प्रवासी भारतीय समारोह में डॉ. बलराम सिंह पुस्तक विमोचन से सम्मानित

भाग (१) 
डॉ. मधुसूदन 

(एक) प्रवेश :

जिनके गौरव में हम अपना गौरव और सम्मान में अपना सम्मान मानते हैं, ऐसे हमारे परम मित्र डॉ. बलराम सिंह जी के प्रवासी भारतीय सम्मान के अवसर पर परिचय कराने में मुझे अपार हर्ष हो रहा है. एक स्वाभिमानी भारतीय संस्कृति प्रेमी, राम की कर्तव्य निष्ठा से प्रेरित, मिलन सार, कर्मठ, अविरत लक्ष्य प्रवृत्त, और सदैव सकारात्मक सोच के धनी ऐसी गिनती भी उनका वर्णन करने  में असमर्थ होगी. कुछ छूट ही जाएगा. 
हमारे विश्व विद्यालय में जितने भारतीय प्राध्यापक हैं, उन सबके  लिए यह अपार हर्ष का समाचार है, कि इस प्रवासी भारतीय सम्मान  के समारोह में भारत शासन की ओर से, हमारे प्रिय डॉ. बलराम सिंह का  सम्मान हो रहा है. 

हमारे विश्वविद्यालय को अमरीका के नक्शे में स्थान दिलानेवाला व्यक्तित्व हमारे पास है. जिनके नाम से २०० से अधिक शोध पत्र प्रकाशित हुए हैं, स्वभाव से स्थितप्रज्ञता का परिचय कराता यह व्यक्ति,जिसे आप अंग्रेज़ी में  फ़ेदर इन अवर  कॅप कह सके, ऐसा व्यक्ति हमारे पास है. और मुझे विशेष आनन्द है, कि, यह अष्ट-पहलु व्यक्तिमत्व रखनेवाला मानव भगवान राम के आदर्श से भी प्रभावित है. 

(दो)व्यक्तित्व की पहचान :

किसी ज्यॉर्ज  नामक  व्यक्ति ने जब, बलराम जी से परिचय बाद, बिल नाम से बुलाना चाहा. कहा लम्बा नाम है, शॉर्ट कर ले. तुम्हें, बिल नाम से बुलाऊं तो कैसा ?  तिसपर इस स्वाभिमानी भारतीय ने सामने पूछा, कि तुम्हें जॉर्ज के बदले घसीटाराम बुलाऊं तो कैसा ? ज्यॉर्ज की समझ में आ गया. फिर उसने ऐसा प्रश्न कभी नहीं उठाया. और बाल या बलराम बुलाता रहा. 
पढा था, कि, जीवन में कुछ मोड आते रहते हैं. कुछ व्यक्तियों का मिलना, मिलते समय लगता है, कि, अकस्मात  है; पर लम्बे कालावधि के बाद यदि पीछे  मुडकर  सिंहावलोकन किया जाए, तो  लगता है, कि, नियति ने ही ऐसा संयोग गढा होगा. जैसे जीवन ही अनेक संयोगों का जाल हो, और किसी विशिष्ट ऊर्ध्व दिशा को इंगित करता हुआ रास्ता हो;



(तीन) पारिवारिक पृष्ठभूमि: 

चाँदी का चम्मच मुँह मे ले कर पैदा हुए बडे बाप के बेटों को, या बडे महानगरों के प्रतिष्ठित परिवार की सहायता से, आगे बढे हुओं को  देखा है; पर अयोध्या के निकटवर्ती अनजाने गाँव से जे एन यु  तक पहुँचा यह व्यक्ति दिल्ली में  भी नहीं रुका, सीधा अमरिका तक यश का झण्डा गाडते चला आया. ऐसा व्यक्ति जब सम्पर्क में आया, तो धीरे धीरे व्यक्तित्व की पंखुडियाँ खुलती गई. जो सामने आया, उससे प्रभावित हुए बिना रहा नहीं  गया.  
यह सन १९९० का समय था, मोदी जी के उदय पूर्वका महा-भ्रष्टाचारी काल.

(चार) मोदी के उदय पूर्व स्थिति 

सभी जानते होंगे; कि, भारत में नरेन्द्र मोदी के उदय पूर्व स्थिति कितनी दारुण और निराशाजनक थी. दिन दूने रात चौगुने घोटालों से समाचारपत्र भरे होते थे. मुम्बई हवाई अड्डे पर (अनुभव है) खुले आम रिश्वत माँगते थे. मुझ जैसा जो नहीं देता; उसे आखिर तक रोका जाता. 
घोटाले, घोटाले और घोटाले, और भ्रष्टाचार का घोर अंधकार ऐसा, कि क्षितिज पर सूर्य तो क्या, आशा की किरण भी दिखाई नहीं देती थी. सारा भारत निष्क्रिय प्रतीत होता था. कोई आशा का चिह्न दिखाई नहीं देता था. 
यु एस ए में,  जिस किसी से वार्तालाप करे, वह निराश था, भारतीयता से मुख मोड कर समस्त भारतीय संस्कृति के प्रति लज्जा का अनुभव करता पाया जाता. जो भी मिलता, गया बीता, लज्जा  अनुभव करता भारतीय ही सम्पर्क में आता. 


इस अमेरिका में ऐसे अशोक जानता था, जो स्वयं को ऍश (राख ) बुलाने पर आपत्ति नहीं उठाते. ऐसे रवीन्द्र  थे जो स्वयं को रॉबिन कहलवाते थे,  ऐसे प्यारेलाल थे जिन्हें लोग पॅरेलल  बुलाते थे. 
मैंने जब, मुझे मधु के बदले मॅथ्यु बुलाने पर आपत्ति जताई तो मुझे वे  मॅढू बुलाने लगे थे.
दिनेश डॅनी बन गए थे, जशवन्त जॅश हो गए थे. 
ऐसे,
हरि के हॅरी कहलाए, रवीन्द्र के  रॉबीन हुए थे॥
छगन मगन चंदु सभी अमरीका दाखिल हुए थे॥

ऐसे कसौटी के समय  जब भारतीय प्रवासी हीन ग्रंथि से ग्रस्त थे, तब बलराम सिंह जी की युनीवर्सीटी में नियुक्ति हुई. 


(पाँच) हीन ग्रंथि:

वास्तव में जो आत्म-द्वेष जनित हीन -ग्रंथि से परिचालित होते हैं. उन्हें यह हीन ग्रंथि उनका घोडा बनाकर स्वार हो जाती है. बडा उटपटांग व्यवहार करवाती है. जन्म से शाकाहारी गांधी जी के वैष्णवजन मांसाहार करते, शराब पीते देखें हैं. फिर गांधी टोपी पहन  १५ अगस्त के उत्सव में सम्मिलित होते भी देखें हैं. पढे लिखे होने से भी विशेष अंतर नहीं पडता. अंदर से थोथे चने, घने बाज बाज कर गर्ज कर अपनी हीन ग्रंथिका परिचय देते हैं. 
ये हमारी मॅकाले वाली अंग्रेज़ी शिक्षा का परिणाम था. सुदूर अमरीका में भी भारतीयों पर मॅकाले ही राज कर रहा था. ऐसे प्रवासी भारतीय भी, अपनी भाषा अपनी संस्कृति सब कुछ भूलना चाहते थे. हिन्दी भाषा पर लज्जा रखनेवालों ने अपनी सन्तानों पर भी हिन्दी का संस्कार अंकित नहीं किया. 

(छः) हीन व्यवहार:

इसी अंतराल में, एक वरिष्ठ भारतीय प्राध्यापक की ओर से इस शाकाहारी वैष्णव लेखक ने उपदेश सुना था. बोले, *प्रगति करना है, तो मांसाहार और मदिरापान सीखो. इसके बिना तुम  मित्र नहीं बना पाओगे. और इस समाज में स्वीकृत नहीं हो पाओगे.*अमरीकन सहकारी प्राध्यापकों से मैत्री और स्वीकार्यता बढा कर सफलता प्राप्त करने का यही उनका तरीका था. किसी भारतीय से वे सम्पर्क ही नहीं रखते थे. अमरीकनों से दोस्ती और अपनों को लत्ता प्रहार!पर इस समय का ठीक अनुमान आपको निम्न उदाहरण से भी होगा, जो इस आत्मविस्मृति के समय को चिह्नित करता है.

(सात)आत्म विस्मृति कैसी थी?एक दुर्गा पूजा उत्सव में आमंत्रित एक व्याख्याता पहुँचा तो वक्ता को निर्देश मिला कि दुर्गा पूजा के उस कार्यक्रम में श्रोताओं को परामर्श दे, कि कैसे इस मेल्टिंग पॉट में  सहज मेल्ट हुआ जाए? 
इस पर वह वक्ता क्या कहे, जो संघ-प्रचारक रह चुका था;  
उस वक्ता ने कहा था, कि इसके लिए  सब से पहले  दुर्गा पूजा मनाना बन्द करें. इस पूजा के आयोजन से आप मेल्टिंग पॉट में सुविधापूर्वक मेल्ट नहीं हो सकते. आगे कहा  कि, आत्म-हत्त्या करने के लिए कोई विशेष योजना नहीं बनानी पडती. ५ वी मन्जिल पर जाकर खिडकी खोलकर कूद जाना होता है. योजना तो संस्कृति टिकाने के लिए बनानी पडती है. किसी पर्बत पर चढने के लिए कठोर परिश्रम करना पडता है.नीचे लुढकना तो आसान होता है. लुढक जाइए.

(आठ) कर्मनिष्ठ डॉ. बलराम सिंह:ऐसे कसौटी के समय में सिंह साहब का प्रवेश हमारे बीच हुआ.  जैसे बताया, कि, अयोध्या के निकटवर्ती छोटे गाँव से निकला हुआ यह  व्यक्तिमत्व सम्पर्क में आया और धीरे धीरे परिचय की पंखुडियाँ खुलती गई. 
साथ, एक विशेष सिद्धान्त उद्घाटित भी हुआ, कि,सुगठित संस्कारॊं के लिए बहुत पढाई लिखाई वाला परिवार ही अनिवार्य नहीं.
यह, अयोध्या के समीप से आनेवाला यह व्यक्ति राम चरित्र से भी प्रभावित था! इनकी कर्मनिष्ठा से  हम सब विशेष प्रभावित थे.
निर्भिक पर सौम्य  व्यक्तित्व और प्रखर कर्मनिष्ठा. राम भगवान के आदर्श पर दृष्टि रखकर चलनेवाला वचनबद्ध व्यक्तित्व है बलराम सिंह.
निम्न पंक्तियाँ उन्हीं के विचारों पर आश्रित हैं। राम के विषय में राम का पिता के वचन की पूर्ति के लिए १४ वर्ष का वनवास! उन्हें बहुत प्रभावी करता है. उन्हीं के विचारों को निम्न पंक्तियों मे समाया जा सकता है.

क्यों याद करते, अवध के, उस पुत्र को?
लगा दिया था दाव पर जीवन जिसने।
बस पिता के वचन को सत्य करने।
जब हम तुले हैं, रिश्तों का ही अंत करने? 

(नौ) बल राम सिंह एवं श्रीमती रेखा सिंह का परिवार:
 
बल राम सिंह एवं श्रीमती रेखा सिंह का परिवार युनिवर्सीटी में आते ही कार्यक्रमों में उत्साह की लहर दौड गयी. श्रीमती रेखा सिंह के घर रामायण पूजा के आयोजन, युनिवर्सीटी में नियत कालिक सत्संग, विभिन्न उत्सव, १५ अगस्त, स्वतंत्रता  दिवस, संस्कृत संभाषण वर्ग, का आयोजन, इण्डिया स्तुडंट एसोसिएशन का ओरिएन्टेशन, इत्यादि में सक्रिय  सहायता, उनकी विशेषता थी.  
बार बार इनके निवास पर रामायण कथा, वार्ता, चर्चा, पूजा, प्रार्थना हुआ करती. बेटा ऋषि तबला बजाता, बेटियाँ रश्मि और रेणु पूजा में सहायता करती. प्रार्थना आरति और कीर्तन करवाती. 
इनकी कर्मनिष्ठा से मैं  सर्वाधिक प्रभावित हूँ. निर्भिक व्यक्तित्व और प्रखर कर्मनिष्ठा  राम भगवान के आदर्श पर दृष्टि रखकर चलनेवाला वचनबद्ध व्यक्तित्व  है बलराम सिंह.



(दस) कृण्वन्तो विश्वं  आर्यम्‌ 

वास्तव में हमारे  कृण्वन्तो विश्वं  आर्यम्‌ को  आज अमरीका भी कुछ समझने लगा है. मॅसेच्युसेट्स के (गवर्नर) राज्यपाल द्वारा हिन्दू परम्परा दिवस पर हर वर्ष दिया जानेवाला प्रशंसा पत्र इसी का प्रमाण है. इस प्रशंसा पत्र का प्रारंभ भी सिंह साहब के परिश्रम का फल है. सन २००० से २०१८ तक अठारा बार विशाल आकारका मढा हुआ प्रमाण पत्र हर वर्ष मिल रहा है. धन्यवाद सिंह साहेब.

यह बलराम सिंह स्वयं आगे बढा है, पर अपने पैतृक गाँव को भूला नहीं है. 
गाँव में नई पीढीके लिए शाला स्थापित की है. उसका सारा प्रबंधन और आय-व्यय बलराम सिंह देखते हैं. 
साथ, अपने पैतृक संयुक्त परिवार को भी जो भूला नहीं है. 

अब युनिवर्सीटी के वरिष्ठ प्राध्यापकों के संदेश  भी आए हैं.
कुछ चुने हुए संदेश ही प्रस्तुत हैं. 
आप देखेंगे, कि, इनकी कर्मनिष्ठा से सारे विशेष प्रभावित है. 
निर्भिक पर सौम्य, मिलनसार  व्यक्तित्व साथ  प्रखर कर्मनिष्ठा  राम भगवान के आदर्श पर दृष्टि रखकर चलनेवाला वचनबद्ध व्यक्तित्व सभी से मिलकर चलनेवाला प्राध्यापक है बलराम सिंह.


(बारह) पहले परिचय का प्रसंग
१९९० का वर्ष होगा. 
मैं मेरी प्रयोग शाला के समीप  आँगन में तिरंगा फहरा कर १५ अगस्त मनाया करता था. साथ भारतीय छात्रों को इकठ्ठा कर, जन गण मन गा कर स्वातंत्र्य दिनका  कार्यक्रम मनाता था. कार्यक्रम छोटा पर अनुशासन बद्ध रहे इसका ध्यान और आग्रह रखता था. संघका का संस्कार अनजाने ही प्रकट हो जाता था. जितने भी छात्र भारत से आते थे, उनको बिना भेद-भाव, इस बहाने इकठ्ठा कर परस्पर सहायता का ढाँचा खडा करना मेरा गौण उद्देश्य हुआ करता था. कुछ बंगला देशी छात्र भी साथ हो लेते थे. 

इस कार्यक्रम को दूरसे देखकर ही नहीं, पर आगे बढकर सहायता करने वाले उत्साही प्राध्यापक थे बलराम सिंह. अभी अभी विश्वविद्यालय से जुडे थे, और बिना किसी के आमंत्रण की राह देखे आगे आए थे.किसी भी भारत लक्ष्यी  काम में हमें श्री ईश्वर भाई पटेल, डॉ. त्रिदिव कुमार राय, श्री महेश गोयल, श्री विवेक नायक, डॉ. मुरली राजगोपालन,  इत्यादि मित्रों की  सहायता भी हुआ करती थी. डॉ, सुकल्याण सेन गुप्ता और डॉ. सत्यनारायण परायीतम उस समय विश्वविद्यालय में नियुक्त नहीं हुए थे. सिंह साहब की सक्रिय सहायता वरदान प्रमाणित हुई. धीरे धीरे हमारा विस्तार होता गया. आज तीन संस्थाएँ सक्रिय है. युनीवर्सीटी को, भारतीय शासन की ओर से अनेक पुस्तकें प्रदान की गई है. सेन्टर फॉर इण्डिक स्टडिज़ के लिए यह  विशेष सम्मान है.

(तेरह)
एक विशेष उल्लेखनीय निजी बात: 

मैं भी यदि बार बार विवेकानन्द जी का  *थॉट्स ऑफ पॉवर* ना पढता और भारतीय संस्कृति के त्यागी कर्णधार संघ के प्रदीप्त दीपकों के सम्पर्क में ना होता, तो निराशा से पीडित ही हो कर ही रह जाता. संघ दीपकों का ऐसा पुंज परस्पर उत्साह टिकाने में काम आता है.एक यदि बुझने लगता है, तो, दूसरा दीपक उसे फिर से प्रज्वलित कर देता है. संघ के सम्पर्क में रहने का ऐसा अनन्य लाभ है. हर प्रकार की सक्रिय सहायता भी संघ की विशेषता है. जो मुझे अन्य जगहों पर नहीं दिखाई देती. 


(चौदह) 
मेरी लेखन  मर्यादा:

किसी व्यक्तित्त्व को आप शत प्रतिशत नहीं जान सकते, आपको जो दिखता  हैं, वो आप के अपने चष्मेसे छनकर आया  होता है; इस लिए मैंने  जो भी कहा, उस पर  मेरी दृष्टि का रंग चढा ही होगा. जो अन्य प्राध्यापकों के संदेश आए हैं, उनमे उनके अन्य पहलुओं को उजागर किया गया है. कुछ मेरी त्रुटियाँ भी हो सकती हैं; जिनके लिए मैं ही उत्तरदायी हूँ. 

तुकाराम महाराज मराठी में कहते हैं  *बोले तैसा चाले त्याची वंदावी पाऊले.* अर्थात बोले वैसा चले, उसका  चरण वंदन  करे.* 
जिन के जीवन में यह गुण वास्तव में व्यक्त होता है; वैसा व्यक्तित्व है डॉ. बलराम सिंह. जो विचार मस्तिष्क में है, वही है जिह्वा पर, और वही कृति में भी. इन तीनों की समानता ही नीतिमत्ता का आदर्श है. 
हमारा भाग्य है, कि, ऐसा व्यक्तित्व हमारे मित्र मण्डल में सहज उपलब्ध हुआ. 
बिलकुल   कसौटी के  समय हमें ’बल’ मिला ’राम’ मिला ’बलराम’ मिला ’बलराम सिंह’ मिला. बडा सयुक्तिक नाम लेकर यह व्यक्तित्व गढा गया था. 


(पंद्रह)
परिशिष्ट 
आए हुए संदेश: 

(१) डॉ. त्रिदिब कुमार राय (वरिष्ठ निवृत्त प्राध्यापक) द्वारा;I have known Dr. Singh for 20 years  as a colleague and friend. Dr. Singh earned a reputation of high caliber  teacher but more so he excelled in the area of research and publication as an international scholar. He has published more than 200 research papers in his field including obtaining some patents on his research work. 
Besides he has made significant contributions in other areas such as Biology, arts and philosophy including publishing and editing some valuable books. Dr. Singh was the driving force in establishing the Center for  Indic Studies at the University 
He managed the activities of the Center very efficiently for ten years as the Director of the Center. 

The Center has flourished to become a  well known institution and recently has been honored by the Government of India as “India Corner”. This means the Center will receive many Important publications on India and will have the benefit of visiting faculty from reputed academic institutions from India supported and funded by the Government of India.

 Dr. Singh continues to work in developing a good relationship between India and the United States for mutual benefit. His contributions deserve to be recognized on an International level. I wish him success in his future endeavors.
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(२) डॉ. सत्त्यनारायण परायीतम (इण्डिया स्टुडन्ट ऍसॉसिएशन )द्वारा 

 Dr Singh is very intelligent, hard-working and enthusiastic person. I know Dr Singh for ten years and I will focus on his multi-dimensional character. Dr Singh is high influential intelligent individual who makes difference between success and failure. he is one of the top ten researchers in  Botulinium research. He has published several hundred papers during his tenure at the  University.  Dr Singh is versatile not only in his subject of biochemistry, he is well versed in Yoga and Ayurveda. He is very spiritual-person. His knowledge of Vedas and Upanishads is vast. He is the chief organizer of Vedanta conferences all  over the world. 
Dr. Singh is walking encyclopedia of knowledge; embodiment of spiritual values and promotes rich cultural heritage of India in USA. Dr Singh is a true ambassador of Indian culture and traditions. Dr Singh is down-to-earth personality and is always stoic, a characteristic of a true saint. 
Dr. Satyanarayana Parayitam
University of Massachusetts Dartmouth
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डॉ. अभय अस्थाना, अध्यक्ष विश्व हिन्दू परिषद (यु. एस. ए.)  द्वारा Besides his professional accomplishments, Balram Singh Ji has contributed consistently for years to the Hindu community in New England to strengthen it and increase its visibility.
He enjoys working with children, whether it be at the V H P A camp teaching about Hindu traditions or guiding youth committees to organize regional Hindu Youth Conferences in New England.
For almost a decade starting in mid-1990’s Balram Ji served on the core organizing team for Hindu Heritage Day, a celebration of Hindu tradition and culture that continues to be hailed as a landmark event year after year by the Governor of Massachusetts. Our heartiest congratulations to Dr. Balram Singh for this well-deserved award.
Dr. Abhaya  Asthana
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डॉ. सुकल्याण सेनगुप्ता (सेन्टर फॉर इण्डिक स्तडीज़) द्वारा: Dr. Bal Ram Singh’s exemplary work ethic can serve as an example for others to follow.  He is an efficient manager of several simultaneous projects, with the common and underlying thread being his selfless service to the society. But though he is extremely busy with these projects, any request for help/advice on any activity which has a potential for benefiting society is immediately addressed with complete attention to detail.  Another rare quality of Dr. Singh is that he never criticizes people but always offers encouraging words to co-workers if they have made any missteps.  He will point out the errors but also guide them to the right path in a very positive manner.  Ernest Hemingway once remarked, “Courage is grace under pressure”; Dr. Singh is a living example of this definition of courage.  I have seen him face many adverse circumstances, but he never let the adversities embitter him or lose his grace. 
Sukalyan Sengupta, Ph.D., P.E.; Director, Center for Indic Studies; University of Massachusetts Dartmouth
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9 thoughts on “प्रवासी भारतीय समारोह में डॉ. बलराम सिंह पुस्तक विमोचन से सम्मानित

  1. अनेक संदेश दूरभाष पर भी आए हैं. सभी अंग्रेज़ी मे आए हैं. कुछ वार्तालाप में और कुछ ध्वनि मुद्रित भी हैं. मेरी वैयक्तिक व्यस्तता के कारण उन्हें टिप्पणियों में लिखना असंभव है. नाम कुछ गिना सकता हूँ. (१) त्रिदिव कुमार रॉय (२) सत्या पराईतम (३) पार्थ सारथी (४) सुकल्याण सेनगुप्ता (५) पल्लवी झवेरी (६) ईश्वर भाई पटेल (७) हरि बिंदल, (८) राम कृष्ण रस्तोगी (९) डॉ. सुरेंद्र नाथ गुप्त. (१०) सुधेश कुमार…इत्यादि .
    कुछ संदेश लिखित आए हैं; जो मैंने आलेख के नीचे डाल दिए हैं.
    बलराम सिंह जी की लोक प्रियता का यह प्रमाण मुझे प्रस्तुत करने में अपार हर्ष हो रहा है.
    सभी को धन्यवाद. .

  2. श्री मधुसूदन जी,आप लोग विदेश में रहकर भी अपने भारत का मान सम्मान बढ़ाते रहते है और उन सूचनाओं से हमे अवगत कराते रहते है आप भी इसके लिए सम्मान और धन्यवाद के पात्र है || जब श्री बलराम जी की पुस्तक विमोचन पर उनको सम्मानित किया गया यह सुनकर हमारी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा | इस बधाई का संदेश उन तक पहुचाने की कृपा करे ||

  3. आ. डॉ. प्रतिभा जी सक्सेना,,और प्रोफ़ेसर शकुन्तला बहादुर जी, आप को समय निकाल कर टिप्पणी करने और आलेख को पढने के लिए धन्यवाद.
    डॉ. बलराम सिंह जी को आप का संदेश अवश्य पहुँचाऊंगा। बलराम सिंह जी हिन्दी के भी पुरस्कर्ता हैं। शुभेच्छाएँ। —डॉ. मधुसूदन

  4. भाई मधुसूदन जी
    भारतीय समाचार पत्रों और टी वी चैनलों में तो मा० बलराम जी के विषय में कोई चर्चा ही नहीं है। आपके लेख से उनके बारे में विस्तृत जानकारी मिली। माँ भारती के ऐसे सपूत पर गर्व होना स्वाभाविक है। यह मोदी सरकार ही विशेषता है कि ऐसे महान व्यक्तित्व को पहचान कर उसे सम्मानित किया। इससे पहले तो भारत में सरकारी पुरस्कार केवल सत्ता के चटुकारों को ही दिए जाते थे।
    आपके द्वारा प्रदत्त जानकारी के लिए हार्दिक धन्यवाद।
    शुभेच्छु
    डा० सुरेंद्र नाथ गुप्त

    1. धन्यवाद डॉ. गुप्त जी. डॉ. बलराम सिंह जी को मैं प्रायः २८ वर्षों से जानता हूँ. आप ने बॉटलिज़म पर सराहनीय काम किया है. साथ साथ भारतीय संस्कृति का व्यवहार से आदर व्यक्त करते हैं. मुझे आपको निकटता से जानने का अवसर मिला जो अन्य समाचार दाताओं को मिलना संभव नहीं.. शायद यही कारण है, आपने समय निकाल कर टिप्पणी दी. धन्यवाद.

  5. हमें गर्व है देश के ऐसे सपूतों पर जो विदेशों की चकाचौंध में रह कर भी अपनी संस्कृति को पृष्ठभूमि में न छोड़ उसे व्यवहार में ला कर देश के !गौरव का कारण बनते हैं .उन्हें हार्दिक बधाई और आपको भी ,जो उन्हीं की राह पर हैं .धन्यवाद इस सुखद सूचना के लिये !
    – प्रतिभा सक्सेना.

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