डॉ. मधुसूदन: ”हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर?” भाग-एक

(क ) एक रविवारीय भोज के बाद, वार्तालाप में, भोजनोपरांत डकारते डकारते, मेरे एक पश्चिम-प्रशंसक, { भारत-निंदक, उन्हें स्वीकार ना होगा } वरिष्ठ मित्र नें प्रश्न उठाया, कि ”क्या, तुम्हारी हिंदी अंग्रेज़ी से टक्कर ले सकती है? सपने में भी नहीं।” यह सज्जन, हिंदी के प्रति, हीन भाव रखनेवालों में से है। वे, उन के ज्ञान की अपेक्षा, आयु के कारण ही, आदर पाते रहते है।

पर आंखे मूंद कर, ”साहेब वाक्यं प्रमाणं”, वाला उन का, यह पैंतरा और भारत के धर्म-भाषा-संस्कृति के प्रति हीन भावना-ग्रस्त-मानस मुझे रुचता नहीं। पर, ऐसी दुविधा में क्या करता? दुविधा इस लिए, कि यदि, उनकी आयु का आदर करूं, तो असत्य की, स्वीकृति समझी जाती है; और अपना अलग मत व्यक्त करूं, तो एक वरिष्ठ मित्र का अपमान माना जाता है। पर कुछ लोग स्वभाव से, आरोप को ही प्रमाण मान कर चलते हैं। यह सज्जन ¨ भी बहुत पढे होते हुए भी, उसी वर्ग में आते थे।

इस लिए, उस समय, उनका तर्क-हीन निर्णय और सर्वज्ञानी ठप्पामार पैंतरा देख, मुझे कुछ निराशा-सी हुयी। ऐसा नहीं, कि मेरे पास कुछ उत्तर नहीं था; पर इस लिए भी , कि हिंदी तो मेरे इस मित्र की भी भाषा थी, एक दृष्टि से मुझ से भी कुछ अधिक ही।पर उस समय उनका आक्रामक रूप, चुनौती भरा पैंतरा और ”सपने में भी नहीं” यह ब्रह्म वाक्य और आयु देख, उन्हें उत्तर देना मैं ने उचित नहीं माना। पर इस प्रसंग ने मेरी जिज्ञासा जगाई, अतः इस विषयपर कुछ पठन-पाठन-चिंतन-मनन इ. करता रहा।

(ख) तो, क्या, हिंदी अंग्रेज़ीसे टक्कर ले सकती है?

निश्चित ले सकती है। और हिंदी भारतके लिए कई गुना लाभदायी ही नहीं, शीघ्र-उन्नतिकारक भी है। भारत की अपनी भाषा है। मैं इस विषयका हरेक बिंदु न्यूनतम शब्दों में क्रमवार आपके सामने रखूंगा। केवल तर्क ही दूंगा, भावना नहीं जगाउंगा। तर्क की भाषा सभी को स्वीकार करनी पडती है, पर केवल भावनाएं, आप को वयक्तिक जीवन में जो चाहो, करने की छूट देती है। और मैं चाहता हूं, कि सभी भारतीय हिंदी को अपनाएं; इसी लिए तर्क, केवल तर्क ही दूंगा।

(ग)

आप निर्णय लें, मैं नहीं लूंगा। न्यूनतम समय लेकर मैं क्रमवार बिंदू आप के समक्ष रखता हूँ। इन बिंदुओं में भाउकता नहीं लाऊंगा। राष्ट्र भक्ति, भारतमाता, संस्कृति, इत्यादि शब्दों से परे, केवल तर्क के आधार पर प्रतिपादन करूंगा। तर्क ही, सर्व स्वीकृति के लिए उचित भी और आवश्यक भी है। इस लिए, केवल तर्क-तर्क-और तर्क ही दूंगा।

”हिंदी और देवनागरी की वैज्ञानिकता”

(१)हर बिंदू पर गुणांक, आप अपने अनुमानके अनुसार, लगाने के लिए मुक्त हैं।

हमारी देवनागरी समस्त संसार की लिपियों में सबसे अधिक वैज्ञानिक है,सर्वोत्तम हैं। और, संसार के किसी भी कोने में प्रयुक्त वर्णमाला वैज्ञानिक रूप में विभाजित नहीं है, जैसी देवनागरी है। [गुणांक ५० अंग्रेज़ी २०]

(२) आप अपना नाम हिंदी में लिखिए। मैं ने ”मधुसूदन”(५ अक्षर) लिखा। अब अंग्रेज़ी-रोमन में लिखिए ”madhusudan” (१० अक्षर) अब, बताइए कि १० अक्षर लिखनेमें अधिक समय लगेगा, या ५ अक्षर लिखने में? ऐसे आप किसी भी शब्दके विषय में कह सकते हैं। गुणांक {हिंदी २०-अंग्रेज़ी १०}

(३) हिंदी में वर्तनी होती है, पर अंग्रेज़ी की भांति स्पेलिंग नहीं होती। लिपि चिह्नों के नाम और ध्वनि अभिन्न (समरूप) है।जो बोला जाता है, उसीको लिखा जाता है। क लिखो, और क ही पढो, गी लिखो और गी ही पढो।जो लिखा जाता है, वही बोला जाता है। ध्वनि और लिपि मे सामंजस्य है।

अंग्रेज़ी में ऐसा नहीं है। लिखते हैं S- T- A- T- I- O- N, और पढते हैं स्टेशन। उसका उच्चारण भी आपको किसीसे सुनना ही पडेगा। हमें तो देवनागरी का लाभ अंग्रेज़ी सीखते समय भी होता है, उच्चारण सीखने में भी, शब्द कोष के कोष्ठक मे देवनागरी में लिखा (स्टेशन) पढकर हम उच्चारण सीख गए। सोचो, कि केवल अंग्रेज़ी माध्यम में पढने वाला इसे कैसे सीखेगा? चीनी तो और चकरा जाएगा। देखा देवनागरी का प्रताप ! [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(४) और, अंग्रेज़ी स्पेलिंग रटने में आप घंटे, बीता देंगे। इस एक ही, हिंदी के गुण के आधार पर हिंदी अतुलनीय हो जाती है। आज भी मुझे (एक प्रोफेसर को) अंग्रेज़ी शब्दों की स्पेलिंग डिक्षनरी खोल कर देखने में पर्याप्त समय व्यय करना पडता है।हिंदी शब्द उच्चारण ठीक सुनने पर, आप उसे लिख सकते हैं। कुछ वर्तनी का ध्यान देने पर आप सही सही लिख पाएंगे। {हिं 100 गुण -अं – १० )।

हो सकता है, आपको 100 गुण अधिक लगे। पर आप के समय की बचत निश्चित कीमत रखती है। इससे भी अधिक, यह गतिमान, शीघ्रता का युग है। समय बचाने आप क्या नहीं करते? विमान, रेलगाडी, मोटर, बस सारा शीघ्रता के आधार पर चुना जाता है।

(५) हिंदी में, एक ध्वनिका एक ही संकेत है। अंग्रेज़ी में एक ही ध्वनि के लिए, अनेक संकेत काम में लिए जाते हैं। उदा. जैसे —-> क के लिए, k (king), c (cat), ck (cuckoo) इत्यादि.

एक संकेत से अनेक ध्वनियाँ भी व्यक्त की जाती है। उदा. जैसे—> a से (१) अ (२)आ (३) ऍ (४) ए (५) इत्यादि। [हिंदी २५ अंग्रेज़ी १०]

(६) यही कारण था, कि, शालांत परीक्षा में हिंदी (मराठी) माध्यम से हम लोग शीघ्रता से परीक्षा के प्रश्न हल कर लेते थे। जब हमारे अंग्रेज़ी माध्यमों वाले मित्र विलंब से, उन्ही प्रश्नों को अंग्रेज़ी माध्यम से जैसे तैसे समय पूर्व पूरा करने में कठिनाई अनुभव करते थे। एक उदाहरण लेकर देखें। भूगोल का प्रश्न:

कोंकण में रेलमार्ग क्यों नहीं? {१२ अक्षर}और अंग्रेज़ी में होता था,

Why there are no railways in Konkan?{२९ अक्षर}

उसका उत्तर लिखने में भी उन्हें अधिक लिखना पडता था। अक्षर भी अधिक, गति पराई भाषा होने से धीमी, और अंग्रेज़ी में, सोचना भी धीमे ही, होता था। प्रश्न तो वही था, पर माध्यम अलग था।और फिर शायद उन्हें स्पेलिंग का भी ध्यान रखना पडता था। पर परीक्षार्थी का प्रभाव निश्चित घट जाता होगा। जो उत्तर एक पन्ने में हम देते थे, वे दो पन्ने लेते थे। (हिं २५-अं १०}

(७) हिंदी का लेखन संक्षेप में होता है।

उदा:एक बार मेरी, डिपार्टमेंट की बैठक में, युनिवर्सीटी के अध्यक्ष बिना पूर्व सूचना आए थे, जब हमारी सहायिका (सेक्रेटरी) छुट्टी पर थी। तो कनिष्ठ प्राध्यापक होने के नाते, मुझे उस के सविस्तार विवरण के लिए नियुक्त किया गया।इस बैठक मे, अध्यक्ष ने महत्व पूर्ण वचन दिए थे, जिस का विवरण आवश्यक था।

मैने कुछ सोच कर, देवनागरी मे, अंग्रेजी उच्चारों को लिखा, जो रोमन लिपिकी अपेक्षा, दो से ढाइ गुना शीघ्र था। जहां The के बदले ’द’ से काम चलता था, laboratory Expense के बदले लॅबोरॅटरी एक्सपेंस इस प्रकार लिख कर नोट्स तैय्यार किए, शब्दों के ऊपर की रेखा को भी तिलांजली दी। फिर घर जाकर, उसी को रोमन लिपि मे रूपांतरित कर के दुसरे दिन प्रस्तुत किया। विभाग के अन्य प्रोफेसरों के, अचरज का पार ना था। पूछा, क्या मà �ˆ शॉर्ट हॅंड जानता हूं? मैने उत्तर मे हिंदी- देव नागरी की जानकारी दी। उनके नाम लिख कर थोडी प्राथमिक जानकारी दी। उन्हें, हमारी नागरी लिपि कोई पहली बार समझा रहा था। अपेक्षा से कई अधिक, प्रभावित हुए। एक आयर्लॅण्ड से आया प्रॉफेसर लिपि के वलयांकित सुंदर(सविनय,मेरे अक्षर सुंदर है)अक्षरों को देख कर बोला ,यह तो सुपर-ह्यूमन लिपि है। {मन में सोचा, यह तो, अंग्रेज़ी में, इसे, देव(Divine) नागरी कह रहा à ��ै।} संसार भर में, इतनी वैज्ञानिक लिपि और कोई नहीं। सारे पी एच डी थे, पर उन्हें किसी ने हिंदी-नागरी लिपि के बारे में ठीक बताया नहीं था। हिंदी को उस के नाम से जानते थे, कुछ शब्द जैसे नमस्ते इत्यादि जानते थे। बंधुओ ! लगा, कि, हम जिस ढेर पर बैठे हैं, कचरे कूडे का नहीं पर हीरों का ढेर है। हृदय गद गद हुआ। हिंदी पर, गौरव प्रतीत हुआ। [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(८) व्यक्ति सोचती भी शब्दों द्वारा है।जब आप सोचते हैं, मस्तिष्क में शब्द मालिका चलती है। लंबा शब्द अधिक समय लेता है, छोटा शब्द कम।

तो जब अंग्रेज़ी के शब्द ही लंबे हैं, तो उसमें सोचने की गति धीमी होनी ही है। अतिरिक्त, वह परायी भाषा होनेसे और भी धीमी। इसका अर्थ हुआ, कि अंग्रेज़ी में विचारों की गति हिंदी की अपेक्षा धीमी है। मेरी दृष्टि में हिंदी अंग्रेज़ी से दो गुना गतिमान है। [हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(९) लेखन की गति का भी वही निष्कर्ष। जो आशय आप ६ पन्नों में व्यक्त करेंगे। अंग्रेज़ी में व्यक्त करने में आपको १० पन्ने लगते हैं। गीता का एक २ पंक्ति का श्लोक पना भरकर अंग्रेज़ी में समझाना पडता है।[हिंदी ५० अंग्रेज़ी २५]

(१०) अर्थात, आप अंग्रेज़ी भाषा द्वारा शोध कर रहे हैं, तो जो काम ६ घंटों में हिंदी में कर सकते थे, उसे करने में आप को १० घंटे लग सकते हैं। अर्थ: आप शोध कार्य हिंदी में करेंगे, तो जीवन भर में ६७% से ७५% अधिक शोधकार्य कर सकते हैं। [हिं ५० अंग्रेज़ी २५]

(११) इस के अतिरिक्त हर छात्रको हिंदी माध्यम द्वारा, आज की शालेय शिक्षा अवधि में ही,(११-१२ वर्ष में) MSc की उपाधि मिल पाएगी। अर्थात आज तक जितने लोग केवल शाला पढकर निकले हैं, वे सारे M Sc से विभूषित होत।अंग्रेज़ी के कारण, यह ज्ञान भंडार दुर्लक्षित हो गया है।{ संदर्भ: बैसाखी पर दौडा दौडी, मुख्तार सिंह चौधरी} तो, क्या भारत आगे नहीं बढा होता? क्या भारत पीछडा होता ? भारत आज के अनुपातमें, कमसे कम, ३ स े ५ गुना आगे निकल गया होता?वैसे हम भारतीय बहुत बुद्धिमान है। यह जानकारी परदेश आकर पता चली। { हिंदी ५०० अंग्रेज़ी १००}

(१२) किसी को अंग्रेज़ी, रूसी, चीनी, अरबी, फारसी ही क्यों झूलू, स्वाहिली. हवाइयन —-संसार की कोई भी भाषा पढने से किस ने रोका है? प्रश्न:कल यदि रूस आगे बढा तो क्या तुरंत सभी को रूसी में शिक्षा देना प्रारंभ करेंगे? और परसों चीन आगे बढा तो? और फ्रांस?

वास्तव में पडोस के, चीन की भाषा पर्याप्त लोगों ने (सभी ने नहीं)सीखने की आवश्यकता है। उन की सीमा पर की कार्यवाही जानने के लिए। मेरी जानकारी के अनुसार आज कल यह जानकारी हमें अमरिका से प्राप्त होती है। या,फिर आक्रमण होने के बाद! [अनुमानसे लिखा है] अमरिका में सारी परदेशी भाषाएं गुप्त शत्रुओं की जान कारी प्राप्त करने के लिए पढी जाती हैं।

जो घोडा प्रति घंटा ५० मील की गति से दौडता है, वह क्या २० मील प्रति घंटा दौडनेवाले घोडेसे अधिक लाभदायी नहीं है?

पर भारतीय कस्तुरी मृग(हिरन) दौड रहा है, सुगंध का स्रोत ढूंढने। कोई तो उसे कहो, कहां भटक रहे हो, मेरे हिरना!तेरे पास ही, सुगंध-राशी है।

मुझे यह विश्वास नहीं होता, कि ऐसी कॉमन सेन्स वाली जानकारी जो इस लेखमें लिखी गयी है, हमारे नेतृत्व को नहीं थी? क्या किसी ने ऐसा सीधा सरल अध्ययन नहीं किया?

अब भी देर भले हुयी है। शीघ्रता से चरण बढाने चाहिए।

तो,क्या हिंदी अंग्रेज़ी से टक्कर ले सकती है? आप बुद्धिमान हैं। आप ही निर्णय करें।

===>सूचना: प्रश्नों के उत्तर देने में पर्याप्त विलंब होगा। विशेष: भाग दो की भी प्रतीक्षा करें।

42 thoughts on “डॉ. मधुसूदन: ”हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर?” भाग-एक

  1. (२) आप अपना नाम हिंदी में लिखिए। मैं ने ”मधुसूदन”(५ अक्षर) लिखा। अब अंग्रेज़ी-रोमन में लिखिए ”madhusudan” (१० अक्षर) अब, बताइए कि १० अक्षर लिखनेमें अधिक समय लगेगा, या ५ अक्षर लिखने में?

    कोंकण में रेलमार्ग क्यों नहीं? {१२ अक्षर}और अंग्रेज़ी में होता था,
    Why there are no railways in Konkan?{२९ अक्षर}

    One may count key strokes ,pen strokes and look at visual eye strain while reading and simplicity in writing when evaluating a language.

    India needs simple script but let the people and tools offered by computer decide what’s good for them.

    मधुसूदन
    म ध उ स ऊ द न
    म् अ ध उ स ऊ द् अ न् अ
    म ध ु स ू द न

    મ ધ ઉ સ ઊ દ ન
    મ્ અ ધ ઉ સ ઊ દ્ અ ન્ અ
    મ ધ ુ સ ૂ દ ન

    madhusuudan
    madhusūdana
    madhusUdana

    कोंकण में रेलमार्ग क्यों नहीं?
    कोन् क मे न् रेलमार् ग क्यो न् नही न्?
    क ो न् कण म े न् र े ल म ा र ् ग क् य ो न ् नह ी न ् ?

    કોંકણ મેં રેલમાર્ગ ક્યોં નહીં?
    કોન્ ક મે ન્ રેલમાર્ ગ ક્યો ન્ નહી ન્?
    ક ો ન્ કણ મ ે ન્ ર ે લ મ ા ર ् ગ ક્ ય ો ન ् નહ ી ન ् ?

    koṁkaṇa meṁ relamārga kyoṁ nahīṁ?
    koṁkaṇ meṁ relamārg kyoṁ nahīṁ?………IAST

    preffered Anuswar free Hindi…
    कोन् क मे न् रेलमार् ग क्यो न् नही न्?
    konkamen relamārga kyon nahīn?

  2. मधुसुदंजी के इस उत्तम लेख आ उर उस पर प्रस्तुत टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं
    फिर भी मेरा यह मत है की भारत केलिए सरल संस्कृत ही ग्राह्य और स्वीकार्य भाषा होने जा रही है
    भले ही इसका विरोध कुछ हिन्दू विरोधी व ब्रह्मण विरोधी अनेक नाम से करें –
    इस आलेख्मे जिस लिपि देवनागरी की चर्चा की गयी है वह संस्कृत की है इस लिए यह हिन्दी अंगरेजी टक्कर नहीं रोमन देवनागरी / संस्कृत टक्कर है
    और भी आसान हो जता आपका आकलन यदि आप प्रचलित हिन्दी के मानकों से हंट संस्कृत की तरह शब्द -ब्विभक्ति को मिला लिखने सलाह देते( राम का घर नहीं रामका घर संस्कृत के रामस्य गृहम की तरह जिसे मेरी मातृभाषा मैथिली में भी सरल का रडिय गया ही- रामक घर
    हिन्दी को किसी की मातृभाषामत बताएं- यह है भे इनही -तथाकथित हिन्दी क्षेत्र में अवधी, भोजपुरी, बुन्देली, बघेली, छत्तीसगढ़ी लोग बोलते हैं, हिन्दी थोपे जाने से उनकी मौलिक्तासमाप्र्ट हो रही है- हमारी मैथिली को भी बहुत दशकों तक हिंदीवाले ने अपना अंचल कहने में शर्म नहीं किया , अब भी नहीं जबकी हमारी मान्यता १७ ७१ से अल्फबेतिकम ब्रह्मनिकम, १८८१ से ग्रिरासन के द्वार्रा, १९१९ से कोल्कता विश्व्वुद्यालय द्वारा, १९४८ से PEN द्वारा , १९६५ से साहित्य अकादमी से, २००४ से भारतीय संविधान से है ..
    हिन्दी को अंगरेजी के विकल्प में जरूर बताएं पर भारतीय भाषाओँ के विकल्प में नहीं क्योंकि उन्हीमे छिपा है भारत की अतीत का गौरव

    1. (१) डॉ, ठाकुर : मधुसुदंजी के इस उत्तम लेख आ उर उस पर प्रस्तुत टिप्पणियां महत्वपूर्ण हैं
      म:==>विधान: एक आदर्श ब्राह्मण की भाँति, प्रादेशिकता से ऊपर उठकर, राग-द्वेष रहित, पर राष्ट्रीयता को जगाकर, व्यवहार्यता को लक्ष्य़ में, रखते हुए, चिन्तन अपेक्षित है। मेरा ऐसा प्रयास है।
      यह एक वर्ष पुराना आलेख है।मेरे विचारमें कुछ बिन्दु और परिष्कृत किए जा सकते हैं। मैं न्यूनतम विरोध की दृष्टि से, और प्रादेशिकता से ऊपर उठकर सोचने का प्रयास करता हूँ।”सर्वेषां अविरोधेन” यदि संभव नहीं तो “न्यूनतम विरोधेन” का प्रयास है।
      ——————————–
      (२) डॉ, ठाकुर :फिर भी मेरा यह मत है की भारत केलिए सरल संस्कृत ही ग्राह्य और………………….
      म==>:पर, व्यवहार्यता आज संस्कृत में नहीं देखता।डॉ. सुब्रह्मण्यं स्वामी की “जनता पार्टी” भी “संस्कृत राष्ट्र भाषा” की प्रवक्ता हैं।उस में मैं दक्षिण का संस्कृत पुरस्कारी रूप देखता हूँ। “राष्ट्र भाषा भारती” नामक आलेख की राह देखने का अनुरोध।संस्कृत बहुल राष्ट्र भाषा, और व्याख्याएं संस्कृत छंद में (उदा. योगः कर्म सु कौशलम‍ या योगश्चित्तवृत्ति निरोधः। जैसी ) बहुत उचित लगता है। मुझे संस्कृत-बहुल, राष्ट्र भाषा को दक्षिण से मान्यता प्राप्त होने में न्य़ूनतम विरोध अपेक्षित है।साथ “राष्ट्र भाषा भारती” नाम से काम सरल होगा। इस पर उस लेख में चर्चा करेंगे। (#2A)कुछ तमिल छात्र “तमिल पर संस्कृत प्रभाव” शोध में सहायता कर रहें हैं। शीघ्र प्रकाशित करूंगा।
      —————————————–
      (३) डॉ, ठाकुर इस आलेख्मे जिस लिपि देवनागरी की चर्चा की गयी है वह संस्कृत की है…..
      म:===>स्वीकार।
      म: ===> विधान: आपकी टिप्पणी एक विशेष और आवश्यक दृष्टिकोण प्रदान करती है। विशेष धन्यवाद और स्वीकार। स्थूल रूपसे सोच कर फिर गौण बिन्दुओं पर सोच रहा हूँ। राष्ट्र के विषय में सोच कर फिर उसके अंग गुजरात ,मिथिला ऐसे सोचा जा सकता है। स्थूल रूपसे सोचते समय गौण बिन्दु दिशा को भटका सकते हैं।
      ———————————————
      (४)डॉ, ठाकुर : और भी आसान हो जता आपका आकलन यदि आप प्रचलित हिन्दी के मानकों……………..
      म:===> विभक्ति के विषय में मानक कुछ स्थिर हो गया है। पर यह गौण बिन्दू है, जो भी माना जाएगा, स्वीकार है। शक्यतः सभी को साथ लेकर चलना चाहिए। उसी प्रकारसे, आज कल पूर्ण विराम (।) के बदले (.) का प्रयोग भी हो रहा है। पङ्ख नहीं पर पंख चल रहा है।विहङ्ग नहीं पर विहंग ही चल रहा है। उसी प्रकार पञ्च और भञ्जन भी ,पंच और भंजन बन गये हैं।इसे, कुछ गौण बिन्दु मानता हूँ।इस पर, मैं उदासीन मत रखता हूँ।
      ———————————————–
      (५) डॉ. ठाकुर: हिन्दी को किसी की मातृभाषामत बताएं- ———
      म:===>स्वीकार। कहीं गलत कह गया लगता है। मेरे लिए बिन्दु गौण है। अनेकानेक राष्ट्र भाषा प्रचारी संस्थाओं ने जिस भाषा का प्रचार किया है, वह भाषा अभिप्रेत है। मैं(गुजराती बनिया)-आप(मैथिली ब्राह्मण) जिस भाषा में चर्चा कर रहें हैं, वह भाषा।
      अनेकानेक धन्यवाद । विचार परिश्कृत हो रहे हैं।

    2. मुझे तो लगता है कि भारत को फ़ोड़ने के लिये एक षड़यंत्र चल रहा है।
      यदि हिन्दी का अस्तित्व ही‌हटा दिया जाए, यह कह कुप्रचारकर कि वह कोई भाषा ही नहीं है, तब अंग्रेज़ी के विरोध में कोई भी‌भारतीय भाषा, संस्कृत सहित, खड़ी नहीं हो सकती। आम जन को संस्कृत से कोई ‘मतलब
      नहीं। कुछ विद्वान क्या कर सकेंगे, बस अभी तक हिन्दी और अन्य राष्ट्ीय भाषाओं वाले लड़ रहे थे ( यह भी दुर्भाग्य’ है) अब हिन्दी और संस्कृतवाले भी लड़ने लगेंगे
      .बिल्लियां आपस में लड़ती रहें, बन्दर को लाभ मिलेगा ही।

    3. डॉ. ठाकुर कल ही,
      “अंग्रेज़ी से कड़ी टक्कर” डाला है.
      देखने की कृपा का अनुरोध करता हूँ.

  3. प्रिय मधुसुदना जी,
    बहुत बधाई, धन्यवाद तथा साधुवाद,
    आपकी शैली के अनुकूल आपने जड़ में जाकर कार्य किया है, और तर्क स्वीकार करना होता है..
    आपको १०० में से ९५ अंक देता हूँ
    एक बिंदु खोलना चाहता हूँ जो आप के मन में उपस्थित है :
    आपने भाषा के एक ही गुण को लेकर चर्चा की है – वर्तनी और उससे सम्बंधित गुण..
    आप जानते हैं की भाषा के अनेक गुण होते हैं , तभी तो आपने इस लेख के शीर्षक में “भाग एक” लिखा है, और अन्य भागों को आप क्रमशः लिखेंगे ..जैसे व्याकरण, अर्थ विषयक, भाषा विज्ञान, अदि, और अंत में सर्वाधिक महत्वपूर्ण गुण – हिंदी ४० % भारतीयों की मातृभाषा है, और ६०% इसे समझते हैं.. मातृभाषा होने से यह ह्रदय की भाषा बन जाती है जिसमें आविष्कार और सृजन होता है , विदेशी भाषा में यह्दोनों कार्य अत्यंत कठिन, तभी हम आविष्कारों में पिछड़े हैं , और मौलिक सोच में भी..
    किन्तु अंग्रेज़ी को हटाना बहुत ही दुष्कर होगा, तब भी हम संघर्ष करेंगे ही..
    आपने लिखा : ,”मुझे यह विश्वास नहीं होता, कि ऐसी कॉमन सेन्स वाली जानकारी जो इस लेखमें लिखी गयी है, हमारे नेतृत्व को नहीं थी? क्या किसी ने ऐसा सीधा सरल अध्ययन नहीं किया?”
    मेरी समझ में मैकाले गांधी से अधिक सफल हुआ, तभी इस देश में ब्राउन साहिबों की भरमार है..जो देखने में काले हैं पर सोचते अंग्रेजों के समाना हैं, उनकी भलाई के लिए सोचते हैं..हमारे प्रथम प्रधान मंत्री जो अपने को अंतिम ब्रिटिश प्रधान मंत्री मानते थे भी कश्मीरी ललामी लिए हुए ब्राउन साहिब ही थे वे तो अंग्रेज़ी की श्रेष्ठता माने बैठे थे.. हिन्दी में विज्ञान को अभिव्यक्त करने की शक्ति नहीं है भी एक बड़ा झूठ था..संस्कृत की पुत्री में विज्ञान अभिव्यक्त काने की शक्ति न हो ऐसा एक मैकालेनिष्ठ व्यक्ति ही सोच सकता है..
    और एक बात और, ब्रिटेन और यूएस ए अपनी पुरी शक्ति अंग्रेज़ी के प्रसार में लगा रहे हैं और भारत को अंग्रेज़ी का भाषाई उपनिवेश बना रहे हैं..हमारे शासक उनकी सहायता कर रहे हैं..
    अतः हम सभी मिलकर राष्ट्रीय भाषाओं की रक्षा करें, हम सभी भारतीय भाषाओं में एकता आवश्यक है जो मुझे कम दिखती है..
    काम जितना कठिन होता, हमारा संकल्प उतनाही दृढ होता है
    जय भारत की राष्ट्र भाषाएँ..

    1. आदरणीय तिवारी जी,
      आपने अगले लेख का आशय सही सही पहचाना/सुझाया।
      आप के शब्द और प्रतिक्रिया,मेरे लिए प्रेरक हैं।
      एवं मेरे अगले लेख की दिशा भी सुनिश्चित करते है।
      हृदयतल से धन्यवाद।

  4. आदरणीय मधुसुदनजी नमस्कार! चित्त प्रसन्ना हुआ यह जानकार की आप मातृभाषा की सेवा का काम अनवरत जारी रखे हुए हैं,

    1. शिशिर जी,
      कहाँ खो गये थे?
      प्रवक्ता के लिए,कुछ समय निकाल कर अपना स्वतन्त्र,दृष्टिकोण, अलग हो तो भी,दर्शाते रहिए।
      बहुत बहुत धन्यवाद।

  5. डॉ. राजेश कपूर जी
    मैं अपनी ओर से पूरा प्रयास करुंगा.
    मुझे संदेह नहीं है, कि हिंदी ही भारत की शीघ्रताशीघ्र उन्नति के लिए परमावश्यक है|
    पर, अन्य मतों को भी सुनना चाहता हूँ, जिस से मेरी प्रस्तुति परिशुद्ध हो, और मेरी प्रस्तुति की त्रुटियाँ पता चले.
    कोई भी देश पराई( अंग्रेजी की) वैशाखी पर चढ़कर विश्वकी ओलिम्पिक जित नहीं सकता. कुछ दूर दर्शिता के अभाव में तत्कालीन राज्य कर्ताओं नें शायद(?) त्वरित राजकीय लाभ की ओर देखकर देशका बहुत बड़ा घाटा होने दिया.

    आप की और अन्य विद्वानों की टिप्पणियां मुझे विश्व विद्यालय से अनुमति लेने में भी सहायक होंगी. अन्य भाषा विज्ञानियों से भी अनुरोध कि आप अपनी मुक्त टिपण्णी दें.
    (१) विरोधी-(२) त्रुटियाँ दिखाने वाली- और (३) सकारात्मक
    हर प्रकार कि टिपण्णी का मुझे लाभ दीजिए. साथ आपकी डिग्री, पद, पदवी, इत्यादि का संकेत भी मुझे काम आएगा.
    जिससे मुझे अनुमति लेने में लाभ ही होगा.
    मैं अपना भाग्य ही समझूंगा यदि हिंदी के लिए कुछ कर पाऊं. कपूर जी धन्यवाद.
    वन्दे मातरम

  6. आदरणीय प्रो. मधुसुदन जी आपके ये लेख अमरत्व को प्राप्त होने की श्रेणी में आते हैं. विषय के महत्व के अनुसार हर लेख की एक आयु होती है. पर कुछ लेखन ऐसा होता है जो अनेक दशकों या उससे भी अधिक समय तक महत्वपूर्ण व प्रासंगिक बना रहता है. आपकी यह लेख श्रृंखला भारत के लिए एक अभूतपूर्व योगदान है.मेरा विनम्र सुझाव है कि इसका सम्पादन करके पुस्तक के रूप में यथाशीग्र प्रकाशित करें. मैं या भारत के अन्य प्रशंसक इस कार्य में यदि किसी भी प्रकार से सहयोगी हो सकते हैं तो आवश्य अवसर दें. पुनः सादर आग्रह कई इसे प्रकाशित करें. नमन एवं धन्यवाद !

  7. बेहतरीन लेख मधुसूदन जी। निश्चय ही हिन्दी भाषा और देवनागरी लिपि विश्व में सर्वश्रेष्ठ हैं। यह हमारी मूर्खता है कि अपनी इतनी समृद्ध भाषा हम अंग्रेजी के प्रति व्यर्थ मोह पाले हैं।

    1. गिरीश पंकज जी, और इ पंडित जी,
      पढ़ने और टिपण्णी देने के लिए अनेकानेक धन्यवाद.

  8. सम्माननीय इन्सान , एवं डॉ. राजीव जी—बहुत बहुत धन्यवाद।आप को निम्न घटना सुनाने का मन करता है।

    ==>१९८४ में एक शोधपत्र प्रस्तुत करने वायोमिंग -गया था, भोजन के लिए लगभग १२ भारतीय प्राध्यापक साथ बैठे बैठे आपस में, अंग्रेज़ी में वार्तालाप करते देख, निकट से जा रहे अमरिकन को अचरज सा हुआ।
    और उसने (हम लोगों से) पूछा, कि आप लोग क्यों भारतीय भाषा में बात नहीं करते? आप सभी तो भारतीय दिखाइ देते हो?
    तो एक भारतीय (जो कुछ विद्वान भी थे) नें उत्तर दिया, कि अंग्रेज़ी ही हमारी “राष्ट्र भाषा समान” ही तो है।
    और यह थे हमारे पढे लिखे वयोवृद्ध, “बुद्धि भ्रमित” प्राध्यापक, जिन्हें भारत ने आगे बढने में शाला, विश्वविद्यालयों में इत्यादि अनुदान देकर पढाया, लिखाया। क्या ऋण चुका रहे थे?
    वयोवृद्ध की वय देखकर भी, मैंने उनसे बाद में आदर सहित, बात करने का प्रयास किया; पर वे मुझे ही उपदेश देने लगे, कि मैं कुछ और समझदार बनुं।
    जी, हम मूरख है, यह जानकारी भी हमें नहीं, तो हमें कौन बचा सकता है?

  9. महोदय
    प्रणाम ।

    आपका लेख बहुत सार्थक है। समस्या यह है कि देश में हिंदी के प्रति कहीं भी सम्मान अथवा आग्रह नहीं है और इसका सबसे मुख्य कारण हमारे आका गण हैं क्योंकि वे भारतीय हैं ही नहीं न सोच में, न जीवन में- लोकतंत्र बंधक बना हुआ है अभी भी। मूल में जाएं तो हमारी आजादी का इतिहास ठेके पर लिखाया गया जो कि सच्चाई से कोसों दूर था और इसमें चिकनी मिट्टी के रंग विरंगे खिलोंनों को शेर दर्शाया गया- बलिदानियों के उत्सर्ग की उपेक्षा की गई, हिंदी ने देश को एक किया था, लेकिन बताया नहीं गया- नैतिकता की कहानियों को प्राथमिक शिक्षा में से चुन चुन कर निकाला गया,जिससे कि आज जो दो पीढिया है ४० -६० की उमर की और उसके बाद की पूरी पंक्ति – इसे देश की गरिमा, आत्माभिमान, निज भाषा से कोई सरोकार रह नहीं गया है-और उसी कूड़े में से आज हमारे आका हैं- सिर्फ सुविधा के कीड़े- इस लिए राष्ट्रीय प्रश्नों पर उनकी न कोई सोच है और न कोई आग्रह- भाषा का प्रश्न भी उनमें से एक है।
    संविधान के अनुसार जब २६ जनवरी १९६५ से हिंदी को पूरी तरह लागू हो जाना था और अंग्रेजी को इस देश से विदा हो जाना था , आकाऔं को लगा कि अगर शासन की भाषा हिंदी हो गई तो हमारा वैश्ष्टिय समाप्त हो जाएगा- आम आदमी हमसे सवाल करने लगेगा और षणयंत्र रचते हुए १५ वर्ष के स्थान पर जब तक संसद चाहे शब्द संशोधित कर रख दिए गए । एक विचित्र दुर्योग मैं आप सभी के संज्ञान में विना किसी दुर्भावना के लाना चाहता हूं। स्व. शास्त्री जी की तपस्वी आत्मा मुझे क्षमा करे- भारत के गौरव को मिटाने में और अनंतकाल तक समस्या को लटकाने में आदरणीय शास्त्री जी दो बार मोहरा बन गए । सन- १९६५ में जब युद्ध जीत गए थे और सारी शर्तें हम मनवाने की ठोस स्थिति में थे वहां वे वार्ता की मेज पर स्वाभिमान हार गए और इसी अपराध बोध के चलते या तो ह्रदयाघात से उनका शरीर शांत हो गया अथवा किसी राजनीतिक षणयंत्र के चलते उनकी हत्या कर दी गई । दूसरे संसद में भी हिंदी के स्थान पर अंग्रेजी अनंतकाल तक लागू रहेगी का प्रस्ताव भी लोकसभा में आदरणीय शास्त्री जी से ही रखवाया गया- विपक्ष ने वाकआउट किया लेकिन स्व. लक्ष्मीमल सिंघवी अपनी बात कहते रहे कि मैं यहां वाकआउट करने नहीं अपनी बात कहने आया हूं। बाद में गलियारे में शास्त्रीजी से उन्होंने उलाहना भरा विरोध जताया तो शास्त्री जी कहने लगे कि मैं आपकी भावना से सहमत हूं किंतु आप हमारी लाचारी समझिए-। लम्हों की खता पता नहीं देश कितनी सदियों तक भुगतेगा ? जय हिंद जय हिंदी

  10. बहुत सुन्दर आलेख है| इसे पूर्णतया पढ़ अंत में प्रस्तुत कुछ परिच्छेदों को देर तक फिर से पढता रहा हूँ|

    मधुसूदन जी, सयुंक्त राष्ट्र अमरीका में बैठ हिंदी भाषा के प्रति भावपूर्ण कहे आपके शब्द, “पर भारतीय कस्तुरी मृग (हिरन) दौड रहा है, सुगंध का स्रोत ढूंढने। कोई तो उसे कहो, कहां भटक रहे हो, मेरे हिरना! तेरे पास ही, सुगंध-राशी है।” अपने में शुद्ध कविता हैं| अवश्य ही, व्यर्थ में हमें रूलाने के आप दोषी हैं|

    और जहां तक आपके वक्तव्य, “मुझे यह विश्वास नहीं होता, कि ऐसी कॉमन सेन्स वाली जानकारी जो इस लेख में लिखी गयी है, हमारे नेतृत्व को नहीं थी? क्या किसी ने ऐसा सीधा सरल अध्ययन नहीं किया?” की बात है, मैंने स्वतन्त्र भारत के राजनीतिक क्षितिज पर कभी किसी ऐसे दूरदर्शी को नहीं देखा जो अखंड भारत में हिंदी भाषा को राष्ट्रभाषा का सम्मान दिला सके|

    मानो न मानो, बीते शतकों की परिस्थितियों के बावजूद हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर में हिंदी अवश्य प्रबल रही है।

  11. अभिषेक उपाध्याय
    आपकी टिपण्णी के कारण लेख और पढ़ा गया.
    कुछ पाठकों की संख्या और बढ़ गयी.
    धन्यवाद और आशीष.

  12. सदर चरण स्पर्श !
    बहुत ही सारगर्भित विश्लेषण है ,निज भाषा की इतनी गहरी वैज्ञानिक और तार्किक शक्ति को जानकार काफी विस्मय और हर्ष हुआ ! अमेरिकी विश्वविद्यालय में २५ वर्षों से भी अधिक अध्यापन के अनुभव के आधार पर अगर आप निज भाषा के वैभव से अवगत करते हैं तो वाकई काफी गर्व होता है ! आप हमारे लिए प्रेणना स्रोत हैं !अंग्रेजीदां तथाकथित विद्वानों के लिए यहाँ पर्याप्त जवाब दिए हैं आपने ! चाणक्य अनुसार- ” देश में विपत्ति की परिस्थिति में शिक्षकों का दायित्व काफी महत्वपूर्ण हो जाता है , जिस राष्ट्र में शिक्षक सोया हो उस राष्ट्र का पतन शीघ्र होता है ” वर्तमान में आप सुदूर सात समुद्र पार से भारत के छात्रों समेत नागरिको को जागरूक कर पुनरराष्ट्रनिर्माण में बहुत ही महती भूमिका अदा कर रहे हैं ! आपका बहुत बहुत आभार , आपके आशीर्वाद की आकांक्षा के साथ …

  13. (१)
    विमलेश जी नहुत बहुत धन्यवाद। मैं ने आपकी टिप्पणी को पुरानी समझ के ध्यान ना दिया।
    (२) धर्मेंद्र कुमार जी।
    निम्न दो लेख पढने के लिए अनुरोध करता हूं।कदी भी देता हूं।
    ============================
    (११) http://www.pravakta.com/archives/20880 Baisakhi par dauda daudi –बैसाखी पर दौडा दौडी
    ===============================
    (३) http://www.pravakta.com/archives/16330 हिन्दी का भाषा वैभव – डॉ. मधुसूदन उवाच Hindi ka Bhasha vaibhav
    ===============================आप के टिप्पणी की अपेक्षा है।

  14. डॉ. मधुसूदनजी का लेख ”हिंदी-अंग्रेज़ी टक्कर?” भाग-एक” पढ़ा. देवनागरी लिपि की वैज्ञानिकता हिन्दी का वह पक्ष है जिसकी तुलना विश्व की कोई भाषा नहीं कर सकती .डॉ. भोलानाथ तिवारी की भाषा बिज्ञान पुस्तक सुधीजन अवश्य देखें. आज यदि संकट है दो स्वाभिमान का ,आत्म-सम्मान का. भारत सरकार के वैज्ञानिक व तकनीकी शब्दावली आयोग ने इतना भारी कम किया है की अब उसे विश्व की आम जाता के लिए वेब साइट के माध्यम से सर्व जन हिताय सार्वजनिक किया जाना चहिए.आज हिंदी की सामर्थ्य का नहीं अपितु देश के कर्णधारों की हिन्दी को लेकर हीनताग्रंथी का संकट है मैं विख्यात कवि दुष्यंत कुमार की गजलके पक्तिंयाँ उधृत करना चाहूँगा- “मेले में खोए होते तो कोई घर पहुंचा देता, हम तो अपने ही घर में खोए हैं कैसे थोर ठिकाने आयेंगे ?”
    -धर्मेन्द्र कुमार गुप्त, इंदौर

    1. -धर्मेन्द्र कुमार गुप्त, जी। टिप्पणी के लिए धन्यवाद।
      “मेले में खोए होते तो कोई घर पहुंचा देता, हम तो अपने ही घर में खोए हैं कैसे थोर ठिकाने आयेंगे ?”
      आप की टिप्पणी पढ़ी।
      अंग्रेज़ी ही हिन्दी की शत्रु हैं। इसी लिए, मेरा प्रयास है, कि हिन्दी को, अंग्रेज़ी से अधिक तर्कशुद्ध बताएं- बिना, हिन्दी सफल होने की संभावना कम देखता हूं।

  15. सचमुच एक अद्भुत अनुभव आपके द्वारा दिया गया जिसे सभी झेल तो रहे है (अपवादों को छोड़ दे ) किन्तु अनुभव नहीं कर रहे है .

    सच्चे अर्थो में मधुसुदन जी आप मात्रभूमि के ऋण से उऋण हो रहे है .

    काश!
    हम सभी भारत वासियों की सोच आप जैसी होती.

    आपके अगले लेख के इंतजार में .

  16. अभिषेक पुरोहित जी —-आप निश्चिंत रहिए। मेरे कहने का तात्पर्य, हितैषियों के सामने समर्थन के लिए था। कुछ ऋषि ऋण भी तो उतारना है।
    आप के सातो बिंदुओंसे सहमत हूं। निम्न दो लेख भी आपने ना देखे हो, तो अवश्य देख लें।
    http://www.pravakta.com/story/20880 –बैसाखी पर दौडा दौडी
    http://www.pravakta.com/story/20966 —भारतीय ”बॉन्साई पौधे”

  17. वास्तव में, मुझे कुछ लोग कहा करते हैं। “कौन तुम्हें(मुझे) पढता है? क्यों समय व्यर्थ करते रहते हो? कहने वाले मेरे कुछ मित्र और निजी हितैषि भी है। उनके लिए टिप्पणियां एक उत्तर के रूप में सत्यापन है। स्पष्ट और बिना हिचकाहट प्रामाणिक टिप्पणी देते रहें। गलति कर सकता हूं।

    यह ishvar का काम है आप करिए अपने लोगो को जगाते रहिये ,निश्चित जानिए बहुत से लोग पढ़ते है ओउर कोई और नहीं तो इश्वर तो जरुर देखता है न |gilahari की tarah काम chhota hi sahi par ram की najar में ksis prakar hanuman के कम से chhota नहीं है apani भाषा अपने desh apana dharm अपने लोगो के liye ही likhate है आप ,ye janakari hamare जैसे लोगो के liye बहुत उपयोगी है व् ye उधाहरण ही पर्याप्त है की उच्च शिक्षित एक तकनीक प्रोफ़ेसर इंग्लिश के bajay hindi या भारतीय भाषा को ज्यादा मान्यता deta है vo भी एक इंग्लिश भूमि से ,इसका prabhav achuk है क्योकि भारतीय आज भी अमेरिका से भारत के बारे में बोलने वाले को ज्यादा मान्यता देते है जैसे स्वामी विवेकानंद को दिया था अत इसे अच्छे काम के लिए आपका बहुत बहुत अभिनन्दन…………….

  18. १.हिंदी व् भारतीय भाषाओ में यदि पढ़ाया जाए तो कोई भी अभियंता ४ की जगह तिन वर्ष में बन सकता है एसा मेरा व्यक्तिगत अनुभव है|
    २.दुर्भाग्य से हिंदी में तकनीकी शब्दावली को ज्यादा प्रचलित नहीं किया गया है न हिंदी में भारत में कही भी अभियांत्रिकी में पढाई होती है {उच्च क्शिक्षा न की डिपलोमा,जहा तक मेरी जानकारी है} जिससे सीधा नुकसान हमारे गाव से या हिंदी माध्यम से पढ़े हुवे विद्यार्थियों को होता है उनके मन पर जबरदस्ती से अंग्रेजी थोपी जाती है क्योकि भारत के नौकर शाह नहीं चाहते है की हिंदी या किसी भी भारतीय भाषा को प्राथमिकता मिले|
    ३.लेकिन सारा दोष उनको हो एसा नहीं है अमूमन एक मध्यम वर्ग का भारतीय आज भी अंग्रेजी के प्रति एक “अbhijaaty भाव” रkhaता है व् अपनी भाष के प्रति हिन् भाव|
    ४.योजना बध्ध तरीके से भाषा में मिलावट की जा रही है जिसका सबसे ज्यादा जिम्मेदार मिडिया व् बाजार है
    ५. पिछले कुछ समय से मुझे भी ये बात ध्यान में आई की अंग्रेजी के बजे अपनी हिंदी में लिखने से कम सोचना पड़ता है व् ज्यादा लिख जाते है मतलब विषय को जितना चाहे लम्बा कर सकते है ओउर जितना काहे छोटा फिर कोई अपवाद भी नहीं है ,केवल और केवल हिंदी या भारतीय भाषा बोलने वाले कमजोर है इस लिए ही पुरे भारत को अंग्रेजी पढ़नी पड़ेगी |
    ६.मेने कुछ समय एक कोलेज में सिविल इंजीनियरिंग पढाई थी वहा मेने एक प्रयोग किया था मेने पहले हिंदी में पढाया फिर मेने इंग्लिश में पढाया ,जानकर आपको आश्चर्य होगा की वर्षो से इंग्लिश में पढ़ रहे विद्यार्थी भी हिंदी में जल्दी समझ गए याधय्पी सबकी घर पर बोलने की वो भाषा नहीं थी फिर भी हिंदी सबको आती थी|
    ७.जब में कोलेज पढ़ता था तब मई,मेरे बहुत से दोस्त इंग्लिश को पहले हिंदी या मारवड़ी में समझते थे फिर उनका अनुवाद इंग्लिश में करते थे मन में फिर लिखते थे अगर वो ही सीधा हिंदी या मारवाड़ी में लेखन होता तो हमें इंग्लिश की तुलना में चोथाई समय ही लगता जबकि मेरे दोस्त इंग्लिश मीडियम से ही पढ़े थे|

  19. ajit bhosle कहते हैं==>”आपके लेख पर इतनी टिप्पणियाँ देखकर सच कहूं तो ईर्ष्या होने लगती है, पर मेरी ईर्ष्या सकारात्मक है, यह मुझे हिंदी के लिए कुछ अच्छा करने की प्रेरणा देती है, आप सचमुच एक दिन अपना एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर लेंगे, मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं, मेरी ईर्ष्या वाली बात को गंभीरता से ना ले.”धन्यवाद अजित जी। भाई आपकी टिप्पणियों से उत्साहित हूं। और अपेक्षाएं पूरी करने का प्रयास करूंगा। आप ना भी कहते, तो भी मैं आप की ईर्ष्या वाली बात को सकारात्मक अर्थ में ही लेता। टिप्पणी देते रहें।
    वास्तव में, मुझे कुछ लोग कहा करते हैं। “कौन तुम्हें(मुझे) पढता है? क्यों समय व्यर्थ करते रहते हो? कहने वाले मेरे कुछ मित्र और निजी हितैषि भी है। उनके लिए टिप्पणियां एक उत्तर के रूप में सत्यापन है। स्पष्ट और बिना हिचकाहट प्रामाणिक टिप्पणी देते रहें। गलति कर सकता हूं। शुभेच्छा।

  20. अनीश पटेल:
    आप कहते हैं: ” महोदय आपने जिन तत्थ्योँ की चर्चा कि है, उन पर पुनः विचार करेँ, काम लिखने के लिये दो शब्द और KAM के लिये तीन । निवेदन है कि पूर्ण सच लिखेँ क्योँकि आप दो माताओँ कि तुलना मेँ अपनेँ उस माँ से सीखी तकनीकि छुपा ली …प्रशंशा सिर्फ सत्य की ..अनीश”
    =================
    मधुसूदन का उत्तर : “काम के लिए अंग्रेज़ी तो WORK होगा, उसके कितने अक्षर है? कुछ विचार तो कीजिए। फिर यह तो एक उदाहरण ही है।
    प्रश्न: आपने पूरा लेख पढा था? आप अपनी दृष्टिसे गुणांक दीजिए। और सारे गुणांकों का योग कीजिए।
    भाई, मैं ने २५ से भी अधिक वर्ष अंग्रेज़ी माध्यम में पढाया है।किसी तथ्य को छुपाने से मुझे कोई लाभ नहीं।
    मैं जो दस पंद्रह वर्ष पहले मानता था, आज नहीं मानता। मेरी आंखे खुल गयी है। आप भी सोचिए। कोई दुराग्रह नहीं।
    सुझाव: निम्न दो लेख पढने का अनुरोध कर सकता हूं?
    ====
    http://www.pravakta.com/story/20880 –बैसाखी पर दौडा दौडी
    http://www.pravakta.com/story/20966 —भारतीय ”बॉन्साई पौधे”

  21. आपके लेख पर इतनी टिप्पणियाँ देखकर सच कहूं तो ईर्ष्या होने लगती है, पर मेरी ईर्ष्या सकारात्मक है, यह मुझे हिंदी के लिए कुछ अच्छा करने की प्रेरणा देती है, आप सचमुच एक दिन अपना एक बड़ा पाठक वर्ग तैयार कर लेंगे, मेरी शुभकामनाएं आपके साथ हैं, मेरी ईर्ष्या वाली बात को गंभीरता से ना ले.

  22. नेम सिंह जी आप सच्चे भारतीय हैं आपकी टिप्पणी पढ़कर अच्छा लगा , आपसे एक विनम्र निवेदन है की आप रोमन लिपि की बजाय देवनागरी में टिप्पणी दे और ज्यादा प्रभावकारी होंगे, अगर इस साईट पर मोड़रेशन नहीं हो पा रहा हो तो आज तमाम व्यवस्थाएं हो गयीं हैं वहां टाइप करके यहाँ कॉपी पेस्ट करें, लोग ज्यादा आनंदित होंगे.

  23. महोदय आपने जिन तत्थ्योँ की चर्चा कि है, उन पर पुनः विचार करेँ, काम लिखने के लिये दो शब्द और KAM के लिये तीन । निवेदन है कि पूर्ण सच लिखेँ क्योँकि आप दो माताओँ कि तुलना मेँ अपनेँ उस माँ से सीखी तकनीकि छुपा ली …प्रशंशा सिर्फ सत्य की ..अनीश

  24. सर्व श्री पाठक, नेम सिंघ जी, पं. विश्व मोहन तिवारी जी, अभिषेक जी, और मुकुल जी, एवं सुनील जी–
    आप सभी को धन्यवाद। यदि आपने, पढे ना हो, तो निम्न दो लेखों को पढने का कष्ट करें। कुछ बिंदू और प्रकाशित हो जाएंगे। वैसे उच्च हिंदी के पहलुओं पर “हिन्दी अंग्रेज़ी टक्कर – भाग दो” की प्रतीक्षा करें। अपना मत खुलकर व्यक्त करते रहें।
    http://www.pravakta.com/story/20880–बैसाखी पर दौडा दौडी
    http://www.pravakta.com/story/20966—भारतीय ”बॉन्साई पौधे”

  25. koi asatya nahin hai lekin hamare bandhuvar jo matra bhasha ko chupakar anya bhasaon ka rag alapte hain unka apana koi aadhar nahin hota vo hamesha nakal main hi vishwas rakhte hain ore vastavikta ko chupate hain. anya bhasaon ka gyan prapt karna acchi bat hai kintu apani bhasha ka anadar karna murkhta hi hai. jai bharat jai Hindi. mera un videsh main rahne vale bhasha premiyon se anurodh hai ki aaj ham diniya main hain or takniki vyavastha se bhi jure hain so apana thora samay nikal kar jyada nahi to thora kuch hindi main avasya likhen. dhanyawad

  26. आदरणीय मधुसुदन जी के द्वारा हिंदी पर अति उत्तम लेख लिखा गया है. काश इस लेख की प्रतिया संसद भवन में भेज दे जाए. अंग्रेजो का छोड़ा हुआ प्रमुख वायरस अंग्रेजी है जिसने भारतीय सिक्षा व्यवस्था के आधार को ही कमजोर कर दिया है.

  27. सर्व श्री अज्ञानी जी, अजित जी, डॉ राजेश जी, विवेक जी, प्रेम जी, दिवस जी आप सभी को धन्यवाद समय निकालकर लेख पढ़ने के लिए| कृतज्ञता अनुभव करता हूँ| राजेश जी उदार मना है, शब्दों शब्दों में प्रोत्साहित भी करते हैं,– आपकी अपेक्षाएं पूरी करने की चेष्टा करुंगा|
    प्रेम जी आप दुसरे भाग में आप की जिज्ञासा का उत्तर कुछ अंश में पाएंगे| “हिंदी का भाषा वैभव” १ ला लेख देख ले| संस्कृत शब्द रचना शास्त्र बेजोड़ और अप्रतिम है(दुसरे भाग में) | समयाभाव के कारण संक्षेप में उत्तर दिया है|
    कृतज्ञता सहित—-
    मधुसूदन

  28. मधुसूदन जी आपके देशभक्ति के जज्बे को सलाम और हमारे भीतर भी अपनी भाषाव का गुरव बढ़ने के लिए आप का बहुत बहुत धन्यवाद | इस देश को आप जैसे देशभक्तों की बहुत ज़रुरत है | कृपया आप अपना ये लेखन न केवल जारी रखे बल्कि जल्दी जल्दी भी प्रकाशित किया करे ताकि हम जैसे भारतीयों के भी ज्ञान में थोड़ी बहुत अपने देश और अपनी भाषा के लिए सम्मान जागे और हम अपनी भाषा की सुन्दरता और अच्छाई का महत्त्व भी लोगो को बता सके | आपके इन प्रयासों के लिए हम अपनी कृतज्ञता प्रकट करते है और आपको धन्यवाद और साधुवाद देते है |

  29. आदरणीय डॉ.मधुसुदन जी हिंदी पर आपने अति सुन्दर लेख लिखा है, सच में प्रशंसा के लिए शब्दों की कमी है| आपका हिंदी प्रेम तो हम जान ही गए हैं| विदेश में रहते हुए भी हिंदी से आपका विशेष लगाव सच में प्रशंसनीय है| वरना हमारे देश में पले बढे व यहीं की खाने वाले युवा आज अंग्रेजी का रट्टा लगाते अपनी ही मातृभाषा का मज़ाक बनाते नज़र आते हैं| शिकायत तब अधिक होती है जब कोई मित्र या भाई अथवा बहन मिलते ही जोर से कहते हैं ” HI”…या “HEY DUDE, WATZ UP”…फेसबुक पर कभी कोई कहता है “HEY DUDE…HW’S UR LIFE IS GOING ON”…यहाँ तक की पता नहीं कौन कौन से विद्वानों(?) की कही बातों को ऐसे छापते हैं जैसे की बचपन से इनका अनुसरण कर रहे हों| बल्कि क्या लिखा है उन्हें तो इसका मतलब भी नहीं पता न ही वे लिखने वाले को जानते हैं|
    उदा. “GOD is always playing CHESS with each one of us. He makes Moves in our LIFE & then sits back to see how
    we react to the CHALLENGES … So make the best move before CHECKMATE…”
    अब १० मिनट तो इसेसमझने में ही खराब हो जाएंगे| किन्तु हीन भावना से भरे इन भारतीयों को मार्ग दिखाने में आपके लेख अति सहायक सिद्ध होंगे…
    इस सुन्दर रचना के लिए आपका ह्रदय से आभार…

  30. डॉ.राजेश कपूर जी आप ने बिल कुल सही लिखा है की जापान समझ गया था की कॉन्वेंट स्कूल कभी देश भक्त पैदा नहीं कर सकते, लेकिन अपने देश में आप देख ही रहे होंगे की कॉन्वेंट में में सिर्फ रजिस्ट्रेशन के लिए नौनिहालों के माता पिता किस तरह एक साल पहले ही पगला जाते हैं, बहरहाल मधुसूदन जी के जज्बे की में दिल खोलकर तारीफ़ करता हूँ की विदेश में भी रह कर किस तरह हिंदी का झंडा बुलंद करने का अथक प्रयास कर रहे हैं.

  31. एक और बात, मधुसूदन जी, दोनों भाषाओं की लिपियाँ भी भिन्न भिन्न रूप में है! भारत के बाहर आपके सहकर्मियों की भांति अधिकांश लोग हिंदी अथवा देवनागरी लिपि से अनभिज्ञ हैं| मैं समझता हूं कि इन दो भाषाओं को लेकर आपका अभ्यास केवल भारत में देखा समझा जा सकता है| और, न घर का न घाट का, युगों से हिंदी अंग्रेजी टक्कर में फंसा बेचारा भारतीय शब्दावली ज्ञान के अभाव के कारण अपनी सोचने की क्षमता को ही खो बैठा है| आज हिंदी और अंग्रेजी में छपे भारतीय समाचारपत्रों को पढ़ने मात्र से मेरा अभिप्राय स्पष्ट हो जायेगा| विषय की गंभीरता के कारण उचाट होने से बचने हेतु मुझे एक चुटकुला याद हो आया| प्रार्थी की अंग्रेजी में दक्षता को जानने के लिए परीक्षक ने पूछा किसी को पास बुलाना हो तो अंग्रेजी में क्या कहो गे? उत्तर मिला, “Come here.” ठीक है, लेकिन वहां कमरे के कोने में जाने के लिए उसे क्या कहो गे? प्रार्थी कमरे के कोने में जा खड़ा हुआ और बोला, “Come here.”
    मैं आज भी आँखे मूंदे १९५० दशक में सैंकडों विद्यार्थियों के संग सफेद बनियान और खाकी निकर पहने दिल्ली के लाल किले के बाहर नवम्बर माह की मीठी मीठी ठंड में जवाहरलाल नेहरू द्वारा टूटी फूटी हिंदी में कहे वक्तव्य को सुन सकता हूं| और किशोरावस्था में कचहरी के बाहर खोकों में तख्तपोश पर काले चोगे पहने वकीलों को टाइपराईटर पर अंग्रेजी भाषा में कानूनी कागजात तैयार करते भी देख सकता है| लगता है कि जवाहरलाल नेहरु और वकीलों के पारस्परिक प्रेम ने अंग्रेजी को भुलाने और हिंदी को अपनाने का कोई अवसर ही नहीं दिया| नवभारत टाइम्ज़ पर ऑनलाइन टिप्पणी करते पाठकों को रोमन लिपी में हिंदी लिखने की प्राप्य सुविधा देख मुझे भय है कि भारतीय युवा वर्ग समय के साथ कहीं देवनागरी लिपि को न भूल जाये| भाषा का उपयुक्त प्रभाव न केवल रोज की बोल चाल पर बल्कि हमारी कुशल विचारधारा पर भी होना चाहिए और इस कारण भारतीय स्वाभिमान बनाए रखने के लिए देवनागरी में हिंदी शब्दावली में निरंतर विकास करते भाषा को अपने दैनिक प्रयोग में लाना बहुत आवश्यक है|

  32. प्रो. मधुसुदन जी बड़े महत्व के और मौलिक विषयों को उठाते हैं आप. भावी राष्ट्र निर्माण में इन विषयों का कितना महत्व है, यह आपके ध्यान में है.भारतीयों की सोच को कहाँ से पकड़ने की ज़रूरत ही, इसे आपने काफी अछि तरह से समझा है.लिखते भी बड़े तर्कपूर्ण ढंग से हैं, साधुवाद.
    – अंग्रजी विश्व की सबसे अधिक अवैज्ञानिक, अधूरी भाषा है जिस में उच्चारण के लिए पूरी वर्णमाला है ही नहीं. अँगरेज़ को भी पहली बार उच्चारण दूसरे से समझना-जानना पडेगा.
    – विदेशी भाषा में पढ़ने वाले बच्चे तर्क बुधी को खो बैठते हैं.क्युंकी वे बिना समझे रट्टा मार कर याद करते हैं. अतः वे हर विषय को समझने में कई गुना अधिक समय लगाते है. ८०% क्षमता भाषा के समझने-सीखने में व्यर्थ चली जाती है. सुभाष, अरविन्द, हरदयाल, धींगरा अदि केवल अपवाद थे.
    – अतः विदेशी भाषा में अध्ययन करने वाले देश तरक्की नहीं कर सकते. अंग्रेजी भाषा को देश के शासन-प्रशासन, पढाई में लागू रखने के पीछे एक षड्यंत्र है जिसका शिकार भारत को बनाया गया है.
    – तभी तो जापान ने स्वतंत्र होते ही कोंवेंट स्कूलों को जापान में प्रतिबंधित कर दिया था. उनका मानना था कि विदेशी भाषा के इन विद्यालयों में देशभक्त पैदा नहीं हो सकते.

  33. मधुसुदन जी बहुत ही रोचक है यह जानकारी, आप निश्चिन्त रहिये हिंदी एक दिन सब को पछाड़ देगी, पहले मैं बहुत निराश हो गया था लेकिन आप जैसे और भी लोग हैं जिनके कारण यह समझ में आ रहा है की हिंदी को कितना भी नज़रंदाज़ किया जाए पर यह एक दिन नेतृत्व करती नज़र आएगी, सबसे बड़ी समस्या यह हैं की भारतीय लोग स्वयं को हीन समझना छोड़ नहीं पा रहे हैं, केवल दिखावे के लिए अपने बच्चों पर अंगरेजी थोप रहे हैं. जिस दिन उनको समझ में आ जाएगा की की वो गलती पर हैं उस दिन भारत की किस्मत बदल जायेगी.

  34. डॉ प्रोफेसर मधुसुदन जी आपने इतना सुन्दर लिखा है की इसमें कुछ टिप्पणी करना सूरज को दीया दिखने जैसा होगा! घर की मुर्गी दाल बराबर वाली मानसिकता और विदेशी चाटुकारिता की वजह से ही हम लोग पिछड़े हुए कहलाते हैं!

    सरकारी कामकाज, वित्तीय लेन देन में अगर हिंदी दृढ़ता से उपयोग में लाई जाए तो कई समस्याएं अपने आप समाप्त हो जायेंगी!

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