कश्मीर का रंक्तरंजित वर्तमान? इस वर्तमान को समझने के लिए एक बालकथा का उल्लेख जरूरी हो
जाता है। एक गिद्ध का बच्चा अपने माता-पिता के साथ रहता था। एक दिन बच्चा अपने पिता से बोला, ‘पिता
जी, मुझे बहुत भूख लगी है।‘
पिता ने कहा, ‘ठीक है। तू थोड़ी देर इंतज़ार कर, मैं अभी भोजन लेकर आता हूं।‘ कहते हुए गिद्ध जब उड़ने को
हुआ तो बच्चे ने उसे टोक दिया। बच्चा बोला, ‘पिताजी, आज इन्सान का मांस खाने को दिल कर रहा है।‘

‘ठीक है, मैं देखता हूं‘ , पिता ने कहा।
गिद्ध ने चांेच से अपने बेटे का सिर सहलाया और बस्ती की ओर उड़ गया। गिद्ध बस्ती के पास पहुंच कर इधर-
उधर मंडराता रहा मगर इन्सान का मांस लेने में सफलता नहीं मिली। यहां-वहां उसे मरे हुए जानवर जरूर मिल
जाते। थक हारकर वह एक मरे हुए सुअर का गोश्त लेकर अपने घोंसले में पहुंचा।
‘पिताजी, मैंने तो आपसे इन्सान का मांस लाने को कहा था, आप तो सुअर का मांस लेकर आ गए?‘ बेटे ने सवाल
किया।
बेटे का सवाल सुन कर गिद्ध झेंप गया। वह बोला, ‘तू थोड़ी सी और प्रतीक्षा कर, मैं आता हूं।‘ कहते हुए गिद्ध
फिर से उड़ गया। उसने फिर से बस्ती का चक्कर लगाया मगर सफलता नहीं मिली। घोंसले की तरफ लौटते हुए
उसकी दृष्टि एक मरी हुई गाय पर पड़ी। गिद्ध ने अपनी पैनी नुकीली चोंच से गाय के मांस का एक टुकड़ा तोड़ा
और बच्चे के लिए ले गया। गिद्ध का बच्चा फिर से बिगड़ उठा और बोला, ‘पिताजी, यह तो गाय का मांस है।
मुझे तो सिर्फ इन्सान का मांस खाना है। आप मेरी इतनी सी इच्छा भी पूरी नहीं कर सकते?‘
बेटे की बात सुनकर गिद्ध बहुत शर्मिंदा हुआ। गिद्ध ने अब मन ही मन एक योजना बनाई और अपने उद्देश्य को
पूरा करने के लिए निकल पड़ा। गिद्ध ने सुअर के मांस का एक बड़ा सा टुकड़ा उठाया और उसे मस्जिद के अहाते
में डाल दिया। उसके बाद उसने गाय के मांस का टुकड़ा उठाया और मंदिर की दीवार के पास फेंक दिया। मांस के
टुकड़ों ने अपना काम किया और देखते ही देखते पूरे क्षेत्र में नफरत की आग भड़क गई। रात होते-होते चारों तरफ
इन्सांनों की लाशें बिछ गईं। यह देखकर गिद्ध बहुत खुश हुआ और मानव मांस का टुकड़ा लेकर घोंसले की ओर
चल दिया।
सवाल यह उठता है कि सत्ता का मनमाफिक स्वाद हासिल करने के लिए तल्ख सच्चाई से हमारे राजनीतिक
कर्णधार मुंह क्यों चुराते हैं? जम्मू-कश्मीर में भी गिद्ध जैसी योजनाओं से माहौल खराब करके उद्देश्य पूर्ति में
आखिर शामिल कौन हैं? गिद्ध जैसे सियासी खेल जम्मू-कश्मीर की प्रारब्ध तो नहीं है? यह सवाल भी है और
धरातल का कटु सत्य भी
Unpublished matter
Kewal Krishan Pangotra
16/6/2019

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