लेखक परिचय

व्योमेश चित्रवंश

व्योमेश चित्रवंश

अवढरदानी महादेव शंकर की राजधानी काशी मे पला बढ़ा और जीवन यापन कर रहा हूँ. कबीर का फक्कडपन और बनारस की मस्ती जीवन का हिस्सा है, पता नही उसके बिना मैं हूँ भी या नही. राजर्षि उदय प्रताप के बगीचे यू पी कालेज से निकल कर महामना के कर्मस्थली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मे खेलते कूदते कुछ डिग्रीयॉ पा गये, नौकरी के लिये रियाज किया पर कभी आरक्षण कभी रिश्ता, जाति,बिरादरी,क्षेत्र व भ्रष्टाचार ने टॉग खींच दिया, एक लाईन मे कहे तो अपनी किस्मत मे नौकरी नही मयस्सर थी. बनारस छोड़ नही सकते थे तो अपनी मर्जी के मालिक वकील बन बैठे. वकालत के बाद थोड़ा समय मिलता है तो अपने पढ़ने, घूमने, पर्यावरण के लिये कुछ कर लेता हूँ. भगवान की दया से अच्छी संगत मिली है इससे कुछ अच्छा भी करने की कोशिस करता हूँ, लिहाजा दो चार संगठनो से जुड़ा हूँ. हॉ मन मे कुछ मौज आने पर लिख लेता हूँ, राम जाने अच्छा या बुरा. वैसे आप भी बेहतर मूल्यॉकन कर सकते हैं क्योकि पढ़ते तो आप ही हैं....

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पारिवारिक बाल मजदूर, छुट्टियों मे परेशान घर के बच्चे : खाली बैठे रहने की निठल्ली सोच  
व्योमेश चित्रवंश
आजकल मेरे पुत्र कृस्ना जी गर्मियों की छुट्टियों मे शाम को संपूर्णानंद सिगरा स्टेडियम मे समर स्विमिंग कैम्प मे तैराकी सीख रहे है तो सुबह के समय एक्टिविटीज समर कैम्प मे एक्टिंग व गिटार बजाना,बाकी समय उछलकूद, धमाचौकड़ी व हंगामा के साथ अपनी दीदी से लड़ाई. ऐसे मे अकसर उनकी माँ कुछ घरेलू काम उन्हे दे देती है जिसमे वे व्यस्त रहें पर यह घरेलू व्यस्तता भी उन्हे कम ही बॉध पाती  है. यही हाल लगभग सभी घरों मे बच्चो का है, पर इनके बारे मे कोई नही सोचता.
कल स्टेडियम मे बैठा मै भी खलिहर दिमाग से निठल्लेपन के साथ यही सोच रहा था तो समस्या की विकरालता समझ मे आयी, सोचा आप से भी यह विचार साझा करूँ क्योंकि कहीं न कहीं आप भी इसमे शामिल है.
गर्मियों का समय आ गया है. ये वो समय है जब क्रैश कोर्स कराने वाले सेंटर, कोल्ड ड्रिंक की कैन्स, मच्छर, काले चश्मे और विदेशी क्रिकेटर देश में अचानक से बढ़ जाते हैं.
जंगल से ज्यादा लकड़ियां आइसक्रीम के ठेलों पर डंडी और चम्मच के रूप में मिलने लगती हैं.
अपना भविष्य बर्बाद कर चुके लोग परिचितों के घर बैठते हैं और राय दे-देकर टीनएजर्स के भविष्य के साथ खेलते हैं. शहरों में भी गमछे बढ़ जाते हैं और नेताओं के पीछे घूमने वाले चमचे घट जाते हैं. खलिहर से खलिहर आदमी व्यस्त हो जाता है क्योंकि हर शाम उसे तीन जगह शादियों में जाना होता है.
ये वो समय होता है, जब सबसे ज्यादा मौज मिस्त्रियों और इस्त्रियों से काम लेने वालों की होती है. क्योंकि गर्मी में ढेर सा बिजली का सामान फुंकता है और इस्त्री करने वालों के पास बारातों में पहनने के लिए रोज़ धुले कपड़ों का ढेर पहुंचता है.
लेकिन एक कौम अब भी है जो गर्मी से परेशान होती है, ये पसीने में तर पांच रुपये के लिए झिकझिक करने वाले रिक्शावाले नहीं होते. न वो सब्जी वाले होते हैं, जिनके पास ‘सब्जी एक दिन में सूख जाती है’ वाली शिकायत आती है. न ये वो एम्प्लोई होते हैं, जो ऑफिस के अंदर शिमला की ठंड झेलते हैं और ऑफिस से निकलते ही अलवर की गर्मी का सामना करते हैं. ये हर घर में पाए जाने वाले लड़के होते हैं. मन ही मन मान लिया जाता है कि अगर ये लड़के हैं तो बलिष्ठ भी होंगे और अगर बलिष्ठ हैं तो कूलर में पानी भर ही सकते हैं. इसलिए ये सुनिश्चित किया जाता है कि इनसे बाल्टियों में भरवा-भरवाकर कूलर में पानी डलवाया जाए.
कई जगह ऐसी प्रथा भी है कि अगर कूलर तक पाइप पहुंच सकती है तो कूलर को जान-बूझकर ऐसी जगह पर रख दिया जाता है, जहां बाल्टी लेकर ही पहुंचा जा सके. कहा जाता है कि एक बार एक लड़के ने जुगाड़ से कूलर तक पाइप पहुंचा दी थी. इस अनहोनी घटना के बाद उसके घरवालों ने कूलर को बाहरी खिड़की पर ऐसी जगह पर फिट करा दिया, जहां पहुंचने मात्र के लिए घर का आधा चक्कर लगाना पड़ता था.
इस बात का विशेष ध्यान दिया जाता है कि कूलर के आसपास ढेर से मच्छर हों, आठ साल की उम्र से कूलर में पानी भर रहे कूलेंद्र बताते हैं कि उनके घर वाले तो कूलर के पानी में ही मच्छर पाल लेते हैं ताकि कूलर खोलते ही वो उन्हें काट सकें.
मच्छरों के काटने पर लड़कों के हाथ से अक्सर पानी छलक जाया करता है. ऐसे मौकों पर “एक काम ढंग से नहीं कर सकता नालायक” कहने के लिए विशेष तौर पर बड़ी बहन या मां वहीं कहीं खड़ी रहती हैं. प्रताड़ना का दौर यहीं ख़त्म नहीं होता, इस प्लास्टिक युग में लड़कों से जान-बूझकर स्टील या लोहे की बाल्टी में पानी भरवाया जाता है. जिन बाल्टियों का वजन, उनमें आने वाले कुल पानी के वजन से भी दुगुना होता है.
नाम न बताने की शर्त पर एक युवक ने हमें ये बताया कि कई बार घर वाले और क्रूर हो जाते हैं. बजाय कूलर में सीधे पानी उड़ेलवाने के वो मग्गे से एक-एक मग्गा पानी जाली पर बने सुराख से डालने को कहते हैं. बदले में घरवालों की ये दलील होती है कि बार-बार साइड से खोलने से कूलर में लगी जाली झड़ने लगती है. ऐसी परिस्थिति में उन्हें कूलर के पास देर तक झुककर खड़े रहना पड़ता है और कमरदर्द के अलावा देर तक मच्छर उन्हें काट पाते हैं.
कुछ लड़कों का अनुभव और भी बुरा है, वो बताते हैं कि मुश्किल तब होती है जब एक तरफ आप कूलर भर रहे हों और दूसरी तरफ बाथरूम में भरने को दूसरी बाल्टी लगा आए हों. समय के साथ न चल पाने पर अगर एक चुल्लू पानी भी बाल्टी से बह जाए तो वैश्विक जल संकट पर आधे घंटे का भाषण सुनने को अलग मिल जाता है.
हमारी आत्मा तो ये जानकर कांप गई कि इतना सब करने के बाद भी अगर कभी कूलर जल गया तो लड़कों को ये सुनने को मिलता है कि तुमने ही मोटर पर पानी उड़ेल दिया होगा.
अब तक इस बड़े मुद्दे पर दुनिया के किसी नेता का ध्यान नहीं गया, न मीडिया या मानवाधिकार संगठनों ने ही इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाई. युवावर्ग खुद इसके खिलाफ आगे नहीं आ पा रहा है क्योंकि जैसे ही वो कूलर में पानी भर कर ठंडी हवा में सांस लेना चाहता है. उसे फ्रिज की बोतलें भरने में लगा दिया जाता है.
आप भी सोचिये, कहीं आप इस शोषक वर्ग मे शामिल तो नही हैं , यदि नही तो क्या आप पारिवारिक व्यवस्था को धता बताते हुये इस पारिवारिक बाल मजदूरी के खिलाफ आवाज उठाने का माद्दा रखते है

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