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-कल्पना पालखीवाल

राष्ट्रीय पर्यावरण नीति, 2006 पर्यावरण सुरक्षा को विकास प्रक्रिया के अभिन्न अंग और सभी विकास गतिविधियों में पर्यावरणीय प्राथमिकता के रूप में पहचान प्रदान करती है। इस नीति का मुख्य ध्येयवाक्य है कि पर्यावारणीय संसाधनों का संरक्षण जीविका, सुरक्षा और सभी के कल्याण के लिए जरूरी है। इसके साथ ही संरक्षण के लिए मुख्य आधार यह होना चाहिए कि किन्हीं खास संसाधनों पर आश्रित लोग संसाधनों के क्षरण से नहीं बल्कि उसके संरक्षण से अपनी जीविका चलाएं। यह नीति विभिन्न हितधारकों को अपने संबंधित संसाधन का दोहन करने और पर्यावरण प्रबंधन का जरूरी कौशल हासिल करने के लिए उनके बीच साझेदारी को बढावा देती है।

पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन अधिसूचना, 2006 के तहत विकास परियोजनाओं, गतिविधियों, प्रक्रियाओं आदि के लिए पूर्व पर्यावरणीय अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करना आवश्यक है।

विधायी ढांचा

पर्यावरण संरक्षण के लिए मौजूदा विधायी ढांचा मुख्य रूप से पर्यावरण संरक्षण अधिनियम,1986 , जल (प्रदूषण की रोकथाम एवं नियंत्रण) अधिनियम,1974 , जल प्रभार अधिनियम, 1977 और वायु (प्रदूषण की रोकथाम और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 में सन्निहित है। वन और जैव विविधता के प्रबंधन से संबंधित विनियम भारतीय वन अधिनियम, 1927, वन संरक्षण अधिनियम, 1980 ,वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम,1972, और जैवविविधता अधिनियम, 2002 में निहित हैं। इसके अलावा भी कई और नियम हैं जो इन मूल अधिनियमों के पूरक हैं।

तकनीकी कौशल एवं निगरानी अवसंरचना के अभाव और पर्यावरणीय नियमों को लागू करने वाले संस्थानों में प्रशिक्षित कर्मचारियों की कमी के कारण ये नियम पूरी तरह लागू नहीं हो पा रहे हैं। इसके अलावा सबसे ज्यादा प्रभावित होने वाले स्थानीय समुदाय की भी नियमों के अनुपालन की निगरानी में पर्याप्त भागीदारी नहीं होती है। निगरानी अवसंरचना में संस्थागत सार्वजनिक निजी साझेदारी का भी अभाव है।

पंचायती राज संस्थानों और शहरी निकायों को पर्यावरण प्रबंधन योजनाओं की निगरानी के योग्य बनाने के लिए कौशल विकास कार्यक्रम चलाए गए तथा कई और कदम भी उठाए गए। इसके साथ ही नगरपालिकाओं को पर्यावरण के मोर्चे पर अपने कार्य की रिपोर्ट पेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। मजबूत निगरानी अवसंरचना खड़ी करने के लिए व्यवहारिक सार्वजनिक निजी साझेदारी पर पर्याप्त बल दिया जाएगा।

अधिसूचना, 2006

पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन (ईआईए) अधिसूचना, 2006 देश के विभिन्न हिस्सों में विकास परियोजनाओं और उनकी विस्तारआधुनिकीरण गतिविधियों को विनियमित करती है। इसके तहत अधिसूचना की अनुसूची में दर्ज परियोजनाओं के लिए पूर्व अनापत्ति ग्रहण करना अनिवार्य है। पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ने पर्यावरण (सुरक्षा) अधिनियम, 1986 के उप अनुच्छेद (1) तथा अनुच्छेद 3 के उप अनुच्छेद(2) के तहत प्राप्त अधिकारों के अंतर्गत ईआईए अधिसचूना जारी की है। ईआईए अधिसूचना, 2006 के प्रावधानों के तहत परियोजना के लिए निर्माण कार्य शुरू या जमीन को तैयार करने से पहले अनापत्ति प्रमाण पत्र हासिल करना जरूरी है। केवल भूमि अधिग्रहण इसका अपवाद है।

चरण

ईआईए अधिसूचना, 2006 के तहत पर्यावरणीय अनापत्ति के चार चरण हैं-जांच, कार्यक्षेत्र, जन परामर्श और मूल्यांकन।

परियोजनाएं

जिन परियोजनाओं के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र आवश्यक हैं उनमें पनबिजली परियोजनाएं, तापविद्युत परियोजनाएं, परमाणु बिजली परियोजनाएं, कोयला और गैर कोयला उत्पादों से संबंधित खनन परियोजनाएं, हवाई अडडे, राजमार्ग, बंदरगाह, सीमेंट, पल्प एंड पेपर, धातुकर्म आदि जैसी औद्योगिक परियोजनाएं शामिल हैं। केंद्रीय पर्यावरण एवं वन मंत्रालय ए श्रेणी की परियोजनाओं के लिए विनियामक प्राधिकरण है जबकि राज्य एवं संघशासित स्तरीय पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण अपने अपने राज्यों और संघशासित क्षेत्रों की बी श्रेणी की परियोजनाओं के लिए विनियामक प्राधिकरण हैं। अबतक 23 राज्यों के लिए 22 राज्यसंघशासित पर्यावरणीय प्रभाव मूल्यांकन प्राधिकरण अधिसूचित किए गए हैं। उनमें पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, मेघालय, कर्नाटक, पंजाब, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, जम्मू कश्मीर, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ, उड़ीसा, राजस्थान और दमन एवं दीव शामिल हैं।

विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति (ईएसी)

ईएसी बहुविषयक क्षेत्रीय समितियां होती हैं जिसमें विभिन्न विषयों के विशेषज्ञ होते हैं। इनका गठन क्षेत्र विशेष की परियोजनाओं के मूल्यांकन के लिए ईआईए अधिसूचना, 2006 के तहत किया जाता है। ये अपनी सिफारिशें देती हैं।

शीघ्र फैसले के लिए कदम

ईआईए अधिसूचना, 2006 जारी होने के बाद पर्यावरणीय मूल्यांकन के लिए परियोजनाओं की बाढ आ गयी। शीघ्र निर्णय के लिए कई कदम उठाए गए जिनमें लंबित परियोजनाओं की स्थिति की सतत निगरानी, अधिकाधिक परियोजनाओं पर विचार के लिए विशेषज्ञ मूल्यांकन समिति की लंबी बैठकें, प्रक्रिया को सुसंगत बनाना तथा परियोजना स्थिति को आम लोगों के लिए उसे वेबसाइट पर डालना आदि शामिल हैं।

ईसी के लिए समय सीमा

ईआईए अधिसूचना, 2009 पर्यावरणीय अनापत्ति प्रमाण पत्र जारी करने के लिए 105 दिनों की समय सीमा तय करती है जिनमें से 65 दिन ईएसी द्वारा मूल्यांकन के लिए तथा 45 दिन जरूरी प्रक्रिया एवं फैसले से अवगत कराने के लिए होते हैं।

2006 की ईआईए अधिसूचना में दिसंबर, 2009 में संशोधन किया गया था ताकि प्रक्रिया को और आसान एवं सुसंगत बनाया जा सके। (स्टार न्यूज़ एजेंसी)

3 Responses to “पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन”

  1. sunil patel

    सुश्री कल्पना जी ने पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन पर बहुत अछि जानकारी दी है. धन्यवाद. श्री सिंह जी की चिंता बिलकुल जायज है. अभी तक केवेल ४७ दृश्य ही हुए है.

    वाकई सरकार ने बहुत अछे कदम उठाये है. बहुत से योजनयें बनाई है, किन्तु क्या नहीं लगता की ये योजनयें बहुत ज्यादा उच्च स्तरों पर बनी है, बेहद पेचीदा है, आम व्यक्ति को इनकी कोई जानकारी ही नहीं होती है. एक सामान्य पोस्ट ग्रेजूएट विद्यार्थी भी इन्हें अछे से समझ नहीं सकता है.
    जितनी बड़ी परियोजनाओं उतना बड़ा भ्रष्टाचार.

    पर्यावरण को बचाना है तो आम व्यक्ति को पर्यावरण से जोड़ना होगा. जंगल बचाना है तो आम व्यक्ति को जंगल में जाने की आजादी तो दो, जंगल से प्रेम तो करने दो, आज के नियम तो एक सामान्य व्यक्ति को जंगल में प्रवेश तक नहीं करने देते है क्योंकि जंगल में जाना बहुत महंगा है.

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  2. आर. सिंह

    R.Singh

    दो दिनों से ज्यादा हो गए जब मैंने अपनी पहली प्रतिक्रिया इस लेख पर व्यक्त
    की थी उसके बाद अभी तक किसी अन्य की टिपण्णी इस पर नहीं आयी.इसे मैं प्रयावरण के प्रति हमारी उदासीनता के सिवा और क्या समझू?कल्पना जी को भी लग रहा होगा की शायद किसी ने उनका लेख पढ़ा ही नहीं .मुझे भी ऐसा ही लग रहा है.

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  3. आर. सिंह

    R.Singh

    पर्यावरण संबधी विविध कानूनों की विस्तृत जानकारी देने के लिए कल्पना जी को धन्यवाद.आपने कभी ध्यान दिया है की प्रयावरण सम्बन्धी विभिन्न कानूनों और सरकार द्वारा इसके प्रति जागरूकता के अनेक उपायों के बावजूद पर्यावरण के प्रति हमलोगों में अभी भी अज्ञानता ही ज्यादा है और उससे भी बढ़ कर है हमारी उदासीनता.हमारा व्यक्तिगत स्वार्थ भी हमें पर्यावरण संरक्षण से बहुत बार विमुख करता है.पेड़ों को बेतहासा काटना और नदियों को दूषित करना इसी में आता है.दिल्ली में हमने नदी और नालों के पूलों पर लोहे का जाल लगाया हुआ है जिससे लोग इनमे कूड़ा न फेंक सके,पर हम कारों और ट्रकों के छतों पर चढ़ कर कूड़ा फेंकते है.इसका कारन हमारी दूषित मनोवृति और पर्यावरण के प्रति उदासीनता के सिवा और क्या हो सकता है?
    ऐसे पर्यावरण को बर्बाद करने का यह एक छोटा सा उदाहरण है.हमारी यही दूषित मनोवृति उस समय और भयावह हो जाती है जब विभिन उद्योग लगाते है.गंगा और यमुना न एक दिन में गन्दी हुई है और न उन्हें किसी एक आदमी ने गंदा किया है.यह गन्दगी हमारी सामाजिक और राष्ट्रीय दिवालियापन का द्योतक है. यह हमारे सामूहिक विचारहीनता की कहानी है.सरकार क़ानून बना रही है .जागरूकता अभियान भी चला रही है,पर हमारी मनोवृति है की बदलने का नाम नहीं लेती.हम असल में कालिदास के ज्ञान प्राप्ति के पहले वाली अवस्था में हैं,यानी पेड़ की उसी डाली को काट रहे हैं जिसपर हम बैठे हैं.और हमें परिणाम का भी ज्ञान नहीं है.

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