लेखक परिचय

गंगानन्द झा

गंगानन्द झा

डी.ए.वी स्नातकोत्तर महाविद्यालय में वनस्पति शास्त्र के प्राध्यापक के पद से सेवानिवृत होने के पश्चात् चण्डीगढ़ में गत पन्‍द्रह सालों से रह रहे गंगानंद जी को लिखने पढ़ने का शौक है।

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प्रदूषण कम करने में सबकी सहभागिता जरूरी

हाल ही में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों की लिस्ट जारी की है। जिसमें एक दो नहीं बल्कि 14 शहर भारत के हैं। प्रदूषित शहरों की इस लिस्ट में उत्तर प्रदेश का शहर कानपुर जहां पहले स्थान पर है, वहीं राजधानी दिल्ली के हालत भी कुछ ठीक नहीं है। इस लिस्ट में दिल्ली को छठवां स्थान मिला है।

एक तरफ जहां देश को साफ-सुथरा बनाने के लिए सरकार की तरफ से स्वच्छ भारत अभियान चलाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ स्थिति यह है कि भारतीय शहर साफ होने की जगह गंदे ही होते जा रहे हैं। सबसे खास बात यह है कि धार्मिक नगरी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का संसदीय क्षेत्र वाराणसी भी प्रदूषित शहरों की लिस्ट में तीसरे स्थान पर है। सच तो यह है कि विकास की दौड़ में हम एक ओर सवाल उठाते और दूसरी ओर उन सवालों की वजह भी बनते हैं। हम पेड़ लगा सकते हैं, लेकिन हम ऐसा कर नहीं पा रहे। पहाड़ तो हम उगा भी नहीं सकते, मगर उसे नष्ट करने में अंतिम दम तक लगे हुए हैं। ऐसे में पहाड़ों की घटती ऊंचाई को रोक पाना तो नामुमकिन है ही, पहाड़ों के वजूद को बचाना भी मुश्किल हो गया है। हालात यही रहे, तो हमारी आने वाली पीढ़ी कागज पर बने पहाड़ों में ही उनकी ऊंचाई तलाशती रह जाएगी। कचरे के पहाड़ में आग और विस्फोट से दर्दनाक हादसे हम देख चुके हैं, पीने के पानी की मारामारी किसी से छिपी नहीं है। वर्षा की कमी व अधिकता के साथ बाढ़ का आना अब सामान्य बात लगने लगी है। कचरे के बढ़ते ढेर कई मोर्चों पर समस्याओं में इजाफा कर रहे हैं। नदियों का प्रदूषण अरबों के खर्च के बाद भी बढ़ता ही जा रहा है। बड़ा सवाल यह है कि आखिरकर प्रदूषण से हमारा बचाव कैसे होगा। 

बढ़ता प्रदूषण व कचरे की समस्या निश्चित रूप से यह केंद्र व प्रदेश सरकारों के लिए परेशानी का सबब है और इससे निपटने के लिए अब सरकार को ठोस कदम उठाने ही होंगे। साथ ही उन कारणों की पड़ताल भी करनी होगी कि आखिर प्रदूषण से निपटने के लिए उठाए गए कदमों के अपेक्षित परिणाम क्यों नहीं मिले। इसके अतिरिक्त आम जनता को भी इसमें सक्रिय भागीदारी निभानी होगी और अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन करना होगा। अब तो यह और भी आवश्यक है कि शहरों को साफ-सुथरा, प्रदूषणमुक्त व हराभरा बनाया जाए क्योंकि बढ़ता प्रदूषण स्वास्थ्य, संस्कृति, राजनीति व अर्थव्यवस्था पर बुरा असर डाल रहा है। जिस तरह सिंगापुर, बीजिंग और नीदरलैंड ने इस विकराल होती समस्या से लड़ने के लिए योजना बनाई और लागू की है, उसी तरह की गंभीरता हमारे देश में सरकार और जनता के स्तर पर दिखनी चाहिए। आम जनमानस के भविष्य को मद्देनजर रखते हुए सही योजना के साथ सही कदम उठाए जाएं। देश का हर नागरिक भी इस कार्य में अपनी सहभागिता निभाए। तभी हम आने वाले समय में अपनी पीढ़ियों को हरे-भरे एवं स्वच्छ वातावरण का उपहार दे पाएंगे। हमें सर्वाजनिक परिवहन व्यवस्था को बेहतर बनाने, पैदल चलने, साइकिल चलाने की दिशा में निवेश की जरूरत है।

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