“क्या हमें अपना व अपने अतीत और भविष्य का पता है?”

मनमोहन कुमार आर्य

हम इस जन्म में मनुष्य योनि में उत्पन्न हुए हैं। हम क्या हैं, यह अधिकांश मनुष्यों को ज्ञात नहीं है। कारण यह है कि न तो हमारे माता-पिता और न ही हमारे स्कूलों के आचार्य ही जानते हैं कि मनुष्य की आत्मा का स्वरूप क्या है? स्कूलों में हमें यह विषय पढ़ाया ही नहीं जाता। हमारे देश में कुछ मत-मतान्तर प्रबल हैं। जितने भी मत-मतान्तर हैं वह जीवात्मा के विषय में बहुत कम जानते हैं व बातें करते हैं जिनमें सत्य कम असत्य अधिक होती हैं। बहुत से तो सत्य आत्मा के अस्तित्व को भी नहीं मानते। इस कारण मनुष्य अपनी आत्मा व अस्तित्व के विषय में भ्रमित हैं। वेद व वैदिक साहित्य का अध्ययन करने पर जीवात्मा के विषय में पूर्ण ज्ञान प्राप्त होता है। यह एक ऐसा विषय है कि इसके बारे में सभी मनुष्यों को अनिवार्य रूप से ज्ञान होना चाहिये। इससे हमें बहुत से लाभ होते हैं। जानने पर मनुष्य को अनेक हानियां भी होती हैं। हमारी आत्मा एक चेतन तत्व है। यह ज्ञान का ग्राहक, संवदेनशील, भावनाओं से युक्त कर्म करने की शक्ति से युक्त होता है। मानव जन्म व अन्य जन्म मिलने से आत्मा की ज्ञान व कर्म की शक्तियां कुछ विकसित व प्रभावी होती हैं परन्तु शरीर से वियुक्त होने पर वह स्वयं के अस्तित्व से भी अनभिज्ञ रहता है। जन्म लेने के बाद इसे माता-पिता ज्ञान कराते हैं व यह आचार्यों की शरण में जाकर यह ज्ञान की प्राप्ति करता है। मनुष्य से इतर योनियों में जो ज्ञान होता है वह परमात्मा का उन योनियों में व्यवहार करने के लिये दिया गया स्वाभाविक ज्ञान होता है जिससे उनका काम चल सके। मनुष्य योनि में परमात्मा ने मनुष्यों को वाणी भी दी है, बुद्धि भी दी है और सृष्टि के आरम्भ से उसे वेदों का ज्ञान भी दिया हुआ है। सृष्टि के आरम्भ से ही और बाद में भी विद्वानों ने बहुत से ग्रन्थों की रचना की है जिसका लाभ हम लोग उठा रहे हैं। मनुष्य के पास ज्ञान को प्राप्त करने समझने के लिये विशेष मन बुद्धि है जो कि अन्य योनि के प्राणियों को उपलब्ध नहीं है। ज्ञान के अनुरूप कर्म करने के लिये मनुष्य के शरीर की बनावट भी उसी प्रकार की परमात्मा ने बनाई है। उसके पास हाथ हैं जिससे वह कर्म कर सकता है। पैरों से चलकर वह अपने किसी इच्छित स्थान पर आ जा सकता है। वृक्षों पर चढ़ व उतर सकता है तथा नदियों व जलाशयों में तैर भी सकता है। भवन निर्माण की बात करें तो वह अपनी बुद्धि व ज्ञान के बल से बहिमंजिली इमारते भी बना सकता है। इस आत्मा को जानने से हम स्वयं को जान लेते हैं क्योंकि हमारे शरीर में जो आत्मा हैं, वही हम हैं।

 

आत्मा एक अल्प परिमाण वाली चेतन सत्ता है। यह अनादि, अनुत्पन्न, सनातन व शाश्वत है। इसका आकार अत्यन्त सूक्ष्म होने के कारण इसके आकार व आकृति को जाना नहीं जा सकता। समाधि अवस्था में ही इसका साक्षात्कार योगीजन कर सकते हैं। अनुमान से इसे एक सूक्ष्म बिन्दू रूप में ही जाना व माना जा सकता है। यह व्यापक न होकर एकदेशी अर्थात् एक-स्थानीय होती है। एकदेशी होने से ही यह असीम न होकर ससीम होती है। सीमाओं में बद्ध होने के कारण यह ईश्वर के समान सर्वज्ञ न होकर अल्पज्ञ अर्थात् अल्प ज्ञान ही प्राप्त कर सकती है। पूरे ब्रह्माण्ड को पूर्ण रूप में जानना समझना जीवात्मा वा आत्मा की क्षमता में नहीं है। हां, यह ब्रहमाण्ड के बहुत से रहस्यों को जान सकती है। वेदों व वैदिक साहित्य का ज्ञान भी प्राप्त कर सकती है। वैज्ञानिकों ने जितनी खोजों को किया है उन सबको पूर्ण रूप में तो नहीं परन्तु उनके विषय में कुछ कुछ ज्ञान प्राप्त कर सकती है। आत्मा मनुष्य का उद्देश्य ज्ञान विज्ञान की वृद्धि करना है। यह चिन्तन, विचार, मनन, अध्ययन, लेखन, विद्वानों की संगति, ज्ञान के अनुरूप प्रयोगों, उपदेश श्रवण व दूसरों को प्रवचन, गोष्ठी आदि के द्वारा अपने ज्ञान को बढ़ाकर अपने उद्देश्यों व लक्ष्यों को प्राप्त हो सकती है। जीवात्मा अनादि होने के साथ अमर, अविनाशी, नित्य, अन्तहीन, जन्म व मरण धर्मा, प्रत्येक शुभ व अशुभ कर्म का फल भोगने वाली तथा ईश्वर को जानकर व सद्कर्मों को करके जीवनोन्नति सहित मोक्ष प्राप्त करने वाली सत्ता है। वेद वैदिक साहित्य के अध्ययन से ही इसे अपने सत्य लक्ष्यों का ज्ञान होता है। आत्मा को जानने के लिये हमारे विद्वानों ने वेद, दर्शन व उपनिषद आदि ग्रन्थों के प्रमाणों से युक्त पुस्तकें भी लिखी हैं। एक पुस्तक आत्मा का स्वरूप है, यह भी आत्मा को जानने के लिये उपयोगी ग्रन्थ है। बहुत पहले ‘‘जीवात्माज्योति के स्वरूप, इसके गुण, कर्म व स्वभाव आदि पर पं. राजवीर शास्त्री द्वारा सम्पादित एक बहुत उपयोगी ग्रन्थ मासिक दयानन्द सन्देश पत्रिका के तीन विशेषांकों के रूप में प्रकाशित हुआ था। इसे पुस्तक रूप में प्रकाशित किया जाना था परन्तु दुःख है कि इसका कभी पुस्तक रूप में प्रकाशन नहीं हुआ जिससे इस पुस्तक की विषय सामग्री व आत्मा विषयक शास्त्रों के प्रमाणों को जानने में जिज्ञासु असमर्थ हैं। इसका प्रकाशन जिज्ञासुओं को लाभकारी होगा, अतः इसका शीघ्र प्रकाशन किया जाना चाहिये।

 

जीवात्मा के विषय में महर्षि पतंजलि के योगदर्शन का अध्ययन कर भी ज्ञान प्राप्त किया जा सकता है। इसके अध्ययन से मनुष्य मनुष्य जीवन के उद्देश्य व लक्ष्य सहित अपने साध्य को प्राप्त करने में समर्थ होता है। चित्त की वृत्तियों का निरोध कर आत्मा द्वारा परमात्मा का ध्यान कर समाधि अवस्था को प्राप्त हो सकते है। समाधि अवस्था में ईश्वर का साक्षात्कार होता है। यह लक्ष्य प्राप्त कर मनुष्य अपने साध्य को प्राप्त कर मोक्ष को प्राप्त करता है। यही मनुष्य जीवन का प्रमुख व अन्तिम लक्ष्य होता है। अतीत में हमारे ऋषि व योगीजन इस लक्ष्य को प्राप्त होते रहे हैं। महर्षि दयानन्द ने अपने जीवन में जो योग साधना की व देश एवं समाजोपकार के कार्य किये उनसे भी उनका मोक्ष को प्राप्त होना सम्भव प्रतीत होता है। किसको मोक्ष प्राप्त होता है या नहीं होता, निश्चयपूर्वक तो केवल परमात्मा ही जानता है परन्तु मोक्ष के साधन करते हुए आत्मा निरन्तर उन्नति के पथ पर अग्रसर रहता है और इस जन्म व परजन्मों में कभी न कभी अपने लक्ष्य अर्थात् मोक्ष को प्राप्त हो ही जाता है। महर्षि दयानन्द जी ने सत्यार्थप्रकाश में मोक्ष व उसकी प्राप्ति के साधनों पर विस्तार से प्रकाश डाला है। सत्यार्थप्रकाश में वर्णित ज्ञान ऐसा है जो अन्यत्र कहीं से प्राप्त नहीं होता। अतः जिज्ञासु पाठकों को पूरा सत्यार्थप्रकाश पढ़ना चाहिये। यदि किसी कारण न भी पढ़ सके तो आरम्भ के दस समुल्लासों वा अध्यायों को तो अवश्य ही अनेक बार पढ़ना चाहिये और कोई शंका होने पर योग्य विद्वानों से शंका समाधान कर लेना चाहिये।

 

आत्मा अनादि, नित्य, अविनाशी व अमर है, अतः यह अनादि काल से अपने कर्मों के अनुसार जन्म लेता आ रहा है। इस कल्प व सृष्टि के व्यतीत हो चुके 1.96 अरब वर्षों में भी सभी जीवात्माओं के लगभग 1 करोड़ से अधिक बार जन्म व मृत्यु हो चुकी है। मनुष्य मृत्यु से डरता भी इसीलिये है कि इसकी आत्मा पर विगत जन्मों व मृत्यु के संस्कार व स्मृतियां सुप्त व प्रसुप्त अवस्था में विद्यमान व अंकित हैं। जन्म व मरण का यह चक्र अनन्त काल तक चलना है। यह जन्म तो मात्र लगभग 60 से 100 वर्ष का ही देखा जाता है। इसमें भी अधिकांश समय बाल्यकाल, सोने, जागने, विद्या पढ़ने, व्यवसाय करने, वृद्धावस्था व रोग आदि के उपचार आदि में व्यतीत हो जाता है। इससे हम अनुमान लगा सकते हैं कि हमें सुख भोगने का समय पूरी आयु में कुछ वर्ष ही मिलता होगा। इस सुख का भोग यदि वह अशुभ व पाप कर्मों से मिलता है, जैसा कि आजकल बहुत से लोग देखे जाते है, तो हमारे भविष्य को नष्ट व बर्बाद करता है। इस लिये हमें अपनी वर्तमान एवं भविष्य की उन्नति के लिये कोई भी अशुभ व पाप कर्म कदापि नहीं करना चाहिये। यदि करेंगे तो हमें निश्चित रूप से उसका फल भोगना होगा। परमात्मा हमारे प्रत्येक कर्म का साक्षी होता है। वह हमारे छोटे से छोटे कर्म को भले ही वह छुप कर व रात्रि के अंधेरे में किसी निर्जन व गुप्त स्थान पर ही क्यों न किया जाये, जानता है, वह ईश्वर से छुपता नहीं है। उसका फल हमें भोगना ही पड़ता है। अतः हमें वेद विहित सद्कर्मों को करना चाहिये और निषिद्ध कर्मों का सर्वथा त्याग कर देना चाहिये। इसके साथ वेद हमें ईश्वरोपासना व यज्ञादि कर्मों सहित मता-पिता की सेवा व विद्वान अतिथियों के सत्कार का जो आदेश देते हैं उसे भी हमें नित्यप्रति करना चाहिये। इससे हमारे इस जीवन में भी सुख व शान्ति मिलेगी, हमें यश प्राप्त होगा और परजन्मों में भी हमारी उन्नति व मोक्ष व अमृत रूपी लक्ष्य की प्राप्ति होगी।

 

अतीत में हमारे असंख्य व अनन्त बार अनेक योनियों में जन्म हो चुके हैं। अनेक बार मोक्ष होने का भी अनुमान है। पूर्वजन्मों के कर्मों के कारण ही हमारा यह मनुष्य जन्म हमें परमात्मा से मिला है। मनुष्य योनि उभय योनि है। इस जन्म में हम कर्म भोग भी रहे हैं और कर भी रहे हैं। जो कर्म कर रहे हैं वह बिना भोगे हुए पूर्व किये कर्मों में जुड़कर हमारे पुनर्जन्म का आधार होंगे। अतः हमें वेद का स्वाध्याय एवं वेदानुकूल कर्म करने चाहिये जिससे निश्चय ही हमारा अगला जन्म श्रेष्ठ व उन्नत होगा। उसके बाद के हमारे सभी जन्म भी मनुष्य योनि में उत्तम कोटि के होंगे। वेद व आत्मवेत्ता ईश्वर का साक्षात्कार किये हुए ऋषियों के ग्रन्थों से यह विदित होता है। हमें अन्धविश्वासों व पाखण्डों से मुक्त सत्य ज्ञान पर आधारित जीवन व्यतीत करना है। सत्यार्थप्रकाश हमारा पथ प्रदर्शक धर्म ग्रन्थ है। इससे व वैदिक ग्रन्थों की प्रेरणा से हमारा जीवन व आचरण निर्धारित होना चाहिये। इससे हमें भावी जन्म-जन्मान्तरों में लाभ होगा। हम स्वयं भी वेदों का आचरण करें और अपने परिवार, सम्बन्धियों व परिचितों को भी इसको अपनाने की प्रेरणा करें।

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