लेखक परिचय

रवि श्रीवास्तव

रवि श्रीवास्तव

स्वतंत्र वेब लेखक व ब्लॉगर

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-रवि श्रीवास्तव-
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किन्नर आए हैं, ये सुनकर लोगों की दिल की धड़कन तेज हो जाती हैं। जब उनकी ताली की गूंज कानों तक पहुंचती है तो हर व्यक्ति यही अपने मन में सोचता है, हे ईश्वर मेरे पास ये न आएं इनसे हमें दूर रखो। इतना जबरदस्त ख़ौफ बन चुका है- इनका समाज के अंदर। हो भी क्यों न बस स्टेशनों, रेलवे स्टेशनों, के साथ-साथ विवाह आदि शुभ अवसर पर इनका तांडव साफ देखा जा सकता है। अवैध वसूली करना इनका धंधा बन गया। किसी की मेहनत की कमाई को अपने जिद और नंगेपन से छीनना इनका पेशा बनता जा रहा है। वैसे कहा जाता है कि इन किन्नरों को दुआएं और श्राप दोनों लगते है। पर ये दुआएं पैसे देने पर और श्राप न देने पर मिलते हैं। छोटा शहर हो या महानगर दोनों में अपना रूतबा इस कदर बना रखा है कि आप सोच भी नहीं सकते। कहने के लिए ये लोगों से मागते है। पर इनका रहन सहन रवैया हाथों मे सोने की अगूठियां, गले में सोने की चैन, और चार पहिया गाड़ी से जाकर वसूली करना होता है। इस उगाही के दौरान इनकी बात नही मानते तो भरे समाज आप की इज़्ज़त उतारते उन्हें जरा भी देरी नही लगती है। हर कोई सोचता है कि अपनी आबरू सरेआम नीलाम होने से बचाते हुए इन्हें रकम देकर विदा करो। वैसे एक बात कही गई है, दान अहम शक्ति, मतलब लोग अपना इच्छा और हैसियत के अनुसार दान कर सकते हैं। पर इनके लिए ये सब कोई मायने नहीं रखता है। शादी बगैरह जैसे शुभ अवसर पर इनकी पहली बोली इतनी महंगी होती है कि लोग उनकी गालियां सुन और विनती कर उस रकम को कम कराने में जुटे रहते हैं। बहुत नंगा नाच होने के बाद कही एक बीच का रास्ता निकलता है।

खैर ये तो हुई शादी समारोह आदि उत्सव की बात। अगर हम बात करें इनकी उगाही से बस स्टेशन और रेलवे स्टेशन भी अछूते नहीं हैं। इन जगहों पर भी इनका पूरा कब्जा है। हर लम्बी दूरी की ट्रेनों में चढ़कर यात्रियों को परेशान कर उगाही करना वो कुछ इस तरह से जैसे इनका कोई पुराना कर्ज ले रखें हो सफर करने वाले मुसाफ़िर। ऐसा ही कुछ बस स्टेशनों पर होता है। बात एक की हो तो भी ठीक है। एक आया उगाही किया थोड़ी देर बात बाद दूसरा आ जाता है जो यात्रा कर रहे लोगों के परेशानी का सबब बनता है। अब मुसाफिर करें भी तो क्या, न दे तो अपनी इज़्ज़त इन किन्नरों से धुलवा दे। सबसे बड़ी बात जिस ट्रेन में या बस में उगाही करने के लिए जाते है। उसमें सफर करने वालों में महिलाएं, बच्चे और बुजुर्ग भी होते हैं। मैं इस लेख में एक सफर का जिक्र कर रहा हूं। दिल्ली रेलवे स्टेशन से मैं अपने जन्मभूमि रायबरेली के लिए जा रहा था। आरक्षण न होने से मैं पद्मावत एक्सप्रेस के सामान्य डिब्बे में सफर कर रहा था। जब दिल्ली रेलवे स्टेशन पर ट्रेन खड़ी थी तभी 3-4 किन्नर उगाही करने के लिए ट्रेन पर चढ़े। और उगाही करना शुरू किया, फिर शुरू हुई लोगों के धैर्य की परीक्षा। जो मना करे वो गाली और अंगो की नुमाइश देखे। लोगों की यात्रा में खलन डाल रहे इन किन्नरों को सब यही सोच रहे थे कि पैसे देकर मुक्ति पाओ। महिलाएं, बच्चे, और बुजुर्ग लोगों के सामने कौन अपनी बेइज्जती करवाए। सार्वजनिक स्थानों पर अंगों की नुमाइश करना कहां तक उचित है। इनके पास शर्म हया नाम की चीज़ नही है पर दूसरों के पास तो है। ये बात जब गाड़ी स्टेशन पर थी तब की है ।जब गाड़ी मुरादाबाद पहुंची तो उनके एरिया के मुताबिक वहां से एक किन्नर चढ़ा और वसूली करने लगा। ऐसे ख़तरनाक तरीके से उगाही मैने पहली बार देखी थी। कुछ लोगों ने कहा अभी स्टेशन पर दिया था तो उसका कहना था कि हर काम एक ही बार करता है। गालियों की बौछार से लोगों के कान सुन्न पड़ने लगे थे। नजारा कुछ ऐसा था कि सबके सामने अपने कपड़ों को हटाकर लोगों को गालियां दे रहे थे। हद तो तब हो गई जब कुछ नौजवान ने विरोध किया तो उनके गुप्त अंगों से छेड़छाड़ शुरू कर दिए। साथ ही धमकी देने लगे की बरेली का स्टेशन आ रहा है, पैसे दे वरना चप्पल से मारूंगी और ट्रेन से नीचे फेक दूंगी। जब उनका आगमन मेरे सीट पर हुआ तो मैंने मना किया तो वही पुराना डायलाग पर प्रेस का कार्ड होने से मेरे पास बैठे कुछ लोग भी इस उगाही से बच गए पर गालियों से नही। मैने ये बात इसलिए जाहिर की कि रेलवे में सफर कर रहे यात्री कितने सुरक्षित हैं। ये किन्नर जबरजस्ती वसूली करते हैं, न दो तो बेइज्जत करते हैं। मतलब साफ कि ऐसा होता रहा तो मुसाफिर अपने साथ इन किन्नरों के खौफ से बचने के लिए दान दक्षिणा साथ लेकर चले। आखिर रेलवे सुरक्षा बल और रेल विभाग ऐसी बातों पर गौर क्यों नही करता है। अगर करता है तो रेलवे सुरक्षा बल को ऐ किन्नर कैसे चकमा दे देते हैं। एक बात मैं और कहना चाहूंगा कि इस देश के चौथे स्तंभ पर समाज के हित में कार्य की बात करने वाली ये मीडिया को समाज की ये बीमारी नहीं दिखती है। समाज से दूर बस चंद राजनीतिक दलों के नेताओं में उलझकर रह गई है। एक बार सफर कर रहे उन मुसाफिरों से पूछों की किस तरह से रास्ते भर इनका दंश झेलते हैं। ये तो लम्बी दूरी के टेन के सफर की बात हुई। बस स्टेशनों का भी यही हाल है, यहां पर भी इनका कहर भरप रहा है और पुलिस खड़ी तमाशा देखती है।

One Response to “किन्नरों का कहर”

  1. dr.ashokkumartiwari@gmail.com

    ये अभद्रता और बदमाशी पर उतर आते हैं इन पर विशेषकर ट्रेनों में रोक लगनी चाहिए ! किराया बढ़ता जा रहा है और परेशानियों का कोई निदान नहीं है !!

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