डॉ वेदप्रताप वैदिक: न भूतों न भविष्यति

डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’

हिन्दी के आकाश से आज स्वयं दिनकर अस्ताचल की ओर बढ़ गया, डॉ. वैदिक की देह अब अक्षर देह में बदल गई, 13 वर्ष की आयु से हिन्दी के लिए लड़ने वाले योद्धा ने आज देह को त्याग दिया, पत्रकारिता को ख़बर पालिका कहने वाले तटस्थ पत्रकार ने अलविदा कह दिया, मातृभाषा उन्नयन संस्थान ने अपना संरक्षक खो दिया, देश ने सजग पत्रकार को अंतिम विदाई दी, वैदिक युग का अनंत में विलय हो गया, डॉ. वैदिक नहीं रहे, हिन्दी योद्धा डॉ. वैदिक ने अंतिम सांस ली और ऐसे हज़ारों शीर्षकों को आज मौका मिल गया, जब देश के सुप्रसिद्ध पत्रकार और हिन्दी के अनथक योद्धा डॉ. वेदप्रताप वैदिक जी ने भौतिक लोक से विदाई ले ली।

महज़ 13 वर्ष की अल्पायु से हिन्दी भाषा के स्वाभिमान की लड़ाई लड़ने वाले डॉ. वैदिक वह शख़्स रहे, जिनके भारत ही नहीं अपितु वैश्विक स्तर पर प्रगाढ़ संपर्क और सम्बंध रहे हैं। भारत के विभिन्न प्रधानमंत्रियों से लेकर राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, कई मुख्यमंत्री, राजनायक, राजनेताओं के आप सलाहकार भी रहे और यथासमय आप उनका मार्गदर्शन भी करते रहे।

मंगलवार को गुरुग्राम स्थित निज निवास पर नहाते समय बाथरूम में गिरने के कारण डॉ. वैदिक जी का हृदय गति रुक जाने से सुबह निधन हो गया। 

हिन्दी के अनथक योद्धा डॉ. वेदप्रताप वैदिक वैश्विक स्तर पर हिन्दी के पक्षधर और प्रचारक रहे। भारतीय भाषाओं को उनका उचित स्थान दिलवाने के लिए सतत् संघर्ष और त्याग किया।

महर्षि दयानंद, स्वामी श्रद्धानंद, महात्मा गांधी और डॉ. राममनोहर लोहिया की महान परंपरा को आगे बढ़ाने वाले योद्धाओं में वैदिक जी का नाम अग्रणी है।

हिन्दी योद्धा डॉ. वेदप्रताप वैदिक का जन्म 30 दिसंबर 1944 को पौष की पूर्णिमा पर इंदौर, मध्य प्रदेश में हुआ। आपके पिता आर्यसमाजी विद्वान रहे। डॉ. वैदिक पढ़ने में सदा प्रथम श्रेणी के छात्र रहे। आप बतौर वक्ता भी कई राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में अव्वल रहे। आप रूसी, फ़ारसी, जर्मन और संस्कृत के भी जानकार रहे। छात्र जीवन से ही विद्वत्ता का लोहा मनवा चुके डॉ. वैदिक के जीवन के कई पहलू हैं। बाल्यकाल में महज़ 12-13 वर्ष की आयु में ही नईदुनिया के तत्कालीन संपादक रहे, राहुल बारपुते जी को अपनी वाक चातुर्य से स्तब्ध कर चुके डॉ. वैदिक को बाबा बारपुते ने अपने भाषण को लिखकर लाने के लिए कहा और यह आश्वस्ति दी कि उसे नईदुनिया में छापेंगे। दूसरे दिन वैदिक जी अपना भाषण लिखकर ले गए और बाबा को सौंपा, फिर बाबा ने उसे छापा भी। यहीं से वैदिक जी के भीतर पत्रकार बनने की चेष्टा का जन्म हुआ। उन दिनों इंदौर से ईश्वर चंद जैन जी जागरण अख़बार प्रकाशित करते थे, उस अख़बार में प्रूफ़ रीडिंग का कार्य करने के लिए वैदिक जी को काम मिल गया, धीरे-धीरे उनकी पत्रकारिता आरम्भ हुई और फिर नई दुनिया इत्यादि में भी आपने कार्य किया।

डॉ. वैदिक ने अपनी पीएच.डी. के शोधकार्य के दौरान न्यूयार्क की कोलंबिया यूनिवर्सिटी, मास्को के ‘इंस्तीतूते नरोदोव आजी’, लंदन के ‘स्कूल ऑफ़ ओरिंयटल एंड एफ़्रीकन स्टडीज़’ और अफ़गानिस्तान के काबुल विश्वविद्यालय में अध्ययन और शोध किया।

महाविद्यालयीन शिक्षा इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज से ग्रहण करने के बाद डॉ. वैदिक जी ने जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के ‘स्कूल ऑफ़ इंज़’ से अंतरराष्ट्रीय राजनीति में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की। वे भारत के ऐसे पहले विद्वान हैं, जिन्होंने अपना अंतरराष्ट्रीय राजनीति का शोध-ग्रंथ हिन्दी में लिखा। उनका निष्कासन हुआ, वह भी राष्ट्रीय मुद्दा बना। 1965-67 में संसद डॉ. राममनोहर लोहिया, मधु लिमये, आचार्य कृपालानी, इंदिरा गांधी, गुरू गोलवलकर, दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, चंद्रशेखर, डॉ. जाकिर हुसैन, रामधारी सिंह दिनकर, डॉ. धर्मवीर भारती, डॉ. हरिवंशराय बच्चन जैसे लोगों ने वैदिक जी का डटकर समर्थन किया। यह मामला संसद में उठाया, संसद हिल गई, तब जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री इन्दिरा गाँधी ने विशेष स्वीकृति प्रदान की और वेदप्रताप वैदिक जी का शोध हिन्दी में स्वीकृत हुआ। सभी दलों के समर्थन से वैदिक जी ने विजय प्राप्त की, नया इतिहास रचा। तब से लेकर आज तक छात्रों को अपना शोध हिन्दी व भारतीय भाषाओं में प्रस्तुत करने की सहूलियत मिली यानी हिन्दी में शोधार्थियों को शोध कार्य करने का श्रेय भी डॉ. वैदिक को जाता है। 

हिन्दी के प्रति उनका प्रेम बाल्यकाल से ही रहा । इंदौर शहर इस बात की भी गवाही देता है कि वैदिक जी का जन्म भी इंदौर में हुआ और उन्होंने लोहिया के ‘अंग्रेज़ी हटाओ आन्दोलन’ को भी इंदौर में संचालित किया। 

डॉ. वैदिक जी ने अपनी पहली जेल-यात्रा सिर्फ़ 13 वर्ष की अल्पायु में की थी। हिन्दी सत्याग्रही के तौर पर वे 1957 में पटियाला जेल में रहे। बाद में छात्र नेता और भाषाई आंदोलनकारी के तौर पर कई जेल यात्राएं की, इसके साथ ही, डॉ, वैदिक भारत में चलने वाले अनेक प्रचंड जन-आंदोलनों के सूत्रधार भी रहे।

डॉ. वैदिक द्वारा अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों का आयोजन किया गया, राष्ट्रीय राजनीति और भारतीय विदेश नीति के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाई।  यहां तक कि कई भारतीय और विदेशी प्रधानमंत्रियों के व्यक्तिगत मित्र और अनौपचारिक सलाहकार भी रहे। भारत के प्रधानमंत्री एच डी देवघोड़ा को हिन्दी सीखने के लिए भी. डॉ वेदप्रताप वैदिक जाते रहे। प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से लेकर चंद्रशेखर, नरसिम्हा राव, इन्द्रकुमार गुजराल, अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ. मनमोहन सिंह तक डॉ. वैदिक जी से कई मसलों पर लगातार सलाह लेते रहे। एक करिश्माई व्यक्तित्व के धनी डॉ. वैदिक जी ने लगभग 80 देशों  की कूटनीतिक और अकादमिक यात्राएं कीं, 1999 में संयुक्त राष्ट्र संघ में भारत का प्रतिनिधित्व भी किया। इसी वर्ष विस्कोन्सिन यूनिवर्सिटी द्वारा आयोजित दक्षिण एशियाई विश्व-सम्मेलन का उद्घाटन डॉ. वैदिक ने किया।

तत्कालीन मंत्री रहीं सुषमा स्वराज जी को डॉ. वैदिक सदैव संयुक्त राष्ट्र संघ में हिन्दी भाषा को सम्मिलित करवाने के लिए कहते रहे, कई प्रयासों में उनकी सहायता भी की और कूटनीतिक अनुभवों को साझा भी किया।

डॉ. वैदिक लगभग 10 वर्षों तक पीटीआई भाषा (हिन्दी समाचार समिति) के संस्थापक-संपादक और उसके पहले नवभारत टाइम्स के संपादक (विचारक) रहे हैं। यहाँ तक कि जब उनका कोई बेहतरीन  लेख, समाचार या विचार प्रकाशित होता था तो उन्हें सुबह-सुबह टेलीफ़ोन कर बधाई देने वालों में कई पूर्व राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रसिद्ध राजनेता, मुख्यमंत्री इत्यादि हुआ करते थे।

भारतीय और विदेशी विश्वविद्यालयों में विशेष व्याख्यान देने के लिए लगातार डॉ. वैदिक को बुलाया जाता रहा। उन्होंने अनेक अन्तरराष्ट्रीय सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया। आकाशवाणी और विभिन्न टीवी चैनलों पर 1962 से अब तक अगणित कार्यक्रम किए।

डॉ. वैदिक ने ‘अफ़गानिस्तान में सोवियत-अमेरिकी प्रतिस्पर्धा’, ‘अंग्रेज़ी हटाओ: क्यों और कैसे?’, ‘हिन्दी पत्रकारिता-विविध आयाम’, ‘भारतीय विदेश नीतिः नए दिशा संकेत’, ‘एथनिक क्राइसिस इन श्रीलंका: इंडियाज ऑप्शन्स’, ‘हिन्दी का संपूर्ण समाचार-पत्र कैसा हो?’, ‘वर्तमान भारत’, ‘अफ़गानिस्तान: कल, आज और कल’, ‘महाशक्ति भारत’, ‘भाजपा, हिंदुत्व और मुसलमान’, ‘कुछ मित्र और कुछ महापुरुष,’ ‘मेरे सपनों का हिंदी विश्वविद्यालय’ ‘हिंदी कैसे बने विश्वभाषा’ ‘स्वभाषा लाओ:अंग्रेज़ी हटाओ’, आदि पुस्तकें लिखीं।

डॉ. वैदिक को अनेक राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पुरस्कारों और सम्मानों से विभूषित किया गया, जिनमें विश्व हिन्दी सम्मान (2003), महात्मा गांधी सम्मान (2008), दिनकर शिखर सम्मान, पुरुषोत्तम टंडन स्वर्ण-पदक, गोविंद वल्लभ पंत पुरस्कार, हिन्दी अकादमी सम्मान, लोहिया सम्मान, काबुल विश्वविद्यालय पुरस्कार, मीडिया इंडिया सम्मान, लाला लाजपतराय सम्मान आदि।

इन सबके अलावा आप हाफ़िज़ सईद के साक्षात्कार लेने वाले मामले में विश्वव्यापी चर्चित रहे। हालांकि इंदौर के एक कार्यक्रम में डॉ. वैदिक ने यह कहा भी था कि ‘वह साक्षात्कार लेना नहीं चाहते थे, पर उन्हें मजबूरी में हाफ़िज़ सईद से मिलना पड़ा।’

वर्ष 2018 में मातृभाषा उन्नयन संस्थान के संरक्षक का दायित्व संभाल कर हिन्दी में हस्ताक्षर बदलो आंदोलन के प्रणेता रहे। आपके मार्गदर्शन में संस्थान द्वारा 21 लाख से अधिक लोगों के हस्ताक्षर अन्य भाषाओं से हिन्दी में बदलवाए। यह अपनी तरह का अनूठा आंदोलन रहा, जिसके कारण वर्ष 2020 में इसे विश्व कीर्तिमान में भी दर्ज किया गया। संस्थान के अध्यक्ष के नाते डॉ. अर्पण जैन अविचल और डॉ. वैदिक सहित सभी पदाधिकारियों ने यह विश्व कीर्तिमान ग्रहण किया।

आप अनेक न्यासों, संस्थाओं और संगठनों में सक्रिय रहे। आपने भारतीय भाषा सम्मेलन एवं भारतीय विदेश नीति परिषद् के साथ जन दसेक्ष की स्थापना कर हज़ारों लोगों को जोड़ा।

वर्तमान में दिल्ली के राष्ट्रीय समाचार पत्रों तथा अन्य प्रदेशों और विदेशों के लगभग 150 से अधिक समाचार पत्रों में भारतीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर डॉ. वैदिक के लेख हर सप्ताह प्रकाशित होते रहते हैं।

हज़ारों किस्से, सैेंकड़ो अनुभव, बीसियों सलाह, सबका सम्मिश्रण यदि कहीं देखने को मिलता है तो वह व्यक्तित्व डॉ. वेदप्रताप वैदिक का बनता है।

रामधारी सिंह दिनकर की पंक्तियों के अनुसार –

स्वर्ग के सम्राट को जाकर खबर कर दे/ रोज ही आकाश चढ़ते जा रहे हैं वे।

रोकिये, जैसे बने इन स्वप्नवालों को / स्वर्ग की ही ओर बढ़ते आ रहे हैं वे।

महायोद्धा, स्पष्ट वक्ता, सरल मना और सहृदय व्यक्तित्व के धनी डॉ. वेदप्रताप वैदिक के अवसान से डॉ. वैदिक युगीन पत्रकारिता का स्तम्भ ढह गया। डॉ. वैदिक आज शरीर को त्याग कर अक्षर देह के रूप में हमारे बीच विद्यमान रहेंगे।

वर्तमान दौर में भारत की पत्रकारिता संक्रमण काल से गुज़र रही है, ऐसे दौर में डॉ. वेदप्रताप वैदिक जी का चले जाना एक ऐसे शून्य का निर्माण कर गया, जो इस अमृतकाल में तो भरना असम्भव है, सदियों तक यह निर्वात बना रहेगा।

 *डॉ. अर्पण जैन ‘अविचल’*

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