मानवता के विकास की आधारशिला है नारी सशक्तिकरण

राष्ट्र का  अभिमान है “नारी”। राष्ट्र की शान है नारी । भारतीय परिवेश व परिधान की शोभा है नारी । नर से नारायण की कहावत को चरितार्थ करती है नारी | मानवता की मिशाल है नारी ।

महिला सशक्तिकरण से तात्पर्य है समाज में महिलाओं के वास्तविक अधिकार को प्राप्त करने के लिए उन्हें सक्षम बनाना अर्थात महिलाओं का शक्तिशाली होना । महिलाएं शक्तिशाली होंगी तो वह अपने जीवन से जुड़े प्रत्येक  फैसले स्वयं ले सकती है। ऐसी महिलाएं परिवार और समाज को विकास की राह  पर ले जाती हैं । महिलाओं को दिए गए अधिकार महिला सशक्तिकरण का आधार है । महिला एवं बाल विकास मंत्रालय, भारत सरकार महिलाओं के विकास में निरंतर अग्रसर है ।

महिलाओं को दिए गए अधिकार जो प्रत्येक महिला को शक्तिशाली बनाते हैं , वे इस प्रकार हैं –

समान वेतन का अधिकार – समान पारिश्रमिक अधिनियम के अनुसार अगर बात वेतन या मजदूरी की हो तो लिंग के आधार पर किसी के साथ भी भेदभाव नहीं किया जा सकता ।

कार्य-स्थल में उत्पीड़न के खिलाफ कानून – यौन उत्पीड़न अधिनियम के तहत, महिलाओं को  वर्किंग प्लेस पर हुए यौन उत्पीड़न के खिलाफ शिकायत दर्ज कराने का पूरा हक है। केंद्र सरकार ने भी महिला कर्मचारियों के लिए नए नियम लागू किए हैं, जिसके तहत वर्किंग प्लेस पर यौन शोषण के शिकायत दर्ज होने पर महिलाओं को जांच लंबित रहने तक 90 दिन का पेड लीव दी जाएगी।

कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अधिकार – भारत के हर नागरिक का यह कर्तव्य है कि वह एक महिला को उसके मूल अधिकार ‘जीने के अधिकार’ का अनुभव करने दें। गर्भाधान और प्रसव पूर्व निदान तकनीक (पी सी पी एन डी टी) अधिनियम, 1994 भारत में कन्या भ्रूण हत्या और गिरते लिंगानुपात को रोकने के लिए भारत की संसद द्वारा पारित एक संघीय कानून है।इस अधिनियम से प्रसव पूर्व लिंग निर्धारण पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्निक ‘पीएनडीटी’ एक्ट 1996, के तहत जन्म से पूर्व शिशु के लिंग की जांच पर पाबंदी है।ऐसे में अल्ट्रासाउंड या अल्ट्रासोनोग्राफी कराने वाले जोड़े या करने वाले डाक्टर, लैब कर्मी को तीन से पांच साल सजा और 10 से 50 हजार जुर्माने की सजा का प्रावधान है।

संपत्ति पर अधिकार – हिंदू उत्तराधिकारी अधिनियम के तहत नए नियमों के आधार पर पुश्तैनी संपत्ति पर महिला और पुरुष दोनों का बराबर हक है।

गरिमा और शालीनता के लिए अधिकार – किसी मामले में अगर आरोपी एक महिला है तो उस पर की जाने वाली कोई भी चिकित्सा जांच प्रक्रिया किसी महिला द्वारा या किसी दूसरी महिला की उपस्थिति में ही की जानी चाहिए।

अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस ,महिला सशक्तिकरण के लिए उत्प्रेरक का कार्य करता है । अंतर्राष्ट्रीय  महिला दिवस को, महिलाओं के आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक उपलब्धियों के उपलक्ष्य में उत्सव के तौर पर मनाया जाता है। इस दिन विश्व के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के प्रति सम्मान, प्रशंसा और प्यार प्रकट किया जाता है ।अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस , महिलाओं के अधिकारों के लिए आवाज उठाने के मकसद से भी मनाया जाता है।  दुनियाभर के हर कोने में इस दिन उन महिलाओं को और उनके योगदान को याद किया जाता है जिन्होंने अपने क्षेत्र में सफलता हासिल की हो। अमेरिका में सोशलिस्ट पार्टी के आह्वान पर, यह दिवस सबसे पहले 28 फरवरी 1909 को मनाया गया था। इसके बाद यह फरवरी महीने के आखिरी रविवार के दिन मनाया जाने लगा। 1910 में सोशलिस्ट इंटरनेशनल के कोपेनहेगन सम्मेलन में इसे अंतर्राष्ट्रीय दर्जा दिया गया। उस समय इसका प्रमुख उद्देश्य महिलाओं को वोट देने का अधिकार दिलवाना था क्योंकि उस समय अधिकतर देशों में महिलाएं वोट नहीं दे सकती थीं। 1917 में रूस की महिलाओं ने, महिला दिवस पर रोटी और कपड़े के लिए हड़ताल पर जाने का फैसला किया था। यह हड़ताल भी बिल्कुल ऐतिहासिक थी। जार ने सत्ता छोड़ी, अंतरिम सरकार ने महिलाओं को वोट देने के अधिकार दिया। उस समय रूस में जुलियन कैलेंडर चलता था और बाकी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलेंडर। इन दोनों की तारीखों में थोड़ा अंतर था। जुलियन कैलेंडर के मुताबिक 1917 की फरवरी का आखिरी रविवार 23 फरवरी को था जबकि ग्रेगेरियन कैलैंडर के अनुसार उस दिन 8 मार्च तारीख थी। इस समय पूरी दुनिया में ग्रेगेरियन कैलैंडर चलता है। यही कारण है कि 8 मार्च को ही अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस का आयोजन किया जाता है |

प्रत्येक वर्ष अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस एक खास थीम पर आयोजित किया जाता है। वर्ष  1996 से लगातार अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस किसी निश्चित थीम के साथ ही मनाया जाता है। सबसे पहले वर्ष 1996 में इसकी थीम “अतीत का जश्न और भविष्य के लिए योजना” रखी गई थी।  अंतर्राष्ट्रीय महिला दिवस – २०२० की थीम  है – मैं जनरेशन इक्वेलिटी: महिलाओं के अधिकारों को महसूस कर रही हूं। (आई  एम  जनरेशन  इक्वलिटी : रीयलाइज़िंग  वूमेन्स राइट्स ) है।

संस्कृत में एक श्लोक है- ‘यस्य पूज्यंते नार्यस्तु तत्र रमन्ते देवता:। अर्थात्, जहां नारी की पूजा होती है, वहां देवता निवास करते हैं। भारतीय संस्कृति में नारी के सम्मान को बहुत महत्व दिया गया है। अधिकतर धर्मों में नारी सशक्तिकरण का उदाहरण देखने को मिलता है जैसे हिन्दू धर्म में वेद  नारी को अत्यंत महत्वपूर्ण, गरिमामय, उच्च स्थान प्रदान करते हैं। वेदों में स्त्रियों की शिक्षा- दीक्षा, शील, गुण, कर्तव्य, अधिकार और सामाजिक भूमिका का  सुन्दर वर्णन पाया जाता है । वेद उन्हें घर की सम्राज्ञी कहते हैं और देश की शासक, पृथ्वी की सम्राज्ञी तक बनने का अधिकार देते हैं।वेदों में स्त्री यज्ञीय है अर्थात् यज्ञ समान पूजनीय। वेदों में नारी को ज्ञान देने वाली, सुख – समृद्धि लाने वाली, विशेष तेज वाली, देवी, विदुषी, सरस्वती, इन्द्राणी, उषा- जो सबको जगाती है इत्यादि अनेक आदर सूचक नाम दिए गए हैं।वेदों में स्त्रियों पर किसी प्रकार का प्रतिबन्ध नहीं है – उसे सदा विजयिनी कहा गया है और उन के हर काम में सहयोग और प्रोत्साहन की बात कही गई है। वैदिक काल में नारी अध्यन- अध्यापन से लेकर रणक्षेत्र में भी जाती थी। जैसे कैकयी महाराज दशरथ के साथ युद्ध में गई थी। कन्या को अपना पति स्वयं चुनने का अधिकार देकर वेद पुरुष से एक कदम आगे ही रखते हैं।अनेक ऋषिकाएं वेद मंत्रों की द्रष्टा हैं – अपाला, घोषा, सरस्वती, सर्पराज्ञी, सूर्या, सावित्री, अदिति- दाक्षायनी, लोपामुद्रा, विश्ववारा, आत्रेयी आदि । वेदों में नारी के स्वरुप की झलक इन मंत्रों में देखें जा सकते हैं -यजुर्वेद २०:९ (स्त्री और पुरुष दोनों को शासक चुने जाने का समान अधिकार है) । यजुर्वेद १७:४५ (स्त्रियों की भी सेना हो । स्त्रियों को युद्ध में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित करें) । यजुर्वेद १०:२६(शासकों की स्त्रियां अन्यों को राजनीति की शिक्षा दें । जैसे राजा, लोगों का न्याय करते हैं वैसे ही रानी भी न्याय करने वाली हों) ।अथर्ववेद ११:५:१८ (ब्रह्मचर्य सूक्त के इस मंत्र में कन्याओं के लिए भी ब्रह्मचर्य और विद्या ग्रहण करने के बाद ही विवाह करने के लिए कहा गया है । यह सूक्त लड़कों के समान ही कन्याओं की शिक्षा को भी विशेष महत्त्व देता है) कन्याएं ब्रह्मचर्य के सेवन से पूर्ण विदुषी और युवती होकर ही विवाह करें ।अथर्ववेद १४:१:६(माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धीमत्ता और विद्याबल का उपहार दें । वे उसे ज्ञान का दहेज़ दें) । जब कन्याएं बाहरी उपकरणों को छोड़ कर, भीतरी विद्या बल से चैतन्य स्वभाव और पदार्थों को दिव्य दृष्टि से देखने वाली और आकाश और भूमि से सुवर्ण आदि प्राप्त करने – कराने वाली हो तब सुयोग्य पति से विवाह करे । ऋग्वेद १०.८५.७ (माता- पिता अपनी कन्या को पति के घर जाते समय बुद्धिमत्ता और विद्याबल उपहार में दें | माता- पिता को चाहिए कि वे अपनी कन्या को दहेज़ भी दें तो वह ज्ञान का दहेज़ हो) | ऋग्वेद ३.३१.१ (पुत्रों की ही भांति पुत्री भी अपने पिता की संपत्ति में समान रूप से उत्तराधिकारी है) |

बाइबिल में भी महिलाओं के सम्मान का विवरण मिलता है –

(कुलुस्सियों 1:15) यीशु जब इस धरती पर थे तब वह स्त्रियों के साथ जिस तरह पेश आए, उससे पता चलता है कि यहोवा और यीशु दोनों, स्त्रियों की बहुत इज़्ज़त करते हैं। साथ ही, उन्हें यह कतई पसंद नहीं कि स्त्रियों पर ज़ुल्म ढाए जाएँ, जैसे कि आज बहुत-से देशों में किया जाता है।

बाइबिल में एक और वर्णन मिलता है जो स्त्रियों के सम्मान को दर्शाता है -एक ऐसी स्त्री यीशु के पास आयी, जिसे 12 साल से लहू बहने की बीमारी थी। इस बीमारी की वजह से वह न सिर्फ धीरे-धीरे कमज़ोर होती जा रही थी, बल्कि उसे काफी शर्मिंदगी से भी गुज़रना पड़ रहा था। जब उस स्त्री ने यीशु को छुआ, तब वह फौरन ठीक हो गयी। “यीशु ने फिरकर उसे देखा, और कहा; पुत्री ढाढ़स बान्ध; तेरे विश्‍वास ने तुझे चंगा किया है।” (मत्ती 9:22) दरअसल मूसा की कानून-व्यवस्था के मुताबिक, इस हालत में एक स्त्री का दूसरों को छूना तो दूर, उसे उस भीड़ में होना भी नहीं चाहिए था। फिर भी, यीशु उस पर झल्लाए नहीं बल्कि उसे करुणा दिखायी, उसे दिलासा दिया और प्यार से उसे “पुत्री” कहा। यह शब्द सुनकर उस स्त्री को कितनी राहत मिली होगी! यही नहीं, उसे चंगा करने में यीशु को भी कितनी खुशी हुई होगी!

जब यीशु को मरे हुओं में से जिलाया गया, तो वह सबसे पहले मरियम मगदलीनी और उस स्त्री के सामने प्रकट हुआ, जिसे बाइबल “दूसरी मरियम” कहती है। यीशु अगर चाहता तो पहले पतरस, यूहन्‍ना या किसी और पुरुष-चेले के सामने प्रकट हो सकते थे । मगर नहीं, उन्होंने ऐसा नहीं किया। इसके बजाय, उन्होंने अपने जिलाए जाने का पहला चश्‍मदीद गवाह होने का सम्मान स्त्रियों को दिया। एक स्वर्गदूत ने उन स्त्रियों को हिदायत दी कि वे यीशु के पुरुष-चेलों के पास जाकर उन्हें इस हैरतअँगेज़ घटना के बारे में बताएँ। यीशु ने भी उन स्त्रियों से कहा: “जाओ, मेरे भाइयों को खबर दो।” (किताब-ए-मुकद्दस) (मत्ती 28:1,5-10) इससे साफ ज़ाहिर होता है कि यीशु अपने ज़माने के यहूदियों की तरह, स्त्रियों के साथ भेदभाव नहीं करते थे । और ना ही वह उनकी तरह सोचते थे कि स्त्रियाँ, कानूनी गवाह नहीं बन सकतीं।

देवी अहिल्याबाई होलकर, मदर टेरेसा, इला भट्ट, महादेवी वर्मा, राजकुमारी अमृत कौर, अरुणा आसफ अली, सुचेता कृपलानी और कस्तूरबा गांधी आदि जैसी कुछ प्रसिद्ध महिलाओं ने अपने मन-वचन व कर्म से सारे जग-संसार में अपना नाम रोशन किया था । कस्तूरबा गांधी ने महात्मा गांधी का बायां हाथ बनकर उनके कंधे से कंधा मिलाकर देश को आजाद करवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी । इंदिरा गांधी ने अपने दृढ़-संकल्प के बल पर भारत व विश्व राजनीति को प्रभावित किया था । उन्हें लौह-महिला यूं ही नहीं कहा जाता है। इंदिरा गांधी ने पिता, पति व एक पुत्र के निधन के बावजूद हौसला नहीं खोया। दृढ़ चट्टान की तरह वे अपने कर्मक्षेत्र में कार्यरत रहीं। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन तो उन्हें ‘चतुर महिला’ तक कहते थे, क्योंकि इंदिराजी राजनीति के साथ वाक्-चातुर्य में भी माहिर थीं।

किसी ने क्या खूब कहा है – हर सफल इंसान के पीछे एक महिला का हाथ होता है, इसी प्रकार राष्ट्र निर्माण में  एक नहीं बल्कि सैकड़ों महिला वैज्ञानिकों का सहयोग होता है । महिलाएं सशक्त होंगी तभी देश बनेगा महाशक्ति ।

सरल और सकारात्मक बुद्धिगमान महिलाएं, जो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान के कई महत्वपूर्ण मिशनों का हिस्सा रहीं। इन महिलाओं के लिए सफलता की सीमा आकाश तक सीमित नहीं, बल्कि उससे आगे का जहां इनका है। ये जोश से भरी हुईं सशक्त और आत्मनिर्भर महिलाएं हमारे आसपास दिखाई देने वालीं सामान्य महिलाओं की तरह ही हैं, लेकिन वैज्ञानिक प्रभाव इन्हें कुछ खास बनाता है।

ऋतु करिढाल भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के साथ काम करने वाली एक भारतीय वैज्ञानिक हैं। वह भारत के मंगल कक्षीय मिशन, मंगलयान के उप-संचालन निदेशक थीं। उन्हें भारत की “रॉकेट वुमन” के रूप में जाना जाता है। वह लखनऊ में पैदा हुई थी और एक एयरोस्पेस इंजीनियर थी। उसने पहले भी कई अन्य इसरो प्रोजेक्ट्स के लिए काम किया है और इनमें से कुछ के लिए ऑपरेशन डायरेक्टर के रूप में काम किया है।

मौमिता दत्ता विभिन्न प्रकार के कुलीन परियोजनाएं जैसे कि- चंद्रयान-1, ओशियनसेट, रिसोर्ससैट और हाएसेट का हिस्सा रह चुकी हैं। उन्हें मंगल परियोजनाओं में मीथेन सेंसर के लिए परियोजना के आयोजक के तौर पर चुना गया था। वह ऑप्टिकल प्रणाली के विकास और सूचक के लक्षण वर्णन और अंशांकन के लिए जिम्मेदार थीं। इसरो की विभिन्न परियोजनाओं के लिए विभिन्न बहु-वर्णक्रमीय पेलोड और स्पेक्ट्रोमीटर के विकास में वे शामिल हैं।

नंदिनी हरिनाथ अपनी पहली नौकरी के तौर पर इसरो में शामिल हुई थीं और आज 20 साल हो गए, वे निरंतर प्रगति पथ पर अग्रसर हैं। कई दशकों पहले टीवी की दुनिया के प्रसिद्ध अमेरिकी विज्ञान कथा मनोरंजन कार्यक्रम, “स्टार ट्रेक”  सीरिज को देखने के बाद विज्ञान विषय पढ़ने के लिए प्रेरित हुईं। शिक्षकों एवं इंजीनियरों के परिवार से होने के कारण विज्ञान और तकनीक के प्रति उनका स्वभाविक झुकाव था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने 14 परियोजनाओं पर काम किया। इसरो के मंगलयान परियोजनाओं में इन्होंने मार्स ऑर्बिटर मिशन पर मिशन डिज़ाइन की परियोजना प्रबंधक और उप-ऑपेरशन संचालक के रूप में काम किया। भारत के सफल मंगल अभियान से पहले मंगल ग्रह के लिए किये जाने वाले मिशन में सफलता की दर केवल 40% ही थी और भारत इसे पहली बार में और वह भी बहुत कम लागत और बहुत कम समय में पूरा करने वाला पहला देश है।

अनुराधा टी के भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र (इसरो) में पहली औरत हैं  जिन्हें 2011 में अभियान (जीसैट 12) का निर्देशक बनाया गया। उम्र लगभग 9 साल रही होगी, जब उन्होंने यह जाना कि चंद्रमा पर पहुंचने वाले पहले अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग थे। बस यही था एक अंतरिक्ष यात्री बनने का उनका पहला पाठ, जिससे वे सम्मोहित हुईं। एक वरिष्ठ अधिकारी होने के नाते वे इसरो की हर महिला वैज्ञानिक के लिए एक प्रेरणास्त्रोत हैं। विद्यार्थी जीवन में उन्हें तार्किक विषयों को पढ़ने में अधिक रूचि थी, बजाए रटने या याद करने वाले विषयों के। आज वे इसरो के बेहद महत्वपूर्ण विभाग की प्रमुख होते हुए भी अपना वही तार्किक दिमाग लगाती हैं। उनका कहना है कि यहां समानता के व्यवहार के चलते कई बार उन्हें याद नहीं होता कि वे एक महिला हैं या अलग हैं।

एन वलारमथी – भारत के पहले देशज राडार इमेजिन उपग्रह, रिसेट वन की लांचिंग का एन वलारमथी ने प्रतिनिधित्व किया है। टी के अनुराधा के बाद वे इसरो के उपग्रह मिशन की प्रमुख के तौर पर वे दूसरी महिला अधिकारी हैं। एन वलारमथी ऐसी पहली महिला हैं जो रिमोट सेंसिंग सेटेलाइट में प्रयुक्त मिशन की प्रमुख रहीं ।

मीनल संपथ – मीनल संपथ को मिनल रोहित के नाम से भी जाना जाता है। यह स्पेस एप्लीकेशन सेंटर अहमदाबाद में एक वैज्ञानिक/ इन्जीनियर के तौर पर काम करती हैं। एक विधार्थी के तौर पर पीएसएलवी रॉकेट की निर्दोष उड़ान के सीधे प्रसारण से प्रभावित हो कर उन्होंने 1999 में बेंगलोर में स्थित भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान  केंद्र  में कार्यभार संभाला। दिलचस्पी की बात तो यह है कि वह डाक्टर बनना चाहतीं थीं, पर दन्त विज्ञान में एक नंबर कम होने के कारण उन्हें दाखिला नहीं मिला और उन्होंने इंजिनियरिंग में दाखिला ले लिया। उन्हें भारतीय अंतरिक्ष अनुसन्धान  केंद्र  के अध्यक्ष ई. एस किरण कुमार के साथ काम करने का अवसर मिला, जो कि सैक, अहमदाबाद में उनके समूह के निर्देशक थे। देश के सबसे महत्वाकांक्षी अंतरिक्ष परियोजना के सफलतापूर्वक पूरा करने की खातिर, दो साल तक मीनल संपथ ने भारत के मंगल मिशन में एक प्रणाली इंजीनियर के रूप में काम किया, जिसके दौरान वे अक्सर एक दिन में 18 घंटे काम करती थीं।

कीर्ति फौजदार –  कीर्ति फौजदार इसरो की कम्प्यूटर वैज्ञानिक हैं जो उपग्रह को उनकी सही कक्षा में स्थापित करने के लिए मास्टर कंट्रोल फेसिलिटी पर काम करती हैं। वे उस टीम का हिस्सा हैं, जो उपग्रहों एवं अन्य मिशन पर लगातार अपनी नजर बनाए रखती है। कुछ भी गलत होने पर सुधार का काम वही करती हैं।उनके काम का समय कुछ अनियमित सा है, कभी दिन में तो कभी रात भर। वे बिना डरे शांति से काम करती हैं क्योंकि उन्हें बस अपने काम से प्यार है।

टेसी थॉमस – टेसी थॉमस (जन्म १९६३) भारत की एक प्रक्षेपास्त्र वैज्ञानिक हैं। वे रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन में अग्नि चतुर्थ की परियोजना निदेशक एवं एरोनाटिकल सिस्टम्स की महानिदेशक थीं। भारत में प्रक्षेपास्त्र परियोजना का प्रबन्धन करने वाली वे पहली महिला हैं। उन्हें ‘भारत की प्रक्षेपास्त्रांगना’ कहा जाता है। ४८ वर्षीय भारतीय महिला वैज्ञानिक टेसी थॉमस को 1988 से अग्नि प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम से जुड़ने के बाद से ही अग्निपुत्री टेसी थॉमस के नाम से भी जाना जाता है। उनकी अनेक उपलब्धियों में अग्नि-2, अग्नि-3 और अग्नि-4 प्रक्षेपास्त्र की मुख्य टीम का हिस्सा बनना और सफल प्रशीक्षण है। उन्होंने पूर्व राष्ट्रपति अब्दुल कलाम को अपना प्रेरणा स्रोत माना है।

प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में  केंद्र सरकार ने महिला विकास पर विशेष ध्यान  केंद्रित किया  है। भारत की महिलाएं राष्ट्र की प्रगति में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं और सरकार उनके योगदान और क्षमता को पहचानती है। सरकार ने महिला सशक्तिकरण को लेकर कई मजबूत कदम उठाए हैं। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ से लेकर बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा सुविधाओं और उनके दैनिक जीवन और उनकी दीर्घकालिक संभावनाओं को सुधारने के लिए कई पहल की है। केंद्र  सरकार ने अपने कामकाज  की बदौलत  एक तरह से महिलाओं को एक साथ जोड़ दिया है। विज्ञान मिशन के लिए सबसे बड़ा बजट वर्ष २०२० में पेश किया गया। विज्ञान मिशन के लिए सबसे बड़ा बजट पेश करने वाली वित्त मंत्री भी एक महिला हैं जिनका नाम है निर्मला सीतारमण । अतएव हम कह सकते है की  महिलाओं ने अपने अविष्कार और कार्यों  के द्वारा, राष्ट्र को विश्व पटल पर चरितार्थ  किया ।

अंत में हमे यही कहना ठीक रहेगा कि हम हर महिला का सम्मान करें। अवहेलना, भ्रूण हत्या और नारी की अहमियत न समझने के परिणाम स्वरूप महिलाओं की संख्या, पुरुषों के मुकाबले काम  बची है। इंसान को यह नहीं भूलना चाहिए, कि नारी द्वारा जन्म दिए जाने पर ही वह दुनिया में अस्तित्व बना पाया है और यहां तक पहुंचा है। उसे ठुकराना या अपमान करना सही नहीं है। भारतीय संस्कृति में महिलाओं को देवी, दुर्गा व लक्ष्मी आदि का यथोचित सम्मान दिया गया है अत: उसे उचित सम्मान दिया ही जाना चाहिए।

अतएव हम कह सकते हैं की मानवता के विकास की आधारशिला है नारी सशक्तिकरण | राष्ट्र का गौरव है नारी सशक्तिकरण |

                             लेखिका

                           अमिता सिंह

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