लेखक परिचय

राजीव रंजन प्रसाद

राजीव रंजन प्रसाद

लेखक मूल रूप से बस्तर (छतीसगढ) के निवासी हैं तथा वर्तमान में एक सरकारी उपक्रम एन.एच.पी.सी में प्रबंधक है। आप साहित्यिक ई-पत्रिका "साहित्य शिल्पी" (www.sahityashilpi.in) के सम्पादक भी हैं। आपके आलेख व रचनायें प्रमुखता से पत्र, पत्रिकाओं तथा ई-पत्रिकाओं में प्रकशित होती रहती है।

लेखक के विरोध का तरीका केवल लेखन है

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राजीव रंजन प्रसाद व्यवस्था के विरुद्ध सभी लड़ाईयों में जो सर्वाधिक कारगर हथियार सिद्ध होता रहा है वह है – कलम। सामाजिक-सांस्कृतिक आन्दोलन हों अथवा साम्प्रदायिक असहिष्णुताओं को समरसताओं में कायांतरित किये जाने के प्रयास, यह अब तक लेखकों के कंधों का दायित्व रहा है। व्यवस्था कोई भी हो और सरकारें कैसी भी हों, लेखन… Read more »

दुर्गा-महिषासुर प्रसंग, फॉरवर्ड प्रेस में गिरफ्तारियाँ और बौद्धिक लफ्फाजियाँ

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राजीव रंजन प्रसाद  अभिव्यक्ति की नियति जहर की तरह है, यह संयम और सोचपूर्णता से प्रयुक्त हो तो ओषधि है और यूं ही गटकनी पडे तो प्राणघाती। ताजा चर्चा जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, नई दिल्ली में आयोजित महिषासुर दिवस तथा फॉरवर्ड प्रेस के अक्टूबर अंक में प्रकाशित कतिपय सामग्री की है जिसपर स्वाभाविक विवाद हुआ और… Read more »



प्रशांत भूषण पर ही जनमत संग्रह क्यों न करा लिया जाये ?

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-राजीव रंजन प्रसाद-    यह सही है कि आम आदमी पार्टी का उदय जिस दृष्टिकोण के साथ हुआ, उसके केन्द्र में भ्रष्टाचार से त्राहि-त्राहि करते आम लोग ही हैं। आम आदमी पार्टी से लोगों की अपेक्षायें जिस तेजी से बढ़ी, उतनी ही शीघ्रता से इस पार्टी ने स्वयं को प्रसारित-प्रचारित करने वाली राजनीति को भी… Read more »

तोड़ने ही होंगे मठ और गढ़ सब

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 राजीव रंजन प्रसाद तहलका प्रकरण किसी एक व्यक्ति या एक संस्था पर प्रश्नचिन्ह नहीं है। यह गढ़ों और मठों के टूटने की कड़ी में एक और महत्वपूर्ण घटना है। वैचारिक असहिष्णुता और विचारधारात्मक अस्पृश्यता के वातावरण में जब यह घटना घटी तो अनायास ही इसके सम्बन्ध समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिशास्त्र से जुड़ने लगे। एक आम… Read more »

तहलका युग के मुखौटे

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राजीव रंजन प्रसाद यह तहलका युग है; यहाँ धमाकों पर चर्चा अवश्यम्भावी है। इस देश ने तालियाँ बजा कर उन खुफिया कैमरों की तारीफ की जिसने पैसे लेते हुए बंगारू लक्ष्मण को कैद किया और उनका राजनैतिक जीवन हमेशा के लिये समाप्त कर दिया, जिसने क्रिकेट के चेहरे से नकाब उतारी जिसके बाद जडेजा तथा… Read more »

विचारों के कठमुल्ले

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राजीव रंजन प्रसाद फेसबुक पर जगदीश्वर चतुर्वेदी जी का आलेख पढ रहा था जहाँ उन्होंने बडे ही कठोर शब्दों में लिखा है – “हिंदी में कठमुल्ले मार्क्सवादी वे हैं जो मार्क्सवाद को विकृत ढ़ंग से प्रचारित करते हैं। इनमें यह प्रवृत्ति होती है कि अपने विचार थोपते हैं”। वस्तुत: हिन्दी के हर नवोदित लेखक को… Read more »

“प्रवक्ता” का लेखक होना मेरे लिये गर्व का विषय है / राजीव रंजन प्रसाद

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ई-पत्रिकाओं के इतिहास को अभी बमुश्किल पाँच-छ: वर्ष ही हुए हैं। आरंभ में इन्हें गंभीरता से नहीं लिया गया; बीतते समय के साथ एक नये शब्द का सृजन हुआ – वैकल्पिक मीडिया। अब यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि विश्वसनीयता के लिये वैकल्पिक माध्यमों की ओर ही गंभीरतापूर्वक देखा जाता है। “प्रवक्ता” के साथ मेरा… Read more »

महिषासुर के नाम पर विचारधारा की जंग?

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राजीव रंजन प्रसाद धीमा जहर कैसे फैलाया जाता है और मिथक कथाओं के माध्यम से सर्वदा विद्यमान जातिगत खाइयों को किस तरह चौड़ा किया जा सकता है इसका उदाहरण है इन दिनों महिषासुर पर चलाई जा रही कुछ चर्चाएं। बस्तर में सिपाहियों की शहादत पर दारू छलका कर जश्न मनाने वाले जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली… Read more »

अभिव्यक्ति और प्रतिबन्ध [व्यंग्य]

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राजीव रंजन प्रसाद  “सर जी सहारा प्रणाम”  “काहे का सहारा वो तो डूब गया भाई, और कौन सा प्रणाम? आज कल हम लाल सलाम करते हैं”  “कल तक तो वहीं की गा रहे थे”  “भाई वो खिला रहे थे, हम खा रहे थे”  “कल यह लाल कहीं हरा, नीला या पीला हो गया तो?”  “देख… Read more »

“भारतीय भाषाओं के हक के लिये …..”

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राजीव रंजन प्रसाद मुल्ला नसीरुद्दीन की बोलने वाली बकरी की कथा सर्वव्यापी है। बाजार में सबसे मंहगी बकरी बिक रही थी। राजा पहुँच गया विशेषतायें जानने। मुल्ला ने कहा कि बोलती है मेरी बकरी हुजूर और वह भी आदमी की भाषा में। बुलवाया गया बकरी से। मुल्ला ने सवाल किया कि बता यहाँ बकरी कौन?… Read more »