लेखक परिचय

राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद

लेखक मूल रूप से बस्तर (छतीसगढ) के निवासी हैं तथा वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी में प्रबंधक है। आप साहित्यिक ई-पत्रिका "साहित्य शिल्पी" (www.sahityashilpi.in) के सम्पादक भी हैं। आपके आलेख व रचनायें प्रमुखता से पत्र, पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकशित होती रहती है।

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मंगलेश डबराल प्रसंग हिन्दी साहित्य जगत के कूड़ाघर हो जाने की व्यथा कथा का उपसंहार है। यह पूरी घटना एक छटपटाहट का नतीजा है जो मेरी मुर्गी की एक टाग़ वाली प्रवृत्ति से निकली है और जिन्हें दो टाँगे दिख रही थी उन्हें भी फतवा-वितरकों ने जन्मान्ध घोषित करने के निबटा दिया। हिन्दी में रंगदारों के इलाके है मजाल कि यूं ही किसी की मनमानी चल जाये? हर इलाके के अपने अपने सुर भी है वो कहते हैं न कि साथ जियेंगे साथ लिखेंगे हम तुम सारे छैला….और चूंकि भारत विचारधाराओं का महान देश है इस लिये हर रंगदार बिरादरी का अपना चश्मा भी है जिसपर रंग-रंग की पन्नी चढी हुई है, किसी पर लाल किसी पर हरी कोई नीली कोई पीली। कहानी भी है कि पंडित जी रूस से गाय खरीद लाये (नोट: – यह अविभाजित रूस की कथा है जिस जमाने में देसी रंगदार वहाँ से जी-हुजूरी टैक्स वसूलते थे)। गाय देसी चारा देखे और बिदक जाये। आखिर में जुगाड़ किया गया। पंडित जी गाय की साईज का चश्मा बनवा लाये और उसपर चढा दी लाल पन्नी। अब गाय हपड़-हपड़ कर जो धर दीजिये गटक जाती है।

ए गो सज्जन भेटाए थे। हम अदना वो कद्दू, हम तिनका वो झाडू..वैसे तो हमारी कोई बराबरी हो ही नहीं सकती थी। ऊ हमारे किसी लेख पर खिसियाए हुए थे। हमसे बोले – जानते हो हमको हम कहाँ कहाँ छपते हैं? जितनी भी समकालीन पत्रिका है नू सब कैप्चर किये हुए हैं। यादव जी का मैगजीन हो चाहे और कौनो बडका अत्रिका-पत्रिका। हमने पूछा कि भाई साहब जी आप जो मर्जी और जहाँ मर्जी छपो हमसे मतलब? तो तुनक गये बोले मार्क्स लेनिन माओ का गोली खाओ तब बूझोगे कि साहित्य कौन ठो कौवा है (वो बोले तो चिडिया ही होंगे लेकिन एतना करकशा के बोने न कि हमको यहाँ कव्वा ही ठीक लग रहा है, फिर नाम में क्या रखा है? कव्वा भी तो चिडिया ही है न। जाति न देखो चिडिया की….।) हमने कहा कि हम तो एसे ही लिखेंगे आजादी है वो क्या कहते है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता। अब सज्जन भडक गये बोले तुम संघी जो, तुम भाजपाई हो, तुम पूरी कांग्रेस आई हो, तुम अलना हो तुम फलना हो तुम ढिमका हो। हमने कहा कि आज तक तो जो लिखा उसकी लिंग, जाति, नस्ल वगैरह वगैरह नहीं देखी। सज्जन हँस पडे बोले आपने नहीं देखी तो क्या हुआ हम लोग बराबर नजर रखते है। हमारे साथ रहिये और अनाप शनाप लिखने की जगह हम आपको जो सूची पकडा रहे हैं वो सारे हमारे खेमे के राईटर लोग है इनसे सीखिये और इनकी तरह लिखिये; फिर देखिये रातो रात आप कहाँ होंगे। मैं खुद आपकी लिखी हुई चीजों की रुव्यु लिखूंगा और आठ दस से लिखवा भी दूंगा। आपकी एसी तारीफ की जायेगी कि मियाज गनगना जायेगा। आपको प्रेमचंद का नाती और पक्का तोपचंद न बना दें तो कहियेगा। हम बेकूफी कर गये (ईमोशनल हो गये थे)। हमने कहा हमने यह नहीं हो सकेगा। वो मुस्कुरा दिये बोले फिर आपकी साहित्यिक मौत हो गयी समझिये। आप आकास फाड के या पाताल फोड के कुछ भी लिख लीजिये आपको हम लोग तबज्जो ही नहीं देंगे। सड जायेंगी आपकी किताबे और ताकते रहियेगा मुँह कि हम तो चाँद तारे तोड़ भी लाये लेकिन खुदा का नुक्ता खो गया और खेत बकरिया चर गयी।

वो जमाना भी खूब था जब रूस से बीज आता था और हिन्दुस्तान में सोच की खेती होती थी। बचेली जैसी छोटी सी जगह में ट्रक के पीछे माईक लगा कर चमचमाते जिल्द वाली किताबे लगभग मुफ्त या बहुत सस्ते बेची जाती थी जैसे आज भी मसीही साहित्य मिलता है, बिलकुल वैसे ही। परबू ईसू मसी तुम्हारा उद्धार करेंगे वाली शैली में मार्क्स एंगेल्स और लेनिन के चित्र छपी पुस्तकें तब खूब बटोरी और अपने बारीक से भेजे में जितना घुस सका घुसाने की कोशिश भी की। क्या मस्त छपाई होती थी उन किताबों कि पन्नों पे हाँथ फेर लो तो प्रेमिका से कुट्टी हो जाये। तब की साहित्यिक कम्युनिटी नें हमें गाईडेड लेक्चर भी दिये कि बालक यही परमसत्य है इसे जान लो तो साहित्यकार हो जाओगे, वरना तो कोई गुदानेगा भी नहीं। बस्तरिया पानी पीया है तो थोड़ा जिद्दी भी हो गये हैं। बात माननी आती ही नहीं। तब भी अपनी पत्रिका खुद निकालते थे वह भी प्रतिध्वनि के नाम से साईल्कोस्टाईन और आज भी अंतर्जाल को ही मंच बना रखा है। हमें तुम्हारी जी हुजूरी करनी ही नही तुम शर्मा-सिंह-पाण्डे जो भी हो मेरी बला से। मोहल्ला लाईव एक खेमेबाज ई-पत्रिका है। अगर आपको वहाँ कुछ प्रकाशित चाहिये तो कंटेंट को उसके संपादक अविनाश जी की मानसिकता से वैसे ही मैच कराना जरूरी है जैसे कि औरतें साड़ी से फॉल की मैचिंग कराती हैं। इसके बाद वो आपके परिचय को अपनी मर्जी से एडिट करेंगे आपके लेख का शीर्षक भी बदल कर आम से इमली कर देंगे। मर्जी उनकी। चूंकि बस्तर पर छपी एक किताब का वहाँ एडवर्टिज्मेंट देखा था तो हमने किताब मंगा कर पढी। लगा कि किताब के शीर्षक में बस्तर है लेकिन कंटेंट उसको जस्टीफाई नहीं करता तो बाकायदा गंभीरता से पढ़ कर उसकी समीक्षा लिखी। मोहल्लालाईव ने बहुत दिनों आना-कानी की फिर जब छापा तो साथ में काऊंटर समीक्षा छापी। धन्य हो गये हम तो, गणॆश जी को लड्डू नहीं चढा आये बस कि “समीक्षा” की “समीक्षा”। यहाँ लेखकों को आरती का थाल ले कर घूमना पड़ता है और चरणों पर लेट-लेट कर लिखवानी पड़ती हैं समीक्षायें वहाँ हमारी की गयी समीक्षा की समीक्षा। हम तो फूल कर कुप्पा हो गये। सुबह इससे भी सुहानी हुई थी, इंटरनेट खोला तो आलेख पर नजर पड़ी। हमारे नाम के आगे संघी, दक्षिणपंथी सब थोप रखा था। जहाँ तक मेरी याद्दाश्त काम करती है अविनाश से मेरी केवल एक मुलाकात हुई है वह भी ब्लॉगर्स मीट में। इससे ज्यादा न वो मुझे जानते हैं, न जानने की फुर्सत है उनको, न ही जानना चाहते होंगे? हमने फोन किया उनको, तब हटवाया। लेकिन समीक्षा की समीक्षा का शीर्षक देख कर हमने माथा पीट लिया। हम तो उन टीचर साहब से मिलने को उत्साहित हो उठे हैं जो पत्रकारिता पढाते हैं भईया लिखने वालों को कंटेंट समझने की अक्ल भी दे दो और थोड़ी शीर्षक बनाने की तमीज भी। शीर्षक था “आदिवासियों को कमजोर समझना बंद करो राजीव रंजन प्रसादों” पिताजी ने नाम एक वचन में रखा था ये बहुवचन कहाँ से आया? बहुवचन के कारण पर बात करने से पहले उस लेखक पर चर्चा जिसकी समीक्षा मैंने लिखी थी। मानता हूँ कि समीक्षा लेखक के मनमुताबिक नहीं रही होगी किंतु मैंने पूरे सम्मान के साथ किताब को अक्षरक्ष: पढ़ा और तब लिखा। मेरे उठाये सवालों के सौहार्दपूर्ण माहौल में उत्तर दिये जा सकते थे इससे विमर्श का एक वातावरण तो बनता ही। मेरी उस किताब के लेखक से न तो निजी कटुता पहले थी न ही अब है, बल्कि उनकी मेधा और कार्य से मुझे इनकार भी नहीं और यह बात मैंने अपनी समीक्षा के अंतिम अनुच्छेद में लिखी भी थी। अगर हर लेखक अपने असहमत पाठक को गालियाँ देने पर उतर आयेगा तो शायद कभी भी मुद्दों पर किसी मंच पर बात नहीं हो सकेगी। मैंने अश्विनी जी को फोन किया जिनसे समीक्षा की समीक्षा लिखवाई गयी थी। अश्विनी कुमार पंकज आदिवासी मामलों के बडे जानकार हैं तथा मेरे हृदय में उनके प्रति बहुत सम्मान है और हमेशा रहेगा। मैं उनके कार्यों को निरंतर देखता पढता रहता हूँ इस लिये मुझे यह अपेक्षा थी कि वे इतने सुलझे हुए व्यक्ति तो हैं ही कि जान सकें कि जो लेखक गुण्डाधुर और आयतुमाहरा जैसे आदिवासी वीरों की दबी कहानियों कि बाहर लाने के श्रम में जुटा हुआ है उसके लिये यह शीर्षक कितना बेमानी है। अश्विनी जी नें बताया कि शीर्षक उन्होंने नहीं लगाया है बल्कि अविनाश नें स्वयं लगाया है। अर्थात अपनी राजनीति में इस वेब पत्रिका के सम्पादक नें मेरे साथ एक इमानदार लेखक को भी घसीटा और अपमानित किया। उन्होंने यह भी बताया कि जिस किताब पर चर्चा हो रही है वह उनके द्वारा पढ़ी ही नहीं गयी है तथा अविनाश के आग्रह पर समीक्षा की समीक्षा की गयी। मैं यहाँ अश्विनी जी अथवा वह लेखक जिसकी किताब के इर्दगिर्द यह घटना है, को चर्चा का मुद्दा नहीं मानता तथा इनकी रचनात्मकता के प्रति मेरा पूरा सम्मान है। बात मोहल्ला के द्वारा किये गये इस पूरे प्रक्रम ही। वस्तुत: यह किसी बात को दबाने की सामान्य वृत्ति है किसी कथन को खारिज करने की राजनीति। यह अजीब किस्म की रंगदारी है कि – तुम कम्बख्त बोलेगा रे!! एतना मजाल तुम्हारा!!…..। जय हो अविनाश जी आप जैसे सम्पादक हों तो नाहक ही हम पत्रकारिता की मौत का रोना रोते हैं यह काम आप खुद ही दक्षता से कर रहे हैं, जय आपकी विचारधारा, जय आपकी सोच – लाल जय जय, भाड़ में जाएं पीले-हरे। यह तो अंतर्जाल माध्यम का आभार कि यह दोतरफा माध्यम है। यहाँ आप केवल लिख कर बच नहीं सकते। आपके पास वे पाठक भी हैं तो पढते हैं तो गुनते और टिप्पणी भी करते हैं पक्ष और विपक्ष में। यही कारण है कि अंतर्जाल माध्यम में चाह कर भी केन्द्रीकृत दुकानदारी चल नहीं पा रही है वरना कौन नहीं जानता कि ब्‍लॉग का एग्रीगेटर नारद क्यों बंद हुआ? सफलतम एग्रीगेटर ब्‍लॉगवाणी क्यों बंद हुआ? विवाद बनाये रखना और कीचड़ उछालते रहना अगर यही साहित्य है यही पत्रकारिता है तो इसकी “एसी की तैसी”।

इन्हीं दिनों बस्तर पर केन्द्रित मेरी किताब “आमचो बस्तर” आयी है। मुझे “विद्युत गति” से होने वाली समीक्षा का पहली बार भान हुआ। बिना किताब पढे पहली समीक्षा तो बारह घंटे के भीतर ही आ गयी थी जिसमें पूछा गया सबसे मजेदार सवाल था कि खुद को कवि मानने वाले व्यक्ति ने उपन्यास कैसे लिख डाला? अरे भईया आपके पप्पा मिले नहीं, नहीं तो उनसे जरूर पूछते कि अंकल जी अनुमति हो तो लिख लें? बाद में आपके बेटुआ को बुरा लग गया तो लुटिया डूब जायेगी हमारी। अजीब दादागिरी और अंधेरगर्दी है कि किताब पढेंगे नहीं, तर्क करेंगे नहीं, विमर्श की फुरसत नहीं लेकिन भकाभक गरियाएंगे। दस-बारह साल से मैं एक विषय पर शोध कर रहा हूँ और लिख रहा हूँ, इतनी अपेक्षा तो गालियाँ देने वाले से होगी ही कि यार पढ़ कर गालियाँ दो। आप किताब पढ़ कर यह कहें कि लेखक ने बकवास लिखा है – स्वीकार्य। कई समीक्षक तथा साथियों की कई मुद्दों पर असहमतियाँ भी प्राप्त हुई हैं जिसे पूरी विनम्रता से मैंने स्वीकार किया है। लेकिन आप पढे़ बिना खारिज करने की राजनीति केवल इस लिये करोगे कि इस उपन्यास का विमोचन मेरे प्रदेश के मुखिया ने किया है? जब काम कर रहा था तो मदद करने वाले हाथ सामने नहीं आये, जब रात दिन जानकारियों का एकत्रीकरण, सर्वे और समाजशास्त्रियों के साथ बैठक कर रहा था तब भी मैं अकेला था। कुछ मित्रों के सहयोग मिल जाने के कारण मेरा आग्रह डॉ. रमन सिंह तक पहुँचा और उन्होंने किताब का विमोचन करना स्वीकार किया। इस कार्यक्रम के मुख्य वक्ता थे साधना चैनल के सम्पादक श्री एन के सिंह तथा कार्यक्रम की अध्यक्षता की थी डॉ. प्रेम जनमेजय ने। अगले दिन समाचार प्रकाशित होने के बाद ही हुआ हुआ शुरु हो गया कि यह हुआ तो क्यों हुआ? एक स्वनामधन्य समाजसेवी हैं तथा उनका बिजनेस भी है डॉ. रमन सिंह के खिलाफ बोलते रहना, शुरू हो गये गरियाने, श्री एन के सिंह और डॉ. जनमेजय को भी पेट भर भर कर कोसा गया। डॉ. रमन सिंह राज्य के मुख्यमंत्री हैं और स्वाभाविक है कि मैं ही क्यों छत्तीसगढ के सभी लेखक यह चाहते ही होंगे कि उनकी कृति का लोकार्पण उनके हाथों से हो। इसमे विचारधारा की पूंछ पकड कर अपनी कुण्ठा निकालने की आवश्यकता क्या है? मैं तो बहुत छोटा लेखक हूँ और मेरी पहली किताब को मारने के षड्यंत्र का बहुत ध्यान से अध्ययन कर रहा हूँ। जब एक गुमनाम लेखक के साथ यह सब कुछ हो सकता है तो फिर हिन्दी का परचम बुलंद रहे मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि लेखक के सम्बोधन के साथ चमकने वाले अधिकांश चेहरे नकली ही होंगे। आ तेरी पीठ मैं खुजाता हूँ तू खुजा दे मेरी अगर ऐसा ही हिन्दी जगत है तो फिर स्तरहीनता और पाठकविहीनता का रोना किस लिये? अभी फेसबुक पर कहीं मैंने ज्ञानरंजन जी के विचार पढे थे “”केजी, अराजक, गोटीपसंद, कब्जाधारी सांस्कृतिक समाज का असर साहित्य पर भी खूब है और विवेकपूर्ण, संतुलित इतिहास दृष्टि के साथ वाला नज़रिया धूसर होता जा रहा है। अब तो प्रकाशन के बेजो़ड़ घराने भी उभर रहे हैं और वे काफ़ी हद तक तय भी करने लगे हैं। वे प्रकाशन के साथ-साथ लेखकों को भी प्रोजेक्ट करते हैं।“” इसी विमर्श को कथाकार तेजेन्द्र शर्मा जी ने आगे बढाते हुए लिखा कि “”पहले यह काम पहल जैसी पत्रिकाएं करती थीं। अपने गुट के लोगों की रचनाएं छापती थी और उनको प्रोजेक्ट करती थी। उसी के तहत पहल पुरस्कार भी आता है”।“

लेकिन यही तय लाईन नहीं है। विश्व पुस्तक पुस्तक मेले में तरुण विजय जी की किताब का विमोचन नामवर सिंह ने किया लेकिन इससे नामवर दक्षिणपंथी नहीं हुए। राहुल पंडिता की किताब ‘हलो बस्तर’ का विमोचन दिग्विजय सिंह ने किया लेकिन इससे भी वे कांग्रेसी नहीं हुए लेकिन थारी भली होवे मंगलेश डबराल कि किसी लेखक यूनियन की परमीशन तो ले लेते? अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जिस विचारधारा के लोग सबसे ज्यादा स्वांग रचते हैं वहीं सर्वाधिक कट्टरपंथिता विद्यमान है तथा खुली बहस की कोई गुंजाईश नहीं छोड़ी गयी है। मंगलेश जी मेरे प्रिय कवि आज भी हैं किंतु उनका इस घटना के बाद दिया गया स्पष्टीकरण हजम करने में बेहद तकलीफ हुई। अगर रचनाकार यह घोषणा ही कर दे कि वह फलां, जाति, समूह, लिंग, झंडे या नारे के लिये लिखता है तो फिर काहे की हिन्दी और काहे की साहित्यिक माथापच्ची? अब तो हर विचारधारा अपनी अपनी फतवा कमिटियाँ बना ले? नियम भी तय हो जाने चाहिए कि किसके साथ कौन दिखेगा, किसके फेवर में लिखेगा, किसकी दावत में खायेगा और किसका फीता काटने जायेगा?

9 Responses to “हिन्दी जगत में बनाई जाएं फतवा कमेटियाँ / राजीव रंजन प्रसाद”

  1. नितेश नंदा

    राजीव जी आपके लेख में भाषा व्यंग्य का तरीका और कहने की शैली को ले कर की गयी श्रीराम तिवारी की टिप्पणी मजेदार है और मुझे यकीन है ये आदमी वामपंथी ही होगा और उसी जमात में शामिल जिस पर तान कर आपने तीर मारा है। आपका व्यंग्य सार्थक हुआ क्योंकि लगा भी सही जगह पर है। रही बात बदसूरत तस्वीर की तो लोग न आईना देखते हैं न अपने गिरेबान में झांकते हैं। आग्रह और दुराग्रह का जवाब तो श्रीराम महोदय को उनसे ही मिलेगा जो हर लेखक मंच सफाई देते घूम रहे है।

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  2. श्रीराम तिवारी

    shriram tiwari

    यदि ऐसी ही बदसूरत तस्वीर है उनकी -जिन्हें इस घटिया अनगढ़ , लबार और भद्दे आलेख में धुल धूसरित करने की कुचेष्टा की गई है तो दक्षिणपंथी साम्प्रदायिक मंच द्वारा उन्हें पटाने,रिझाने और अपने खेमे की ओर जबरिया मंचासीन किये जाने का इतना दुराग्रह क्यों?

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  3. डॉ. मधुसूदन

    डॉ. मधुसूदन उवाच

    वाह! वाह!
    आनन्द आ गया।
    पढते पढते, लगा कि चिडवा, खा रहे हैं।
    और बीच बीच में गुलाब जामुन का स्वाद भी चख रहे हैं।
    लगे रहो।

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  4. विकास सैनी

    शानदार लेख। बिना लाग लपेट के। कुछ लोग पूर्वग्रहों के साथ काम करते हैं, यह गलत है।

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  5. सौरभ कुमार

    देश में सभी वादों की दुकान बंद होनी चाहिए। ये वाद दिमाग को तंग बनाते हैं। बस, सामाजिक चेतना में बदलाव होते रहना चाहिए। नागरिक बोध प्रबल रहना चाहिए। मनुष्‍य का मन करुणा और संवेदना से ओतप्रोत होना चाहिए। व्‍यक्ति वाद के चौखटे में कैद होकर बंधुआ मजदूर की तरह विवेकहीन कर्म करता रहता है, यह दुर्भाग्‍यपूर्ण है।

    राजीव जी को विचारोत्तेजक लेख के बधाई।

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  6. gaurav jain

    If he can’t read Amcho baster then i would advise to him, kindly read the article written by Rajiv Ji on his blog, afterthat he should decide who know more about the main problem of Baster without using this red Chasma.

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  7. gaurav jain

    Dear Sir Rajiv Ji,
    I am not a writer, poet and.., i am a reader of such books that are related to any country issue.I have read your book Amcho Bastar if somebody says “Aadivasiyon ko kamjor mat samjho Rajiv Rajan Prasdo” then i would suggest to him kindly read the Amcho Bastar and then write such comment.

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